Белинский Виссарион Григорьевич
Письма 1829-1848 годов

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    По изданию 1982 г.


  
   Белинский В. Г. Собрание сочинений. В 9-ти т. Т. 9. Письма 1829--1848 годов.
   М., "Художественная литература", 1982.
  

СОДЕРЖАНИЕ

   1. Г. Н. и М. И. Белинским. 26--30 сентября 1829
   2. Л. П. и Е. П. Ивановым. 21--31 декабря 1829
   3. Г. Н. и М. И. Белинским. Около 5 января 1830
   4. М. М. Попову. 30 апреля 1830
   5. Г. Н. и М. И. Белинским. 22 января 1831
   6. Г. Н. и М. И. Белинским. 17 февраля 1831
   7. М. И. Белинской. 21 мая 1833
   8. К. Г. Белинскому. 20 сентября 1833
   9. М. И. Белинской. 25 мая 1834
   10. Н. А. Полевому. 26 апреля 1835
   11. Н. А. Полевому. 19 сентября 1835
   12. А. П. Ефремову. Между 16--31 декабря 1836
   13. А. А. Краевскому. 14 января 1837
   14. Н. А. Полевому. 25 января 1837
   15. А. А. Краевскому. 4 февраля 1837
   16. К. С. Аксакову. 21 июня 1837
   17. М. А. Бакунину. 28 июня 1837
   18. Д. П. Иванову. 3 июля 1837
   19. Д. П. Иванову. 7 августа 1837
   20. К. С. Аксакову. 14 августа 1837
   21. М. А. Бакунину. 16 августа 1837
   22. М. А. Бакунину. 21 сентября 1837
   23. М. А. Бакунину. 1 ноября 1837
   24. М. А. Бакунину. 15 ноября 1837
   25. К. С. Аксакову. Между 16--20 ноября 1837
   26. М. А. Бакунину. Между 15--20 ноября 1837
   27. М. А. Бакунину. 21 ноября 1837
   28. М. А. Бакунину. 3 января 1838
   29. А. А. Беер. 13 января 1838
   30. М. А. Бакунину. 14 января 1838
   31. И. И. Панаеву. 26 апреля 1838
   32. М. А. Бакунину. 9-27 мая? 1838
   33. М. А. Бакунину. 20--21 июня 1833
   34. М. А. Бакунину. 18--19 июня 1838
   35. А. П. Ефремову. 1 августа 1838
   36. И. И. Панаеву. 10 августа 1838
   37. В. П. Боткину. 12 августа 1838
   38. М. А. Бакунину. 13--15 августа 1838
   39. М. А. Бакунину. 16--17 августа 1838
   40. А. В. Кольцову. 25 августа или 5 сентября 1838
   41. М. А. Бакунину. 10 сентября 1838
   42. Н. В. Станкевичу. 5--8 октября 1838
   43. М. А. Бакунину. 12--24 октября 1838
   44. Н. В. Станкевичу. 8 ноября 1838
   45. В. П. Боткину. 10--16 февраля 1839
   46. И. И. Панаеву. 18 февраля 1839
   47. И. И. Панаеву. 22 февраля 1839
   48. И. И. Панаеву. 25 февраля 1939
   49. К. С. Аксакову. Март -- апрель 1839
   50. Н. В. Станкевичу. 19 апреля 1839
   51. М. А. Бакунину. 15-23 мая? 1839
   52. А. А. Краевскому. 5 июля 1839
   53. А. А. Краевскому. 19 августа 1839
   54. И. И. Панаеву. 19 августа 1839
   55. А. А. Краевскому. 24 августа 1839
   56. Н. В. Станкевичу. 29 сентября -- 8 октября 1839
   57. В. П. Боткину. 22 ноября 1839
   58. В. П. Боткину. 16 декабря 1839--10 февраля 1840
   59. К. С. Аксакову. 10 января 1840
   60. В. П. Боткину. 3--10 февраля 1840
   61. В. П. Боткину. 18--20 февраля 1810
   62. Д. П. Иванову. 21 февраля 1840
   63. В. П. Боткину. Около 22 февраля 1840
   64. В. П. Боткину. 24 февраля -- 1 марта 1840
   65. М. А. Бакунину. 26 февраля 1840
   68. В. П. Боткину. 14--15 марта 1840
   67. В. П. Боткину. 19 марта 1810
   68. М. А. Бакунину. 14--18 апреля 1840
   69. В. П. Боткину. 16--21 апреля 1840
   70. Н. Х. Кетчеру. 16 апреля 1810
   71. М. А. Языкову. 16 апреля 1810
   72. В. П. Боткину. 24 апреля 1840
   73. П. Н. Кудрявцеву. 24 апреля 1840
   74. В. П. Боткину. 16 мая 1840
   75. В. П. Боткину. 13 июня 1840
   76. К. С. Аксакову. 14 июня 1840
   77. В. П. Боткину. 12 августа 1840
   78. Н. Х. Кетчеру. 16 августа 1840
   79. К. С. Аксакову. 23 августа 1810
   80. А. П. Ефремову. 23 августа 1810
   81. А. Я. Кульчицкому. 3 сентября 1840
   82. В. П. Боткину. 5 сентября 1840
   83. В. П. Боткину. 4 октября 1840
   84. В. П. Боткину. 25 октября 1840
   85. В. П. Боткину. 31 октября 1840
   86. В. П. Боткину. 10--11 декабря 1840
   87. В. П. Боткину. 26 декабря 1840
   88. В. П. Боткину. 30 декабря 1840--22 января 1841
   89. А. Н. Струговщикову. 20--29 января 1841
   90. В. П. Боткину. 1 марта 1841
   91. В. П. Боткину. 13 марта 1841
   92. Н. Х. Кетчеру. Конец марта -- начало апреля? 1841
   93. Н. А. Бакунину. 6--8 апреля 1841
   94. В. П. Боткину. 9 апреля 1841
   95. А. А. Краевскому. 9--10 апреля 1841
   96. А. А. Краевскому. 9--10 апреля 1841
   97. В. П. Боткину. 27-28 июня 1841
   98. П. Н. Кудрявцеву. 28 июня 1841
   99. А. А. Краевскому. 18--19 июля 1841
   100. Н. Х. Кетчеру. 3 августа 1841
   101. Н. Х. Кетчеру. 25 августа 1841
   102. В. П. Боткину. 8 сентября 1841
   103. Н. А. Бакунину. 9 декабря 1841
   104. В. П. Боткину. 14 марта 1842
   105. В. П. Боткину. 17 марта 1842
   106. В. П. Боткину. 31 марта 1842
   107. В. П. Боткину. 4 апреля 1842
   108. М. Н. Каткову и А. П. Ефремову. 6 апреля 1842
   109. В. П. Боткину. 13 апреля 1842
   110. М. С. Щепкину. 14 апреля 1842
   111. В. П. Боткину. 15--20 апреля 1842
   112. Н. В. Гоголю. 20 апреля 1842
   113. В. П. Боткину. Начало июля 1842
   114. В. П. Боткину. Начало июля 1842
   115. Н. А. Бакунину. 7 ноября 1842
   116. В. П. Боткину. 23 ноября 1842
   117. И. И. Панаеву. 5 декабря 1842
   118. В. П. Боткину. 9--10 декабря 1842
   119. В. П. Боткину. 6 февраля 1843
   120. А. А., В. А., Н. А. и Т. А. Бакуниным. <22--23 февраля 1843>
   121. А. А., Н. А. и Т. А. Бакуниным. 8 марта 1843
   122. В. П. Боткину. 9 марта 1843
   123. В. П. Боткину. 31 марта -- 3 апреля 1843
   124. В. П. Боткину. 17 апреля 1843
   125. И. С. Тургеневу. Около 20 апреля 1843
   126. В. П. Боткину. 30 апреля 1843
   127. В. П. Боткину. 10--11 мая 1843
   128. В. П. Боткину, и А. И. Герцену. 24 мая 1843
   129. А. А. Краевскому. 26 июня 1843
   130. А. А. Краевскому. 8 июля 1843
   131. И. С. Тургеневу. 8 июля 1843
   132. А. А. Краевскому. 22 июля 1843
   133. М. В. Орловой. 3 сентября 1843
   134. М. В. Орловой. 3--4 октября 1843
   135. И. С. Тургеневу. Около 13 декабря 1844
   136. А. И. Герцену. 26 января 1845
   137. Ф. М. Достоевскому. Ноябрь 1845 -- первая половина января 1846
   138. А. И. Герцену. 2 января 1846
   139. А. И. Герцену. 14 января 1846
   140. А. И. Герцену. 26 января 1846
   141. А. И. Герцену. 6 февраля 1846
   142. А. И. Герцену. 19 февраля 1846
   143. А. И. Герцену. 20 марта 1846
   144. В. П. Боткину. 26 марта (6 апреля) 1846
   145. П. Н. Кудрявцеву. 26 марта 1846
   146. А. И. Герцену. 6 апреля 1846
   147. П. Н. Кудрявцеву. 15 мая 1846
   148. М. В. Белинской. 11--12 июня 1846
   149. А. И. Герцену. 4 июля 1846
   150. Н. М. Щепкину. 30 июля 1846
   151. А. И. Герцену. 6 сентября 1846
   152. В. П. Боткину. 29 января 1847
   153. В. П. Боткину. 6 февраля 1847
   154. В. П. Боткину. 7 февраля 1847
   155. В. П. Боткину. 17 февраля 1847
   156. И. С. Тургеневу. 19 февраля (3 марта) 1847
   157. В. П. Боткину. 26 февраля 1847
   158. В. П. Боткину. 28 февраля 1847
   159. П. В. Анненкову. 1/13 марта 1847
   160. И. С. Тургеневу. 1/13 марта 1847
   161. В. П. Боткину. 4 марта 1847
   162. В. П. Боткину. 8 марта 1847
   163. В. П. Боткину. 15-17 марта 1847
   164. И. С. Тургеневу. 12/24 марта 1847
   165. В. П. Боткину. 22 апреля 1847
   166. В. П. Боткину. 5 мая 1847
   167. М. В. Белинской. 24 мая/5 июня 1847
   168. В. П. Боткину. 7/19 июля 1847
   169. П. В. Анненкову. 17/29 сентября 1847
   170. В. П. Боткину. 4--8 ноября 1847
   171. П. Н. Кудрявцеву. 8 ноября 1847
   172. П. В. Анненкову. 20 ноября/2 декабря 1847
   173. К. Д. Кавелину. 22 ноября 1847
   174. П. В. Анненкову. 1--10 декабря 1847
   175. В. П. Боткину. 2--6 декабря 1847
   176. К. Д. Кавелину. 7 декабря 1847
   177. А. Д. Галахову. 4 января 1818
   178. П. В. Анненкову. 15 февраля 1848
   179. М. М. Попову. 27 марта 1818
   Примечания
   Указатель писем по адресатам
   Указатель имен
   Указатель периодических изданий
  

1. Г. Н. и M. И. БЕЛИНСКИМ

26--30 сентября 1829. Москва

   Любезные родители: папенька Григорий Никифорович и маменька Марья Ивановна!
   С живейшей радостию и нетерпением спешу уведомить вас, что я принят в число студентов императорского Московского университета1. Меня не столько радует то, что я студент, сколько то, что сим могу доставить вам удовольствие. Я, с своей стороны, сделал все, что только мог сделать: я перед вами оправдался. Тем более меня радует и восхищает принятие в университет, что я оному обязан не покровительству и стараниям кого-нибудь, но собственно самому себе. Хотя Лажечников и просил обо мне двух профессоров2, но его просьба потому осталась недействительна, что в то время, когда я держал экзамен, вместо их другие были назначены экзаминаторами. Генерал Дурасов тоже в сем случае мне нимало не помог. Впрочем, он тем сделал мне большую пользу, что собственноручною распискою поручился в том, что я буду всегда ходить в форменной одежде и поведением своим не нанесу никакого начальству беспокойства3. По уставу каждый студент должен найти себе поручителя; поручаться же может отец, родственник и всякой чиновный человек. Я получил от вас свидетельство о рождении 11 числа, в середу, просьбу подал 12 числа, экзамен держал 19, табель получил 21. Итак, я теперь студент и состоюсь в 14 классе, имею право носить шпагу и треугольную шляпу. 25 числа подал я просьбу в совет императорского Московского университета о принятии меня на казенный кошт. Решение на мою просьбу выйдет около Рождества Христова, а не прежде, и до тех пор я должен жить на своем коште. Мне необходимо нужно сшить студенческий вицмундир с форменными панталонами и черным жилетом. Когда Капитолина Степановна поедет в Чембар, то с ее людьми пришлю вам фрак с панталонами, обе жилетки, тюфяк, одеяло, тулуп, картуз и проч. Так как меня определят на казенный кошт не ближе трех месяцев, а в партикулярной одежде ходить на лекции невозможно, то сделайте одолжение, пришлите мне денег на вицмундир, панталопы, форменную черную жилетку и форменную шинель. На вицмундир я куплю такого сукна по 5 руб. аршин, какого у вас в Чембаре или Пензе за 10 нельзя купить. На шинель я куплю серого сукна рубля по 4 за аршин. Сверх того, надобно не менее полуаршина купить малинового сукна на воротник и отвороты к вицмундиру, на воротник к шинели, на выпушку и на околыш картуза и на выпушку на панталоны. Сверх того, надобно купить желтых пуговиц и проч. Это письмо заключает в себе последние просьбы, которыми я вас обеспокоиваю. Скоро уже я перестану быть вам в тягость. Если к сему удастся найти хорошую кондицию, то я не только ничего от вас не буду требовать, но еще стану помогать братьям. Я сошел от Ольги Матвевны и теперь стою вместе с Максимовым и Слепцовым, братом того Слепцова, который был у вас помощником, на своих хлебах, в доме Колесникова, у портного Козакова, в двух шагах от университета4. Мы платим за комнату по 20 ас, и у нас на содержание в день выходит у всех троих не более рубля. Сверх того, с нами живет Слепцова мальчик для услуг. Я начал ходить на лекции и записался на первый академический год у следующих профессоров словесного отделения: у
   Каченовского, который читает историю русскую и статистику,
   Победоносцева, который читает словесность,
   Терновского, " " богословие,
   Улърихса, " " всеобщую историю,
   Кубарева, " " латинскую словесность,
   Еннекеня, " " французскую словесность,
   Кистера, " " немецкую "
   Оболенского, " " греческую "
   Больше писать некогда, ибо тороплюсь на лекции. В следующем письме буду писать пространнее. Пожалуйста, не оставьте меня присылкою денег на вышеописанную форменную одежду и на содержание. Без форменной одежды мне запретят ходить на лекции. Прощайте. Остаюсь любящий и почитающий вас сын ваш, студент императорского Московского университета

Виссарион Белинский.

   Вот мой адрес:
   Его благородию м. г. В. Г. (Белинскому) своекоштному студенту императорского Московского университета, живущему в 4-м квартале Тверской части, на Тверской улице в дохме купца Колесникова, у портного Козакова.
  

2. А. П. и Е. П. ИВАНОВЫМ

21--31 декабря 1829. Москва

  

ЖУРНАЛ МОЕЙ ПОЕЗДКИ В МОСКВУ И ПРЕБЫВАНИЕ В ОНОЙ1

   Я расстался с вами с чувством совершенной холодности и спокойствия: мне казалось, что я еду не далее Владыкина2. Разговаривая, шутя и смеясь с Иваном Николаевичем, мы неприметно доехали до оного. Я тотчас пошел к Степану Михайловичу. Из его слов и из последующих обстоятельств я очень ясно увидел, что если бы не он, то не ехать бы мне в Москву с Иваном Николаевичем. Николай Михайлович, весьма преизобильно нагруженный дарами щедрого Бахуса, узнавши, что я еду с его сыном, ужасно рассвирепел. Несмотря на присутствие Степана Михайловича, он то кричал, то говорил мне в глаза, что я ничего не могу описать вам, а только скажу, что никакое перо не в состоянии описать тех чувств, которые возбудило во мне его пленительное, очаровательное красноречие. Окруженный его придворным штатом, я ничего не помнил и ничего не чувствовал, только в уме моем невольным образом вертелся стих Долгорукова: "О бедность, горько жить с тобою!" И хотя я и вспомнил другой стих сего же писателя: "Терпи -- и будешь атаман!"3, однако он меня очень мало утешал. На другой день, часов в девять, мы выехали из Владыкина и ночью часов в одиннадцать приехали в Ломов, до которого провожала нас с детьми Лукерья Савельевна. На другой день поутру, простившись со всеми, мы отправились на Спасск, в который и приехали ночью. Увидевши Ломов, так сказать, мельком, я подумал, что нет в России города хуже Чембара по строению; увидевши же Спасск, я узнал всю несправедливость и неосновательность моего заключения. Этот городишко не стоит и того, чтобы об нем говорить: представьте себе, он не имеет казенного дома для присутственных мест, которые размещены по разным лачугам; нет ни одного каменного дома, только домов десяток, крытых тесом; одна только церковь; словом, Спасск есть не что иное, как довольно хорошее село и довольно гнусный городишко. Впрочем, я это говорю-то о наружном, а не внутреннем его достоинстве. Постоялые дворы в нем превосходны. От Ломова до Спасска 50 верст. От Спасска пойдет дорога песчаная, и земля принимает цвет светло-серый. Чем далее едешь, тем более песчаность умножается. На дороге от Спасска до Старой Рязани мы переправлялись на пароме через Цну. Вы не можете себе представить, в каком я был восхищении, но оное еще более усугубилось, когда мне сказали, что будем еще два раза переправляться чрез Оку. Цна довольно быстра и широка: по ней ходят барки, которые я в первый раз увидел. От Цны дорога так песчана, что в иных местах колеса
   увязали почти по ступицу. Чем земля песчаное, тем лесистее. Одним лесом мы ехали около 15 верст, п весь этот лес состоит по большей части из строевого сосняку. По сему изобилию в лесе в деревнях, чрез которые мы проезжали, не только избы построены из прекрасного соснового леса и покрыты тесом, но и самые сараи и амбары построены из оного.
   Не могу упомнить, во сколько дней мы доехали до Старой Рязани. Не доезжая до оной за полверсты, я увидел два земляные вала в очень близком друг от друга расстоянии, из коих ближайший к Старой Рязани гораздо выше. Впрочем, оба довольно поразвалились, и на них пасутся стада. Старая Рязань есть не что иное, как деревня, едва ли состоящая дворов из пятидесяти, но селение, достопримечательное своею древностию. Это был прежде большой пограничный город. Прежде владения России, от сердца ее -- Москвы, простирались на восток только до Старой Рязани. А теперь?..
   Всем известно происшествие, назад тому около семи лет случившееся в Старой Рязани: один мужик, копая в валу землю, нашел некоторое количество драгоценных камней, золота и серебра. Все сие он представил правительству, от которого и получил 10 000 р. награждения. Хозяин постоялого двора, на котором мы остановились, сказывал нам, что часто, копая землю, находят здесь огромные своды. Из этого должно заключить, что здесь был некогда большой город. Какие пленительные и, можно сказать, единственные виды представляет Старая Рязань с своими окрестностями. Представьте себе высокую равнину, которая оканчивается такою крутою, неприступною горою, что пеший человек едва может, и то в некоторых только местах, взобраться на оную. В левой стороне на покатой горе, и как бы в яме, стоит Рязань, а при подошве течет широкая Ока, которая, разделяясь на две части, делает довольно большой остров и одною своею частию омывает живописный берег стоящего противу Старой Рязани городка Новоспасска. Ежели станете на горе лицом к Оке, то какое величественное и восхитительное зрелище представится изумленным очам вашим: у подошзы крутизны, под ногами вашими, гордо расстилается быстрая Ока, покрытая барками; низкий, почти равный с Окою противоположный берег, желтый, песчаный, как необозримое море, теряется в своем пространстве и граничит с горизонтом в левой стороне; на возвышенном месте, которое, однако ж, гораздо ниже крутизны, на которой вы стоите, стоит Новоспасск. О, с каким восторгом, с какою гордостию, стоя на помянутой крутизне, я обозревал сии восхитительные виды! Эти места достойны, чтобы на них стоял столичный город. Если бы хотя уездный хорошо выстроенный городок стоял на горе, то бы и тогда был вид, превосходящий всякое описание! Новоспасск строением хуже нашего Чембара, но лучше Спасска: в нем довольно каменных домов.
   Сей город стоит почти весь в лесу, и из-за дерев виднеются белые домишки с красными крышами, и потому он представляет прелестнейший ландшафт, тем самым более возвышает прелесть и пленительную красоту сих мест. От Старой Рязани до него не более полуверсты. Мы в Старой Рязани останавливались кормить лошадей, и потому я имел довольно времени для осмотрения сих окрестностей. День был прекраснейший, солнце было на полудне. От Спасска до Старой Рязани 150 верст.
   От Старой Рязани до губернского города Рязани ничего достопримечательного я не заметил, кроме того, что в селах и деревнях избы построены из прекрасного соснового леса и крыты тесом, что в оных много есть двухэтажных деревянных и каменных домов, особенно в первых, в которых видна вся прелесть русской деревенской архитектуры. Ворота, окошки и крыши изукрашены резьбою. Постоялые дома почти все без исключения двухэтажные. Таковы села и деревни почти до самой Москвы. В одной из комнат постоялого дома, между площадными, мазаными картинами, коими обита была вся комната, я увидел портреты: Паскевича Эриванского и Конари, одного из полководцев новой Греции. От Старой Рязани до Новой 50 верст.
   На сей дороге случилось со мною небольшое приключение, которое стоит того, чтоб рассказать вам его. Однажды в полдень, уснувши в своей кибитке, я был пробужден громким разговором Ивана Николаевича с кем-то незнакомым. Встаю, гляжу и вижу едущую позади нас цыганку. Взглянувши на меня, она сказала, что умен, доброе лицо, что (признаюсь в слабости) мне было неприятно. По обыкновению она предложила мне известную услугу: поворожить. От скуки и для смеха я согласился на ее предложение и подал ей руку. Между многими глупостями, которые обыкновенно врут сии пророчицы, меня чрезвычайно удивили следующие слова: "Люди почитают и уважают тебя за разум, только языком не сшибайся. Ты едешь получить и получишь, хотя и сверх чаяния". Неудача моя в рассуждении поступления в университет заставила меня смеяться над последними словами сей пифии, но принятие в оный привело мне на память ее слова, довольно удивительные. Наконец мы приехали в Рязань. Не буду много хвалить сей город, только скажу, как Чембар хуже Пензы, так Пенза хуже Рязани. Но пока довольно; в следующий раз буду писать пространно об Рязани и продолжать мой журнал.
   Рязань есть первый истинно хороший город, который я увидел. Правильное расположение улиц, их чистота, прекрасные строения, гостиные ряды, лавки,-- все это привело меня в крайнюю степень восторга и удивления. Я тут в первый раз, собственным своим опытом узнал, что в России есть прекрасные города. В Рязани улицы часто пересекаются глубокими оврагами, но через эти овраги, во всю ширину их, проведены прекрасные мосты, столь длинные, что улицы чрез них делаются совершенно ровными. Из великого числа прекрасных строений мне особенно понравилась губернская гимназия, которая наружным видом гораздо лучше московской. По приезде на постоялый двор, я первым долгом поставил побродить по улицам Рязани для осмотрения оной. Едва отошел от своей квартиры на десять шагов, как увидел подходящую ко мне духовную особу. Служитель алтарей, поровнявшись со мною, снял шляпу, как со старинным знакомым лицом, раскланялся и, пожелав доброго здоровья, козлиным голосом проблеял: "Милостивый государь! Пожалуйте отцу Ивану на бедность две копеечки". Я догадался, что в кармане достопочтеннейшего отца Ивана обретается только шесть копеек и, следовательно, недостает двух. Молча подал я ему два гроша. Тронутый и удивленный такою необычайною щедростию, он осыпал меня благословениями, благодарениями и со всех ног пустился бежать... куда же? В кабак, который находился от нас в нескольких шагах. Пожелав мысленно святому отцу повеселиться в храме Бахуса, я пошел далее. Не могу вам описать всех достопримечательностей Рязани, всех впечатлений, которые она на меня произвела... Скажу вам только, что я почитал себя перенесенным невидимою силою в прелестное царство очарований и так разгулялся по этому царству-государству, что с большим трудом мог найти свою квартиру и то уже случайно. Петр увидел меня в окно, идущего по противоположной стороне, и кликнул. Измученный усталостию и голодом, я вошел в нашу комнату, где увидел сопутников моих, расположившихся обедать, и, не заставляя себя долго просить, бросился на лавку, схватил ложку и начал очень прилежно работать. Долго смеялись насчет моей прогулки и того, что я запутался. Наконец мы выехали и через день или два приехали в Коломну (уездный город Московской губернии).
   Коломна хуже Рязани, но лучше Пензы, и вся состоит из двух- и трехэтажных домов. В ней живет по большей части купечество. Мы только проезжали чрез этот город. Он имеет порядочную крепость, но услужливые господа французы разорили оную, и теперь она находится в самом жалком положении. От Коломны до Бронниц 50 верст.
   Бронницы довольно плохой городишко, однако лучше Чембара. Он почти весь состоит из каменных строений, но главный его недостаток состоит в том, что в оных виден мещанский вкус. Присутственные места оного построены по плану наших чембарских, только менее оных. Впрочем, я очень доволен остался этим городком, ибо нашел в нем прекрасный трактир. Закусивши в оном, мы пошли походить по городу. Он стоит при реке Москве. Долго мы ходили около новопостроенной церкви и от скуки читали надгробные надписи, которых нашли очень много. Почти все эти эпитафии написаны стихами, по красоте и изяществу коих не трудно было догадаться, что они сочинены записным сего города рифмачом (и достойным соперником двух чембарских).
   Вот вам две из них:
  
             1
   О, друг! Твой милый прах
   Давно в сырой земле лежит;
   Но огонь любви в сердцах
   Всегда у нас к тебе горит.
  
             2
   Здесь два птенца, с сестрою брат, положены,
   Одна свет видела не многи дни,
   Друг едва взглянул --
   Заснул.
  
   От сего города до Москвы, кажется, 50 верст. Выехавши из оного, мы ночевали в одном селе. Поутру, часов в 8, мы приехали в Москву. Еще вечером накануне нашего в нее въезда, за несколько до нее верст, как в тумане, виднелась колокольня Ивана Великого.
   Мы въехали в заставу. Сильно билось у меня ретивое, когда мы тащились по звонкой мостовой. Смешение всех чувств волновало мою душу. Утро было ясное. Я протирал глаза, старался увидеть Москву и не видел ее, ибо мы ехали по самой средственной улице. Наконец приблизились к Москве-реке, запруженной барками. Неисчислимое множество народа толпилось по обеим сторонам набережной и на Москворецком мосту. Одна сторона Кремля открылась пред нами. Шумные клики, говор народа, треск экипажей, высокий и частый лес мачт с развевающимися разноцветными флагами, белокаменные стены Кремля, его высокие башни -- все это вместе поражало меня, возбуждало в душе удивление и темное смешанное чувство удовольствия. Я почувствовал, что нахожусь в первопрестольном граде,-- в сердце царства русского.
   Долго мы стояли на набережной, ибо Петр ходил к Владимиру Федоровичу и Надежде Матвеевне для испрошения у них позволения остановиться на время в их доме. Получивши оное, Петр пришел к нам; мы поворотили направо и через ворота каменной стены, окружающей Китай-город, въехали в Зарядье. Так называются несколько улиц, составляющих часть Китая-города. Сии улицы так худы, что и в самой Пензе считались бы посредственными, и так узки, что две кареты никоим образом не могут в них разъехаться. При самом въезде в оные мое обоняние было поражено таким гнусным запахом, что и говорить очень гнусно... Наконец мы доехали до цели и въехали на двор. Я с Иваном Николаевичем взошел в комнаты, где увидел хозяйку дома, очень обрадованную приездом Ивана Николаевича, который отрекомендовал ей меня как своего родственника, приехавшего в Москву для поступления в университет. Она очень ласково обошлась со мною. Подали самовар, и мы напились чаю. Едва ли успели переодеться, как пришел и хозяин дома, который равным образом обошелся со мною как нельзя лучше. Потом мы пошли в книжные лавки. Иван Николаевич имел поручение от Алексея Михайловича купить книг рублей на 60. Комиссию эту он исполнил в одной из лавок Глазунова. Сидельцами оной мы увидели двух молодых людей, довольно образованных, как видно, начитанностию. Их вежливость, их разговоры о литературе пленили меня. Взявши одну книгу и разогнувши оную, я увидел, что это есть том сочинений пресловутого Хвостова. "Расходятся ли у вас толстотомные творения сего великого лирика?" -- спросил я. -- "О, милостивый государь,-- отвечал один из них с насмешливой улыбкой,-- мы от них никогда в накладе не бываем, ибо имеем самого усерднейшего покупателя оных, и этот покупатель есть сам Хвостов!!!"4 Таким образом, во время нашего трехдневного пребывания в доме Владимира Федоровича, мы беспрестанно бродили по Москве. На третий день к Надежде Матвеевне пришла сестра ее Ольга Матвеевна. Иван Николаевич сказал ей о затруднении, в котором я находился в рассуждении квартиры. Так как в доме ее есть маленькая светелка, то она и согласилась принять меня к себе. Светелка мне чрезвычайно понравилась; она довольно просторна для помещения одного человека и имеет большое венецианское окно. Поблагодарив Владимира Федоровича и Надежду Матвеевну за хлеб за соль и ласки, я на другой же день перебрался на свою квартиру. Тут-то я начал смотреть на Москву, как говорится, в оба глаза. Священный Кремль, набережная Москвы, Каменный мост, монументы Минина и Пожарского, Воспитательный дом, Петровский театр, университет, экзерциргауз -- вот что удивляло меня. Как так? А Успенский собор, а колокольня Ивана Великого? -- говорите вы. Погодите, друзья мои, до всего дойдет очередь. Все прекрасные достопримечательные места в Москве разбросаны, а потому она не может при первом на нее взгляде производить сильного впечатления даже на такого человека, который не видывал города лучше Пензы. Иногда идешь большою известною улицею и забываешь, что она московская, а думаешь, что находишься в каком-нибудь уездном городе. Часто в этих улицах встречаешь превосходные по красоте и огромности строения, а между ними такие, какие и в самом Чембаре почитались бы плохими и которые своею гнусностию умножают красоту здания, возле которого стоят. Глядя на подобное зрелище, приводишь на память стихи Долгорукого:
  
   Иной в огромнейшей палате
   Дает вседневный пир друзьям,
   А рядом с ним, в подземной хате,
   Другой не ест по целым дням5.
  
   Часто улицы бывают так узки, что двое саней с трудом могут разъехаться. Вообще, во всей Москве улицы узки. Самая широкая едва ли может равняться с чембарскою. Часто попадаются переулки такие гнусные, что и в самых концах Пензы невозможно таких найти. Вся Москва состоит из камня и железа. Улицы выложены камнем, тротуары кирпичные, дома кирпичные, крыши и заборы по большей части железные. Хотя Москва сначала и не нравится, но чем более в ней живешь, тем более ее узнаешь, тем более ею пленяешься. Изо всех российских городов Москва есть истинный русский город, сохранивший свою национальную физиогномию, богатый историческими воспоминаниями, ознаменованный печатию священной древности, и за то нигде сердце русского не бьется так сильно, так радостно, как в Москве. Ничто не может быть справедливее этих слов, сказанных великим нашим поэтом:6
  
   Москва! как много в этом звуке
   Для сердца русского слилось,
   Как много в нем отозвалось!7
  
   Какие сильные, живые, благородные впечатления возбуждает один Кремль! Над его священными стенами, над его высокими башнями пролетело несколько веков. Я не могу истолковать себе тех чувств, которые возбуждаются во мне при взгляде на Кремль. Вид их погружает меня в сладкую задумчивость и возбуждает во мне чувство благоговения. С почтением смотрю я на их старинную архитектуру. Вид их переносит меня в священную древность, в милую русскую старину. Часто случалось мне мимоходом видеть древний дворец русских царей. Он не очень велик, окошки сделаны и украшены тоже таким образом, каким украшаются наши сельские строения. На праздник Пасхи пускают любопытных во все известные кремлевские здания, как-то: в Грановитую палату, арсенал, дворец и проч., и тогда я подробно опишу вам все, что достойно особенного внимания.
   Монумент Минина и Пожарского стоит на Красной площади, против Кремля. Пьедестал оного сделан из цельного гранита и вышиною будет не менее четырех аршин. Статуи вылиты из бронзы. Пожарский сидит, опершись на щит, а Минин передним стоит и рукою показывает на Кремль. На передней стороне пьедестала вылито из бронзы изображение людей обоих полов и всех возрастов, приносящих на жертву отечеству свои имущества. Вверху сего изображения находится следующая краткая, но выразительная надпись: "Гражданину Минину и князю Пожарскому благодарная Россия".
   Когда я прохожу мимо этого монумента, когда я рассматриваю его, друзья мои, что со мною тогда делается! Какие священные минуты доставляет мне это изваяние! Волосы дыбом подымаются на голове моей, кровь быстро стремится по жилам, священным трепетом исполняется всё существо мое, и холод пробегает по телу. "Вот, думаю я, вот два вечно сонных исполина веков, обессмертившие имена свои пламенною любовию к милой родине. Они всем жертвовали ей: имением, жизнию, кровию. Когда отечество их находилось на краю пропасти, когда поляки овладели матушкой Москвой, когда вероломный король их брал города русские,-- они одни решились спасти ее, одни вспомнили, что в их жилах текла кровь русская. В сии священные минуты забыли все выгоды честолюбия, все расчеты подлой корысти -- и спасли погибающую отчизну. Может быть, время сокрушит эту бронзу, но священные имена их не исчезнут в океане вечности. Поэт сохранит оные в вдохновенных песнях своих, скульптор в произведениях волшебного резца своего. Имена их бессмертны, как дела их. Они всегда будут воспламенять любовь к родине в сердцах своих потомков. Завидный удел! Счастливая участь!"
   Друзья мои, не почитайте эти строки следствием холодного низкого желания...
  

3. Г. Н. И М. И. БЕЛИНСКИМ

Около 5 января 1830. Москва

   Любезные родители, папенька Григорий Никифорович и маменька Марья Ивановна!
   Весьма удивило меня то, что вы не получили моего письма1. Я в нем, движимый чувством благодарности за присылку мне 100 руб. денег, со всем жаром сердца, тронутого вашим благодеянием, со всею сыновнею почтительностию, благодарил вас за ваше одолжение. Потом извещал вас, что я принят на казенный кошт и что уже живу в самом университете2. Как больно мне, что это письмо не дошло до вас! Я долгое время бесплодно ожидал от вас на оное ответа.
   Вы спрашиваете меня, почему я не сшил себе форменной одежды? -- Получив от вас деньги, я за первый долг поставил себе уплатить свои долги, купить черную жилетку и две черные косынки, купить некоторые необходимые и касающиеся до литературы книги, на что вышло больше половины присланных вами мне денег. Потом, по прошествии недели, я хотел уже покупать сукно, как вдруг к величайшему моему удовольствию и радости узнаю, что я принят на казенный кошт и в тот же самый день перешел в университет. Я для того хотел себе сшить форменную одежду, что своекоштному студенту необходимо должно иметь оную, ибо в противном случае могут выйти самые худые следствия. С казенного же студента сего требовать никак не могут, ибо он может ответить: "Если мне выдадут казенное платье, то я буду оное носить". Теперь для чего же мне было напрасно терять деньги? Беспокоил же я вас своими в рассуждении сего просьбами потому, что никаким образом не мог быть уверенным в том, что буду непременно принят на казенный кошт; или, по крайней мере, не надеялся быть принятым так скоро. Меня уверяли, что решение на просьбу о принятии на казенный кошт бывает не прежде, как пред самым Рождеством Христовым. Впрочем, оставшиеся деньги могли мне быть полезными, и я отдал в долги верным и надежным людям, у которых и беру понемногу, когда мне они понадобятся. Теперь вы видите, что в рассуждении меня вы должны быть совершенно спокойны и что присланная вами мне сумма хотя немаловажна, однако уже последняя. Я сам знаю ваши недостатки и тем более чувствую цену вашего одолжения и тем живейшую ощущаю к вам благодарность. Папенька, Вы на меня очень сердитесь и браните меня; это для меня чрезвычайно прискорбно. Признаюсь: я этого никак не ожидал. Часто случалось, в бытность мою в Пензе, переносить мне подобные с Вашей стороны со мною поступки; они раздирали мою душу, приводили меня в отчаяние. Я молчал, был спокоен; но это молчание, это спокойствие были ужасны. Надеюсь, что вперед Вы будете ко мне справедливее и подобными поступками не будете убивать Вашего сына, чувствующего к Вам истинную любовь и почтение, сына, который почти один умеет понимать и ценить Вас3. Может быть, я не буду иметь необходимости беспокоить Вас более своими просьбами, равно как и одолжаться Николаем Михайловичем и Лукерьею Савельевною. Если успех одного предприятия, которым занимается Н. Л. Григорьев с одним студентом и в котором и я имею участие, не обманет нашего ожидания, то я надеюсь получить около 500 руб., а может быть, и втрое больше4.
   Теперь я опишу вам наше казенное житье-бытье. Комнаты, занимаемые студентами, называются номерами, которых 16, из них в двух живут два субинспектора. Всех казенных студентов 150 человек. В каждом номере находится от восьми до 12 студентов. У каждого студента своя кровать, свой стол и своя табуретка. Кровати все железные, очень аккуратно сделанные. Мягкие, довольно высокие тюфяки, подушки, простыня, желтое байковое одеяло, к которому пришита другая простыня, и полосатый чехол составляют постель. Наволоки, простыни и одеяла всегда бывают белы, как снег, и переменяются еженедельно. Стол состоит из довольно большого выдвижного ящика и шкапчика с двумя полками. Номера наши, можно сказать, отлично хороши: карнизы стен украшены алебастровыми барельефами, полы крашеные, окна большие. Чистота и опрятность необыкновенные. Для каждого номера определен солдат, который метет пол, прибирает постели и прислуживает студентам. По уставу вставать должно в 6 часов, впрочем, спать можно и до 8 с половиною. В семь часов бывает завтрак, который состоит из булки и стакана молока. Час вставания, завтрака, обеда, ужина и сна возвещается звоном колокольчика. По будням обед бывает в 2, а по праздникам в 12. Стол по будням состоит из трех блюд: горячего, холодного и каши. Горячее бывает следующее: щи капустные, огуречные, суп картофельный, суп с перловыми крупами, лапша и борщ; все это бывает попеременно. Из горячего говядина вынимается и приготовляется на холодное или жаркое. Хлеб всегда бывает ситный и вкусный, и кушанья вообще приготовлены весьма хорошо. По воскресеньям и прочим праздникам, сверх обыкновенного, бывают пироги, жаркое и какое-нибудь пирожное. Столы всегда накрываются скатертями, и для всякого студента особенный прибор, состоящий, как обыкновенно бывает, из тарелки, покрытой сложенною салфеткою, серебряной ложки, ножа и вилки. У каждого стола, коих всех 14, прислуживает солдат. На всякий стол садится по одиннадцати человек. Порядок в столовой чрезвычайно хорош. Увидя столы, накрытые снеговыми скатертями, на которых поставлены миски, блюда, карафины с квасом, приборы в величайшем порядке, можно подумать, что это приготовлен обед для гостей какого-нибудь богача по случаю праздника, бала или чего-нибудь подобного. Миски у нас оловянные на поддонниках, блюда такие же, тарелки каменные. Миски и блюда блестят, как серебряные. Такая чистота во всех отношениях наблюдается.
   Теперь скажу вам что-нибудь о начальстве университета. Главное лицо оного есть попечитель5, потом ректор6 и два инспектора -- один казенных, а другой своекоштных студентов. Наш инспектор Дмитрий Матвеевич Перевощиков -- человек весьма известный в ученом свете. Он строг, любит порядок, и мы спокойствием, порядком и устройством нашего казенного быта большею частию одолжены ему7. Помощники его в должности называются субинспекторами; их четверо. Один доктор медицины, два лекаря, готовящихся быть докторами, и один кандидат словесности. Должность их состоит в том, чтобы присутствовать в столовой (при) завтраке, обеде и ужине студентов и в 10 часов вечера обойти все номера, посмотреть, все ли студенты, велеть погасить свечи и поутру донести инспектору о тех, которые самовольно отлучались на ночь. Они ни малейшей власти не имеют над нами: если кто им нагрубит или сделает что-нибудь слишком молодецкое, то они должны только донести инспектору. В рассуждении свободы у нас очень хорошо. По будням от 2 до 10 часов ночи я имею право без всякого спроса быть вне университета. Ежели хочу ночевать вне оного, то должен для проформы спроситься у дежурного субинспектора. Перед праздниками носят по номерам лист бумаги, в который записываются желающие отлучиться на ночь. Праздник без всякого спроса можно проводить вне университета, только к 10 часам должно явиться, ибо в 10 часов гасят свечи и ложатся спать. Вот вам краткое описание казенного быта. Покуда все хорошо. Впрочем, эти постановления, а особливо в рассуждении свободы нашей, зависят от воли инспектора, п потому, если инспектор хорош, то и казенное житье хорошо.
   Маменька, Вы уже в другом письме увещеваете меня ходить по церквам;8 право, подобные увещания для меня не всегда приятны и могут мне наскучить. Если бы Вы советовали мне быть добрым человеком, не изменять правилам доброго поведения, то бы, хотя п сам все сие очень хорошо знаю, принял бы с благодарностию подобные советы. Я почел бы их за опасение матери, которая любит своего сына и страшится потерять его. И в таком случае, если бы я пошел по пути порока, увлекаемый пылкостию характера и огнем страстей, то, взглянув на Ваши строки, вспомнил бы, что я имею отца и мать, что я своим поведением могу причинить им много горестей и заставить стыдиться, что они имеют такого сына -- вспомнил бы -- и, может быть, удержался бы на краю пропасти, в которую готов был низвергнуться. Но Вы хотите из меня сделать благочестивого, странствующего пилигрима и заставить меня предпринять благопохвальное путешествие по московским церквам, которым и счета нет. Шататься мне по оным некогда, ибо чрезвычайно много других, гораздо важнейших дел, которыми должно заниматься. Вы меня еще в прежнем письме упрекали в том, что я был в театре, а не был во всех соборных и приходских церквах. Театр мне необходимо должно посещать для образования своего вкуса и для того, чтобы, видя игру великих артистов, иметь толк в этом божественном искусстве. Я пошел по такому отделению, которое требует, чтобы иметь познание и толк во всех изящных искусствах. И потому я прошу Вас уволить меня от нравоучений такого рода: уверяю Вас, что они будут бесполезны.
   Вы меня спрашиваете, любят меня студенты? С удовольствием отвечаю на сие, что я успел снискать любовь и даже уважение многих из них. Впрочем, на всех угодить невозможно. Некоторые из воспитанников семинарской премудрости не очень ко мне благосклонны, потому что я вслух <...>9
  

4. M. M. ПОПОВУ

30 апреля 1830. Москва

Москва. 1830 года. Апреля 30 дня.

   Милостивый государь Михаил Максимович!
   В чрезвычайное затруднение привело меня письмо моего родственника: "Михаил Максимович,-- пишет он,-- издает с И. И. Лажечниковым альманах и через меня просил Вас прислать ему Ваших стихотворений, самых лучших"1. Не могу Вам описать, какое действие произвели на меня эти строки: мысль, что Вы еще меня не забыли, что Вы еще так же ко мне благосклонны, как и прежде; Саше желание, которого я, несмотря на пламенное усердие, не могу исполнить,-- все это привело меня в необыкновенное состояние радости, горести и замешательства. Бывши во втором классе гимназии, я писал стихи и почитал себя опасным соперником Жуковского; но времена переменились2. Вы знаете, что в жизни юноши всякий час важен: чему он верил вчера, над тем смеется завтра. Я увидел, что не рожден быть стихотворцем, и, не хотя идти наперекор природе, давно уже оставил писать стихи. В сердце моем часто происходят движения необыкновенные, душа часто бывает полна чувствами и впечатлениями сильными, в уме рождаются мысли высокие, благородные -- хочу их выразить стихами -- и не могу! Тщетно трудясь, с досадою бросаю перо. Имею пламенную страстную любовь ко всему изящному, высокому, имею душу пылкую и, при всем том, не имею таланта выражать свои чувства и мысли легкими гармоническими стихами. Рифма мне не дается и, не покоряясь, смеется над моими усилиями, выражения не уламываются в стопы, и я нашелся принужденным приняться за смиренную прозу. Есть довольно много начатого -- и ничего оконченного и обработанного, даже такого, что бы могло поместиться не только в альманахе, где сбирается все отличное, но даже и в "Дамском журнале"! В первый еще раз я с горестию проклинаю свою неспособность писать стихами и леность писать прозою.
   Мне давно нужно было писать к Вам; но я не могу сам понять, что меня от сего удерживало, и в сем случае столько перед Вами виноват, что не смею и оправдываться.
   Вы писали обо мне И. И. Лажечникову, я это как бы предчувствовал в то время, как Вы вручали мне письмо. Благородный человек, скажите: чем я могу Вам заслужить за это? Столько ласк, столько внимания и, наконец, такое одолжение! Ищу слов для моей признательности и не нахожу ни одного, которое бы могло выразить оную. Вы доставили мне случай видеть человека, которого я всегда любил, уважал, видеть и говорить с ним. Он принял меня очень ласково и, исполняя Ваше желание, просил обо мне некоторых из гг. профессоров, но просьбы его и намерение оказать мне одолжение не имели успеха, ибо я по стечению некоторых неблагоприятных для меня обстоятельств не мог ими пользоваться3.
   Я не из числа тех низких людей, которые тогда только чувствуют благодарность за прилагаемые об них старания, когда оные бывают не тщетны. Хотя моим поступлением в университет я никому не обязан, однако навсегда останусь благодарным Вам и Ивану Ивановичу. Если Ваше желание споспешествовать устроению моего счастия не имело успеха, то этому причиною не Вы, а посторонние обстоятельства. Так, милостивый государь, если моя к Вам признательность, мое беспредельное уважение, искреннее чувство любви имеют в глазах Ваших хотя некоторую цену, то позвольте уверить Вас, что я оные буду вечно хранить в душе моей, буду ими гордиться. Уметь ценить и уважать такого человека, как Вы,-- есть достоинство; заслужить от Вас внимание -- есть счастие.
   Но, может быть, я утомил Вас изъяснением моей благодарности. Извините меня: строки сии не суть следствие лести; нет: это излияние души тронутой, сердца, исполненного благодарности; чувства мои неподдельные: они чисты и благородны, как мысль о том, кому посвящаются. -Для меня нет ничего тягостнее, ужаснее, как быть обязанным кому-либо: Вы делаете из сего исключение, и для меня ничего нет приятнее, как изъявлять Вам мою благодарность.
   Извините меня, если я продолжительным письмом моим отвлек Вас от Ваших занятий и похитил у них несколько минут. Итак, вторично прося у Вас извинения за то, что я не засвидетельствовал прежде Вам моей благодарности, остаюсь с чувством глубочайшего уважения и готовностию к услугам Вашим

ученик Ваш
Виссарион Белинский4.

  

5. Г. Н. и М. И. БЕЛИНСКИМ

22 января 1831, Москва

Москва. 1831 года, января 22 дня.

   Любезный папенька, Григорий Никифорович!
   С искреннею радостию спешу поздравить Вас с получением отличия, не схваченного, а заслуженного Вами. Желаю, чтобы Вы с такою же честию носили его, с какою и заслужили1. Извините меня за мое долгое молчание и порадуйте меня хотя одною строчкою. Скажу Вам о себе, что я пускаюсь в море треволненное, в море великое и пространное, в нем же гади несть числа!2 Может быть, Вы скоро увидите имя мое в печати и будете читать обо мне разные толки и суждения как в худую, так и в хорошую сторону. Не могу решительно определить достоинство моего сочинения, но скажу, что оно много наделает шуму. Вы в нем увидите многие лица, довольно Вам известные!3 Но вперед говорить нечего: когда напечатается, тогда имеющие уши слышать, да слышат!..4
   Холера в Москве еще не совсем прекратилась: в казенных и частных заведениях еще находится около 60 человек больных. Впрочем, о ней как-то уже почти и не слышно. Москва опять воскресла. Говорят, что неутомимая посетительница находится в Германии и начинает в ней распоряжаться по-свойски. Писать больше не о чем, итак, до следующего случая прощайте!

Ваш сын
Виссарион Белинский.

   Любезная маменька, Марья Ивановна!
   Не знаю о чем и писать к Вам. Поздравлять с новым годом и желать нового счастия -- что-то уже старо и, признаться, нелепо. Ежели я люблю Вас -- то каждую минуту желаю Вам всех благ и всякого счастия, а не один раз в году. К Вам, я думаю, уже приехал инвалид Иванов (А. Е.), за храбрость и заслуги, а более всего за леность, отставленный в чистую. Скажите, пожалуйста, что за черный год напал на наш любезный Чембар: в нем повальный мор. Право, я нынче чембарские письма распечатываю с большим страхом: в них все такие ужасные новости: тот умер, другой скончался. Уведомьте меня, бога ради, как поживает Никанор, довольны ли Вы им хотя сколько-нибудь.
   Прошу Вас засвидетельствовать мое почтение милостивой государыне бабушке Дарье Евсеевпе; кланяйтесь от меня всему семейству Никиты Александровича и скажите им, что я очень соболезную их несчастию. Кланяйтесь Федосье Степановне и скажите ей от меня, чтобы она теряла свои слезы и зрение только на мертвых, а не на живых.
   Свидетельствую как Вам, так и Сашеньке мое почтение и прошу Вас писать ко мне почаще. Я живу далеко от Чембара, так всякий лоскуток бумаги дорог. Прощайте! Будьте здоровы и счастливы!

Ваш сын
Виссарион Белинский.

  

6. Г. Н. и М. И. БЕЛИНСКИМ

17 февраля 1831. Москва

Москва. 1831 года. Февраля 17 дня.

   Милостивые государи, папенька Григорий Никифорович и маменька Марья Ивановпа!
   Из письма Катерины Петровныl, a более чрез Лукерью Савельевну я узнал, что вы сильно на меня негодуете; эти неприятные известия сколько опечалили меня, столько и привели в большое недоумение, тем более, что я их совсем не ожидал. Правда, я давно не писал к вам; но позвольте спросить вас: о чем и как мне было писать к вам? Уверять вас в своей почтительности, любви, преданности, осыпать вас нежными названиями я не могу, ибо почитаю это не чем иным, как подлым ласкательством, как низким средством выманивать у вас деньги. Я не умею нежничать, но умею чувствовать и думаю, что священное чувство любви и уважения к родителям состоит не в словах, а в поступках; заключается не в мертвой бумаге, но в душе пламенной, доступной для благородных и возвышенных впечатлений. Писать же к вам таким образом: при сей верной оказии я не мог проминовать, чтобы не засвидетельствовать вам моего всенижайшего почтения и уведомить вас, что я, слава богу, жив и здоров, чего и вам желаю, а, впрочем, уповаю на благость всевышнего -- я не могу и не смею, ибо это значило бы насмехаться над вами. Не подумайте, что это я для (того) пишу, чтобы загладить мой проступок, вымолить у вас прощение, подластиться к вам и заставить вас этим прислать мне денег -- нет! Я слишком горд, слишком благороден, чтобы извиваться перед вами ужом и жабою из такого низкого и подлого намерения. Цель моего письма есть -- оправдаться перед вами не как перед людьми, от которых я могу получить несколько денег, но как перед людьми, которым я обязан моим существованием. К моему величайшему прискорбию, я вижу, что вы почитаете меня мальчишкою, который потому только забывает вас, что не зависит от вас в рассуждении содержания и свободен от вашего влияния тем расстоянием, которое разделяет его с вами. Одним словом: вы почитаете меня мальчишкой, который вышел из училища и, встретившись на улице с прежним своим учителем, дразнит его языком, зная, что он не может уже высечь его розгами. Поверьте, что сын ваш заслуживает лучшего о себе мнения, нежели какое вы о нем имеете. Где бы я ни жил, чем бы я ни был -- я всегда буду почитать священнейшею обязанностию быть добрым сыном, любить и уважать своих родителей и признавать над собою их власть, которая есть важнее, законнее и священнее всех властей в мире. Я не хочу философски исследовать, есть ли любовь и уважение к родителям чувство, внушенное природою, или оно есть следствие внушенных с младенчества правил, или что-нибудь другое; я способен питать это чувство, почитаю его святым, возвышенным; этого для меня довольно. Если бы я и точно сделал худо, не писавши к вам так долго, то вы могли бы слегка заметить мне неприличность такой с моей стороны в рассуждении вас невнимательности и не подозревать меня в низости чувств и подлости образа мыслей. Опять повторяю вам, что я не мальчишка, которого должно сечь, чтобы заставить хорошо вести себя, не грубый мужик, которого должно бить дубиною, чтобы заставить что-нибудь почувствовать. Вы, маменька, просили Лукерью Савельевну обругать меня Вашим именем; радуйтесь и веселитесь! Она с дипломатическою точностию повторила мне Ваши ласковые и благородные слова. Я не хочу говорить Вам о неприличности этих слов, о крайнем неблагородстве и низости выражений; замечу только мимоходом, что это уже слишком, слишком... Но мне уже не привыкать к подобным поступкам со стороны монх родителей... не хочу договаривать: может быть, и сами поймете..,
   Сообразивши все обстоятельства моей жизни, я вправе назвать себя несчастнейшим человеком... В моей груди сильно пылает пламя тех чувств, высоких и благородных, которые бывают уделом немногих избранных -- и при всем том меня очень редкие могут ценить и понимать... Все мои желания, намерения и предприятия, самые благородные как в рассуждении самого себя, так и других, оканчивались или неудачами, или ко вреду мне же и, что всего хуже, навлекали на меня нарекание и подозрения в дурных умыслах; доказательства перед глазами. Вы сами знаете, как сладки были лета моего младенчества... Учась в гимназии, я жил в бедности, скитался <не> по своей воле по скверным квартиришкам, находился в кругу людей презренных, имел право лениться и проч... Поехал в Москву с пламенным желанием определиться в университет; мое желание сбылось. По ветрености, а более по неопытности, истратил данную мне сумму денег, которая в моих глазах казалась огромною, неистощимою. Потом поступил на казенный кошт... о, да будет проклят этот несчастный день!.. Любя своего брата, видя, что он в дому своих родителей живет на казенном коште, сострадая его слишком жалкому состоянию и вместе желая облегчить участь Александра Ефремовича, я убедил вас отправить их обоих в Москву. Цель благородная, бескорыстная, ибо я для того, чтобы способствовать сколько-нибудь, по мере моих сил и возможности, их счастию, брал на себя большую обузу и большую ответственность -- и что же вышло?.. Чрез это я ввел вас в излишние издержки и хлопоты, через это напрасно измучены лошади, оставлена на дороге бричка и, что всего важнее, через это я навлек на себя ваше неудовольствие! Осужденный страдать на казенном коште, я вознамерился избавиться от него и для того написал книгу, которая могла скоро разойтись и доставить мне немалые выгоды. В этом сочинении со всем жаром сердца, пламенеющего любовию к истине, со всем негодованием души, ненавидящей несправедливость,-- я в картине довольно живой и верной представил тиранства людей, присвоивших себе гибельное и несправедливое право мучить себе подобных. Герой моей драмы есть человек пылкой, с страстями дикими и необузданными; его мысли вольны, поступки бешены -- и следствием их была его гибель. Вообще скажу, что мое сочинение не может оскорбить чувства чистейшей нравственности и что цель его есть самая нравственная. Подаю его в цензуру,-- и что же вышло?.. Прихожу через неделю в цензурный кабинет и узнаю, что мое сочинение цензоровал Л. А. Цветаев (заслуженный профессор, статский советник и кавалер). Прошу секретаря, чтобы он выдал мне мою тетрадь, и секретарь, вместо ответа, подбежал к ректору, сидевшему на другом конце стола, и вскричал: "Иван Алексеевич! Вот он! Вот г. Белинский!;) Не буду много распространяться; скажу только, что несмотря на то, что мой цензор в присутствии всех членов комитета расхвалил мое сочинение и мои таланты, как нельзя лучше,-- оно признано было безнравственным, бесчестящим университет, и об нем составили журнал!.. Но после это дело уничтожено, и ректор сказал мне, что обо мне ежемесячно будут ему подаваться особенные донесения... 2
   Каково это?.. Я надеялся на вырученную сумму откупиться от казны, жить на квартире и хорошенько окопироваться -- и все мои блестящие мечты обратились в противную действительность, горькую и бедственную. Я мог бы найти кондицию, завести хорошие и полезные для меня знакомства; но в форменной одежде, кроме аудитории, нигде нельзя показаться, ибо она в Москве в крайнем пренебрежении; а я не только не имею необходимой для всякого молодого человека хорошей фрачной или сюртучной пары, но даже и хорошей форменной одежды; теперь третьи подштанники совершенно отказываются служить, а нового платья, по случаю холеры, и не думают шить. Лестная, сладостная мечта о приобретении известности, об освобождении от казенного кошта для того только ласкала и тешила меня, доверчивого к ее детскому, легкомысленному лепету, чтобы только усугубить мои горести!.. Кстати, опишу вам поподробнее мое казенное житье-бытье.
   Вам уже известно, что у нас с июня 1830 года воцарился новый инспектор;3 до окончания вакации и до начала открытия лекций он не делал никаких распоряжений; оные последовали через несколько дней после моего приезда в Москву. У нас прежде столы и кровати были вместе, и мы в одном и том же номере и занимались и спали. Это имело для нас ту выгоду, что мы могли иногда и полежать, если надоест сидеть, и кажный из нас имел свой особенный уголок. Щепкин уничтожил эти выгоды, перенесши кровати в другую половину этажа, занимаемого нами. Бывало, в номере жило не более как по десяти, или много-много по одиннадцати человек, а теперь по пятнадцати, семнадцати и девятнадцати. Сами посудите: можно ли при таком многолюдстве заниматься делом? Столики стоят в таком близком один от другого расстоянии, что каждому даже можно читать книгу, лежащую на столе своего соседа, а не только видеть, чем он занимается. Теснота, толкотня, крик, шум, споры; один ходит, другой играет на гитаре, третий на скрипке, четвертый читает вслух -- словом, кто во что горазд! Извольте тут заниматься! Сидя часов пять сряду на лекциях, должно и остальное время вертеться на стуле. Бывало я и понятия не имел о боли в спине и пояснице, а теперь хожу весь как разломанный. Часы ударят десять -- должно идти спать через четыре длинных коридора и несколько площадок; поутру, если забудешь взять с собою полотенце, мыло или что-нибудь подобное, надобно опять два раза пройтить бесконечную цепь коридоров. Пища в столовой так мерзка, так гнусна, что невозможно есть. Я удивляюсь, каким образом мы уцелели от холеры, питаясь пакостною падалью, стервятиной и супом с червями. Обращаются с нами как нельзя хуже. Невозможно исчислить всех неудобств казенного кошта. Какая разница между жизнию казенного и жизнию своекоштного студента! Первый всегда находится в глазах начальства, самые ничтожные проступки его берутся на замечание; второй же почти не знает своего начальства, которое имеет на пего самое слабое влияние. Живет он один или много с двумя товарищами на квартире; ему никто не мешает в его занятиях; он может сидеть целую ночь и спать целый день; никто не потребует у него отчета в образе его жизни. Сердце обливается кровью, как поглядишь, как живут своекоштные! Как только я приехал, то ректор призвал меня в правление и начал бранить за то, что я поздно приехал; этим я обязан Перевощикову, который тогда очень помнил меня и отрекомендовал ректору4 и Щепкину. Когда ректор говорил со мною, то он (Перевощиков) беспрестанно кричал, что меня надобно выгнать из университета. Наконец ректор в заключение спектакля сказал: "Заметьте этого молодца; при первом случае его надобно выгнать". Многие казенные же приезжали гораздо после меня, и им за это ни слова не сказали. Перед окончанием холеры я не ночевал ночи две или три дома; прихожу к Щепкину за одним делом, и он начинает меня ругать; говорит, что меня за это он отдаст, как какого-нибудь каналью, в солдаты и наконец с презрением начал выгонять из своих комнат! Разумеется, что подлец за такой пустой проступок ничего не может сделать, как только наказать выговором или у себя в доме, или в номере, или в правлении, и много-много посадить в карцер, и что его нелепые угрозы не могут никогда выполниться; но каково терпеть-то?.. Надеясь сорваться с казенного кошта, я дал себе клятву все терпеть и сносить, и потому ничего ему не сказал: случись же это ныне, то я разругаю его, как подлеца, нахаркаю ему в рожу, а если он еще стал бы забываться, то и разобью ее -- и тогда уже меня отдадут в солдаты -- но прежде выступления из Москвы зайду проститься с своими благодетелями -- и (клянусь богом и честью!) это прощание будет для них ужасно!.. Я в таком случае на все решусь!.. Покуда этого еще нет; а если еще поживу с годок на казенном коште, то, я думаю, что дождусь!.. Вот каков казенный кошт! Вот каково мое житье-бытье, мои обстоятельства, и вот каковы мои надежды!..
   Теперь, лишившись всех надежд моих, я совершенно опустился. -- Все равно -- вот девиз мой. Но довольно: я думаю, что и так уже надоел вам моим длинным письмом. Прощайте, будьте здоровы и счастливы -- и не забывайте своего несчастного сына5.

Виссарион Белинский.

   P. S. Свидетельствую мое почтение милостивой государыне бабушке Дарье Евсеевне и целую всех, составляющих наше семейство.
  

7. M. И. БЕЛИНСКОЙ

21 мая 1833. Москва

Москва. 1833 года, мая 21 дня.

   Любезная маменька!
   Давно уже не писал я к Вам; не знаю, в хорошую ли или дурную сторону толкуете Вы мое молчание. Как бы то нн было, но на этот раз я желал бы не уметь пи читать, ни писать, ни даже чувствовать, понимать и жить! Каковым кажется Вам это вступление? Но погодите, не торопитесь: это еще цветики, а вот скоро попотчую Вас и плодами... Не радостны были все мои письма с самого проклятого холерного года; но теперь я не могу без ужаса и подумать о том ударе, которым готовлюсь поразить Вас, мою мать... Девять месяцев таил я от Вас свое несчастие, обманывал всех чембарских, бывших в Москве, лгал и лицемерии, скрепя сердце... но теперь не могу более. Ведь когда-нибудь надобно же узнать Вам. Может даже быть, что Вы уже знаете, может быть, Вам сообщено это с преувеличениями, а Вы женщина и мать... Чего не надумаетесь Вы? При одной мысли об этом сердце мое обливается кровию. Я потому так долго молчал, что еще надеялся хотя сколько-нибудь поправить свои обстоятельства, чтобы Вы могли узнать об этом хладнокровнее... Я не щадил себя, употреблял все усилия к достижению своей цели, ничего не упускал, хватался за каждую соломинку и, претерпевая неудачи, не унывал и не приходил в отчаяние-- для Вас, только для Вас: я всегда живо помнил и хорошо понимал мои к Вам отношения и обязанности; терпел все, боролся с обстоятельствами сколько доставало сил, трудился -- и, кажется, не без успеха. Вот в чем дело: Вы знаете, что проходит уже четвертый год, как я поступил в университет; Вы, может быть, считаете по пальцам месяцы, недели, дни, часы, минуты, нас разделяющие, думаете с восхищением о том времени, о той блаженной минуте, когда, нежданный и незванный, я, кат; снег на голову, упаду в объятия семейства кандидатом или, по крайней мере, действительным студентом!.. Мечта очаровательная! и меня обольщала она некогда! Но, увы! В сентябре исполнится год, как я -- выключен из университета!!!1 Вы также, может быть, воображаете, что я скоро получу место учителя в гимназии и что приду в состояние быть опорою для Вас и братьев, и сестры -- и я, точно, может быть, скоро буду учителем -- но не в гимназии, а в уездном училище и еще в Белоруссии, даже, может быть, в самой Вильне, тысячи за две верст от Вас, на 700 рублях жалованья, и, может быть, через неделю после отправления сего письма уеду туда, не повидавшись с Вами ни на минуту. Предчувствую, что это будет Вам стоить больших слез, тоски и даже отчаяния, и это-то самое меня и сокрушает, а на все прочее я смотрю хладнокровно и ни мало не печалюсь.
   Но, маменька, все-таки умоляю Вас не отчаиваться и не убивать себя бесплодною горестию. Есть счастие и в несчастии, есть утешение и в горести, есть благо и в самом зле. Я видел людей в тысячу тысяч раз несчастнее себя и потому смеюсь над своим несчастием. Назад тому месяца два отдали в солдаты без выслуги одного казенного студента за такой проступок, за который и трехдневное заключение в карцер было бы достаточным наказанием2. Его в цепях посадили в яму вместе с ворами и убийцами и в цепях представили к коменданту для отправления в Грузию; но он заболел и теперь в Лефортовской больнице, может быть, с минуты на минуту, как небесного дара, ждет себе смерти. А сколько выключено за ничто с худыми аттестатами, лишенных права служить!.. Что же я?.. я буду служить учителем, получать 700 ас. в год жалованья, а если попаду в самую Вильну, то 1000 рублей; поступя в службу, буду состояться в 12 классе, а через три или 4 года получу прямо 9 класс с годом старшинства. Дальнейшее же мое повышение будет зависеть от моего поведения, усердия к службе и расположения ко мне попечителя. В этом отношении неимение ученой степени не будет иметь никакого влияния, ибо эта служба почти заграничная, и попечитель имеет неограниченную власть, что захочет, то и сделает. К тому же он очень добрый и благородный человек. Я и без того был же бы учителем поневоле на 6 лет, а теперь могу служить, сколь мне заблагорассудится3.
   Теперь в коротких словах расскажу Вам мою печальную историю. Вышедши из больницы, я просил Голохвастова, чтобы он из уважения к моей долговременной болезни позволил мне в конце августа или начале сентября держать особенный экзамен. Он хотя и не обещал исполнить моей просьбы, но и не отказал, а сказал: "Хорошо, посмотрим". Я остался в надежде и с половины мая до самого сентября, несмотря на чрезвычайно худое состояние моего здоровья, работал и трудился, как черт, готовясь к экзамену. Но экзамена не дали, а вместо его уведомили меня о всемилостивейшем увольнении от университета. Я перешел к Алексею Петровичу, купил один французский роман в 4 частях, к Рождеству с великими трудами, просиживая иногда напролет целые ночи, а во время дня не слезая с места, перевел его, в надежде приобрести рублей 300; но фортуна и тут прежестоко подшутила надо мною: в газетах было объявлено о другом переводе сего самого сочинения и потому я едва, едва могу получить 100 руб. ассигн.4. Я купил себе кое-какую фрачную пару, сюртук и прочие необходимости. Потом чуть не уехал на кондицию в Вологду, в дом к одному помещику за 600 руб., а потом в Орловскую губернию за 1200 руб. К счастию моему, все это не состоялось. А. Ф. Мосолов предлагал мне свое посредничество чрез своего родственника, но и сие не состоялось по причине внезапного отъезда из Москвы Аркадия Федоровича.
   Наконец в половине великого поста я познакомился с профессором Надеждиным и начал переводить в его журнал5. На страстной неделе приехал в Москву попечитель Белорусского учебного округа, действительный статский советник и кавалер Григорий Иванович Карташевский, и издатель "Телескопа" попросил его, чтобы он дал мне место учителя в Белоруссии. Я представлялся ему и по его назначению подал ему рассуждение, и он, наконец, сказал мне, что так как все белорусские училища состоят на правах гимназий, то прямо принять меня в какое-нибудь из них нельзя, но что он в скором времени должен открыть несколько уездных училищ; а что до сего времени я должен пробыть в каком-нибудь из приходских на 400 руб. жалованья; но что по приезде в Белоруссию он оставит меня на несколько месяцев в каком-нибудь гимназияльном на 1200 рублях жалованья до прибытия туда настоящего учителя из кандидатов и что в это время откроются и уездные6. Итак, 27 апреля я подал ему просьбу, и он хотел было через два дня отправить меня в Белоруссию с одним кандидатом, туда же едущим. Этою поспешностию он хотел доставить мне рублей 40 денег на дорогу, ибо в таком случае мы бы оба платили прогоны за одну пару, следовательно, у каждого из нас половина прогонных денег осталась бы в кармане. Но после, увидев, что у меня нет ни копейки своих денег для того, чтобы запастись одеждою и другими необходимыми вещами, он сказал мне, что едет в Петербург и там постарается выхлопотать мне рублей полтораста награждения и уже оттуда пришлет мне свое решение, которого я дожидаюсь и теперь. Вот Вам моя история; она неполна, ибо я умалчиваю здесь о многом, многом, перенесенном мною в продолжение этого года. Теперь же только одна мысль, что все это может сильно огорчить Вас, убивает меня, а особенно то, что я перед отъездом не могу повидаться с Вами. О прочем же нимало не беспокоюсь; исключение же из университета даже некоторым образом радует меня, ибо я теперь уверен, что не попаду без всякого суда в солдаты за какую-нибудь безделицу. Притом же, если я с год прослужу хорошо в уездном училище, то непременно буду в гимназияльном, а на эти места много охотников даже и из своекоштных кандидатов.
   Я не буду говорить Вам о причинах моего выключения из университета: отчасти собственные промахи и нерадение, а более всего долговременная болезнь и подлость одного толстого превосходительства7. Ныне времена мудреные и тяжелые: подобные происшествия очень нередки. Обо всем этом я желал бы лично потолковать с Вами; но что делать... видно покуда так и быть; может быть, когда-нибудь, только не теперь... Итак, терпение!
   Терпение! Терпение! Его призовите себе на помощь, им вооружитесь! Вам не слишком трудно будет это сделать, если Вы не забудете, что я перенес ужасные муки и страдания, о которых Вы никогда но узнаете н которые Вам даже невозможно и пенять, что я претерпел несколько казней и пыток -- для Вас! Мысль, что я не один, что с моим счастием или несчастием соединено счастие или несчастие нескольких человек,-- эта мысль вооружила меня какою-то неестественною твердостию к перенесению стольких бедствий, от которых я мог бы освободиться легким и скорым образом; а сладостная надежда в скором времени прийти в состояние быть подпорою, утешением столь близких моему сердцу существ делала то, что я даже с каким-то наслаждением выдерживал эти напоры столь яростных бурь, со всех сторон устремившихся на мой утлой челн! Итак, маменька, я жду от Вас за это награды: не печальтесь, по надейтесь! Вы знаете мой характер -- я на все могу решиться, и горе мне, горе Вам, горе всему нашему семейству, если я узнаю, что я буду причиною Ваших страданий, что еще боле расстрою Ваше здоровье и сокращу Вашу жизнь... Горе... больше ничего не скажу. Но если Вы хладнокровно перенесете эту неприятность, то, клянусь Вам Вашим богом, все дни, все минуты моей жизни до последнего издыхания будут посвящены Вам и Вашим детям, мне единокровным; что все мои действия, все усилия будут стремиться к их и Вашему счастию. Пока я здоров, до тех пор, верьте мне в этом, до тех пор, повторяю Вам, моя мать не будет иметь нужды ни в чем; я сам скорее откажу себе в последнем, но исполню даже малейшие ее прихоти. Итак, маменька, в последний раз повторяю Вам: мое счастие, моя жизнь, сохранение чувства моей нравственности, все, наконец, все зависит теперь от Вас; умейте понять это. Жду от Вас в самом скором времени собственноручного письма; адресуйте его на имя Алексея или Дмитрия Петровича; если оно не застанет меня в Москве, то они перешлют его ко мне в Белоруссию. Буду считать минуты: не медлите ответом! Засим -- простите! Ваш сын

Виссарион Белинский.

   P. S. Ваши письма8, талер и два окорока, посланные с человеком H. H. Щетинина, получил. Насчет Вашего препоручения скажу Вам решительно, что я ни в чем этом толку не знаю ни на грош, и потому прошу Вас обратиться с своими просьбами на этот раз к Вашему внучку Алексею Петровичу: он во всех экономных делах собаку съел и может надуть всю Москву, когда дело идет о том, чтобы из гроша сделать рубль. А я, право, не умею отличать золото от хорошей меди или бронзы, а серебро от олова. Пришлите к нему Вашу табакерку и положитесь на пего совершенно: Вы останетесь им довольны. Об деле бабушки не справлялся, ибо у меня и по сю пору голова ходит кругом и я не могу опомниться; в иной день придется обегать по Москве верст двадцать; дел пропасть. Беспрестанно пишу, перевожу, держу корректуру "Магдалины" -- словом, не знаю куда и сунуться. Только нынче, снова перечтя Ваши письма, обо всем вспомнил. Алексеи Петрович берет на себя исправить все эти комиссии.

В. Б.

  

8. К. Г. БЕЛИНСКОМУ

20 сентября 1833. Москва

Москва. 1833 года. Сентября 20 дня.

   Любезный брат!
   Стыдно забывать брата! Больше ничего не скажу тебе. Получил ли ты "Молву" и письма мои? Что делается у нас? Что папенька? Все ли в том же нравственном положении? Что говорил ои о моем предложении касательно Никанора, что говорит обо мне? Бога ради, уведомь. Хотя он и забыл, что я ему сын, однако ж я помню, что он мне отец.
   "Магдалины" от меня не жди. Я взял ее все три экземпляра и, но крайней моей нужде, продал все, даже и французский подлинник, и потому сам не имею пи одного экземпляра1. В замену же ее посылаю тебе несколько картинок мод, прибей их на слепку, хоть в нужнике, на память обо мне.
   О себе скажу тебе, что я живу довольно хорошо для своих обстоятельств. Связь с моим любезным Петровым и многими другими, можно сказать, отборными по уму, образованности, талантам и благородству чувств молодыми людьми заставляет меля иногда забывать о моих несчастиях2. В семействе Петрова я принят, как родной. Его мать, добрая, умная и любезная старушка, для меня истинно вторая мать. Также я знаком с одною из его сестер (которые все очень воспитанные девицы); она недавно уехала в Тулу, в гувернанты в один дом. Через Петровых я познакомился с домом одного помещика, Зыкова, где тоже очень хорошо принят и обласкан. В этом доме много барышень; ты догадаешься, что по этой причине я с большим удовольствием провожу там время. 17 сентября я был у них на именинах, немного танцевал, немного был пьян, ужинал, волочился, куртизанил... и был счастлив. Скажу тебе, что московский свет резко отличается от чембарского простотою, большею свободою в обращении и отсутствием глупых церемоний, как-то подхождения к руке и прочего. Вообще там менее можно конфузиться, нежели У вас. Там лучше умеют ценить достоинства и лучше вашего умеют наслаждаться удовольствиями. А барышни? О! какая разница с вашими! Мне казалось, что я был перенесен в какой-то другой, доселе безвестный мне мир. Сверх сего, я еще имею хороших знакомых в том доме, где живет Григорьев (Николай Львович). Хозяин оного управляет имением Зыкова. Жена его и дети -- предобрейшие люди и принимают меня совершенно, как родного. Часто хожу к Авениру Ивановичу и Александре Николаевне, которые расположены ко мне по-прежнему. Видишь ли, сколько у меня в Москве знакомств и связей? О, Москва, Москва! -- жить и умереть в тебе, белокаменная, есть верх моих желаний. Признаться, брат,-- расстаться с Москвою для меня все равно, что расстаться с раем. Если я и попаду в проклятую Белоруссию, то прослужу в ней год, много, много два -- а там в Москву, в любезную Москву!3
   Я забываю уведомить маменьку, что я получил подушку, за которую и благодарю, равно как за рубашку, полотенце и платок. Странное дело! мне всё присылают то, чего не надо: рубашек у меня довольно, полотенцев пропасть, а Федосья Степановна прислала мне еще рубашку да полотенце. А я, между тем, крайне нуждаюсь в подштанниках -- а их-то, как нарочно, никто не догадается прислать.
   За всем сим -- прощай!

Твой брат
В. Белинский.

   Доставителя сего письма прошу обласкать: он парень умный, расторопный и оказывал мне некоторые послуги.
  

9. М. И. БЕЛИНСКОЙ

25 мая 1834. Москва

Москва, 1834 года, мая 25 дня.

   Любезная маменька!
   Скажите, бога ради, что у Вас там делается? Живы ли Вы, здоровы ли? С лишком три месяца я не получаю от Вас ни строчки; уж не случилось с Вами какого-нибудь большого несчастия, о котором Вы боитесь меня уведомить? Что делает Константин? Не стыдно ли ему не писать ко мне хотя раз в три недели? Бога ради, успокойте меня поскорее: я не на шутку начал беспокоиться; у меня и своего горя довольно, а Вы своим молчанием еще больше усугубляете его. Я не писал к Вам так долго потому, что все от Вас ожидал письма; наконец, терпенья моего не стало.
   О себе скажу Вам, что я получил, наконец, мои бумаги от подлеца Карташевского; они были у него затеряны; наконец он нашел их и прислал к Надеждину на Фоминой неделе. За мое терпение предлагал мне чрез родственника своего Аксакова место лучшее того, какое я просил прежде;1 но, сами посудите, можно ли служить под таким любезным начальником? К тому же я не расстанусь с Москвою ни за все блага в мире.
   Потом скажу Вам, что я живу на своей собственной квартире и занимаю прекрасную отдельную комнатку, за которую вместе со столом и чаем плачу сорок рублей ассигнациями.
   Я имею две кондиции; приготовляю из словесности к поступлению в университет двух молодых людей2. С первой кондиции получаю 40 ас. в месяц, а со второй по 3 ассигн. за урок и даю два урока в неделю. Эти-то кондиции и дали мне возможность нанять квартиру. Живу я теперь на Тверской улице, почти против дому генерал-губернатора, в мезонине, который составляет собою третий этаж огромного дома Варьгина. Полученные мною за перевод недавно около 200 рублей дали мне средства обзавестись необходимою мебелью, как-то: кроватью, столом, постелей, ширмами, стульями и проч., кое-каким бельем, платьем, необходимыми книгами и прочими вещами. Однако, несмотря на то, все-таки сижу без денег, несмотря на крайнюю расчетливость, умеренность и экономию, и терплю недостаток во многих вещах. Теперь подумываю, как бы еще достать месяца на полтора работки ста на три; тогда бы совсем поправился и зажил бы паном. Я вые себя от восхищения, что нанял квартиру, где тишина и уединение дают мне совершенную возможность заниматься науками. Вы не можете представить, чего мне стоило обременять собою Алексея Петровича, который, как Вам известно, и сам живет с нуждою пополам и кое-как сводит концы с концами. Притом же теснота и многолюдство совершенно лишали меня средств заниматься. Теперь я начинаю дышать посвободнее, начинаю отдыхать от тяжелой ноши горестей и бесперерывных бед, под тяжестию которых чуть было не утратил совершенно и душевного и телесного здоровья.
   Вы, может быть, спросите: а что ты не определяешься к месту? В Москве нельзя занять учительского места, а куда-нибудь, не только в уезд, но даже и в губернский город, я ни за что в свете не поеду, скорей умру. Теперь же дожидаюсь ваканции на место одного корректора в университетской типографии, который едет в Петербург определиться по гражданской части. Я было чуть не попал в корректоры, да покуда ждал бумаг от Карташевского, место заняли перед самою Пасхою3. Если бы я получил мои бумаги на 2-й или 3-й неделе поста, то был бы теперь при месте. Должность корректора состоит в том, чтобы выправлять корректуру печатаемых в университетской типографии книг; жалованья -- 700, квартира, дрова, да, сверх того, так как за каждый выправленный лист полагается корректору 30 коп., то в конце года иные, которые поприлежнее занимаются своею должностию, получают рублей по 300, по 400, по 500 и более в виде награждения; а чины -- чинами. Всех корректоров 7; есть действительные студенты, двое кандидатов, из коих один племянник ректора университета Болдырева. Я спим нахожусь в приятельских отношениях, и он-то доставил мне работу, за которую я получил с лишком 200 руб. Когда я определюсь на это место, то, кроме верных 1200 руб. (полагая сюда квартиру, дрова, свечи и выдачу за поправку), я могу продолжать мои кондиции, занять другие и, сверх того, заниматься переводами, ибо свободного времени от должности -- пропасть. Теперь Вы поймете, отчего я не хочу ехать учителем в какой-нибудь город, хотя теперь могу это сделать в неделю, почему я так дорожу Москвою. У меня теперь две кондиции и то самые плохонькие -- но я надеюсь в скором времени добиться других побольше и получше, ибо в Москве трудно достать одну первую. Здесь так хорошо платят за уроки, что кандидаты московские отказываются от таких кондиций, за которые предлагают по 5 ассигн. за час. Межевич (корректор -- племянник ректора) получает с своих уроков рублей по 40 в день; другие знакомые мне кандидаты тоже. Я не кандидат и не действительный студент, так не побрезгую не только пятью рублями, но 4-мя.
   Получение места зависит от Надеждина; он обещает мне его. Он очень ласкает меня, и я надеюсь на него, как на каменную гору. Итак, маменька, вот Вам на первый раз; в следующий надеюсь написать еще что-нибудь получше. Как скоро получу место и перейду на казенную квартиру, тотчас возьму к себе обоих братьев. Константина можно будет впихнуть как-нибудь в какое-нибудь присутственное место. Я бы желал в почтамт: там служба трудная, зато хорошее жалованье и награды беспрестанные; но об этом потолкуем в свое время. Теперь же прощайте. Свидетельствую мое нижайшее почтение папеньке, бабушке, братьям, сестре, всем родным, домашним и знакомым. Бога ради, пишите поскорее. Погода в Москве гадкая: дождь беспрестанный, солнца видим мало и холод, словно как в октябре. Уведомьте, какова у Вас, каковы хлеба и пр. Остаюсь искренно любящий Вас сын Ваш

Виссарион Белинский.

   Письма по-прежнему адресуйте на имя Алексея Петровича прямо в Сенат или на квартиру его.
  

10. Н. А. ПОЛЕВОМУ

26 апреля 1835. Москва

Милостивый государь, Николай Алексеевич!

   Я принимаюсь за издание журнала;1 принимаюсь не из корыстных видов, не из детского тщеславия, но вместе с тем и не по сознанию в своих силах и своем назначении, а из уверенности, что теперь всякий может сделать что-нибудь, если имеет хоть искру способности и добра... Как бы то ни было, но мне было бы приятно иметь своим читателем того человека, который с таким благородным и беспримерным самоотвержением старался водрузить на родной земле хоругвь века, который воспитал своим журналом несколько юных поколений и сделался вечным образцом журналиста...2 Да, мне приятно и лестно думать, что Вы будете иногда, в редкие часы Вашего досуга, перелистывать книгу, мною составленную, хотя, может быть, для Вас это будет ни приятно и ни лестно... но Ваше внимание ко всякому благородному порыву, Ваше расположение и ласковость к молодым людям, сколько-нибудь принимающим участие в делах книжного мира, Ваша снисходительность к слабости сил при честных намерениях, в чем я имел удовольствие увериться собственным опытом, заставляют меня надеяться, что Вы не откажетесь принять моего приношения3. Николаю Ивановичу было очень приятно исполнить мое желание.

С истинным почтением имею честь пребыть
Вашим, милостивый государь, покорным слугою
Виссарион Белинский.

   1835. Апреля 26 дня.
  

11. Н. А. ПОЛЕВОМУ

19 сентября 1835. Москва

Милостивый государь, Николай Алексеевич!

   Я так много виноват перед Вами, что не смею и оправдываться; нельзя больше употреблять во зло Вашу снисходительность: вместо четырех дней Мольер продержан четырнадцать дней1. Благоволите уведомить меня касательно Вашего намерения насчет Чаттертона;2 я бы и распорядился сообразно с Вашим решением. Также, нет ли каких слухов насчет энциклопедического словаря3. Не почтите моих слов за докучливость: мне нужно только узнать, а я во всяком случае Ваш должник, вполне чувствующий всю важность Ваших одолжений, всю великость Вашей снисходительности.

Ваш, милостивый государь,
покорный слуга
В. Белинский.

   1835. Сент. 19 дня.
  

12. А. П. ЕФРЕМОВУ

Между 16--31 декабря 1836. Москва

   Ефремов! я занят: бога ради, забеги ко мне. Какова бы ни была эта новость и до кого бы ни касалась она,-- она важная новость -- и я горю нетерпением узнать ее. Не случилось ли какого-нибудь несчастия в Прямухине?1 Хоть напиши -- а там, часа через два, я, может быть, и зайду к тебе. Не получил ли письма Станкевич, пли не приехал ли его отец? Бога ради, уведомь скорее.
  

13. A. A. КРАЕВСКОМУ

14 января 1837, Москва

Милостивый государь, Андрей Александрович!

   Благодарю Вас за лестное Ваше ко мне внимание, которое Вы оказали мне приглашением меня участвовать в Вашем журнале1. Со всею охотою готов Вам помогать в издании и принять на свою ответственность разборы всех литературных произведений; только почитаю долгом объясниться с Вами насчет одного пункта, очень для меня важного, чтоб после между мною и Вами не могло быть никаких недоразумений, а следовательно, и неудовольствий. Я от души готов принять участие во всяком благородном предприятии и содействовать, сколько позволяют мне мои слабые силы, успехам отечественной литературы; но я желаю сохранить вполне свободу моих мнений и ни за что в свете не решусь стеснять себя какими бы то ни было личными или житейскими отношениями. Поэтому я готов по Вашему совету делать всевозможные изменения в моих статьях, когда дело будет касаться до безопасности Вашего издания со стороны цензуры; но что касается до авторитетов и разных личных отношений к литераторам, участвующим делом или желанием в Вашем журнале -- то я думаю и уверен, что я в этом отношении останусь совершенно свободен. Но так как у Вас участвуют некоторые литераторы, как-то князь Вяземский, барон Розен и Виктор Тепляков, о которых я по совести не могу напечатать доброго слова и вообще не могу говорить умеренно и хладнокровно, то буду стараться совсем не говорить о них, а если бы вышло какое-нибудь сочинение или собрание сочинений кого-нибудь из них, то также почту себя вправе или говорить, что думаю, или совсем ничего не говорить. Если же случится такая статья, где мне нельзя будет не упоминать о ком-нибудь из них, а Вам нельзя будет напечатать моего упоминовения, то я беру ее назад и имею право поместить в каком-нибудь другом журнале, хотя бы то было (чего избави боже!) в "Северной пчеле". Это главное; о материяльных условиях г. Неверов обещал мне переговорить с Вами2. Все статьи, которые бы не касались критики, но которые могли бы поместиться в Вашем листке, я со всем удовольствием отдаю Вам без всяких особенных условий и вообще буду действовать не как работник по найму, а как человек, принимающий живейшее участие в журнале, в котором он участвует. Если меня пригласят в энциклопедический словарь3, то готов стараться и взял бы на себя статьи о действовавших и действующих лицах русской литературы с полною уверенностию, что в этом мог бы быть полезен, по крайней мере, более Греча, который в статейке об Ломоносове показал образчик своего критицизма;4 также и о других литературных предметах мог бы взяться писать. Но энциклопедический словарь -- статья особая от "Литературных прибавлении". Если я там нужен, то готов, если нет -- напрашиваться не буду. Условия г. Плюшара я почитаю для себя довольно выгодными; а о моих он может узнать подробнее от Яннуария Михайловича. Посылаю Вам статейку5 -- не знаю, как Вам покажется: писал кое-как, наскоро. Если я Ваш сотрудник, то погодите писать о Булгарине (он, кажется, издал еще несколько частей своих творений):6 это моя законная пожива. Не замедлите Вашим ответом. Так как я по обстоятельствам, может быть, не буду в состоянии выехать из Москвы раньше половины или даже конца февраля, то назначьте книги для разборов: я или перешлю к Вам эти разборы, или привезу, чтоб прибыть к Вам не с пустыми руками и чтоб время даром не шло. 22 генваря будут давать в Москве "Гамлета", переведенного Полевым; если представление в каком бы то ни было отношении будет примечательно, то напишу об нем к Вам письмо для помещения в журнале7. Давно не писал, руки чешутся и статей в голове много шевелится, так что рад ко всему привязаться, чтоб только поговорить печатно. Извините за нескладицу моего письма: уж два часа ночи, спать хочется, а Неверов едет завтра. В ожидании скорого ответа, честь имею остаться Вашим,

милостивый государь, готовым к услугам
Виссарион Белинский.

   1837. Генваря 14 дня.
  
   Адрес мой: Виссариону Григорьевичу Белинскому, на Петровке, в Рахмановском переулке, в доме князя Касаткина-Ростовского, No 22,
  

14. Н. А. ПОЛЕВОМУ

25 января 1837, Москва

Милостивый государь, Николай Алексеевич!

   Ожидаю от Вас обещанной Вами рукописи "Гамлета";1 не забудьте приложить к ней и перевод Врончепки2. Сверх того, прошу Вас покорнейше одолжить мне "Живописного обозрения" за второй год: 3 кроме того, что я сам почти не видел его, у меня есть юноши -- брат и племянник -- которые жаждут и алчут прочесть второй год того издания, первый год которого доставлял им столько наслаждения. Исполнением всех этих просьб Вы крайне обяжете преданного Вам всею душою

В. Белинского.

   1837. Генваря 25 дня.
   Ha обороте:
   Его высокоблагородию
   милостивому государю
   Николаю Алексеевичу
   Полевому.
  

15. A. A. КРАЕВСКОМУ

4 февраля 1837. Москва

   Милостивый государь, Андрей Александрович!
   Если Вам угодно иметь меня своим сотрудником, то это мое письмо должно решительно определить мои отношения к Вашему журналу. Я готов со всею охотою писать Вам за объявленную мне Вами плату, итак, вот Вам мои условия:
   1) Я никак не могу согласиться не подписывать своего имени, или не означать моих статей какою бы то ни было фирмою -- нолем, зетом или чем Вам угодно, потому что, не любя присвоивать себе ничего чужого, ни худого, ни хорошего, я не уступаю никому и моих мнений, справедливы или ложны они, хорошо или дурно изложены1. Другое дело, если бы я исключительно заведовал у Вас литературною критикою так, как Н. И. Надеждин философическою; но это невозможно при значительной разности наших мнений касательно достоинства многих русских литераторов. Если Вы можете согласиться на это условие, в таком случае:
   2) Я пишу Вам рецензии на все петербургские и московские произведения, во мнении о которых у нас не может быть разности, и в этом случае я никогда не ошибусь и без всякой предварительной переписки с Вами. Осуждая же меня на управу с одними московскими изделиями2, Вы осуждаете меня на решительное бездействие, потому что в Москве выходит бездна книг, но каких? -- о каких и нечего и стыдно много толковать, какие Вы сами хотите проходить презрительным молчанием, в чем я с Вами почти согласен. Книг примечательных в хорошем или дурном смысле в Москве еще менее, чем в Петербурге. Если Вам угодно будет принять мои условия, я в скором времени пришлю Вам разборы: "Гамлета", перевод Полевого3, и одной нелепой трагедии, которая на днях должна выйти, одного нелепого человека -- Ивельева, что Великопольский, автор "Сатиры на игроков". Трагедь издана очень красиво, с большими затеями, а написана еще с большею бездарностию4.
   Если же Вам не угодно будет принять моего условия насчет подписки статей пли именем, или каким-нибудь значком, в таком случае мое рецензентство у Вас кончено, и я буду Вам присылать (если Вам это будет приятно) такие статьи, под которыми можно будет подписывать имя, не нарушая условий программы.
   Еще одно: если я буду Вашим рецензентом, я готов преследовать при каждом удобном случае Сенковского, Греча и Булгарина, но только как людей вредных для успехов образования нашего отечества, а не как литературную партию; короче, так, как я преследовал в "Телескопе" и "Молве" г-д наблюдателей, которых ненавижу и презираю от всей души, как людей ограниченных и недобросовестных5. Впрочем, под словом людей я разумею не людей собственно, а литераторов, и, хотя держусь правила --
  
   По моему так пей,
   Да дело разумей;
  
   но уважаю и это извинение --
  
   Они немного и дерут,
   Зато уж в рот хмельного не берут6.
  
   Впрочем, это мое мнение, которое важно только для меня и, кроме людей, о которых я тут говорю, никого оскорбить не может. Вскоре пришлю Вам статью о "Гамлете" на московской сцене: ее Вы можете поместить всю от слова до слова. Предмет ее очень любопытен: мы видели чудо -- Мочалова в роли Гамлета, которую он выполнил превосходно7. Публика была в восторге: два раза театр был полон и после каждого представления Мочалов был вызываем по два раза.
   Насчет моего переезда в Петербург я очень сомневаюсь, даже и в таком случае, если бы мы сошлись совершенно на всех спорных пунктах касательно мнений, потому что,-- извините мою откровенность,-- судя по первым NoNo "Литературных прибавлений" и по впечатлению, которое они произвели на Москву, г-ну Плюшару нельзя ожидать и тысячи подписчиков8. В журнале главное дело направление, а направление Вашего журнала может быть совершенно справедливо, но публика требует совсем не того, и мне очень прискорбно видеть, что "Библиотеке" опять оставляется широкое раздолье, что эта литературная чума, зловонная зараза еще с большею силою будет распространяться по России. И мне кажется, что я совершенно понимаю причину ее успеха.
   Благодарю Вас за Ваше обо мне старание насчет "Энциклопедического лексикона". Чрезвычайно бы одолжили Вы меня, если бы сказали г-ну редактору о моем желании как можно скорее иметь слова, на которые я должен писать9. Кроме того, что я имел бы более времени подумать, справиться, обработать, словом, сделать свое дело как можно лучше, добросовестнее -- и мои внешние обстоятельства громко требуют какой-нибудь опоры, не говорю уже о необходимости высказываться и делать. Вы не можете себе представить, что такое Москва: в ней негде строки поместить и нельзя копейки выработать пером.
   Теперь о моей рецензии на книгу Мухина10. Говоря о том, что посредственность печатается у Семена, я не думал этим сделать ни малейшего намека на "Наблюдателя"; впрочем, это выражение -- такая малость, что я не был <бы> на Вас в претензии и тогда, если бы Вы вычеркнули его без моего ведома. В самом деле, если мы будем переписываться о таких мелочах, то для Вас и Вашего журнала игра свеч не будет стоить. Что же касается до моего мнения насчет повестей Н. Ф. Павлова -- это другое дело: это мое мнение. Я могу смягчить выражение: "самые проблески чувства замирают под лоском щегольской отделки, а блестящая фраза отзывается трудом и изысканностию", так: "самые проблески чувства как будто ослаблены излишним старанием об изящной отделке, а блестящий слог отзывается как-то трудом и изысканностию"; остальное же все должно остаться без перемены,-- или бросьте всю статью в огонь. Впрочем, я не понимаю, почему Вам не поместить ее: ведь Вы допускаете же чужие мнения, противоречащие Вашим, и Вы сами писали ко мне, что для Вас всякое честное убеждение свято? Кроме того, Вы можете сделать примечание, выноску, где скажете, что Вы не согласны с этим мнением. Во всяком случае, я нисколько не почту себя обиженным, если моя статья будет брошена под стол: дорожа своими мнениями, я умею уважать и чужие, и Вы будете совершенно правы, поступив, как велит Вам Ваше убеждение.
   Вот, почтеннейший Андрей Александрович, мои последние условия и объяснения. Мы можем не сойтись и в то же время взаимно уважать причины один другого. Извините меня, может быть, за излишнюю резкость в словах: я не умею объясняться тонко и вообще не мастер писать письма. Мне будет очень грустно, если Ваш ответ покажет мне, что я не сотрудник Вашего журнала, потому что бог наказал меня самою задорною охотою высказывать свои мнения о литературных явлениях и вопросах, да и внешние мои обстоятельства очень плохи во всех отношениях... но, по моему мнению, не только лучше молчать и нуждаться, но даже и сгинуть со свету, нежели говорить не то, что думаешь, и спекулировать на свое убеждение.
   Бедный Пушкин! вот чем кончилось его поприще! Смерть Ленского в "Онегине" была пророчеством...11 Как не хотелось верить, что он ранен смертельно, но "Пчела" уверила всех12. Один истинный поэт был на Руси, и тот не совершил вполне своего призвания. Худо понимали его при жизни, поймут ли теперь?..
   Прошу Вас отвечать мне скорее; я с нетерпением буду ожидать Вашего письма. Оно решит -- приняться ли мне снова за работу, или замолчать совсем до времени. Хоть это и в смешном роде, но для меня похоже немного на гамлетовское "Быть или не быть?"13. Да, грустно молчать, когда хочется говорить и иногда есть что сказать! Прошу Вас поклониться Неверову, если увидитесь с ним.
   Имею честь остаться Вашим
   покорнейшим слугою

Виссарион Белинский.

   4 февраля 1837. Москва.
  
   При сем прилагаю статейку о романах и повестях Нарежного14.
  

16. К. С. АКСАКОВУ

21 июня 1837, Пятигорск

Пятигорск. 1837. 21 июня1.

   Любезный друг Константин, вчера я получил известие, что дела мои, насчет сбыта грамматики, идут гадко2. Что делать? Впрочем, я привык к такому счастию, и если бы своими дурными обстоятельствами не портил обстоятельств людей, привязанных ко мне, то без всякого огорчения почитал бы себя пасынком судьбы. Честная бедность не есть несчастие, может быть, для меня она даже счастие; но нищета, но необходимость жить на чужой счет -- слуга покорный -- или конец такой жизни, или черт возьми все, пожалуй, хотя и меня самого с руками и ногами. Если грамматика решительно не пойдет, то обращаюсь к черту, как Громобой3, и продаю мою душу с аукциона Сенковскому, Гречу или Плюшару, что все равно, кто больше даст. Буду писать по совести, но предоставлю покупщику души моей марать и править мои статьи как угодно. Может быть, найду работу и почестнее, по во всяком случае еду в Петербург, потому что в Москве, кроме голодной смерти и бесчестия, ожидать нечего. Служить решительно отказываюсь: какие выгоды даст мне служба взамен потери моей драгоценной свободы и независимости? Ровно никаких, даже средства жить, потому что прежде всего мне надо выплатить мои долги, а их на мне много, очень много. Мысль, что Николай Степанович беспокоится насчет уплаты, что Сергей Тимофеевич, может быть, упрекает себя за это беспокойство, эта мысль легла на мою душу тяжелою горою и давит ее4. Но что бы ни было, а надо, наконец, не шутя подумать о совершенном прекращении всех таких неприятных мыслей. Итак, прости, Москва, здравствуй, Петербург. С Москвою у меня соединено все прекрасное жизни; я прикован к ней; но и в Петербурге можно найти жизнь человеческую: затвориться от людей, быть человеком только наедине с собою и в заочных беседах с московскими друзьями, а в остальное время, вне своей комнаты, играть роль спекулянта, искателя фортуны, охать по деньгам. Отчуждение заставит глубже войти в себя и в самом себе искать замены утраты всего, что было мило, а это милое -- вы, друзья мои. Но, может быть, обстоятельства переменятся. Я уверен, что Полевой напишет о моей книге в "Библиотеке для чтения", что "Пчела" ее разругает, а то и другое равно важно: хуже всего молчание -- оно убивает книгу, так как брань и ругательства часто возвышают ее. Но мне пишут, что ты хотел где-то и что-то написать об ней: бога ради, брат, поспеши. Это не будет приятельскою проделкою: ты можешь говорить по совести, что думаешь, хвалить, что найдешь достойным хвалы, бранить, что найдешь дурным. О тоне нечего и говорить: даже и в случае решительного охуждения -- чем резче, тем лучше5.
   В Воронеже я встретился с М. С. Щепкиным6. Чудный человек! С четверть часа поговорил я с ним о том н о сем и еще более полюбил его. Как понимает он искусство, как горяча душа его -- истинный художник, и художник нашего времени. Вечером пошли мы в театр; дочь его играла (очень мило) Кетли7. В антрактах он морил нас своими шутками и остротами. В театре, где другой бы на его месте походил на потешника толпы, смиренного актера, он казался толстым, богатым и беззаботным барином, который пришел от скуки взглянуть, что тут делается. Дочь его была принята воронежскою публикою с восторгом; через день объявлен был "Ревизор", и мы с сожалением выехали из Воронежа. Воронежские актеры -- чудо из чудес: они доказали мне, что область бездарности так же бесконечна, как и область таланта и гения. Куда перед ними уроды московской сцены. Впрочем, одна актриса с талантом, недурна собою, даже с грациею, играет мило и непринужденно; жаль только, что эта непринужденность часто переходит в тривияльность. Есть также там один актер (кажется, Орлов) если не с талантом, то не без таланта.
   Я взял с собою две части "Вестника Европы" и перечел там несколько критик Надеждина. Боже мой, что это за человек! Из этих критик видно, что г. критик даже и не подозревал, чтобы на свете существовала добросовестность, убеждение, любовь к истине, к искусству. Он извивается, как змея, хитрит, клевещет, по временам притворяется дураком, и все это плоско, безвкусно, трактирно, кабацки. Что он написал о Полтаве!8 Поверишь ли, что в этой критике он превзошел в недобросовестности самого Сенковского. А его перебранки с "Сыном отечества", его остроты -- что твой Александр Анфимович Орлов9. Я читал и бесился. Его можно опозорить, заклеймить, и только глупое состояние нашей журналистики до 31 года 10 помогло этому человеку составить себе какой-то авторитет. Чтобы ты не приписал моих слов влиянию последнего поступка со мною со стороны этого человека11, то вот тебе честное слово, что я ни мало не сердит на него, что я иногда с удовольствием вспоминаю о нем и презираю и ненавижу его только тогда, когда читаю его гадкие и подлые недоумочные гаерства. Прошу тебя, любезный Константин, прочти все его статьи, прошу тебя об этом, как об одолжении: если ты не почувствуешь того же, что почувствовал я от них, то крепка твоя натура.
   Кажется, что я ничего путного не сделаю на Кавказе. Но это <не> беда: я собираюсь с силами, думаю беспрестанно, развиваю мои мысли, составляю планы статей и прочего. Только бы выздороветь, только бы избавиться от этого лимфозного наводнения, которое связывает душу, притупляет способности, убивает деятельность и уничтожает восприимчивость. Я жил доселе отрицательно: вспышки негодования были единственными источниками моей деятельности. Чтоб заставить меня почувствовать истину и заняться ею, надо, чтобы какой-нибудь идиот, вроде Шевырева, или подлец, вроде Сенковского, исказил ее. Но я надеюсь, что Кавказ поможет мне. Вчера я только начал пить воду, и от одной дороги, диеты, перемены места, раннего вставания поутру чувствую себя несравненно лучше. Кавказская природа так прекрасна, что не удивительно, что Пушкин так любил ее и так часто вдохновлялся ею. Горы, братец, выше Мишки Бакунина и толще Ефремова. Кстати, он тебе кланяется. Ты не поверишь, как он успел в такое короткое время поглупеть! Кто бы мог подумать, чтобы этот человек лимфе и болезни был обязан тем, что казался неглупым человеком. Если он приедет в Москву совершенно излеченный, то Говорецкий и Сверчков будут казаться перед ним гениями12.
   Часто читаю Пушкина, которого имею при себе всего, до последней строчки. "Кавказский пленник" его здесь, на Кавказе, получает новое значение. Я часто повторяю эти дивные стихи:
  
   Великолепные картины,
   Престолы вечные снегов.
   Очам казались их вершины
   Недвижной цепью облаков,
   И в их кругу колосс двуглавый,
   В венце блистая ледяном,
   Эльбрус огромный, величавый
   Белел на небе голубом.
  
   Какая верная картина, какая смелая, широкая, размашистая кисть! Что за поэт этот Пушкин! Я с наслаждением и несколько раз перечел его --что бы ты думал? -- его "Графа Нулина". Не говоря о верности изображений, волшебной живости рассказа, удивительном остроумии, он и в этой шутке, в этой карикатуре не изменяет своему характеру, который составляет грустное чувство:
  
   Кто долго жил в глуши печальной,
   Друзья, тот верно знает сам,
   Как сильно колокольчик дальной
   Порой волнует сердце нам.
   Не друг ли едет запоздалый,
   Товарищ юности удалой?..
   Уж не она ли?.. Боже мой!
   Вот ближе, ближе. Сердце бьется,
   Но мимо, мимо звук несется,
   Слабей... и смолкнул за горой.
  
   Прощай, будь счастлив; храни мир и гармонию души своей, потому что счастие только в этом. Мечтай, фантазируй, восхищайся, трогайся; только забудь о двух нелепых вещах, которые тебя губят -- магнетизме и фантастизме. Это глупые вещи. Я сильно начинаю разочаровываться в Гофмане, потому что никак не могу объяснить себе этой поэзии, сумасшедшей и болезненной. Мое почтение Сергею Тимофеевичу и Ольге Семеновне.

Твой В. Б.

   На конверте:
   Его благородию Константину Сергеевичу Аксакову. В Москве. За Мясницкими воротами, в Чудовом переулке, в доме г. Побойнина.
  

17. М. А. БАКУНИНУ

28 июня 1837, Пятигорск

   Пятигорск. 1837, июня 28 дня. Любезный Мишель, в субботу, 26 числа, отправил я к тебе письмо1, а в понедельник, 28 числа, пишу другое, которое ты, может быть, получишь целою неделею позже первого, потому что оно пойдет с тяжелою почтою, как все письма, отправляемые по понедельникам. Распространившись в прошлом письме о необходимости быть честным человеком, необходимости, которая для тебя более, нежели для кого-нибудь, должна быть необходимостию, я забыл сказать тебе кое-что нужное, а именно: Ефремов тебе кланяется и поручил мне известить тебя, что он настрочил своей матушке очень трогательное послание, которое непременно должно возыметь свое действие и которое она давно уже получила, потому что он отправил его на другой день после получения мною твоего письма. А если бы оное красноречивое послание, сверх всякого чаяния, не возымело своего действия и матушка вздумала бы употребить твои письма к Ефремову, как векселя, то ты объяви ей, что деньги тобою давно возвращены ему и что он потратил их на свои нужды. Ефремов решился подтвердить это и словесно и письменно, в случае нужды. Насчет же твоего с ним соперничества по титулу И. А. Хлестакова2, он заклинает тебя всем святым в мире быть спокойным и не ревновать к нему, потому что, говорит он, ты Иван Александрович Хлестаков par excellence {самый настоящий (фр.). -- Ред.}, так что, если бы собрать со всего света Хлестаковых, они были бы перед тобою только Ванечки и Ванюши Хлестаковы, а ты один бы остался между ними Иваном Александровичем Хлестаковым. (Ефремов поцеловал у меня руку, когда сообщил я ему эту остроту: бедный малый так почитает себя обиженным тобою, что всякая удачная выходка против тебя наполняет восторгом его душу.) Что же касается до его соперничества с другим Иваном Александровичем (стариком), то он и от пего отказывается по причине очень основательной: Иван Александрович, несмотря на свою старость, не перестает быть кавалером Венеры и каждый год получает от нее по нескольку наград; а Александр Павлович, увы! теперь решительно сознал себя не могущим не только уподобиться такой высокой чести, но даже служить и простым рядовым под знаменем этой богини, разве только в качестве сберегателя ее жриц, запертых в гаремах Востока. Ефремов поправляется в здоровье видимо, но только жаль, что это на счет ума: его узнать нельзя -- дурак дураком. Страсть к остроумию у него та же, но силы острить решительно нет. С господами офицерами он вошел в самые тесные отношения, но и между ними считается последним остряком. По своему к тебе расположению, он часто говорит о тебе господам офицерам и своими рассказами возбудил в них справедливое удивление к твоим достоинствам и пламенное желание познакомиться с тобою хоть через переписку. Вследствие этого лучшие остряки из них выбраны для сочинения к тебе общими силами шутливого и остроумного послания, пересыпанного энергическими российскими выражениями и остротами в роде "je suis" {я есмь или: я преследую (фр.). -- Ред.} и "сорок восемь". Смотри же, Мишель, не ударься лицом в грязь и ответь им с свойственною тебе тонкостию и остроумием, так чтобы каждая твоя острота была так же замысловата, как меток каждый твой шарик из хлеба, пускаемый тобою с необыкновенною ловкостию и приятностию. Чтобы лучше успеть в этом, дай свое письмо посмотреть Пьеру Полторацкому или даже попроси его и выправить: нисколько не обижая тебя, можно сказать, что он умнее тебя. Здорова ли Фиона Николаевна? Прошу тебя поцеловать ее в ручку и поклониться в ножку, Ефремов просит тебя о том же. Сбрила ли свою бороду Марья Николаевна и здравствуют ли в Прямухине Варинька Имбер и Урика? Обо всем сем не умедли уведомить меня.
   Но пора перестать говорить глупости. Я видимо поправляюсь, хотя начал лечиться только с 20 числа настоящего месяца. В теле чувствую какую-то легкость, а в душе ясность. Пью воды, беру ванны усердно и ревностно, хожу каждый день верст по десяти и взбираюсь ex-officio {по обязанности (лат.). -- Ред.} на ужасные высоты. Смотрю на ясное небо, на фантастические облака, на дикую и величественную природу Кавказа -- и радуюсь, сам не зная чему. Даже у себя в комнате, чуть только луч солнца заиграет на стекле окна, улыбаюсь и радостно потираю руками. Встаю в 4 часа и скоро надеюсь привыкнуть вставать в 3 ровно, разумеется, не дожидаясь, чтоб будили. Этому мешает то, что по милости блох, которые дьявольски кусаются, не могу скоро засыпать и потому сплю иногда не более 5 часов в сутки. Читаю книги. Теперь оканчиваю Сервантесова "Дон Кихота". Генияльное произведение! Зато "Хромоногий бес" Лесажа такая мерзость, что насилу заставил я себя дочесть его, и то ex-officio, a между тем, эта книжонка пользуется европейским авторитетом. Доберусь я до нее когда-нибудь. На водах я увидел генерала Свечина, хорошо тебе известного; ах, старый черт! Впрочем, он очень тих и скромен, не так, как безрукий Скобелев, который ужасно ломается. Что за лица, что за рожи съехались в Пятигорск; недостает только Ивана Петровича, чтоб наслаждаться их созерцанием. А господа офицеры! Боже мой, и теперь начинаю ценить их настоящим образом. Каждый из (них) катает шарики из хлеба не хуже тебя, Мишель.
   Если Никола Тарагннский в Москве, то скажи ему, что я жду от него письма на десяти листах, и вели ему уведомить меня, брал ли он негодные Николаевские ванны, которые более жгут кожу, нежели помогают здоровью. Дней через шесть перейду в Александро-николаевские илп Сабанеевские -- и тогда начну выздоравливать не шутя3. В самом деле, судя по началу, я надеюсь воскреснуть от серной воды. Я так припился к ней, что нахожу ее даже приятною и жалею, что в Москве не буду ею лакомиться. Черкесов вижу много, но черкешенки -- увы! -- еще ни одной не видел. Черкесы ужасно похожи на татар, но это, может быть, потому, что они татары и есть (какая глубокая физиологическая догадка -- сообщи ее Венелину: он напишет об этом огромную книгу)4. Вообще черкесы довольно благообразны, но главное их достоинство -- стройность. Ох, черкешенки!.. Чтоб видеть их, надо ехать в аул, верст за 30, а это мне не очень нравится: погода кавказская в непостоянстве не уступает московской, прекрасное утро здесь не есть ручательство за прекрасный день -- можно простудиться. К тому же я питаю к черкесам такую же антипатию, какую к черкешенкам симпатию. Черкес, плен и мучительное рабство -- для меня синонимы. Эти господа имеют дурную привычку мучить своих пленников и нагайками сообщать красноречие и убедительность их письмам для разжалобления родственников и поощрения их к скорейшему и богатейшему выкупу. Черт с ними! Это уж хуже господ офицеров. А все-таки хочется посмотреть чернооких черкешенок!
   Кланяйся Николаю Христофоровпчу и скажи ему, что его знакомый на Кавказе, но я еще не успел выполнить моего поручения, но что непременно его выполню 5. Миша, нет ли каких-нибудь новостей; нет ли литературных сплетней? Пожалуйста, сообщи мне их. Душа умирает без них. Прощай. Пиши чаще и больше.

Твой В. Б.

  

18. Д. П. ИВАНОВУ

3 июля 1837. Пятигорск

Пятигорск. 1835. Июля 3 дня.

   Вчера получил я письмо твое, любезный Дмитрий, и посылку, за что н благодарю тебя душевно. Жаль только, что, дожидаясь находки логики, ты напрасно потратил много времени. Также и насчет грамматики, ты сделал ошибку: мне нужна грамматика Греча большая, толстая, а не маленькая, которую ты прислал1. Но как бы то ни было, я тем не менее тебе благодарен. Логика Кизеветтера (на русском -- немецкая совсем мне не нужна)2 для меня необходима: без нее я как без рук. Хотя моя грамматика пошла дурно, но я уверен, что это только пока, но что осенью, если еще не раньше, она пойдет хорошо. Но во всяком случае, я пишу вторую часть и теперь обдумываю план большого сочинения под названием: "Полный курс словесности для начинающих". Он будет состоять из нескольких частей или отделений: изданная мною грамматика будет составлять первую часть; во второй будет заключаться низший синтаксис, или теория различных родов предложений, управления и порядка слов; третью часть составит высший синтаксис -- теория соединения предложений в периоды, как выражения умозаключения или силлогизма; о порядке предложений, ясности и пр.; четвертую часть составит риторика, или объяснение языка украшенного (тропы, фигуры); различные роды прозаических сочинений. В особенной части изложится подробно просодия, куда войдет теория стихосложения вообще и русского в особенности. Эстетика и хрестоматия займут несколько частей. Еще будучи в гимназии, я мечтал о сочинении этой книги: теперь настало время, потому что мысли мои об этих предметах созрели, и я почитаю себя способным на выполнение такого важного дела. Мне хотелось бы приняться за это поскорее, и с нынешнего дня я принимаюсь за низший синтаксис; но без логики я как без рук. Бога ради, милый мой, достань где-нибудь поскорее и вместе с грамматикой Греча и еще тремя экземплярами моей собственной перешли: это будет с твоей стороны неоцененною услугою мне3. И так много потеряно времени. Я не знаю, по какой причине Николай не хотел дать мне своей логики?4 Для какого она ему черта? Человек он больной, да и кроме того, без чуждой помощи, без знающего руководителя, он ни черта не поймет в ней. Пожалуйста, брат, похлопочи об этом.
   Уверение твое, что моя квартира продержится до моего приезда, было истинным бальзамом для меня и очень поможет моему выздоровлению. Я надеюсь на тебя, как на каменную гору, и ты напрасно уверяешь меня в твоем ко мне расположении: я и без твоих уверений никогда в нем не сомневался. Причина нашего разъединения нисколько не заключается в этом небывалом сомнении. Но об этом когда-нибудь, после. Насчет пущенного Дарьею Титовною (которой отдай от меня поклон в пояс) постояльца, я предоставляю ей действовать, как ей заблагорассудится. Пусть пустит постояльца и в залу, только кабинет и спальня должны остаться, как были; пусть пока юноши живут в нем5. Кстати о них: я рад, что они прилежно занимаются делом, только мне не нравится то, что один из них налег на немецкий, а другой на французский язык: надо, чтобы они занимались в равной степени тем и другим. Снегу с Эльборуса привезти тебе не могу, потому что, хотя я и вижу его из моего окна, но до него 150 или 200 верст. Боже мой, что за громада! Машук, при подошве которого я живу и целебными струями которого пользуюсь, по крайней мере,
   вдвое выше колокольни Ивана Велпкого; но в сравнении с Эльбрусом он -- горка, потому что только треть Эльбруса, покрытая снегом, из-за 150 верст кажется больше Машука. Бештау, хотя и выше Машука, но пред Эльбрусом -- горка. Здоровье мое видимо поправляется, хоть я только сейчас взял 17-ю ванну и еще не более двух недель начал пить воду. Ах, Дмитрий, как бы тебе удалось съездить на Кавказ -- ты переродился бы. Ваню узнать нельзя: лицо его очистилось совершенно, и он приедет в Москву молодец-молодцом. Он каждый день купается в такой воде, что опустишь ногу, да и вон глядишь, не сошла ли кожа от этого кипятку. Воду он пьет такую, что боишься язык обварить, как от кипящего чаю. Кланяйся Алеше и скажи ему, чтобы он заехал ко мне на Кавказ поохотиться -- дичи бездна, все фазаны, кулики и перепелы. Последние ходят по улице и подпускают к себе человека на два шага. Кланяйся куме и крестнице моим. Прощай. Пожалуйста книги, книги, книги -- перешли поскорее, если будешь иметь возможность.

Твой В. Б.

  

19. Д. П. ИВАНОВУ

7 августа 1837, Пятигорск

Пятигорск. 1837. Август 7 дня.

   Не знаю, как и благодарить тебя, любезный Дмитрий, за твои неоцененные одолжения мне. Ты не можешь представить, какую радость доставляет мне каждая строка из любезной Москвы, как разнообразит она мою однообразную жизнь, а между тем я так мало и так редко получаю эти строки. Тем более благодарен я тебе за твои1. Бакунин пропал -- ну да черт с ним; если увидишь его, скажи ему, что он подлец, свинья, сукин сын и прочее2. Напрасно ты беспокоишься насчет распечатания письма -- это сущие пустяки, только, бога ради, перешли его к нему поскорее. Адрес его следующий: "Повесе, сорванцу, офицеру, Ивану Александровичу Хлестакову, в г. Торжок, село Прямухино". Нет ли о нем каких-нибудь слухов -- сообщи мне их. Я решительно не знаю, что он, как он и где он. Покажи ему это письмо и наплюй ему в рожу, да разотри ногою. Но довольно о нем -- черт с ним. Обращаюсь к тебе. Я очень рад, что мой отъезд на Кавказ не только не разделил нас с тобою, но еще сблизил. Впрочем, это сближение всегда зависело от тебя. Чтобы доказать тебе мою готовность и мое желание быть близким к тебе не по родству и привычке, а по внутренней духовной связи, я решаюсь теперь же высказать тебе несколько неприятных истин, частию уже говоренных мною тебе, частию скрываемых от тебя. Где нет полной откровенности, полной доверенности, где скрывается хотя малость какая-нибудь, там нет и не может быть дружбы. Я с своей стороны готов всегда услышать о себе мнение другого, хотя бы оно было и невыгодно для меня. Если оно несправедливо -- оно огорчит меня, но не рассердит и не возбудит во мне неудовольствия или неприязни против того, кто мне его высказал. Ты это знаешь. Итак, скажу тебе, что меня разделяла с тобою только одна причина -- твоя мелочность. Я никогда не мог понять тебя. С одной стороны, я видел в тебе природную доброту души, нередко замечал даже вспышки благородного негодования против подлости, замечал в тебе здравое суждение и способность понимать даже такие вещи, которые нисколько тебя не занимали и не интересовали; с другой стороны, я видел тебя всегда окруженного пустейшими, ничтожнейшими людьми, и, что всего хуже, я видел, что ты с удовольствием проводишь с ними время. Этого мало, я видел, что ты умеешь приноравливаться к понятиям и языку всех и каждого, даже купцов, купчих, мужиков, девок и кухарок, и что ты находишь особенное удовольствие в любезничании и компанстве этого люда. Еще и теперь не могу забыть того отвращения, с которым я смотрел на твои плоские любезности на именинах Ивана Ивановича Вологжанинова и потом на именинах у Марфы Андреевны. Если ты дурачил этих людей -- это не благородно; если ты делал это для собственного удовольствия -- это глупо и пошло. Равным образом, мне не нравились твои поддакивания отцу Николая Ивановича Вологжанинова и согласие с его простодушным образом мыслей насчет религии и нравственности: если ты издевался над добрым и почтенным стариком -- это безнравственно; если ты хотел этим выиграть в его расположении к тебе -- это подло; если ты в самом деле так думал сам, то ты глуп -- не правда ли? Я ненавижу притворство и не люблю ни под кого подделываться, следовательно, такие поступки не могли мне нравиться. Твой брат, Алеша, скрытен, но тоже не любит никому петь лазаря, и я за это люблю его. Знаю, что ты никогда и ни перед кем не подличал из выгод, что ты даже иногда терял от этого; но разве лучше подличать без выгод? Это также подло, и еще глупо, сверх того. Знаю, что твой характер откровенен и благороден и что такого рода проделки с твоей стороны показывают не подлость, а пустоту и мелочность; но разве это похвально? Не надо и в шутку лгать и льстить. Пусть думает о тебе всякий, что ему угодно, а ты будь тем, что ты есть. Еще возмущал меня в тебе ваш общий семейный порок -- запанибратское обращение с чернью. Поверь мне, друг мой, что равенства нет в природе, потому что один умен, а другой глуп, один благороден, а другой подл, и как в уме, так и в благородстве есть тысячи степеней. Я не признаю неравенства, основанного на правах рождения, чиновности и богатства, но признаю неравенство, основанное на уме, чести и образованности. Я не посажу с собою за стол сапожника, не потому, что он не дворянин родом, не коллежский регистратор, а потому, что он свинья, скотина по своим грубым понятиям, привычкам и поступкам. Будь он даже и добр, и честен, и умен по своему состоянию, я все-таки буду держать его от себя на известном расстоянии, потому что у него нет эстетического чувства, без которого пошлы и ум, и честность, и образованность и без которого человек и при уме, честности и образованности -- он все-таки скотина. Ты скажешь, что я сам по необходимости знаюсь с людьми, чуждыми эстетического чувства, следовательно, скотами. Так -- знаюсь, но не дружусь, и знаюсь потому, что чувство у них заменяется хотя приличием, а это самое приличие помогает мне не допускать их до сближения со мною, а ограничиваться обыкновенными светскими отношениями. Теперь, согласись же, что сапожнику так же чуждо и приличие, как и чувство. Вспомни, сколько неудовольствий и оскорблений потерпел ты от Павлова, потому только, что имел несчастие быть им одолженным. После этого не постыдно ли входить в какие-нибудь отношения и допускать какую-нибудь короткость с этою сволочью? Можно обходиться с нею без гордости, без презрения, ласково, уважая в них и доброту, и рассудительность, и честность, а за отсутствием всего этого, хотя образ человеческий, если не душу, которой у них нет; но не дружиться, не допускать до короткости, не сажать лакея или портного на стул, не говорить ему вы с прибавлением с, как это делаешь ты. Ты скажешь, что и из низкого звания есть люди с чувством и даже призванием. Правда, но разве они не братья, не друзья мне, разве я с ними не на короткой ноге? Я, не стыдясь, в кругу знати, если угодно, назову моим другом какого-нибудь Кольцова. Об этом нечего и говорить. Теперь перехожу к самому смешному твоему пороку, который делает из тебя чуть не дурака -- это ученичество. Ты всегда уважал рутину, школьный порядок, уважал людей, следовавших тому и другому; ты несколько раз переписывал глупые лекции московских профессоров, лекции, где невежество, запоздалость, мелкость, недобросовестность, явное искажение истины так ярко бросались в глаза. Другое дело, если бы ты берег эти лекции, как память о твоем пребывании в университете, и в таком случае тебе всего бы лучше отослать их в Пачелмо3 под сохранение в каком-нибудь старом сундуке в темном чулане; но ты их перечитываешь, ты их переписывал; терял на пустяки и мелочи драгоценное время, которое с пользою мог бы употребить на настоящее занятие наукою или языками, как средством для науки. Ты заковал науку и ученье в школьные формы и от всей души думал, что студент словесного отделения совсем не то, что студент политического, не понимая, что с выходом из университета человек, посвятивший себя знанию, не принадлежит уже ни к какому отделению, если только он не скотина, что он даже совсем перестает быть студентом, если только он не дурак. Не слишком много ума и проницательности нужно для того, чтобы знать, что ни в одном русском университете нельзя положить молодому человеку прочного основания для будущих его занятий наукою и что для человека, посвящающего всю жизнь свою знанию, время, проведенное, им в университете, есть потерянное, погубленное время. Исключение останется разве только за математическими факультетами, и то по части чистой математики, да разве еще может он с успехом заняться медициною. Вообще для такого человека важно только частное, домашнее, кабинетное занятие, а в аудитории он теряет понапрасну свое время и только глупеет. Другое дело, кто хлопочет из аттестата, чтобы открыть себе дорогу по службе или приобрести себе средства к обеспечению своей внешней жизни, или для приобретения звания -- в таком случае его прилежание, его усердие похвальны, потому что имеют цель и смысл. Кто же учится для самой науки, тот должен учиться у себя в комнате, а для университета заниматься не более того, сколько нужно для получения аттестата. Для меня всегда будет жалок человек, который из кожи лезет, чтоб быть первым, вследствие добродушной уверенности, что он через это доберется до самого дна в этом кладезе мудрости; он или ребенок, дитя, хотя и умное и много обещающее, или просто человек бездарный, ограниченный. Это ученость тредьяковская, вагнеровская (Вагнер -- лицо в Фаусте Гете), для которой доступна буква, а не смысл, которая любит книгу для книги, а не как средство для знания, которая сто раз переписывает одну и ту же тетрадь только для удовольствия переписывать, а не по необходимости для знания, словом, ученость, или, лучше сказать, ученичество или детей, пли дураков. Я так убежден во всем этом, что первым долгом своим почитаю внушить Никанору заранее презрение к университету и приучить его смотреть на него, как на дом, в котором за трех или четырехлетнее хождение дают кандидатские аттестаты. Я никогда не забуду, как я смеялся, когда, расспрашивая Никанора о причинах его ненависти и презрения к Николаю Ивановичу, узнал, что в числе других причин находится и та, что он был плохим студентом и долго не мог выдержать экзамена. "А я так и просто был выгнан из университета за леность и неуспехи: так ты и меня должен презирать за это",-- сказал я ему4. "Но ты,-- отвечал он мне очень важно и с большою искренностию,-- ты вознаградил это впоследствии". Ха! ха! ха! бедный малый от всей души был уверен, что я впоследствии занимался именно тем, чем не занимался в университете, ни мало не подозревая, что, несмотря на мое позднейшее занятие, если б я стал держать экзамен на простого студента, и того не выдержал бы, не говоря уж о действительном студенте или кандидате. Но так прилично думать ребенку, дитяти, а не взрослому человеку, понимающему вещи, как должно. И, к несчастию, такой детский способ суждения не чужд тебя! Все это говорю я тебе для объяснения наших взаимных недоразумений и того разъединения, которое, несмотря на нашу взаимную любовь друг к другу, существовало между нами. Так как я от всей души желаю прекращения этих недоразумений, а вместо разъединения, полной дружбы, основанной не на родстве и привычке, а на взаимной доверенности и уважении, то и хочу уже зараз высказать тебе все, что лежало у меня на душе. Если я в чем-нибудь обвиняю тебя напрасно -- оправдывайся; если имеешь что-нибудь против меня -- обвиняй: если я прав, буду оправдываться перед тобою, если виноват -- признаюсь. По приезде из Прямухина, я был к тебе ближе, нежели когда-нибудь, и надеялся совершенно сойтись с тобою; но ты ввязался в глупую историю, заступился за человека доброго и совсем не подлого, но решительно густого, слабого и ничтожного, обвинял человека правого и хотя грубого, с большими недостатками, но доброго, твердого характером и искренно любившего и тебя и меня5. Ты помнишь, как это развело нас. И что же? Не оказалось ли, что я был прав, а ты виноват? Я давно уже не ошибался в людях, по крайней мере, с тех пор, как сошелся с людьми, и теперь никогда не обманусь в человеке и очень скоро пойму его вдоль и поперек. Не заступался ли ты за Алешу Владыкина, его мать и прочих, и после не был ли принужден согласиться со мною? Поверь, что все твои приятели, бывшие товарищи, люди, конечно, не злые и не подлые, даже добрые и честные, но тем не менее пустые и ничтожные. Ты сам опошлился, знаясь с ними. Как мне досадно было видеть, что ты целые дни проводишь с ними или совершенно без дела, или в пустых, детских спорах. Я молчал и решился молчать всегда, потому что считал уже тебя только родственником и навсегда хотел остаться твоим родственником. Но твои письма ко мне на Кавказ снова возбудили во мне надежду, что ты не совсем погиб и что из тебя можно еще сделать человека. Не твое усердие к моим комиссиям и моей квартире подали мие эту надежду, но какая-то грусть в твоих письмах, какое-то беспокойство, с которым ты смотришь на свою человеческую, а не гражданскую, будущность. Я увидел из них, что ты чувствуешь потребность делать и жить; самая простота и небрежность твоего слога уверила меня в этом, потому что кто говорит от души, тот не гоняется за звонкою фразою или вычурным выражением, но пишет, как говорит. А сказать правду, прежде я всегда замечал у тебя наклонность к цветистому слогу, каким отличаются письма Лопатина, мужа Катерины, и в которых так смешно высказывается претензия на ум и красноречие. Короче сказать, я снова уверился, что еще не подавлен в тебе зародыш жизни и что он еще может быть развит и расцвести пышным и прекрасным цветом. Подай мне руку, я не отворочусь от нее, но сожму ее со всем жаром души, жаждущей сочувствия; я подам тебе свою, как подает брат потерянному и снова найденному им брату; я поддержу тебя моею рукою, и сам обопрусь на твою, и, как братья, пойдем мы по пути жизни, совокупно и дружно борясь с ее невзгодами и противоречиям;!, совокупно и дружно наслаждаясь ее радостями и блаженством. Не думай, чтобы дружба была так же ревнива, как любовь, не думай, чтобы многие предметы любви истощали любовь; дружбы нет и не может быть между людьми, но есть между ними братство, о котором проповедовал Христос, есть между ними родство, основанное на любви и стремлении к богу, а бог есть любовь и истина. Бог не есть нечто отдельное от мира, но бог в мире, потому что он везде. Да, его, как говорит великий Иоанн, любимейший ученик Христа, его никто не видал; но он во всяком благородном порыве человека, во всякой светлой его мысли, во всяком святом движении его сердца. Мир, или вселенная, есть его храм, а душа и сердце человека, или, лучше сказать, внутреннее Я человека, есть его алтарь, престол, его святая святых. Итак, ищи бога не в храмах, созданных людьми, но ищи в сердце своем, ищи его в любви своей. Утони, исчезни в науке и искусстве, возлюби науку и искусство, возлюби их, как цель и потребность твоей жизни, а не как средство к образованию и успехам в свете -- и ты будешь блажей, а кто достиг блаженства, тот носит в себе бога, потому что цель жизни человека есть блаженство, а блаженство заключается в боге. Бог есть истина, следовательно, кто сделался сосудом истины, тот есть и сосуд божий; кто знает, тот уже и любит, потому что, не любя, невозможно познавать, а, познавая, невозможно не любить; бог есть вместе и истина, и любовь, и разум, и чувство; так, как солнце есть вместе и свет и теплота. Отвергнись, отрекись самого себя для истины, будь счастлив истиною, а не своими успехами, будь счастлив потому, что ты знаешь истину, а не потому, что ты знаешь истину. Брось свою политическую экономию и статистику: всякое частное знание унижает, опошливает человека; мысль, или идея, в ее безразличном, всемирном значении -- вот что должно быть предметом изучения человека. Вне мысли все призрак, мечта; одна мысль существенна и реальна. Что такое ты сам? -- мысль, одетая телом; тело твое сгниет, но твое Я останется, следовательно, тело твое есть призрак, мечта, но Я твое существенно и вечно. Философия -- вот что должно быть предметом твоей деятельности. Философия есть наука идеи чистой, отрешенной; история и естествознание суть науки идеи в явлении. Теперь, спрашиваю тебя: что важнее -- идея или явление, душа или тело? идея ли есть результат явления, или явление ecib результат идеи? Без сомнения, явление есть результат идеи. Если так, то можешь ли ты понять результат, не зная его причины? Может ли для тебя быть понятна история человечества, если ты не знаешь, что такое человек, что такое человечество? Вот почему философия есть начало и источник всякого знания, вот почему без философии всякая наука мертва, непонятна и нелепа. По тебе нельзя начать прямо с философии: тебе надо приготовиться к ней путем искусства. Как к душевному просветлению через причастие християнин приготовляется путем поста и покаяния, так искусством должен ты очистить свою душу от проказы земной суеты, холодного себялюбия, от обольщений внешней жизни и приготовить ее к принятию чистой истины. Искусство укрепит и разовьет в тебе любовь; оно даст тебе религию, пли истину в созерцании, потому что религия есть истина в созерцании, тогда как философия есть истина в сознании7. Кто уверен в истине по чувству и не может вывести ее из разума собственною свободною самомыслительностию, для того истина существует только в созерцании. Но, не имея истины в созерцании, невозможно иметь ее и в сознании. Ты был еще ребенком, а уже умел отличать добро от зла, истину от лжи -- значит, что истина в созерцании всегда предшествует истине в сознании. Но в детстве ты мог чувствовать только житейскую, практическую истину; теперь ты должен приобрести созерцание истины отвлеченной, чистой, и это созерцание дается тебе искусством. Меня всегда огорчало в тебе равнодушие к поэзии; ты занимался ею очень мало, а если и занимался, то не для наслаждения, а как будто по обязанности, чтобы уметь что-нибудь сказать о том или другом писателе, для образованности, чтобы не отстать от других, следовательно, по эгоизму или для рассеяния, для забавы. Нет, искусством должно заниматься набожно, благоговейно, для высшего наслаждения, наслаждения, свойственного одному духу. Если ты понял создание великого гения, то должен радоваться тому, что понял его, что от этого стал счастливее, а не тому, что ты понял, ты стал счастливее. Какое тебе дело до того, что тебя все бы стали почитать неспособным к высшей истине, к высшему наслаждению, словом, человеком ограниченным и бездушным, какое тебе до этого дело? Ты должен быть равнодушен к обиде твоей личности; ты должен быть неравнодушен только к оскорблению истины, которой ты служишь, потому что ты любишь истину, а не себя. Конечно, мы страдаем, когда оскорбляют наше самолюбие, но это оттого, что в нас больше эгоизма и самолюбия, нежели любви к богу: в ком же много любви к богу, тому легко переносить оскорбления своему самолюбию, или, лучше сказать, ему даже и нельзя будет и получить такого оскорбления, потому что у него нет самолюбия. Любовь есть сила, большая Сампсоновой. Но одним искусством нельзя заниматься беспрестанно, потому что оно требует занятия свободного, а не принужденного; душа же наша изнемогает под тяжестию впечатлений; и ум требует тоже свободной деятельности. Ты пишешь о желании прочесть Гегелеву "Энциклопедию философских наук", это бесполезно -- ты тут ровно ничего не поймешь. Для того, чтобы понимать Гегеля, нужно познакомиться с Кантом, Фихте и даже Шеллингом. Фихте написал две книги для профанов8 -- читай их. Ты их поймешь, и они заинтересуют и заохотят тебя к философии. Обратись насчет их к мерзавцу Бакунину. Достань себе Кизеветтера философию9. Кизеветтер ученик и последователь Канта и яснее его. Для начала этого будет довольно. Итак, ты принимаешься за философию! Доброе дело! Только в ней ты найдешь ответы на вопросы души твоей; только она даст мир и гармонию душе твоей и подарит тебя таким счастием, какого толпа и не подозревает и какого внешняя жизнь не может ни дать тебе, ни отнять у тебя. Ты будешь не в мире, но весь мир будет в тебе. В самом себе, в сокровенном святилище своего духа найдешь ты высшее счастие, и тогда твоя маленькая комнатка, твой убогий и тесный кабинет будет истинным храмом счастия. Ты будешь свободен, потому что не будешь ничего просить у мира, и мир оставит тебя в покое, видя, что ты ничего у него не просишь. Пуще всего, оставь политику и бойся всякого политического влияния на свой образ мыслей. Политика у нас в России не имеет смысла, и ею могут заниматься только пустые головы. Люби добро, и тогда ты будешь необходимо полезен своему отечеству, не думая и не стараясь быть ему полезным. Если бы каждый из индивидов, составляющих Россию, путем любви дошел до совершенства -- тогда Россия без всякой политики сделалась бы счастливейшею страною в мире. Просвещение -- вот путь ее к счастию. Для нее назначена совсем другая судьба, нежели для Франции, где политическое направление и наук, и искусства, и характера жителей имеет свой смысл, свою законность и свою хорошую сторону. Франция есть страна опыта, применения идей к жизни. Совсем другое назначение России. Если хочешь понять ее назначение -- прочти историю Петра Великого -- он объяснит тебе все10. Ни у какого народа не было такого государя. Все великие государи других народов ниже Петра, все они были выражением жизни своих народов и только выполняли волю своих народов, творя великое, словом, все они были под влиянием своих народов. Петр, наоборот, был выскочкою из своего народа, он не воспитал его, но перевоспитал, не создал, но пересоздал. Цари всех народов развивали свои народы, опираясь на прошедшее, на предание; Петр оторвал Россию от прошедшего, разрушил ее традицию, и теперь смешно и жалко смотреть на наших пустоголовых ученых и поэтов, которые ищут народности для мышления и искусства в истории с Рюрика до Алексея, в этой допотопной истории России. Петр есть ясное доказательство, что Россия не из себя разовьет свою гражданственность и свою свободу, но получит то и другое от своих царей, так, как уже много получила от них того и другого. Правда, мы еще не имеем прав, мы еще рабы, если угодно, но это оттого, что мы еще должны быть рабами. Россия еще дитя, для которого нужна нянька, в груди которой билось бы сердце, полное любви к своему питомцу, а в руке которой была бы лоза, готовая наказывать за шалости. Дать дитяти полную свободу -- значит погубить его. Дать России, в теперешнем ее состоянии, конституцию -- значит погубить Россию11. В понятии нашего народа, свобода есть воля, а воля -- озорничество. Не в парламент пошел бы освобожденный русский народ, а в кабак побежал бы он, пить вино, бить стекла и вешать дворян, то есть людей, которые бреют бороду и ходят в сюртуках, а не в зипунах, хотя бы, впрочем, у большей части этих дворян не было ни дворянских грамот, ни копейки денег. Вся надежда России на просвещение, а не на перевороты, не на революции и не на конституции. Во Франции были две революции и результатом их конституция -- и что же? В этой конституционной Франции гораздо менее свободы мысли, нежели в самодержавной Пруссии12. И это оттого, что свобода конституционная есть свобода условная, а истинная, безусловная свобода настает в государствах с успехами просвещения, основанного на философии, на философии умозрительной, а не эмпирической, на царстве чистого разума, а не пошлого здравого смысла. Гражданская свобода должна быть плодом внутренней свободы каждого индивида, составляющего народ, а внутренняя свобода приобретается сознанием. И таким-то прекрасным путем достигнет свободы наша Россия. Приведу тебе еще пример. Наше правительство не позволяет писать против крепостного права, а между тем исподволь освобождает крестьян. Посмотри, как благодаря тому, что у нас нет майоратства, издыхает наше дворянство само собою, без всяких революций и внутренних потрясений13. И если у нас будут дети, то, доживя до наших лет, они будут знать о крепостном праве, как о факте историческом, как о деле прошедшем. И все это сделается без заговоров и бунтов, и потому сделается прочнее и лучше. Давно ли мы с тобою живем на свете, давно ли помним себя, и уже посмотри, как переменилось общественное мнение: много ли теперь осталось тиранов-помещиков, а которые и остались, не презирают ли их самые помещики? Видишь ли, что и в России все идет к лучшему? Давно ли падение при дворе сопровождалось ссылкою в Сибирь? А теперь оно сопровождается много, много, если ссылкою в свою деревню. Давно ли Миних, фельдмаршал, герой, был осужден на четвертование и только по милосердию императрицы был сослан на всю жизнь в Сибирь, а теперь уже и нас с тобою, людей совершенно ничтожных в гражданском отношении, не будут четвертовать даже и в таком случае, когда бы мы были достойны этого. Помнишь ли ты, как отличались, как мило вели себя господа военные, особенно кавалеристы, в царствование Александра, которого мы с тобою видели собственными глазами за год или за два до его смерти? Помнишь ли ты, как они нахальствовали на постоях, увозили жен от мужей, из одного удальства, были ужасом и страхом мирных граждан и безнаказанно разбойничали? А теперь?... теперь они тише воды, ниже травы. Ты уже не боишься их, если имеешь несчастие быть фрачником или иметь мать, сестру, жену, дочь. Не более как года за два до нашего поступления в университет студенты были не лучше военных, и еще при нас академисты изредка свершали подобные подвиги, а теперь? -- Теперь студент, который в состоянии выпить ведро вина и держаться на ногах, уже не заслужит, как прежде, благоговейного удивления от своих товарищей, но возбудит к себе их презрение и ненависть. А что всему этому причиною? Установление общественного мнения, вследствие распространения просвещения, и, может быть, еще более того, самодержавная власть. Эта самодержавная власть дает нам полную свободу думать и мыслить, но ограничивает свободу громко говорить и вмешиваться в ее дела. Она пропускает к нам из-за границы такие книги, которых никак не позволит перевести и издать. И что ж, все это хорошо и законно с ее стороны, потому что то, что можешь знать ты, не должен знать мужик, потому что мысль, которая тебя может сделать лучше, погубила бы мужика, который, естественно, понял бы ее ложно. Правительство позволяет нам выписывать из-за границы все, что производит германская мыслительность, самая свободная, и не позволяет выписывать политических книг, которые послужили бы только ко вреду, кружа головы неосновательных людей. В моих глазах эта мера превосходна и похвальна. Главное дело в том, что граница России со стороны Европы не есть граница мысли, потому что мысль свободно проходит чрез нее, но есть граница вредного для России политического направления, а в этом я не вижу ни малейшего стеснения мысли, но, напротив, самое благонамеренное средство к ее распространению. Вино полезно для людей взрослых и умеющих им пользоваться, но гибельно для детей, а политика есть вино, которое в России может превратиться даже в опиум. Есть книга, наделавшая в Европе много шуму, сочинение аббата La Mennais -- "Les paroles d'un croyant"; {"Слова верующего" (фр.). -- Ред.}14 в этой книге Христос представлен каким-то политическим заговорщиком, мирообъемлющее его учение понято в частном и ограниченном смысле политики, все представлено ложно, противоречиво; я едва мог прочесть страниц 60 и бросил, потому что эта книга нагнала на меня скуку и досаду. А если бы ее позволили перевести и издать, то сколько бы молодых голов сошли от нее с ума, обольщенные ее пышными и звонкими фразами, ее трагическими кривляниями и пошлыми возгласами! Итак, оставим идти делам, как они идут, и будем верить свято и непреложно, что все идет к лучшему, что существует одно добро, что зло есть понятие отрицательное и существует только для добра, а сами обратим внимание на себя, возлюбим добро и истину, путем науки будем стремиться к тому и другому. Что за польза будет для тебя, если ты будешь знать дела всей Европы лучше самого Талейрана или Меттерниха, а сам будешь столоначальником в сенате или секретарем в земском суде? Если же бы ты и сделался министром, и тогда бы для тебя мало было выгоды: ты бы действовал по воле государя, а не по своим идеям, следовательно, был бы орудием, а не действователем. Но когда ты возвысишься до той любви, которая полагает душу свою за братии, когда ты постигнешь ясно свое назначение и обнимешь умом своим мировые истины, тогда ты всегда и везде будешь полезен своему отечеству. Если тебе будет вверена судьба твоих ближних -- эта судьба будет верна, потому что она предастся человеку благородному, просвещенному, ревностному к своей обязанности, а не подлецу, не взяточнику, не дураку и невежде; если ты будешь семьянином -- ты будешь разливать в своем маленьком кругу жизнь и радость, ты воспитаешь для общества души здравые, сильные любовию к добру; если тебе суждено провести жизнь в одиночестве, у тебя опять не может не быть своего круга, где если не прямое твое влияние, то хотя пример твой будет благодетелен. Быть апостолами просвещения -- вот наше назначение. Итак, будем подражать апостолам Христа, которые не делали заговоров и не основывали ни тайных, ни явных политических обществ, распространяя учение своего божественного учителя, но которые не отрекались от него перед царями и судиями и не боялись ни огня, ни меча. Не суйся в дела, которые до тебя не касаются, но будь верен своему делу, а твое дело -- любовь к истине; да, впрочем, тебе никто и не помешает служить ей, если ты не будешь вмешиваться не в свои дела. Итак, учиться, учиться и еще-таки учиться! К черту политику, да здравствует наука! Во Франции и наука, и искусство, и религия сделались или, лучше сказать, всегда были орудием политики, и потому там нет ни науки, ни искусства, ни религии, и потому еще больше французской политики бойся французской науки, в особенности французской философии. Французская политика имеет смысл во Франции, потому что все, что есть -- есть не без причины, не без необходимости и не без пользы; но французская философия есть истинное пустословие, потому что она у них есть отголосок политики и находится под ее влиянием, тогда как здравая политика должна выходить из философии. Право народное должно выходить из права человеческого, а право человеческое должно выходить из вопроса о причине и цели всего сущего, а вопрос этот есть задача философии. Французы же все выводят из настоящего положения общества, и потому у них нет вечных истин, но истины дневные, то есть на каждый день новые истины. Они все хотят вывести не из вечных законов человеческого разума, а из опыта, из истории, и потому не удивительно, что они в конце XVIII века хотели возобновить древнюю римскую республику, забыв, что одно и то же явление не повторяется дважды и что римляне не пример французам. Опыт ведет не к истине, а к заблуждению, потому что факты разнообразны до бесконечности и противоречивы до такой степени, что истину, выведенную из одного факта, можно тотчас же пришибить другим фактом; найти же внутреннюю связь и единство в этом разнообразии и противоречии фактов можно только в духе человеческом, следовательно, философия, основанная на опыте, есть нелепость. Новейшие французы хватились за немцев, но не поняли их, потому что француз никогда не может возвыситься до всеобщности и назло самому себе всегда остается французом, а в области мышления должны исчезать все национальные различия, и должен оставаться один человек. Итак, к черту французов: их влияние, кроме вреда, никогда ничего не приносило нам. Мы подражали их литературе -- и убили свою. Изо всей литературы их заслуживают большого внимания около десятка, можно сказать, превосходных исторических сочинений: а кроме этого, у них много хорошего по части естествознания, но и там господствует эмпиризм. Германия -- вот Иерусалим новейшего человечества, вот куда с надеждою и упованием должны обращаться его взоры; вот откуда придет снова Хрнстос, но уже не гонимый, не покрытый язвами мучения, не в венце мученичества, но в лучах славы. Доселе християнство было истиною в созерцании, словом, было верою, теперь оно должно быть истиною в сознании -- философиею. Да, философия немцев есть ясное и отчетливое, как математика, развитие и объяснение христианского учения, как учения, основанного на идее любви и идее возвышения человека до божества, путем сознания. Мне кажется, что юной и девственной России должна завещать Германия и свою семейственную жизнь, и свои общественные добродетели, и свою мирообъемлющую философию. У нас много зла, много безалаберщины, много чуждых влияний, и худых и хороших, но этот-то беспорядок и ручается за наше прекрасное будущее, потому что еще никакое чуждое влияние, худое или хорошее, не взяло у нас решительного перевеса. Мы по праву наследники всей Европы. Итак, наше (то есть нас, молодых людей) назначение уже и теперь ясно: мы должны начать этот союз с Германией), мы должны принимать верно, честно и отчетливо сокровища ее умственной жизни и быть их хранителями, но хранителями не скупыми, а готовыми делиться своим сокровищем со всеми, кто только пожелает их. Но мы должны выкинуть из головы всякую мысль быть полезными, потому что желание быть полезным проистекает из самолюбия и эгоизма. Человек свободен, долга не существует для него; он должен быть добродетелен не по долгу, а по любви, он должен следовать добру не потому, что оно полезно, а потому, что в нем заключается его счастие. Истина не имеет цели вне себя, так и наука и искусство. Не из желания распространить в своем отечестве здравые понятия должен ты учиться, а из бесцельной любви к знанию, а польза общественная будет и без твоего желания. Кто любит добро, тот не упустит случая сделать его, но не станет искать этого случая. Если я сделал добро, которое ты готов был сделать, ты должен не огорчаться, что упустил случай сделать доброе дело, а должен радоваться, что оно сделано, и тебе нет нужды, кем оно сделано -- тобою или мною. Совершенствуя себя, ты необходимо будешь совершенствовать и все, что близко к тебе. Человек обманывается, когда думает давать обществу направление и вмешиваться в дела миродержавного промысла. Не Петр Великий преобразовал Россию, а провидение, в руках которого Петр был орудием, может быть, сам не зная этого. Он только следовал внутреннему безотчетному своему влечению и следовал ему так твердо, несмотря на все опасности и препятствия, потому что находил свое блаженство в том, чтобы следовать ему; но от его ли воли зависело это внутреннее влечение? Всякий человек, который затеет великое дело, и, не сделав его, погибнет -- есть самозванец, который выдумал, наклеветал на себя подвиг. Кто на что призван, тот свершит свое дело, а точно ли он призван -- это узнает он по своему внутреннему призванию. Сколько мы видим поэтов, которые мучаются, хлопочут, пишут, расстраивают свое имение, здоровье, спокойствие, а потом, после тщетных усилий приобрести славу, перестают писать, делаются хозяевами и проводят спокойно свою жизнь в житейских расчетах. Не ясно ли, что они наклеветали на себя поэтическое призвание и что они приняли движение мелочного самолюбия и тщеславия за поэтическое призвание? Кто родился поэтом, то и умрет им. Отнять у него возможность писать -- значит отнять у него возможность жить. Итак, бога ради, не думай о том, где и как можешь ты быть полезен, но думай о том, чтоб поддержать и возвысить свое человеческое достоинство, а для этого один путь -- наука. Будешь ли ты ученым, расширишь ли ты круг знания --это не твое дело; ученым можно быть только по призванию и призванию частному, но любить науку и изучать ее есть призвание общее. Если бы ты вдруг почувствовал в себе непреодолимую любовь к военному званию -- бросай все и надевай мундир -- ты погиб, если не послушаешься своего внутреннего голоса; но надевши мундир, что ты будешь делать? С любовию заниматься своею должностию. Прекрасно! А в свободное от нее время? Неужели играть в карты? Нет -- твои свободные от должности минуты опять-таки должны быть посвящены науке, если не хочешь сделаться скотом. Еще раз -- забудь самое слово польза, но помни твердо слово любовь; а любовь существует не для пользы, а для самой себя. Когда великий гений распространяет в своем отечестве свет знания -- он не отечеству дает знание, но знанию дает отечество, потому что, что ты любишь в своем ближнем? известный образ, известное лицо или сознание, которого он есть орган? Не любовь к отечеству должна заставлять нас делать добро, но любовь к добру, не польза от добра, но самое добро.
   Итак, вот что прежде всего почитал я нужным сказать тебе. Ты всегда жаловался на мою будто бы холодность и несправедливость к тебе: пусть это письмо разуверит тебя в этом, пусть оно покажет тебе, что если я, подобно Диогену, не ищу людей днем с фонарем, то и не чуждаюсь их, когда они попадаются мне. Родство и приязнь -- вздоры; свято братство духовное, основа которого есть любовь к добру. Я высказал тебе все, что лежало у меня на сердце против тебя, самая многоплодность и говорливость письма моего покажет тебе, что оно писалось от полноты души. Теперь наши будущие отношения зависят совершенно от тебя.
   Занимаясь наукою, как высшею целию жизни, как потребностию внутренней твоей жизни, не оставляй без внимания и внешней жизни. Можно сделаться ее рабом, слишком гонясь за нею, и можно сделаться ее рабом, слишком презирая ее. Умей ограничить себя в своих желаниях, но умей и удовлетворять необходимому. Пуще всего бойся долгов. Мой пример перед тобою. Ты упрекаешь меня, что я понапрасну беспокоюсь о моей квартире; душа моя, положим, что у вас и без меня все идет хорошо, но каково-то пойдут дела, когда я приеду? Илье и лавочнику я должен, по крайней мере, пятьсот рублей -- где я их возьму? Я уезжал с твердою уверенностию, что грамматика меня выручит, но ты знаешь, как оправдалась эта уверенность15. Вследствие этой же уверенности я взял на честное слово до августа 500 р. у Боткина, который их занял у кого-то. Что тут делать? Кавказ мне надоел, опротивел, душа рвется в Москву, а между тем дух замирает у меня от ужаса при одной мысли о Москве. Я знаю, что грамматика моя разойдется и что единственная причина ее неуспеха заключается в том, что она существует incognito; но могу ли я ждать? Я так был вскружен своим отъездом, что забыл сделать много нужного для успеха моей книги, как, например, послать экземпляр Краевскому, который уже давно бы написал о ней в своем журнале и написал бы с похвалою. Горе мне, горе! Черт возьми и с жизнью и с здоровьем! Я жертва моей веры в судьбу, моей доверчивости к обстоятельствам, жертва моего ложного положения в обществе. Мне давно надо было свести концы с концами, по гривнам и копейкам разложить месяцы и дни, уравнять приход с расходом, а я все полагался на благоприятную перемену обстоятельств, то чрез журнальную работу, то через отдельные литературные труды. Это письмо к тебе последнее; если ты получишь его числа 13--15, то на другой же день отвечай, хотя коротенько, потому что первого или второго сентября мы выезжаем. Но если что случится для меня радостного, то, бога ради, уведомь поскорее; к 12 числу мы, верно, будем в Воронеже, так адресуй на имя Алексея Васильевича Кольцова, в Дворянской улице, в собственном доме; к 15 мы будем в Туле, так адресуй туда на имя младшего учителя гимназии Павла Петровича Матюшенки, с передачею мне. Это только в таком случае, когда, сверх всякого чаяния, дела мои поправятся хоть так, чтобы мне можно было без мучения и душевной пытки приближаться к Москве. Кавказ меня не излечил, но много поправил. Живой и здоровый цвет лица, чистый язык (чего уже не было лет пять) и сильный аппетит (чего тоже уж года два не было, потому что я едою не удовлетворял аппетит, а избавлялся от изнеможения) -- вот результат моего лечения. Сверх того, я уже уверен, что во мне нет ни остатков сифилиса, ни меркурия, а это не шутка. Нынче вечером (7 авг.) я беру 88-ю ванну, завтра кончу Сабанеевские и возьму 20 Елизаветинских, кислых, которые восстановят мои истощенные силы; 19 числа я еду на железные воды, верст за 15 от Пятигорска; возьму 20 ванн и 30-го возвращусь в Пятигорск. Итак, всех ванн я возьму 130--20 Николаевских, 20 Александровских, 50 Сабанеевских, 20 Елизаветинских и 20 железных. Из этого числа должно исключить 5 Сабанеевских, которые пропустил, потому что сделался болен, объевшись арбузом. Со вчерашнего дня снова начал. Сколько от арбуза, столько и от самых ванн у меня сделалась легкая лихорадка, а собственно от арбуза резь в животе и мучительный понос. Но теперь поправляюсь. Ослаб я ужасно, едва держусь на ногах, а между тем никогда не чувствовал я себя так легко, никогда не был в состояния ходить так много и на такие высоты. Вообще от ванн у большей части больных болит грудь, а чахоточный может умереть от 5 ванн, чему и бывали примеры; но у меня с ваннами решительно прекратилась боль в груди. Мой лекарь говорит, это оттого, что геморрой ушел в свое место -- к заднице. Итак, я приеду к вам не излеченный, но поправленный, для совершенного же излечения нужен еще курс и совершенная перемена жизни, то есть душевное спокойствие, диета, ходьба, верховая езда; надо оставить сидячую жизнь, чего мне нельзя сделать. Но делать нечего, хорошо и то, что уже приобретено водами, а будущее так мало льстит мне, что, право, не для чего больше и заботиться о здоровье. Кавказский климат -- гадость. Июнь был порядочный, но к концу изгадился, и до 20 июля погода стояла пасмурная и холодная; потом дней 6 были жары, доходившие до 48 градусов; пыль несносная и зловредная -- известковый порошок, мелко-истолченный. Теперь опять гадкая погода. Осень и начало весны (с марта до июня) бывают превосходны; зима умеренная, снег продолжается не более месяца, в марте все покрывается зеленью и показываются цветы. Верст за 60 влево от Пятигорска и снегу не бывает, а летом трава выгорает. Горы мне надоели, ванны и воды опротивели; скучно, грустно; считаем дни и часы, ждем выезда, как выпуска из ада в рай. На Кавказе хорошо пожить с месяц здоровому, а лечиться и в раю скучно. Жизнь постоянная в Пятигорске ужасна -- нет людей. Зато хороша природа и все дешево: пара кур и пара куропаток стоят гривенник; десять перепелок 30 к.; фунт славного белого хлеба 4 к.; арбузы и дыни нипочем,-- и какие дыни -- я и в Чембаре таких не видывал.
   Попечительность твоя о продаже моей грамматики мне очень не понравилась: не чисто и не честно. Грамматику Греча прислал ты мне не ту, о которой я писал: я говорил о своей, в переплете; я оставил ее на столе или в шкапу -- не помню. За "Логику" спасибо16. Алеше низко кланяюсь за его длинное и многословное послание и благодарю. Прощай

Твой В. Б.

   Кланяйся Николаю; скажи ему, чтобы он поскорее выздоравливал и уже больше б не дурачился, а занимался бы делом. Ивану Ивановичу мое почтение и повторение той благодарности за его бесценные одолжения, которую я никогда не перестану питать к нему.
   Куме опять кланяйся, а о дочери больше не пиши: ты так хвалишь ее, что я боюсь влюбиться и страдать бог знает из чего.
   Ваня лечится; служить ему двоим и лечиться самому очень трудновато, да что ж делать. По крайней мере, его труды не пропадут даром: он за них будет здоров и избавится от будущих болезней, которым мог бы быть подверженным.
  

20. К. С. АКСАКОВУ

14 августа 1837. Пятигорск

Пятигорск. 1837 года, 14 августа.

   Не ожидал я получить письма от тебя, любезный Константин -- и получил1. О дивное диво и чудное чудо! -- повторял я, получнв твое писанье. От кого ожидал, не дождался2, от кого не ждал -- получил. Ты написал письмо! Я думаю, ты ужаснулся великости своего подвига, тебе показалось, что ты сдвинул с места огромную гору, думая откатить камешек. Конечно, это письмо писано не буквами, а гиероглифами, и притом самыми неразборчивыми, но для твоей медвежьей лености и это подвиг. Итак, благодарю тебя вдвойне. Теперь я вполне уверился, что ты меня любишь: после такого доказательства странно было б сомневаться в этом.
   Все, что писал я тебе о моем намерении переехать в Питер, все это было плодом минуты отчаяния и ожесточения3. Теперь, когда я несколько спокойнее, теперь я не почитаю этого переезда неизбежным, не хочу продавать себя с аукциона, но все-таки думаю, что мне придется ехать в Петербург и предложить мок услуги хоть "Энциклопедическому лексикону". Рад бы писать и в "Библиотеку для чтения", но не решусь ни за что в мире, ни за какие блага видеть мои статьи искаженными и переделанными не только рукою какого-нибудь негодяя Сенковского, но и самого почтенного и доброго Жуковского, или, сказать яснее, никого в мире. Пойми хорошенько мое положение, голова тяжелая и бестолковая. Ты предлагаешь мне писать для детей -- очень хорошо. Но ведь тотчас по моем входе, так сказать, на квартиру я должен буду заплатить за квартиру рублей около 300 да в лавочку около этой же суммы, да иметь средства жить до тех пор, пока что-нибудь напишу, напечатаю и продам. Кредиторы и желудки (мой, брата и племянника) не согласятся ждать несколько месяцев. Кроме того, я решительно не способен к спекуляциям и компиляциям и решусь издать только добросовестный труд, а для такого труда нужно время и время, потому что я работаю тяжело и медленно. И притом, как много нужно условий для детской книжки! Целью ее должно быть -- возбудить в детях истину не в поучениях, не сознательную, но истину в представлении, в ощущении, и для этого нужно то спокойствие, та гармония духа, которая дается человеку только любовью. Во мне теперь мало любви; я весь в моих внешних обстоятельствах, весь вне себя и чужд всякой сосредоточенности. Сверх того, писать книгу, имеющую благую цель, для денег, для поправки обстоятельств... Выручка денег за книгу не есть дурное дело, даже очень хорошее; но надо, чтобы эти деньги были, так сказать, необходимым результатом книги, а не книга необходимым результатом денег. Ты это знаешь очень хорошо. Писать повестей я не могу, потому что для этого требуется творчество, потому что детская повесть должна отличаться художественною истиною создания. Но читая детские книжки, я находил некоторые из них не дурными самих по себе, но искаженными пошлою нравственностию, и думал, что переделка таких книг была бы очень полезна. Это я думаю и теперь. Хотя такие переделанные повести все-таки не были бы художественными, но, по крайней мере, я не насиловал бы моей фантазии, не грешил бы сам, а только поправлял бы грехи других4. Впрочем, кроме повестей, есть что писать для детей: одна история представила бы так много материалов. Но для этого нужны знания, которых у меня нет и недостаток которых могло бы заменить знание языков. Сколько вертелось и вертится еще у меня в голове славных предприятий -- и все они уничтожаются сами собою незнанием языков, особенно немецкого. Видишь ли, что прежде всего мне надо приняться за это, а чтобы приняться за это, надо быть спокойным со стороны внешней жизни, а это спокойствие могут дать только деньги, которых у меня нет и которых мне решительно негде взять. О грамматика -- ты срезала меня!5 Вот что значит не иметь журнальных благоприятелей и некоторой оборотливости; я был так необоротлив, что даже не послал экземпляра к Краевскому, с которым знаком и который, верно, уже давно и написал бы об ней и пропечатал бы известие аршинными буквами6. Беда, да и только. Нет никакого выхода. Или продай свое убеждение, сделай из себя пишущую машину -- или умирай с голоду. Москва самый глупый город в литературно-промышленном отношении: нет ни журналов, ни книгопродавцев. Скучно, брат, этак жить на свете. Я пишу письмо к тебе, одному из моих друзей,-- и что же в этом письме? -- Не мечты и мысли о благе, о любви, о цели жизни, но какие-то пошлые, коммерческие рассуждения о гадости жизни. И таковы-то, по большей части, все письма мои к друзьям и разговоры с ними... Это становится невыносимо. Я боюсь или сойти с ума, или сделаться пошлым человеком, приобщиться к этой толпе, которую так презираю и ненавижу. Горькая будущность, тем более горькая, что я сам приготовил ее своею беспорядочного жизнию.
   Слова два о Надеждине. Я не сержусь на него нимало, не ненавижу его, даже люблю по какому-то воспоминанию о моих прежних с ним отношениях. Он человек добрый, но решительно пустой и ничтожный. Жаль только, что он пустотою и ничтожностию своего характера может делать много зла людям, находящимся с ним в тесных отношениях. Это я еще недавно испытал на себе. На Кавказе лечился генерал Скобелев, которого обругал в "Молве" 1835 года Селивановский в безымянной статейке, как он это всегда делает по свойственному ему благоразумию7. Скобелев один раз, столкнувшись со мною на водах, спросил меня: "Вы г. Белинский?" -- Я. -- "Очень рад: я давно желал познакомиться с вами". Наговорил мне тьму комплиментов и потом спросил меня, за что я его разругал? -- Я ему сказал очень резко, что я не люблю отказываться от моих литературных дел, хороши ли они, дурны ли; что, высказывая резкие мнения о том и о сем, я никогда из чувства страха не отказывался от них; но что об нем писал не я, а Селивановский. -- "Как не вы, да Надеждин сам был у меня, просил извинения и сказал мне, что это написали вы. И хорошо, что он извинился передо мною, а то ему было бы худо: я хотел жаловаться императору. Не хорошо, братец, быть так заносчивым: Греч мне именно сказал о тебе, что ты голова редкая, ум светлый, перо отличное, но что дерзок и ругаешься на чем свет стоит". В этом духе продолжался наш разговор. Он продолжал осыпать меня комплиментами и в то же время ругал Надеждина с таким остервенением и таким тоном, что я не мог не заметить, что все эти ругательства относились ко мне, а не к Надеждину, который, поклонившись его превосходительству повинною головою, получил полное его прощение. Расстались мы дружески: он пожал мне руку и пригласил к себе8. Каков Николай Иванович? Не говоря уже о том, что он не знает, кто и что у него пишет, он еще выдает головою сильному человеку своего сотрудника, который мог безвозвратно погибнуть от одного слова этого сильного человека? Если бы и я написал эту статейку, и в таком случае, так как дело уже обошлось без беды, ему следовало бы прикрыть меня, а не выдавать. Хорош! Впрочем, бог с ним; желаю ему всякого счастия от всей души; готов сделать ему всякое добро, если бы нашел для этого случай; но также не упустил бы случая вывести наружу все его литературное поведение, от статей в "Вестнике Европы" против Пушкина9 до статей в "Библиотеке для чтения". Думаю, что после такой моей статьи, слава Булгарина и Греча померкла бы перед этим новым светилом на поприще литературной бессовестности. Кстати, здесь в Пятигорске служит брат Пушкина, Лев Сергеевич; должен быть, пустейший человек. Здесь познакомился я с очень интересным человеком -- козаком Сухоруковым10. Но обо всем этом поговорим при свидании. Это письмо -- последнее: 1 или 2 сентября мы выезжаем в Москву, к которой рвется душа и при одной мысли о которой у меня замирает сердце и кружится голова: так страшно мне въехать в нее. Этот въезд представляется мне какою-то ужасною катастрофою в моей жизни. Одна надежда еще осталась, и та слабая: не тронется ли моя грамматика к моему приезду; без этого я погиб. Ты что-то и где-то сбирался написать об ней -- что же медлишь?11 Ведь о ее выходе, кроме моих знакомых, никто не знает -- как же идти ей? В Петербурге решительно никто о ней и не слышал. В газетах было объявление только один раз12.
   Прощай, мой милый, желаю тебе по-прежнему хорошего аппетита. Кстати, у меня теперь свой не уступит твоему. Свидетельствую мое почтение Сергею Тимофеевичу. Прости.

Твой В. Белинский,

  

21. M. A. БАКУНИНУ

16 августа 1837. Пятигорск

Пятигорск. 1837 года, августа 16 дня.

   Вчера получил я совсем неожиданно твое письмо1, любез-ный Мишель. Оно меня очень удивило и если не огорчило, то и не доставило никакого удовольствия. Вместе с этим, оно нисколь-ко не достигло той цели, которую ты предполагал, когда писал его. И все это оттого, что с некоторого времени ты не понимаешь ни себя самого, ни меня, и цель моего теперешнего письма -- есть вывести тебя из этого двойного заблуждения. Начну с того, что все, что ты говоришь мне о моем падении2, совершенно спра-ведливо; сравнение меня с свиньею, которая, валяясь в грязи, ругает эту грязь -- очень верно, и я почел бы себя еще гораздо хуже свиньи, если бы обиделся истиною, высказанною прямо и без околичностей. Это мой любимый способ говорить правду: лишь было бы верно, а до слов и выражения мне нет дела. Скажу еще более: ты гораздо снисходительнее ко мне, нежели я заслу-живаю того в самом деле, и я сам гораздо строже к себе, может быть, потому, что лучше знаю сам себя, нежели ты знаешь меня. И несмотря на все это, повторяю тебе, что ты, по крайней мере на этот раз, не понял меня. Но прежде я должен сказать тебе, почему ты не понимаешь себя. Ты говоришь, что в последнее время мы все ужасно пали и что наши отношения поэтому опош-лились,-- это правда. Потом ты говоришь, что ты теперь встал и встал так, чтобы уже никогда не пасть, встал навеки. Поздрав-ляю тебя с этим восстанием от всей души и желаю, чтобы тебе в самом деле не пришлось никогда возвестить меня о своем новом восстании; но, признаюсь, сомневаюсь в этом, потому что еще не вполне верю и теперешнему твоему восстанию. Я уже сказал тебе, что в письме твоем ко мне не заключается решительно ни-чего оскорбительного для меня; да и притом ты и прежде почи-тал себя вправе говорить истину без всяких уловок, и это право было всегда между нами общее и служило основою нашей друж-бы. Теперь спрашиваю тебя: что же значит твоя приписка, в ко-торой ты просишь меня не сердиться на тебя за резкость твоих выражений и уверяешь, что они вырвались из души, любящей меня. Судя по этой приписке, можно подумать, что или мы с тобою еще недавно подружились, или что ты меня уж слишком глубоко презираешь, или, наконец, что (и это всего справедли-вее) ты не мог не заметить слишком заметной резкости своих выражений на свой счет и бессознательно перенес ее к выраже-ниям на мой счет. Да, Мишель, ты говоришь резко не обо мне, а о себе, и эта-то резкость невольно бросилась тебе самому в глаза; только ты не понял ее. И вот почему я говорю, что ты не понимаешь себя, и вот почему я не совсем верю тому, чтобы ты жил теперь в царстве любви, в царстве божием. В любви нет гордости, и человек, живущий в любви, счастлив тем, что он живет в любви, а не тем. что он живет в любви. Не с чувством умиления и кроткой радости извещаешь ты страждущего друга о своем восстании, а трубишь о нем с какою-то гордостню и жесткостию, с какою обыкновенно выскочка извещает о повышении в новый чин. Ты похож на человека, которому удалось взобраться на высокую гору и который, вместо того, чтобы именем любви и счастия убеждать своих дольных братии победить трудности и с долины взойти на гору, с которой видна пристань спасения,-- ругает их и бросает в них грязью и каменьями. Нет, не таков голос любви. Любовь не презирает падшими, но плачет о них, и ее голос успокаивает страждущую душу, а не возмущает ее каким-то неприятным, отталкивающим чувством. Тебе известны мои понятия о людях; ты знаешь, что я разделяю их на два класса -- на людей с зародышем любви и людей, лишенных этого зародыша. Последние для меня -- скоты, и я почитаю слабостию всякое снисхождение к ним. Но когда я вижу человека с зародышем чувства, то как бы глубоко ни пал он, но если в самом падении он сохранил инстинкт истины и сознание своего падения -- он брат мой, и я не могу презирать его. Вот о какой снисходительности говорю я и какой не вижу в тебе. Повторяю, что не выражения собственно на мой счет в твоем письме, но твои выражения на свой собственный счет заставляют меня так думать, и, к чести твоей, уверен, что ты согласишься со мною, если уже и теперь не думаешь того же. Посмотри на своих сестер: они в тысячу раз лучше тебя, в тысячу раз совершеннее тебя; они давно уже живут в царстве любви, в царстве божием, к которому ты приобщился навсегда так недавно; для них падение трудно, хотя и не невозможно (как для тебя); они давно уже наслаждаются этим миром и гармониею души, этим счастием, тихим, кротким и ясным, но глубоким и верным, этою ясностию и спокойствием духа, которые дает человеку только одна любовь и которые одни составляют на земле царствие божие. И что же? Они-то именно те, которые менее всех ценят себя и менее всех думают о себе. И это потому, что они видят впереди себя совершенство, которого еще они не достигли, и измеряют свое достоинство не своим прошедшим и настоящим совершенством, а будущим, и только его почитают совершенством; настоящее же их достоинство кажется им обыкновенным и естественным состоянием человека, и они никак не могут понять, чтобы можно было человеку жить вне этого состояния. И потому-то, будучи строгими к себе, они снисходительны к другим. И если бы которая-нибудь из твоих сестер писала письмо к подруге, впадшей в душевное уныние и бездействие, то, верно, бы нашла для ее ободрения другие способы, а не стала бы показывать с торжеством на себя. Все они простирают свою снисходительность к другим до слабости; но в них это не есть слабость, а любовь, потому что, слава богу, они еще не знают так хорошо людей, как мы с тобою, и не могут понять, чтобы могли существовать люди без зародыша благодати божией. Повторяю: истинное совершенство измеряет себя не тем достоинством, которое оно уже приобрело, но тем, которое остается еще приобресть ему. А кто может сказать себе, что ему уже ничего не остается приобретать в этом отношении? Никто, потому что если кто сказал это -- тот хуже пал. Человек, освободившийся от оков ничтожества и ощутивший в себе царство божие, плачет от умиления и умоляет своих братии, как о милости, разделить с ним его блаженство. А ты похож на человека, который <с> отчаянною храбростию вскочил на неприятельскую батарею, взял ее, выхватил знамя и, в гордом упоении победы, закричал: <<Ура! наша взяла!" Это ли восстание?.. Судя по твоему письму, можно подумать, что презрение уже победило в тебе любовь ко мне и что ты написал ко мне не по движению любви, а по побуждению долга, чтобы, в случае совершенного и безвозвратного моего падения, иметь право сказать самому себе: "Ну, что ж делать? Я сделал все, что мог -- его вина!" Да, Миша, такое-то впечатление произвело на меня твое письмо: оно заставило меня не обратиться на самого себя, а пожалеть о тебе, потому что, как мне кажется, ты находишься не в состоянии любви, но в состоянии напряжения, какое свойственно человеку, готовящемуся мужественно встретить ужасную бурю,-- бурю, которая должна или разрешиться в гармонию, или повлечь за собою падение. Может быть, я ошибаюсь; может быть, мое падение так глубоко, что я не в состоянии видеть истины; но как бы то ни было, а вот какое впечатление произвело на меня твое письмо, вот что заставило оно меня думать о тебе и, наконец, вот что почел я моим святым долгом высказать тебе со всею откровенностию, на которую дает право дружба. Впрочем, это еще не все: ниже я буду еще обращаться к некоторым пунктам письма твоего. Еще раз говорю тебе, может быть, я не прав; но не оскорбленное самолюбие скрывает от меня истину. Я горд, самолюбив, тщеславен до того, что всякая похвала, даже иногда не совсем заслуженная, даже со стороны глупца, вызывает краску удовольствия на мое лицо и ускоряет обращение крови; но никогда горькая правда, высказанная другом с участием, в каких бы то ни было резких или, если угодно, ругательных выражениях, не возбуждала во мне охлаждения к другу или малейшего неудовольствия. Похвала скорее может повредить мне, нежели горькая истина, и нигде и ни в чем не бываю я так свято добросовестен, нигде и ни в чем я не возвышаюсь до такого совершенного самоотвержения, как в сознании своего ничтожества, когда мне на него указывают. Это я всегда могу сказать о себе смело и утвердительно, это есть моя лучшая сторона. В самом глубочайшем моем падении я всегда сохранял уважение к истине, и теперь особенно мне чуждо всякое сомнение в ней, тогда как сомнение в самом себе с каждым днем более и более терзает меня и лишает последних сил.
   Чтобы избежать повторенпй, теперь же выскажу тебе и все остальное о духе и тоне твоего письма. Я и вы, говоришь ты беспрестанно: стало быть ты уже не заключаешься более в мы? Говоря об общем нашем оничтожении, ты как будто выгораживаешь себя из вины и всю ее складываешь на нас. Мы уехали -- и ты восстал, именно потому, что мы уехали3. После этого, нам опасно увидеться с тобою: ты можешь снова пасть. Ах, Миша, Миша! Какой злой дух овладел тобою? Твой ли это язык, твоя ли душа в нем? Не в нас заключается причина нашего падения: удар судьбы поразил нас, а мы виноваты в том, что допустили его оглушить себя. Очарование нашего круга исчезло, мы стали смотреть друг на друга, как на больных, и, сходясь вместе, боялись расшевелить раны один другого. По крайней мере, ты согласишься, что ты по необходимости был связан в присутствии Станкевича, так же, как он в твоем, и я в его. Мы сходились по-прежнему, но уже не было прежнего очарования, уже чего-то недоставало. Обрати внимание только на то, как мы отдалились все от Ивана Петровича; а что нас отдалило от него? -- несчастная тайна, нам троим известная4. Я уже не говорю о себе: я даже сам начинаю уверяться, что нет ничего мизернее и скучнее, как человек, который, утопая в грязи, понимает всю гадость своего положения, а не имеет силы вырваться из него, который имеет прямые и светлые идеи о цели жизни и не может перенести их в свою жизнь, который беспрестанно раскаивается, жалуется на себя друзьям своим, обвиняет себя в животности, слабодушии, пошлости и ограничивается только одним раскаянием, самообвинениями и жалобами. Да, Мишель, я чувствую, что должен казаться слишком пошлым всякому, кто знает меня вблизи, а не издали. Я уверен, что Боткин лучше обо мне думает, нежели ты, и это именно потому, что он менее знает меня, нежели ты, и поэтому его уважение более тяготит меня, нежели твое презрение. Итак, ни слова обо мне: на мой счет ты, может быть, и очень прав. Но я не могу понять этого презрительного сожаления, этого обидного сострадания, с которым ты смотришь на падение Станкевича5. Дай бог, чтобы он восстал скорее, чтобы он скорее вышел из этой ужасной борьбы; но я бы первый презрел его, как подлеца и эгоиста, если бы он не пал, не пал ужасно. Перебирая в уме всевозможные несчастия: непризнанную любовь, лишенке всего милого в жизни, ссылку, заточение, пытку, я еще в иные минуты вижу дух мой наравне или еще и выше этих несчастий; но пусть они все обрушатся на мою голову, только избавь меня боже от такого несчастия. Как! быть виною несчастия целой жизни совершеннейшего и прекраснейшего божьего создания; посулить ему рай на земле, осуществить его святейшие мечты о жизни и потом сказать: я обманулся в моем чувстве, прощайте! Этого мало: не сметь даже и этого сказать, но играть роль лжеца, обманщика, уверять в... боже мой!.. Да ты пошлый человек5, Мишель, если не понимаешь необходимости его падения! Твое положение к известным лицам7 есть счастие, блаженство в сравнении с его положением к пим, а твое положение все-таки ужасно, и уже одно то, что ты еще держишься, свидетельствует о железной силе твоего духа. Нет, Мишель, я лучше тебя понимаю этого человека: он не наш, и его нельзя мерить на нашу мерку. Я и теперь так же, как и прежде, объясняю странный феномен, который так непонятен. Этот человек любил истинно, и когда она узнает все и он после этого оживет, то он снова будет любить ее, но уже никому не скажет об этом. Всякое личное счастие он почитает похищением у его назначения, на всякие человеческие оковы он смотрит, как на задержку в своем ходе. Идеал его жизни -- блаженство в отречении от себя, блаженство в страдании. Он не сознает, но чувствует, что не принадлежит самому себе и не имеет права располагать собою. Я знаю его давно и никогда, сам не знаю почему, никогда не мог примириться с мыслию о возможности для него того счастия, которое так свойственно, так естественно человеку и в котором ему завидуют сами ангелы. Знаю, что он рассердился бы, если б я это сказал ему в глаза, но я уверен, что понимаю его лучше, нежели он сам себя. Мне понятно, отчего он не может примириться с мыслию о бессмертии, которого, впрочем, жаждет душа его: в бессмертии он видит конец страданию, видит награду... И этого-то человека ты обвиняешь за падение, не зная того, что если ему суждено встать, то нам надо будет смотреть на него, высоко подняв голову: иначе мы не рассмотрим и не узнаем его. Теперь об Иване Петровиче: неужели и он записан в твоем поминальнике, как усопший? Неужели между падшим и восставшим уже нет связи? Нет, Мишель, есть: эта связь -- скорбь, страдание по погибающем. И какая разница между им и тобою: он ревматик, он расслабленный, а ты здоров и крепок -- другой разницы нет между вами, кроме разве той, что у тебя есть воспоминание о прекрасных днях детства и живая связь с четырьмя созданиями, из которых для тебя и одного было бы достаточно для веры в жизнь и ее блаженство. Здесь я опять обращаюсь к себе, чтобы сказать, что в моем падении виноват я сам, моя беспорядочная жизнь и что в этом отношении между мною и Клюшниковым большая разница. Этот человек всегда болен, теперь он слег от болезни -- и уже не видит никого подле своей постели, не встречает ничьего взора, полного участия и сострадания. Что же после этого дружба? Что же после этого слова апостола: "Друг другу тяготы носите и тако исполните закон Христов?"8 Нет, Мишель, не упрекать, не презирать должен ты падшего друга, а убедить его в любви силою любви, своим примером. Ты тогда только свободен от прежних уз дружбы, когда бывший твой друг помирится с жизнию и признает мечтами свои прежние идеи и, смотря на человека, кипящего избытком высшей жизни, будет говорить подобно какому-нибудь Михаилу Дмитриеву или Николаю Павлову: "Я сам то же думал, сам тому же верил, но теперь вижу, что обманывался". Вот уже после этого падения скажи ему -- вечное прости. Но до тех пор -- ты еще связан. Ты намекаешь, или, лучше сказать, прямо говоришь, что оставишь нас (то есть меня и Николая!!!), если мы не встанем. Ах, Мишель, Мишель... Я уверен, что тебе уже давно совестно этих слов и что ты желал бы воротить их. Я хорошо знаю тебя; знаю, что в минуту вдохновения ты в состоянии прервать навсегда связь самую тесную, но при первом откровенном разговоре, при первом из тех разговоров, когда души разговаривающих настраиваются гармонически, ты снова друг и брат, снова прежний, добрый Мишель. Сколько раз ты топтал в грязь Ефремова, произносил с омерзением самое имя его и сколько раз после того ты снова делался к нему снисходителен, то есть снова любил его? Это оттого, что твое самочувствие истины в этом отношении вернее ее сознания. Добро -- всегда добро, блестит ли оно как солнце или как ночной червяк -- разница в объеме, но основа одна и та же. И этого-то добра ты никогда не сможешь не уважать даже и в Ефремове, в котором оно высказывается так слабо, как блеск ночного червяка. Всякому есть свое назначение, дальше которого он не может идти; итак, заслуга не в том, чтоб быть больше себя, но в том, чтоб не быть ниже себя. Ефремов -- дитя, ребенок, и у него абсолютной жизни нет даже и в представлении. Он создан тепленьким, добрым9, благородным человеком, с умом практическим, с способностями не ограниченными, но и не обширными. Пусть же он, наконец, насладится своею жизнпю, пусть трудом полезным и приятным уничтожит свою пустоту, а несколькими или и многими (чем больше, тем лучше) полезными для общества трудами приобретет уважение и доверенность к самому себе -- и довольно; тогда нельзя будет не любить его. И он уже успевает в этом: он менее предается апатии, и если не может избавиться ее, то ищет спасения уже не <в> ругательствах на жизнь и самого себя (как прежде), а в труде -- и находит. Он наделал бездну глупостей, пошлостей, вследствие своей пустоты и ложных понятий о средствах наполнить се; он притворялся, комедиянтствовал, обманывал других и еще более себя самого; наконец эта роль стала для него тяжела, оп убедился в ее пошлости и бесплодности, решился все прервать одним разом и навсегда; что ж тут худого находишь ты? Не понимаю. Человек делает глупости -- его презирают; он оставляет их, делая над собою большое усилие,-- его опять презирают. Живя с ним так долго, можно сказать, в одной комнате, я узнал его совершенно. Отношения наши иногда становились довольно тяжелы, особенно когда истощились шутки и воспоминания о знакомых и когда душа требовала перехода к беседе о предметах высших; но никогда его вид, его присутствие не убивали, не мучили моей души. А я на этот счет очень чувствителен: для меня дышать одним воздухом с пошляком и бездушником все равно, что лежать с связанными руками и ногами. И теперь, неужели я должен оставить этого человека, которому моя приязнь служит последнею опорою и поддерживает в благородных решениях? А между тем, он сам видит, что между нами есть какая-то разница, потому что я никогда не говорю с сим о том, о чем говорил каждый день с тобою, живя в Прямухине 4 месяца. С меня довольно и того, что мне не тяжко в его присутствии ни думать, ни говорить ни о чем человеческом, а и это есть признак достоинства. Кроме того, я могу всегда сообщить ему всякое мое человеческое горе и человеческую радость и увидеть в нем человеческое участие; люблю его еще и за то, что он очень деликатен, и деликатен не по приличию, а по чувству. Желаю от всей души, чтобы на белом свете было побольше таких людей: право, тогда на людей можно б было смотреть поласковее и повеселее. И до тех пор, пока Ефремов не заслужит в обществе титла солидного и почтенного человека, до тех пор я Ее буду ему чужой, хотя бы он и по-прежнему остался болен душой. Конечно, я не признаю долга, и если, например, ты не можешь сносить вида малонадежных или даже и безнадежных больных,-- ты прав, оставив их. По крайней мере, что касается до меня -- поверь, что я не в состоянии поддерживать ложных отношений внешней дружбы, и что самолюбие во мне есть такое чувство, которое переживет самую жизнь мою.
   Еще раз, Мишель,-- ты не хорошо понимаешь себя; если же я ошибаюсь в этом -- то, признаюсь, ты совершенно прав, что я пал совсем; скажу более: в таком случае у меня уже не осталось im ума, ни чувства... Как бы то ни было, но я писал к тебе эти строки без малейшего чувства неудовольствия, какое возбуждается самолюбием, писал их от полноты души, не придумывая доводов, не гоняясь за выражениями. Слова толпятся, и я затрудняюсь только излишеством их.
   Теперь докажу тебе, что ты не понимаешь меня или, по крайней мере, не понял моего письма, которое совсем понапрасну возбудило в тебе такое негодование. Я готов его напечатать и защищать публично, с кафедры; я не отступлюсь ни от одного в нем слова и с каждым днем более и более убеждаюсь, что минута, в которую родилась во мне идея, выраженная в нем, была началом восстания, а не падения. Неужели ты мог подумать, что я, бессильный вырваться из моего ничтожества, хочу прибегнуть под защиту честности, аккуратности, пуританизма и здравого смысла? Как же ты мало и худо меня знаешь! Я презираю и ненавижу добродетель без любви, я скорее решусь стремглав броситься в бездну порока и разврата, с ножом в руках на больших дорогах добывать свой насущный кусок хлеба, нежели, затоптав свое чувство и разум ногами в грязь, быть добрым квакером, пошлым резонером, пуританином, раскольником, добрым по расчету, честным по эгоизму, не воровать у других, чтоб другим не дать права воровать у себя, не резать ближнего, чтоб ближний не зарезал меня. Ты знаешь, что в моих глазах женщина, принадлежавшая многим по побуждению чувственности, есть женщина развратная, <...>, но гораздо менее развратная, гораздо менее <...>, нежели женщина, которая одному отдала себя на всю жизнь, по расчету или по чувству долга, или женщина, которая, любив одного, вышла за другого из уважения к родительской воле и общественному мнению, боролась с своим чувством, как с преступлением, и, победив его, сделала из себя <...>, убила в себе все человеческие искры и потом воспитала свою дочь в здравом смысле и понятии о долге, а после сосводничала ей хорошую партию. Живя в Пятигорске, я перечел множество романов и между ними несколько Куперовых, из которых вполне понял стихии североамериканских обществ: моя застоявшаяся, сгустившаяся от тины и паутины, но еще не охладевшая кровь кипела от негодования на это гнусно-добродетельное и честное общество торгашей, новых жидов, отвергшихся от Евангелия и признавших Старый завет10. Нет, лучше Турция, нежели Америка; нет -- лучше быть падшим ангелом, то есть дьяволом, нежели невинною, безгрешною, но холодною и слизистою лягушкою! Лучше вечно валяться в грязи и болоте, нежели опрятно одеться, причесаться и думать, что в этом-то состоит все совершенство человеческое. Нет, Мишель, ты не понял меня; совсем не о том я говорил тебе. Слушай. Благодать божия не дается нам свыше, но лежит как зародыш в нас самих; но не в нашей воле вызывать ее действие, и в этом отношении она нам дается. Человек ничего не может сделать для своего совершенства, действуя своею волею положительно, но много может для него сделать, действуя ею отрицательно. Я не могу возбудить в себе чувства, когда оно замерло во мне, не могу наполнить блаженством мою душу, убитую и истощенную пороком, словом, я не могу взять себе добродетель, но могу бросить порок. Тогда во мне не останется ничего, потому что не быть порочным еще не значит быть добродетельным, я буду пуст совершенно. Но для человека с потребностию жизни нельзя долго оставаться в состоянии пустоты: сильнейшее начало его натуры скоро должно взять верх, если только он не вздумает удовольствоваться отрицательным совершенством; но так как для последнего случая надо родиться подлецом, пошляком, квакером, сектантом и не иметь никакого зародыша человеческой жизни, то, повторяю, добро должно в нем восторжествовать. Против этого нельзя спорить. Теперь исследуем основательнее и глубже причины моего ничтожества при обильном начале жизни. В то время, как я получил твое письмо, я оканчивал письмо к Станкевичу11, в котором обвинял себя в таких грехах, что лучше бы не родиться на свет, как говорит Гамлет12. Во мне два главных недостатка: самолюбие и чувственность. Остановимся на первом, потому что второй совершенно ничтожен, как покажут тебе результаты моих доводов. Ты знаешь, что я имею похвальную привычку краснеть без всякой причины, как думают все, но в самом-то деле очень не без причины. Эта похвальная привычка составляет несчастие моей жизни, и если бы ты мог хотя несколько догадаться, как дорого она мне обходится, то, верно, никогда бы не захотел воспользоваться ею для своей потехи, во всяком случае, очень пошлой и недостойней порядочного человека. Самолюбие -- вот причина этого явления. Конечно, здесь принимает большое участие какая-то природная робость характера и еще одно обстоятельство в моем воспитании, о чем теперь мне некогда распространяться, но главная причина все-таки самолюбие. Я краснею оттого, что мне не отдали должной справедливости, следовательно, от оскорбленного самолюбия; я краснею оттого, что мне отдали справедливость, следовательно, от удовлетворенного самолюбия; к чести своей скажу, что еще чаще краснею я вследствие сознания своего недостоинства, от того внимания, которое оказывают мне хорошие люди, знающие меня издалека. Я понимаю самое малейшее движение моего самолюбия -- и все-таки не могу убить в себе этого пошлого чувства. Оно овладело мною совершенно, сделало меня своим рабом. Я никогда не забуду, как ты в первый раз застал меня у Вееров за фортепьяно; что мне должно было делать? смеяться вместе с тобою над моею неспособностию, своим неумением? Кажется, что на моем месте всякий поступил бы так; но я вспыхнул, вспотел, почти задрожал, как виртуоз, который дает первый концерт свой собранию строгих знатоков. Я не написал ни одной статьи с полным самозабвением в своей идее: бессознательное предчувствие неуспеха и еще более того успеха всегда волновало мою кровь, усиливало и напрягало мои умственные силы, как прием опиуму. И между тем я унизился бы до самого пошлого смирения, оклеветал бы себя самым фарисейским образом, если бы стал отрицать в себе живое и плодотворное зерно любви к истине; все мои- статьи были плодом этой любви, только самолюбие всегда тут вмешивалось и играло большую или меньшую роль. Даже в дружеском кругу, рассуждая о чем-нибудь, я вдруг краснел оттого, что нехорошо выразил мою мысль или, что бывало всего чаще, неловко сострил, или от противной причины, то есть от успеха в том и другом (боже мой -- какая мелочность!); но как скоро дело касается до моих задушевных убеждений, я тотчас забываю себя, выхожу из себя, и тут давай мне кафедру и толпу народа: я ощущаю в себе присутствие божие, мое маленькое я исчезнет, и слова, полные жара и силы, рекою польются с языка моего. Даже и теперь, как и всегда, я выхожу, просыпаюсь от самой тяжелой апатии, как скоро слышу, что искажают истину, ложно толкуя назначение человека, долг, чувство, разум. Итак, во мне есть зародыш жизни. Я понял и усвоил себе многие высокие истины: значит, истина в представлении дана мне природою. Отчего же все это бесплодно? По законам разума, зародыш должен или развиваться и развиться, или сгнить и погибнуть. Со мною нет ни того, ни другого. Неужели мне мешает чувственность? Пустяки -- я давно сознал ее гадость, а сознание недостатка убивает недостаток. Да и может ли быть, чтобы человек, который так верно понимает назначение женщины, как я, который питает ко всякой достойной женщине такое святое, такое робкое чувство благоговения, душа которого так жаждет любви чистой и высокой и, может быть, уже не раз трепетала и замирала от предчувствия этого блаженства, может ли быть, чтобы такой человек не имел силы победить низкие, чувственные побуждения и возгнушаться ими? Что же, спрашиваю я тебя, что же причиною бесплодности моих порывов, моего душевного жару и многих прекрасных даров, в которых не отказала мне природа? -- Вот вопрос, который я окончательно решил во время моего пребывания на Кавказе. Внешняя жизнь, или, лучше сказать, дисгармония внешней жизни с внутреннею. Какая причина этой дисгармонии? Беспорядок жизни и гривенники, которыми ты так презираешь, что не велишь даже писать тебе о них, чтоб не разрушить твоего блаженства13. Бедный Мишель, как не твердо, как не прочно твое блаженство! Но я оставляю тебя в стороне и буду говорить только о себе. С моей стороны подло не оправдаться перед тобою, а с твоей подло не выслушать меня. Но я должен говорить и о тебе, может быть, слишком неприятные для <тебя> вещи; но что ж делать? -- это необходимо для моего оправдания. Ты в долгах по уши; надежных средств к жизни у тебя нет никаких; ты взялся для графа переводить книгу, книгу, назначаемую для учебных заведений, следовательно, требующую труда честного, добросовестного, отчетливого, труда собственного, без всякого вмешательства и помощи со стороны других, словом, труда с любовию. А ты, как ты поступил с ним? Ты знал, что такого рода труды не твое дело -- и взялся за них. Честно ли это? Взялся же ты из расчета, хотя и очень благородного. Потом ты роздал эту книгу своим друзьям, сестрам, братьям, из чего должен был выйти перевод самый разнохарактерный, и потому самый бесхарактерный; благородно ли это?14 Не значит ли это подражать Погодину и подобным ему спекулянтам?15 Если граф подлец, это не дает тебе права быть подлецом; притом же, хорошее ли дело подавать о себе дурное мнение человеку сильному, могущему, сделать тебе много зла, помешать твоему благородному пути, и, сверх того, человеку, и так уже предубежденному против тебя? Ты ничего не делал с Шмптом, а между тем он тебя беспокоил, мучил, отнимал у тебя время, ввергал тебя в апатию, тревожил твою совесть. Наконец граф призывает тебя к себе и требует решительного ответа насчет перевода; ты просишь у него отсрочки и получаешь. Тотчас отдаешь Шмита Боткину и Каткову и, говоря, что ты в них нисколько не сомневаешься, едешь с Лангером и Полем в Прямухино, где и остаешься. Кстати: уезжая в Прямухнно вследствие самой святой потребности своей души16 (как то особенно было перед Пасхою), ты бросаешься то к тому, то к другому, чтобы достать нужную для поездки сумму; приезжаешь оттуда также на заем, и эти займы растут, растут, растут... Теперь, Мишель, я прошу тебя быть добросовестным (твое письмо ко мне сделало необходимою эту просьбу): неужели все это не имеет никакого дурного влияния на твои дух и не мешает нисколько твоей внутренней жизни? Если нет, то ты слишком высок для меня, и я не в состоянии понять тебя; если да, то ты напрасно увидел признаки конечного падения в моем письме об аккуратности и гривенниках. Ты пишешь ко мне, что уж более не тратишь по пяти и более рублей в день для переездов, на которые достаточно трех гривенников, что ты уже не лакомишься у Печкина вареньями и сладенькими водицами: верно -- в Прямухине нет ни извозчиков, ни Печкина17. Ты не хочешь и слышать о гривенниках, но хочешь иметь их -- это бессмысленно. Ты говоришь об одной внутренней жизни -- а сам платишь значительную дань внешней; это не логически. Ты не наденешь сертука с разорванными локтями, ты не оденешься так, чтобы какой-нибудь квартальный мог принять тебя за простолюдина и дать тебе толчок или оплеуху. Не только квартальному, ты дорого заплатишь за пощечину генералу. Ты не скажешь ему с кротостию, как Христос воину, ударившему его по щеке: "Если я сделал худо -- скажи мне это, если хорошее -- то за что же ты меня бьешь?"18 О нет, за такую обиду ты потребуешь крови своего обидчика, его предсмертных содроганий, его предсмертных стонов; чтобы отмстить ему, ты поставишь на лотерею резни свою жизнь, свою будущность, свое человеческое назначение. И за что же все это? -- за пощечину, которая бесчестит не тебя, но обидчика. Видишь ли, как еще мало в тебе любви, как еще велика зависимость твоя от внешней жизни и от гривенников, которыми ты столько презираешь. Но довольно о тебе -- обращаюсь к себе. Я не только потонул в долгах -- я живу на чужой счет, вспоможениями друзей, подаяниями людей, презираемых мною, благодеяниями кухарки. Какой-нибудь Н. Ф. Павлов кричит во всеуслышание, что я не имею права хулить его литературных заслуг, ибо-де он одолжил меня деньгами. Какой-нибудь Селивановский может, если захочет, заставить меня и покраснеть и побледнеть одним намеком об известных ему и мне 250 рублях19. Я взял к себе брата, которого от души люблю, который много обещает в будущем, чтобы передать ему все, что есть во мне хорошего, и предохранить его от всего, что есть во мне дурного, чтобы развить в нем его прекрасные элементы, словом, чтобы создать человека по духу и истине. Чтобы ему было не скучно, чтобы он с юных лет имел друга, я взял к себе племянника, которого, впрочем, люблю для самого него и для которого хотел сделать по возможности все то же, что и для брата20. А сделать все это я мог не иначе, как любовию, как приобретя их доверенность, сдружившись с ними, занимаясь с ними и наукою и беседами. И что же? Я не успел ни в чем. Видя их дурно накормленными, еще хуже одетыми, мучимый моими нуждами, сознанием своего падения, я одичал в семействе и, вместо дружбы и откровенности, возбудил в них к себе что-то вроде боязливого уважения. Вместо того, чтобы с любовию и кротостию исправлять недостатки брата, происходящие от его пылкого характера и дурного воспитания, в котором он нисколько не виноват, я ругал его, как пьяный сапожник, доводимый до ожесточения моими неудачами. Не зная языков, не далекий в науке, я не мог и так много сделать для них; но занятый то своими бесплодными делами, то бедственностию своего положения, я жил большею частию вне своего дома и, приходя домой, запирался в кабинете, и, бедные, они даже не ждали меня и за столом, потому что я обедал особенно. Учителей дать им я был не в состоянии. Племянника я только отвратил бесполезно от бедного, но верного пути, который ему был назначен родными его. И что всему этому причиною? Неаккуратность, беспорядок жизни, неосновательные надежды на будущее. И вот я бросился в разврат и искал в нем забвения, как пьяница ищет его в вине,-- и вот причина моей чувственности -- опять та же беспорядочная жизнь, та же неаккуратность, то же презрение не только к гривенникам, но к ассигнациям и золоту. И между тем, я всегда мог бы жить безбедно, если не богато, и тем избавиться от лютых душевных мук и бездны падения! Великий боже, до чего я дошел. Грамматика, моя последняя и твердая надежда -- рухнула21. Тотчас по приезде я должен буду заплатить за квартиру и в лавочку не менее шестисот рублей, окопировать брата и племянника, которые обносились, и, сверх того, иметь деньги для дальнейшего физического существования. Где я их возьму? Все источники прекратились, просить более нет сил. Да я и так уже сделался попрошайкою -- больше быть ею не могу -- лучше смерть, лучше отчаяние, ожесточение, ненависть к себе, к людям, к добру, чем такая жизнь! Что остается делать в таком положении? Надеяться. Но какое имею право надеяться я, которого бедность есть заслуженное несчастие? И притом, как можно надеяться после таких опытов? Если бы еще (последняя надежда!) к моему приезду тронулась грамматика, если бы я кое-как уладил мои внешние дела -- что я должен делать? Вот что: уничтожить причину зла, а все мое зло в неаккуратности, в беспорядке жизни, в презренных гривенниках. Какому любимому занятию могу я посвятить себя? Чем должен я заняться? Искусством? -- но для этого нужно знание немецкого и английского языка. Философиею? -- но для этого нужно знать по-немецки. Историею? -- опять то же. Итак, мне надо думать не о том, чтобы наслаждаться внутреннею жизнию, жизнию духа, идеи, а чтобы приготовить себя, чтобы сделать для себя возможным это наслаждение. Итак, принимаюсь за языки, принимаюсь с жаром, со всею силою если. Занятие скучное, прозаическое. Тут порядок в занятии и аккуратность не помешают делу, но еще помогут. Да и когда я буду знать по-немецки и английски, когда буду заниматься искусством, философиею и историею, неужели моим занятиям помешает то, что мои расходы будут уравнены с приходом и что я уплачу мои старые долги и не только не буду иметь нужды делать новых, но еще приду в состояние одолжать других; что вместо того, чтобы тратиться на извозчиков и леностию поддерживать свой геморрой, буду ходить пешком; что сообразно с расположением моего духа, которое правильно изменяется в каждую часть дня, расположу и мои занятия, определив на каждое из них свое время; что буду ложиться в 10 часов, а вставать в 5; что откажусь от поздней, хотя и приятной, беседы в кругу друзей для того, чтобы поутру встать с свежей головой, способной к труду; что удержу в себе порыв к высшему наслаждению, когда удовлетворение его заставит меня не устоять в слове, не докончить важного дела? Конечно, тот скотина, кто бы назначил себе определенный час для наслаждения искусством, кто бы, чувствуя сильную потребность перечесть Гамлета или Фауста, задавил в себе это стремление для занятия какими-нибудь склонениями, которым отдано это время; тот скотина, кто бы, настроившись гармонически возвышенною беседою с другом, не пожертвовал этой беседе часом-двумя, что<бы> докончить две страницы какого-нибудь перевода. Я никогда не думал сделать из себя машины. Я смотрю на порядок, как на средство, а не как на цель. Да и не этот ли порядок, в большей или меньшей степени, существует у вас в Прямухине? Сколько я заметил, по утрам твои сестры занимаются преимущественно рукодельем, после обеда чтением. Что этот порядок не может иногда, и даже часто, не изменяться -- об этом нету спору. Итак, за что же ты на меня напал с таким жаром, таким негодованием? Где же признаки конечного падения? Если ты и в этом со мною не согласишься -- то, признаюсь, мы больше не понимаем друг друга и кто-нибудь из нас точно пал глубоко и безвозвратно.
   Кстати о Прямухине. Ты говоришь, что однажды тебе удалось пробудить меня от моего постыдного усыпления и указать мне на новый для меня мир идеи; правда, я этого никогда не забуду -- ты много, много сделал для меня. Но не новыми утешительными идеями, а тем, что вызвал меня в Прямухино -- воскресил ты меня. Душа моя смягчилась, ее ожесточение миновало и она сделалась способною к воспринятию благих впечатлений, благих истин. Прямухинская гармония не помогала тебе в моем пробуждении, но была его главною причиною. Я ощутил себя в новой сфере, увидел себя в новом мире; окрест меня все дышало гармонией и блаженством, и эта гармония и блаженство частию проникли и в мою душу. Я увидел осуществление моих понятий о женщине; опыт утвердил мою веру. Но, друг мой, несмотря на все это, я уехал из Прямухина далеко не тем, чем почитал тогда себя: я был только взволнован, но еще не перерожден; 22 благодать божия стала только доступна мне, но еще не сделалась полным моим достоянием. И потому мое пребывание в Прямухине, не будучи совершенно бесплодным, все-таки не принесло тех плодов, которые я думал, что оно уже принесло. И этому опять та же причина: расстройство внешней жизни. Я хотел в Прямухине успокоиться, забыться -- и до некоторой степени успел в этом; но грозный призрак внешней жизни отравлял мои лучшие минуты. Я не хотел думать о будущем; отъезд мой представлялся мне в каком-то тумане, как будто бы в Прямухине я должен был провести всю жизнь мою. Все житейские попечения, все тревоги внешней жизни я старался да-еить в моей душе и хотя, по-видимому, успевал в этом, но мое спокойствие было обманчиво; в душе моей была страшная борьба. Во-первых, мысль о брате и племяннике, о том, что я для них ничего не сделал, что в то время, когда я живу такою прекрасною жнзнию, они оставлены без призора и борются с нуждою; потом мысль о том, что ожидает меня по возвращении в Москву, где все мои способы были уже истощены и где якорем спасения оставался один "Телескоп", и тот ненадежный. Во-вторых, мои недостатки нравственные терзали меня: сравнивая свои мгновенные порывы восторга с этою жизнию, ровною, гармоническою, без пробелов, без пустот, без падения и восстания, с этим прогрессивным ходом вперед к бесконечному совершенству,-- я ужасался своего ничтожества. Иногда было истинным бальзамом больной душе моей то уважение, которое доставляли мне мои мгновенные, но энергические порывы в любви к истине, эти мои редкие, но сильные вспышки чувства; но иногда я видел во всем этом слишком большое участие самолюбия, видел во всем этом какую-то одежду, блестящую, но без подкладки, какое-то здание великолепное, но без фундамента, какое-<то> дерево ветвистое и пышное, но без корня -- и я становился гадок самому себе. Не видя твоих сестер, я чувствовал внутри себя пожирающую лихорадку и думал, что их присутствие успокоит мою душу; но когда сходил вниз и снова видел их, то снова уверялся, что вид ангелов возбуждает в чертях только сознание их падения. И таким образом случались целые дни, когда я перебегал сверху вниз и снизу вверх, искал общества и, находя его, бегал от него. И вот причина тех порывов отчаяния, с которыми я бросался на кровать, что тебе так не нравилось, на что ты жаловался Ефремову и даже говорил мне самому. Конечно, это были дни, но не редкие, хотя и сменяемые прекрасными днями. Полною жизнию я жил только в те минуты, когда увлекался сильным жаром в спорах и, забывая себя, видел одну истину, которая меня занимала; еще тогда, когда все собирались в гостиной, толпились около рояли и пели хором. В этих хорах я думал слышать гимн восторга и блаженства усовершенствованного человечества, и душа моя замирала, можно сказать, в муках блаженства, потому что в моем блаженстве, от непривычки ли к нему, от недостатка ли гармонии в душе, бы<ло> что-то тяжкое, невыносимое, так что я боялся моими дикими движениями обратить на себя общее внимание, и потому не мог долго стоять или сидеть на одном месте. Еще были для меня минуты блаженства, уже вполне чистого и гармонического, когда, забывая вполне самого себя, оставляя все сравнения с собою, я созерцал и постигал в умилении все совершенство этих чистых, высоких созданий; да, в эти минуты, очень не редкие, я был вполне блажен тем, что верил в существование на земле бесконечно прекрасного и высокого, потому что видел своими глазами, видел перед собою то, что доселе почитал мечтою, что давно почитал долженствовавшим существовать, но к чему доселе не имел живой и сильной веры. Жизнь идеальная и жизнь действительная всегда двоились в моих понятиях: прямухинская гармония и знакомство с идеями Фихте, благодаря тебе23, в первый раз убедили меня, что идеальная-то жизнь есть именно жизнь действительная, положительная, конкретная, а так называемая действительная жизнь есть отрицание, призрак, ничтожество, пустота. И я узнал о существовании этой конкретной жизни для того, чтобы узнать свое бессилие усвоить ее себе; я узнал рай, для того чтобы удостовериться, что только приближение к его воротам -- не наслаждение, но только предощущение его гармонии и его ароматов -- есть естественно возможная моя жизнь. Но самые лютые мои минуты были, когда ты читал с ними по-немецки: тут уже не лихорадку, но целый ад ощущал я в себе, особенно, когда ты имел армейскую неделикатность еще подтрунивать надо мною при всех, нимало не догадываясь о состоянии моей души. Какая-то подлая злоба на всех и даже на невинный немецкий язык, давала мне знать о моем глубоком унижении, глубоком падении. И вслед за этим я иногда должен был шутить или говорить о любви, которой во мне не было, о блаженстве жизни, когда в душе моей был один холод, досада, ненависть к жизни, презрение к себе... Я принялся было за немецкий язык и не успел, потому что, как и во всем, хотел усовершенствовать себя не для себя, а как будто для выставки к известному дню. Гнилое зерно не принесло плода. И вот в каком состоянии борьбы и гармонии, отчаяния и блаженства был я в Прямухине. Я видел, что ты обманывался на мой счет, что ты предполагал во мне больше, нежели во мне было, и не мог, не имел силы открыться тебе. Твои неделикатные шутки и намеки довершали мое мучение: я очень хорошо понимал, на что ты намекаешь, и то, что бы должно было заставить меня гордиться собою, то унижало меня, как человека, который бы вздумал надеть на себя царскую порфиру, тогда как настоящее и достойное его одеяние было -- один разве рогожечный куль. Вот причина, отчего и по приезде в Москву я так смущался, когда слышал известное имя:24 чувство моего недостоинства было слишком глубоко во мне, и мне казалось, что смех и презрение всех и каждого ожидали меня за мою дерзость. Бееры беспрестанно шутили надо мною, увлекаемый невольным очарованием их аллегорий и иносказаний, я не мог не забываться, не мог не болтать с ними,-- это делало меня счастливым; но после мне всегда становилось гадко. Я беспрестанно был у Бееров: видеть женщин, быть в их кругу сделалось моею потребностию, сделалось моею настоящею жизнию. Во мне никогда не было глубокого, сильного чувства, но всегда было что-то, и даже теперь я не могу сказать, чтобы во мне не было ничего. Часто я хотел увериться, что это призрак, обман, потому что не было прогресса в развитии чувства, не было блаженства в его сознании, даже не было полной уверенности в его существовании; но именно в то-то время я и ощущал что-то в себе, когда уверялся, что во мне ничего не было. Притом же многие факты были слишком положительны: я отдалился от Ивана Петровича, мне было тяжело и бессмысленно все, что было чуждо Прямухина. Среди друзей я был один и искал уединения; заговорить со мною -- значило мучить меня, душить, давить. Грудь моя была больна какою-то отрадною болезнию, которая лучше всякого здоровья. Наконец я решился ехать в Петербург; это было лучшее время моей жизни. Я ощутил в себе тройную силу, я возымел какую-то благородную решимость похоронить в сердце все надежды, жить жизнию страдания, оторваться от друзей, от всего, что мило, и строгою жизнию, тяжким трудом выкупить прошедшие заблуждения и помириться с жизнию. Надежда получить от Плюшара вперед сумму, достаточную для уплаты важнейших долгов, и удовлетворить необходимейшим нуждам избавила меня от всех беспокойств насчет внешней жизни. Я стал свободен, горд, несчастен -- и в первый раз узнал счастие, потому что моя решимость родила во мне доверенность и уважение к самому себе. Словом, я страдал -- но был счастлив. Но вскоре увидел, что от меня требуют невозможного и что поэтому поездка должна не состояться25. Тут я упал совершенно -- и лежу до сих пор в грязи. По приезде из Прямухина я взял 600 р. у Боткина; их мне стало не надолго, и меня поддерживала только надежда на Николая,-- тебе известно, как сбылась эта надежда26. Я увидел себя на краю бездны. Кое-как кончил свою грамматику, представил ее Строганову. Потом получил отказ от него, но надежда на поправку чрез напечатание грамматики от себя все еще была якорем спасения. Дома я жить не мог, потому что видел там нужду. Заниматься не мог, потому что червь подтачивал во мне корень жизни. С постепенным ожесточением моей души усиливалась во мне чувственность: перед отъездом ва Кавказ во мне умер человек -- остался самец. Перед Пасхою я опять взял денег у Боткина, кроме того, Аксаков еще помог мне. Отъезжая на Кавказ, я опять взял 500 р. у Боткина, 800 у Ефремова, да еще и поехал на его счет!.. Мишель, я был бы погибший человек, если бы все эти займы не убили меня. Да, они должны убивать меня. Из первого письма моего к тебе ты знаешь, в каком ужасном состоянии приехал я на Кавказ. Конечно, все это оказалось ложною тревогою, невинною простудою и проказами геморроидальной лимфы; но тогда я принимал меркурий. Под влиянием этих-то обстоятельств было написано к тебе мое первое большое письмо (не знаю, получил ли ты его): всю вину моего падения я видел в чувственности. Но после увидел, что это неправда, что есть причина глубже этой, причина, из которой вышла и самая чувственность. Что чувственность сделала мне много зла, что она много способствовала моему падению -- об этом нет спору. Но и ее причина заключается в беспорядке моей жизни, которым я расстроил себя. Мучимый каждую минуту мыслию о долгах, о нищенстве, о попрошайстве, о моих летах, в которые уже пора приобрести какую-нибудь нравственную самостоятельность, о погибшей бесплодно юности, о бедности моих познаний, мог ли я забыться в чистой идее? Прикованный железными цепями к внешней жизни, мог ли я возвыситься до абсолютной! Я увидел себя бесчестным, подлым, ленивым, ни к чему не способным, каким-то жалким недоноском, и только в моей внешней жизни видел причину всего этого. Эта мысль обрадовала меня: я нашел причину болезни -- лекарство было не трудно найти. Не спорю, что, может быть, я невольно впал в другую крайность; но тебе должно было только указать на преувеличения, но согласиться в главном. Но ты, Мишель, не хотел понять меня п, повторяю тебе, в восстании увидел падение. Ты знаешь, что меня ждет в Москве: грамматика должна мне дать средства постепенно и понемногу разделываться с долгами и прожить хоть до Пасхи: иначе я погиб безвозвратно27. Если же эта надежда (последняя и притом слабая) сбудется, тогда я начинаю новый период моей жизни. У меня не будет потеряна ни одна минута. Я учусь по-немецки и английски месяца два беспрерывно, каждый день. Все другие занятия будут отдохновением и наслаждением. Я долго откладывал -- пора перестать. Возвращение с Кавказа будет началом моей новой жизни, или никогда не будет этого начала. Чувственность мне опротивела, и я теперь с большею живостию представляю себе гадкие последствия после обмана чувств, нежели прелесть этого обмана чувств. Не ручаюсь в твердости против соблазна, но ручаюсь, что уже не покупное наслаждение, не продажная любовь будут для меня соблазном. С лишком трехмесячного опыта достаточно для моего убеждения, что очень не трудно давить в себе животные побуждения прежде, нежели они возьмут свою силу. Несмотря на мое истощение от серной воды и ванн, несмотря на скуку однообразной жизни, я никогда не замечал в себе такой сильной восприемлемости впечатлений изящного, как во время моей дороги на Кавказ и пребывания в нем. Все, что ни читал я,-- отозвалось во мне. Пушкин предстал мне в новом свете, как будто я его прочел в первый раз. Никогда я так много не думал о себе в отношении к моей высшей цели, как опять на этом же Кавказе, и не послание Петра, как говоришь ты, но послание Иоанна читал и перечитывал я несколько раз28. Словом, я бы выздоровел и душевно и телесно, если бы будущее не стояло передо мною в грозном виде, если бы приезд мой в Москву был обеспечен. Вот что меня убивает и иссушает во мне источник жизни. Едва родится во мне сознание силы, едва почувствую я теплоту веры, как квартира, авошная лавочка, сертуки, штаны, долги и вся эта мерзость жизни тотчас убивают силу и веру, и тогда я могу только играть в свои козыри или в шашки. Эти пошлые удовольствия доставляют мне много пользы: они заставляют меня забываться в какой-то пустоте; которая все-таки лучше отчаяния. Итак, Мишель, я сказал тебе все и о тебе и о себе: заплати и мне тою же откровенностию. Я признался тебе во всем, в чем только имел признаться; я показал себя тебе во всей наготе, во всем безобразии падения, открыл тебе мои раны -- измеряй их великость, но для того, чтобы исцелить, а не растравить; я коснулся таких задушевных сторон моей жизни, о которых никогда бы не заговорил с тобою, если бы письмо твое не вызвало наружу всей моей души. Остаюсь в уверенности, что при свидании нашем эти стороны по-прежнему останутся неприкосновенными. Источник деликатности по приличию есть -- ничтожество; источник деликатности по чувству есть -- любовь. Я не открыл тебе новости, потому что это сделалось уже не новостию для всех, не только для тебя одного, прежде нежели я мог подозревать, чтобы кто-нибудь знал об этом; но я показал тебе дело в настоящем свете, не боясь унизиться в глазах твоих, потому что не хочу незаслуженного уважения: оно тяжелее презрения. Чтобы сказать все, не скрою от тебя (хотя это мне и больно и тяжко), что много было и фарсов и глупостей, хотя и было что-то истинное. Я не питал никогда никаких надежд, сколько по сознанию своего недостоинства, столько и предубеждению к себе на этот счет; я желал только чувства, хотя бы оно высказывалось в одном страдании; но иметь что-то -- все равно, что ничего не иметь. Это обнаружило мое бессилие. Итак -- ни слова больше об этом. Один только раз, увлекаемый полнотою чувствований, решился я поговорить с тобою об этом; но ты никогда не забывай, что ты ничего от меня не слышал и что, в моем присутствии, ты ничего не знаешь.
   Недавно получил я письмо от Станкевича:29 бедный тяжко страдает; но привычка, так сказать, к жизни идеи видна во всем. По-прежнему он пишет о том, что так занимает его душу, по-прежнему даже паясничает и между выражениями души убитой и растерзанной у него по-прежнему вырываются шутки, от которых нельзя не хохотать. Но эти шутки и фарсы вырываются у него сквозь слез. Он пишет ко мне, что ты все открыл всем, кроме ее. Tiat voluntas tua! {Да будет воля твоя! (лат.) -- Ред.} -- вот все, что он говорит об этом. Впрочем, заметно, что он доволен твоим поступком30. Я, с моей стороны, тоже доволен, что к развязке, какова бы она ни была, уже сделан один шаг. Роль ваша ужасна. Очень радует его твое известие, что Варвара Александровна хочет писать к нему. "Может быть, это только утешение, говорит он, но спасибо ему -- оно, ей-ей, утешило меня. Если бог вывезет меня из нравственного ничтожества, я опять буду не один в свете -- я так высоко ценил это семейство. О, тяжело жить без кумира! Если Ее любовь -- сочувствие необходимо в этой жизни".
   Очень рад, что ты более и более сходишься с Василием Петровичем31. Признаюсь в грехе: меня радует мысль, что я первый понял этого человека и понял так, что дальнейшее с ним знакомство ничего не прибавило к моему о нем мнению. После твоих сестер, это первый святой человек, которого я знаю. Его бесконечная доброта, его тихое упоение, с каким он в разговоре называет того, к кому обращается, его ясное, гармоническое расположение души во всякое время, его всегдашняя готовность к восприятию впечатлений искусства, его совершенное самозабвение, отрешение от своего Я -- даже не производят во мне досады на самого себя: я забываюсь, смотря на него. Он шел по ложному пути; встретил людей, которые лучше его понимали истину, и тотчас призиал свои ошибки, не почитая себя нисколько чрез это униженным32. Меня особенно восхищает в нем то, что у него внешняя жизнь не противоречит внутренней, что он столько же честный, сколько и благородный человек. Он не почитает себя вправе воспользоваться самовольно копейкою отца своего, и, по делам его торговли, он смотрит на свои отношения к отцу, как на отношения приказчика в лавке к своему хозяину33. Да, это единственный способ быть независимым от внешней жизни и людей, быть вполне свободным. Гармония внешней жизни человека с его внутреннею жизниго есть идеал жизни, и только в Василье нашел я осуществление этого идеала. Он умеет отказать себе во всем, исполнение чего вовлекло бы его в обязательство и зависимость от людей; он не займет денег для своих даже похвальных прихотей -- и входит в долги для того, чтобы помочь негодяю, своему приятелю. Да, брат Мишель, что ни говори, а аккуратность и самое скрупулезное внимание к гривенникам, как средство, а не цель жизни, соединенные с стремлением к абсолютной жизни -- есть истинное совершенство человека. Абсолютная жизнь есть безграничная свобода духа, а свободен ли тот, чьи человеческие минуты зависят от влияния внешних обстоятельств? Так как Василий читал твое письмо ко мне, то я бы очень желал, чтобы ты прочел ему из моего все, что относится к предмету нашего несогласия, особливо об аккуратности и гривенниках. Я уверен, что он возьмет мою сторону.
   Не почитаю нужным для соблюдения формы свидетельствовать мое всенижайшее почтение твоим сестрам: это пошло, и если я делывал в моих к тебе письмах такие приписки, то уже не буду вперед. Ты и без того знаешь, какое благоговейное уважение питаю я к ним. Не по случаю писем к тебе, но каждый день вспоминаю и думаю я о них, и это воспоминание -- одно сокровище в моей бедной жизни, одна светлая и отрадная сторона туманной сферы, в которой я живу. Но не нужно фраз: ты и без них поверишь мне в этом. Александру Михайловичу и Варваре Александровне прошу тебя засвидетельствовать мое почтение. Пожми руки за меня братьям твоим и передай им мой дружеский привет.
   Ефремов тебе кланяется. Мы оба с ним не вылечились, но поправились. Хорошо и это, за неимением лучшего. Он непременно опять приедет на Кавказ на будущую весну. Мне надобно бы сделать то же; но прежде вопроса о здоровье, мне еще должно решить вопрос о жизни. На Кавказе я ничего не сделал, потому <что> ничего нельзя было сделать. Перевел было страничек 20 с немецкого, но более не мог. Зато кое-что обдумал -- и не худое, лишь бы вопрос быть или не быть34 решился в мою пользу. Много думал об искусстве и наконец вполне постиг его значение, вопрос о котором давно мучил меня. Лишь бы благодать божия снова проникла в мою завялую и засохшую душу, а то я составил план хорошего сочинения, где в форме писем или переписки друзей хочу изложить все истины, как постиг я их, о цели человеческого бытия или счастии35. Я дам этим истинам практический характер, доступный всякому, у кого есть в груди простое и живое чувство бытия; обе мои статьи, написанные в ПрямухинеЗб, войдут сюда, переделанные в своей форме, очищенные от многословия и противоречии. Здесь я разовью как можно подробнее и картиннее urùiq творчества, которая у нас так мало понята; словом, здесь я надеюсь выразить всю основу нашей внутренней жизни. При свидании поговорим об этом побольше, и о других моих планах, есги только гривенники позволят мне думать и говорить о чем-нибудь человеческом. Письмо это ты получишь через Боткина. Я хотел его отослать 16 числа, но успел кончить только нынче (17); завтра еще остается написать два письма -- к Боткину и Клюшникову37, а послезавтра (19 августа) я буду в Железноводске, верстах в 15 от Пятигорска. Там возьму я 20 железных ванн; эти ванны будут последними. 1 или 2 сентября мы выезжаем в Москву, и, когда ты получишь это письмо (которое Ефремов отправит к тебе без меня 21 августа), я, вероятно, буду уже в Воронеже, где надеюсь увидеться с Николаем38, потому что писал к нему об этом. Отвечай мне немедленно и посылай письмо на имя Боткина, чтобы я тотчас по приезде мог прочесть его. Прощай.

Твой В. Белинский,

  

22. М. А. БАКУНИНУ

21 сентября 1837. Москва

Москва. 1837, сентября 21 дня.

   Наконец я в Москве, любезный Мишель! Кавказ так надоел мне, что теперь он как будто бы и не существует на свете для меня. Порою приятно вспомнить о красавце Эльборусе и цепи снеговых гор, идущих от него к Каспию, но все прочее -- пока еще только неприятное воспоминание. О дороге не хочу и говорить: это ад, или, вернее сказать, это русская дорога, а одно другого стоит. Приехали мы в среду, 15 числа этого месяца. Я тотчас поспешил увидеться с Иваном Петровичем и нашел его в горестном положении: мысль о своей бесплодной жизни в прошедшем и скорой смерти в будущем иссушила его до костей1. Однако ж мой приезд оживил его немного. Он исповедывался в своих грехах передо мною, как перед человеком чуть-чуть не святым, но уж, конечно, безгрешным. Я хохотал, слушая его, и сколько мог разуверил его несколько в его предубеждениях. Впрочем, он не хочет верить, чтобы я был хуже его; и не мудрено: теперь ему кажется, что никого нет хуже его. Он очень благодарен тебе за твои о нем небесплодные попечения, но жалуется, что ты часто слишком круто поворачивал его. Я этому верю, потому что во многих отношениях <он> настоящий ребенок. Начинаю сходиться с Катковым и ценить его -- чудесный малый! На другой день вечером, в театре {На "Роберте-Дьяволе", который некоторыми местами, которые я, разумеется, забыл и не узнаю вперед, потряс меня, но вообще произвел тягостное впечатление скуки2.}, увиделся с Васильем и Христофорычем. На другой день вечером был у Василья на музыкальном вечере. Одно место из одной сонаты Бетховена произвело на меня такое же могущественное действие, как многие места из игры Мочалова в роли Гамлета. Но несмотря на то, я не помню хорошо этого места и едва ли узнаю эту сонату. Василий походил в этот вечер на Пифию на треножнике и был на небе от одного адажио, лучшего, как говорит он, какое только написал Бетховен3. На другой вечер я был у него. Мне хотелось заговорить с Лангером о Прямухине, но я боялся, что ему прямухинская жизнь только понравилась, а не восхитила его до безумия или, по крайней мере, до полоумия4. Василий разуверил меня в этом, и я заговорил с Лангером. В первый еще раз в жизни увидел я столько наивности, столько простодушия в такой сильной и огромной душе, какою высказывает себя душа Лангера в своих созданиях. Он сказал мне, что прямухинская жизнь была его перерождением, пробуждением после продолжительного сна души. Представь себе восторг, простодушно, детски выражаемый, его бесхитростность и самый дурной русский язык и досаду на себя за неумение выразиться. С этого вечера я всею душою полюбил Лангера; думаю, что и он также меня. Христофорович все тот же: так же мил и так же нелеп. Жаль этого малого: душа у него прекрасная, а между тем абсолютная истина недоступна для него. О себе скажу тебе, что я кое-как, при помощи Ивана Петровича, не то чтобы уладил мои дела, а отдалил, отсрочил еще на некоторое время трагикомическую катастрофу, которой боялся5. Впрочем, грамматика моя начинает трогаться, хотя и все еще очень медленно. Но и без нее у меня надежд бездна. Николай Полевой издает "Пчелу", и я уже, разумеется, приглашен к участию6. Ксенофонт Полевой думает купить у Андросова право на издание "Наблюдателя" и в таком случае намерен поручить одному мне библиографию и критику, для того, говорит он, чтобы в его журнале был один тон и один голос. Не говоря уже о том, что это даст мне тысяч пять или шесть в год денег,-- это даст мне мою настоящую жизнь, при одной мысли о которой я уже оживаю и чувствую в себе новую силу. Дело это зависит от согласия Уварова и сговорчивости Андросова и скоро должно решиться, потому что Уваров на днях должен быть в Москве7. О, если бы это сбылось, пожил бы я! Тогда бы уже меня не стала мучить мысль о необходимости переехать в Петербург.
   Но это все моя внешность, которая только в будущем может обратиться в мою внутреннюю жизнь, а тебе, верно, хочется знать о теперешнем состоянии моего духа. Оно -- ни хорошо, ни худо, но более хорошо, чем худо, и я убежден, что с переменою внешних обстоятельств переменятся и внутренние. Я здоровее телом, следовательно, бодрее и духом. Вижу в себе много гадкого, но это гадкое заключается во внешних обстоятельствах и само собою уничтожится с их переменою. Лучше и яснее созерцаю тайну абсолютной жизни, вижу себя далеким от нее, но не отчаиваюсь приблизиться к ней. Одно страшит меня: это то, что при виде женщины или промелькнувшего женского платья я уже не краснею, как прежде, но бледнею, дрожу и чувствую головокружение. Боюсь не то, чтобы пасть, но спотыкнуться на этом пункте. Но -- будь, что будет! Жду тебя с нетерпением. Боюсь, чтобы ты не послал ко мне письма на Кавказ. Каждый день думаю получить от тебя ответ на мое последнее письмо8. Я объяснял дело Боткину, и пока он оправдывает меня насчет гривенников9. Если ты упорствуешь в своем -- бог с тобою,-- мне жаль тебя; но остаюсь верен моей мысли, и осуществление ее есть для меня залог моего стремления к абсолютной жизни. Долго ли ты пробудешь в Прямухине? Как там идут дела? Адресуй ко мне письма на имя Василия или Ивана Петровичей, потому что я переменяю на днях мою гадкую квартиру. Прощай.

Твой В. Белинский.

   P. S. Я очень радуюсь, что со дни на день более и более чувствую расположение к К. Бееру: славный малой, а между тем меня радует усиление моей способности любить людей: это счастье, тогда как презирать и ненавидеть их есть истинное несчастие.
  

23. M. A. БАКУНИНУ

1 ноября 1837. Москва

Москва. 1837, ноября 1 дня.

   В понедельник, 25 октября, прихожу я к Василию Боткину -- и он указывает мне торжественно на тетрадь, писанную тобою1. Не хочу говорить тебе, сколько радости доставило мне твое письмо, <от> скольких беспокойств избавило оно меня. Я думал, что твои семейные дела идут как нельзя хуже, что ты разве только не перерезался с Дьяковым, но, верно, намерен перерезаться с ним и пр. и пр. И что ж? Вместо всего этого твои семейные дела идут как нельзя лучше, Дьяков низложен без всяких несчастных и ужасных мер, старик на твоей стороне2. Последнее меня нисколько не удивляет: Александр Михайлович один из тех людей, благословенных богом при их рождении, которые родятся со всем, что составляет высшего, духовного человека; несчастный век, в который он родился, и главное и важнейшее событие в его жизни -- вот что развило его так неестественно, так ложно, вопреки его прекрасной натуре. Он ошибочно, ложно мыслит, но верно чувствует и делает. Если в последнее время, особливо в мое пребывание в Прямухине, он уже и поступал ложно, то в этом много виноваты и мы с тобою: мы не разочли того, что этот человек уже прожил много, уже освоился с своими идеями и привычку к ним счел за убеждение, что, наконец, мы действовали не всегда, как проповедники истины, во часто в духе полемическом, желчном, который ожесточает противника, но не убеждает его. Я и теперь не могу без досады на самого себя вспомнить о том, что я решился прочесть ему мою вторую статью, статью, в которой много хорошего, высказанного с жаром и убеждением, но которой полемический тон был совершенно в разладе с обстоятельствами3. Мало того, чтобы действовать истинно, по убеждению,-- надо еще действовать умно, рассудительно, если хочешь: обстоятельства для всех, даже великих людей, делались правилами не для убеждения, но для действования. Когда я кончил мою вторую статью, тогда обстоятельства требовали тишины, успокоения, примирения; тогда мы должны были окружить старика всем уважением, которого заслуживала его старая, почтенная жизнь. Он был не прав -- это так; мы не должны были подлаживаться под его образ мыслей -- и это правда; но мы должны были показать ему, что, почитая ложным его убеждение, мы умеем уважать всякое убеждение, особливо если оно оправдано целою жизнию, добровольными лишениями и страданиями. Да, каково бы ни было, но у твоего отца есть убеждение, есть правила, которые он перенес в жизнь -- а этого слишком достаточно, чтобы высоко уважать его самого и щадить его образ мыслей, даже опровергая его. Другое дело какой-нибудь Дьяков: если он безвреден, оставь его в покое, пожелай ему от всего сердца всех тех жалких благ, которых он жаждет, даже всевозможного усовершенствования в торговле, потому что первым желанием человека, проникнутого любовию, благодатию божиею, должно быть: "да будет счастливо и блаженно по-своему все в беспредельном божием творении, все, от человека до червя и от червя до последней былинки, для которой нужны луч солнечный и дождевая капля"; желание зла во всяком случае свидетельствует об отсутствии любви; но если этот же Дьяков составляет несчастие кого бы то ни было4, особливо такого существа, как Варвара Александровна, мешает его дальнейшему развитию, его внутреннему блаженству -- тогда употреби все средства к обоюдному удовольствию обеих сторон, умоляй, плачь, проси, заклинай, но если не помогут никакие миротюбивые средства, тогда обремени его всем своим презрением, всею своею ненавистию, сотри его с лица земли, если это будет нужно. Так должно действовать с людьми ничтожными, чуждыми всякого убеждения; но совсем иначе надо поступать с людьми убеждения. Надобно, чтобы они видели чистое желание обратить их к истине, чистую радость в случае успеха и чистую горесть в случае неуспеха, горесть за истину и за них, а не раздражительность, не желчность. Александр Михайлович по многим фактам имел полное право заключить, что мы больше горды своими убеждениями, нежели счастливы ими. Ты в этом отношении был лучше меня, но ты худо делал, что оправдывал мои мысли об этом. Теперь я уверен, что ты поступаешь с ним так, как должно, и действуешь не одною логикою, но и впечатлениями, этим живым наитием истины, которое дает одна любовь. Полемику к черту. Я даже надеюсь, что Александр Михайлович, не давая нисколько заметить перемены в своем образе мыслей и даже поддерживая свой прежний, будет поступать в отношении к своему семейству совершенно в духе твоих, а не своих убеждений. И это очень естественно: у стариков есть свое самолюбие, очень понятное и очень извинительное; в такие лета трудно сказать -- "я был неправ", по крайней мере, сказать это труднее, нежели показать на деле. Я тогда этого не понимал, потому что был нездоров и телесно и душевно, болезнь же изгоняет любовь и родит ожесточение. Теперь я не лучше прежнего, но здоровее, и потому вижу и понимаю все яснее, и сознаю, что я жестоко ошибался, думая в иные минуты, что я не люблю и не уважаю твоего отца: нет, его нельзя не любить и не уважать -- об нем только можно иногда сожалеть и скорбеть. Да, Мишель, перемена здоровья переменила меня во многом. Станкевич, видя мою желчность и остервенение против всего неистинного, великодушно приписывал это тому, что я люблю истину, но что я только не эманципирован. Он ошибался -- во мне не было любви, потому что, что за любовь, которая проявляется в ненависти? Любовь плачет, скорбит о пороках и заблуждениях своих ближних, но (не> ненавидит, потому что жизнь в добре не дает места к беспрестанной мысли о зле и ненависти к нему, да и притом же, как ты справедливо и прекрасно пишешь ко мне, в общей жизни духа нет зла, но все добро. Теперь во мне так же мало любви, как и прежде, но больше спокойствия в душе, вследствие облегчения телесных страданий, а потому и больше способности лучше и глубже понимать истину. Вследствие этой-то перемены, я понял, что всякая ненависть, хотя бы то и ко злу, есть жизнь отрицательная, а все отрицательное есть призрак, небытие, что мало любви к добру гораздо выше, нежели много ненависти ко злу. Я должен тебе сказать, что я надеюсь с нового года снова выступить на журнальное поприще, столь любезное для меня; Ксенофонт Полевой покупает у Андросова право на издание "Наблюдателя" и приглашает меня к деятельнейшему участию, то есть поручает мне критику и библиографию4. Если это состоится, то ты не узнаешь меня в моих статьях, именно потому, что я разуверился в достоинстве отрицательной любви к добру и чувствую в себе больше снисходительности к подлостям и глупостям литературной братии, но зато и больше ревности противоположным образом действования доказывать истину. Не велика польза доказать, что Сенковский подлец, а "Библиотека" гадкий журнал: публика это давно знает и подписывается на "Библиотеку" не за то, что она гадкий журнал, а за то, что нет лучшего журнала; так гораздо лучше дать ей хороший журнал, нежели бранить "Библиотеку". Поэтому полемика решительно изгоняется из нашего журнала. Из этого отнюдь не следует, чтобы и правда изгонялась из него, но дело в манере и тоне: помнишь ли ты, как мило уничтожает Гегель противников истинной философии, Круга и ему подобных?5 -- он не сердится, не выходит из себя, не старается прибирать выразительнейших браней, энергических выражений; он поступает с ними, как с мухами,-- махнет рукой, и этим движением убивает их гуртом, сотнями, нимало не гордясь своею победою и нимало не жалея о неудаче. Но вот другой пример, хоть гадкий, но идущий к делу -- это Сенковский; он не помещает статей о других журналах и разборов чужих мнений, но при случае, к слову, бьет их славно. Это и мы возьмем за правило. Выходит книга, которая несправедливо разругана в "Библиотеке" -- мы ее похвалим, не браня "Библиотеки", которая ее разбранила. Я имел несчастие обратить на себя внимание правительства не тем, чтобы в моих статьях было что-нибудь противное его видам, но единственно резким тоном, и это очень глупо; 6 вперед буду умнее. Но это в сторону, тем более, что пока это еще литературная тайна, которую я могу доверить только друзьям моим, а больше никому. Теперь я начал "Переписку двух друзей", большое сочинение, где в форме переписки и в форме какого-то полуромана будут высказаны все те идеи о жизни, которые дают жизнь и которые без полемики должны разоблачить Шевыревых и подобных ему. Это будет собственно переписка прекрасной души с духом; первое лицо, как разумеется, будет моим субъективным произведением, а второе -- чисто объективным. В лице первого я поражу прекраснодушие, так что оно устыдится самого себя; впрочем, в представителе прекраснодушия я выведу лицо не пошлое, но полное жизни истинной, кипучей, придам ему не фразы и возгласы, но слово живое, увлекательное, картинное и поэтическое; словом, я изображу в нем одного из тех людей, доступных всему истинному, но лишенных силы воли для полного достижения высшей истины, одного из тех людей, которые понимают истину, но хотят, чтобы она досталась им без труда, без пожертвований, без борьбы и страдания; как цыгане, которые лучше хотят сносить все неудобства непогоды, все невыгоды бродяжнической жизни, нежели пожертвовать частию своей дикой свободы гражданскому порядку, так и эти люди хотят лучше всю жизнь свою жить редкими и немногими минутами восторга, а остальную часть жизни валяться в грязи, нежели путем труда и усилий перейти в полную жизнь. Короче сказать, в этой прекрасной душе я изображу себя и, надеюсь, очень верно: и в этом портрете я наплюю на самого себя и оплачу самого себя. Я изображу себя в двух эпохах жизни: в той, в которую я жил в одном чувстве и прятал свое чувство от разума, как цветок от мороза; и в той, в которую я сознал тождество чувства с разумом, любви с сознанием, но приобрел через это не полное блаженство жизни, а только объективное сознание ее. Что же касается до представителя жизни духа, то это не будет ничей портрет: это будут мои прямухинские статьи, но только глубже перечувствованные и лучше понятые, потому что с тех пор, как я их написал, я немного подрос в моих понятиях. Первое письмо почти уже написано: в нем прекрасная душа описывает свой отъезд из Москвы, свои путевые впечатления; жалуется на людей и жизнь, в которых он разочаровался; доказывает, что истинная жизнь в чувстве, что разумение есть смерть чувства; упрекает своего друга за любовь к философии, за холодность суждений и предрекает ему конечную гибель за доверенность к холодному уму и пр. и пр. Ответ на это письмо будет содержать изложение понятия о разуме и чувстве, их взаимных отношениях; об истине в созерцании как основе нашего сознания; об ошибочном понятии, вследствие которого чувство смешивают с истиною в созерцании, почему и думают несправедливо, что чувством можно узнать какую бы то ни было истину, тогда как оно по существу своему не может давать нам никаких идей, но, так сказать, подкрепляет всякую истинную или почитаемую нами за истинную идею, пробуждаясь в нас, как стремление к бесконечному, или как любовь, что одно и то же, потому что высшая степень любви есть ощущение бесконечного; о достоинстве разума7, живущего в природе как явление и в человеке как сознание; о достоинстве способа исследования истины a priori {интуитивно (лат.). -- Ред.}. Одним словом, это должно быть чем-то порядочным, потому что я нимало не сомневаюсь выразить все эти идеи языком увлекательным, живописным, пламенным5. Несмотря на мою апатическую жизнь, я еще ощущаю в себе столько внутреннего жару, сколько нужно его для десяти таких сочинений. Скоро примусь за статью о Пушкине; это должно быть лучшею моею критическою статьею9. Думаю для журнала составить библиографию всех литературных произведений за 1837 год: это даст мне повод поговорить о Гамлете и об игре Мочалова10, о диссертации Шевырева11 и о прочем. Кстати: я познакомился с Мочаловым на вечере у Селивановского, где Полевой читал два акта своей оригинальной драмы "Граф Уголино"; за ужином Мочалов и Щепкин, по просьбе Полевого, говорили последние монологи из <(Горя от ума"--славный был вечер, хотя и у Селиваыовского! А драма Полевого -- что она такое? -- спросишь ты; да славная вещь -- отвечаю я. Некоторые характеры обрисованы художнически, есть места истинно поэтические; остальное -- фразы, но какие фразы! успех будет полный. Мочалову роль славная -- кипучая, бешеная, страстная. Надо сказать, что самое нехудожественное лицо, но зато в высшей степени эффектное и по мерке Мочалова сделанное12. Полевой с будущего года издает "Пчелу" и "Сын отечества"; он уже в Петербурге13.
   Катков читает "Эстетику" Гегеля и в восторге от нее, хочет перевести для журнала все введение14. Славный малой -- он далеко пойдет, потому что уже и теперь у него убеждение в мире с жизнию. Голова светлая, сердце чистое -- вот Катков. Я недавно стал понимать его; до отъезда на Кавказ, в этот самый желчный период моей жизни, я был не расположен к нему и с каким-то подлым и гнусным удовольствием услышал бы что-нибудь против него. Ах, Мишель, дрянен, пошл я и теперь, но как лучше, как выше прежнего, а все оттого, что мои запоры разрешились и пищеварение улучшилось... Впрочем, есть и нравственные причины. Боткин переводит Марбаха15 и в упоении от него. Боткина я уже не люблю, как прежде, а просто влюблен в него и недавно сделал ему формальное объяснение. Я часто у него ночую, хотя терпеть не могу ночевать не у себя дома, потому что я с младенчества ненавидел бродячую, цыганскую жизнь, для которой ты создан, и всегда любил свой угол и своих пенатов. "Послушай, Боткин,-- сказал я ему шутя,-- посмотри, как я тебя люблю: остался ли бы я у кого-нибудь другого ночевать?" И мой Боткин, в ответ на это, начал не шутя доказывать, самым наивным и достолюбезным образом, что он меня не меньше любит и чувствует себя счастливым, когда бывает вместе со мною. Я чуть не до слез хохотал. Иван Петрович поправляется и в здоровье16 и в образе мыслей, но жизнию все так же беден, как прежде. Вот тебе кстати анекдот об нем. Самарин однажды утешал его, советовал ему терпеливо сносить несчастие, как божие испытание, и присовокупил к этому, что и сам он много терпел.
   "Ваше превосходительство,-- отвечал я ему (говорит Клюшников),-- вы страдали, опираясь на семь тысяч душ, вы сражались с судьбою из-за фронта, а я шел против нее с открытою грудью". Но штуки в сторону. Я рад, по крайней мере, что он уже не колобродит своими понятиями, что он мыслит, как должно, а это большой шаг; бог даст -- и воскреснет вполне для жизни высшей17, начало которой он носит в душе своей. Константина Аксакова я чем более узнаю, тем более люблю: это один из малолюдной семьи сынов божиих. Он еще дитя, еще мало развит, а главное дело, еще не искушен внешнею жизнию, внешнею борьбою, которые потому необходимы человеку, что, как толчки, пробуждают в нем жизнь и борьбу внутреннюю. Самая бедность и нужда необходимы для полного развития. Станкевич не знал бедности, но знал иногда нужду, и это, без сомнения, было ему полезно.
   Дружба! -- бот чем улыбнулась мне жизнь так приветливо, так тепло, и, вероятно, в ней, и только в одной ней, будет сознавать себя моя жизнь до конца своего. Быть так -- спасибо и за то! И теперь в горестной и мертвой жизни моей одна мысль, как добрый гений, как ангел-хранитель, согревает мой изнемогающий дух, мысль, что как бы глубоко ни пал я, мне всегда есть пристанище в минуты сознания -- сердце друзей моих, всегда готовое простить меня, оплакать мое заблуждение и согреть меня своим огнем... А я?.. могу утешать себя только вот чем:
  
   Мой путь уныл, сулит мне труд и горе
   Грядущего волнуемое море.
   Но не хочу, о други, умирать,
   Я жить хочу, чтоб мыслить и страдать.
   И ведаю: мне будут утешенья
   Меж горестей, труда и треволнений18.
  
   Это голос не жизни духа; нет -- это вопль прекрасной души, которая живет жизнию духа только в минутах, только в непрерывных восстаниях, после беспрерывных падений. Жизнь в минутах -- она моя, и всегда будет моею, но это грустная жизнь, и не она должна быть уделом человека. Так жил Пушкин -- и я понимаю его. Но он был гений -- и в его минутах жизни замыкались целые века; он был поэт -- и способность высказывать себя и, как дани, требовать и получать сочувствия от ближних вознаграждала его за минуты, вне вечного духа проведенные. В нем был неистощимый рудник любви, который не мог иссякнуть ни от каких причин, и от колыбели до гроба ему улыбалась любовь. Я только понимаю такую жизнь, и если живу иногда подобною (как подобно отражение солнца в реке на самое солнце), то <не> в действительности, а в фантазиях. Я прячусь в фантазии от действительной жизни, и мое возвращение к действительной жизни из области фантазии есть горькое пробуждение. Б этой жизни есть свое прекрасное, но я понимаю, что такая жизнь есть призрак, потому что истинная жизнь конкретна с действительностию. Иногда мне становится досадно, зачем я знаю слишком много, зачем слишком хорошо понимаю значение и цель жизни; мне кажется, что я был бы счастливее, если бы кругозор моего ума был ограниченнее, а требования чувства умереннее; мне кажется, что тогда бы я нашел все, чем мог бы быть счастлив; это так, Мишель, но не сердись и оставь в покое убеждения: я и без них знаю, что это минуты борьбы, нравственной болезни, что такая мысль безбожна и недостойна просветленного человека, что откровение истины есть единственное благо, за которое человек умиленно должен молиться вечному духу жизни.
   Всякая грусть есть страдание; никакое блаженство не может быть бесконечно и высоко без этого страдания; но при полной гармонии духа, при совершенном его блаженстве, грусть или страдание есть только характер, условие необходимое, форма, так сказать, самого блаженства, но не самое блаженство: это понятно, и мы давно уже согласились с тобою в этом. Но страдание, как единственная и исключительная форма жизни духа и как конечное и возможное его блаженство, есть тоже жизнь человеческая и прекрасная, но низшая, неполная ступень к истинной жизни духа, но не истинная жизнь духа. Вот эта-то жизнь, это-то блаженство доступно мне, и страдания, страдания и еще-таки страдания прошу и не допрошусь я себе у провидения. Это страдание есть недуг души, но недуг сладкий, есть одна из священнейших способностей нашего духа, есть признак присутствия высшей жизни, есть залог дальнейшего и бесконечного развития, ручательство в возможности (близкой или далекой -- нет нужды) перехода в полную жизнь духа. Как-то недавно ощутил я в моей груди это сладостное болезненное стеснение, этот божественный недуг -- и вместе с ним ощутил и веру, и силу, и жизнь. Дня три страдал я таким образом, а на четвертый выздоровел, то есть снова сделался скотиною. Но по временам я живу этим страданием, и теперь, когда я пишу тебе эти строки, я чувствую в груди моей это болезненное стеснение, этот недуг, выше всякого здоровья, и вместе с тем чувствую, что я живу, а не прозябаю, что я человек, а не животное. Да, Мишель, уже не счастия, не блаженства, как прежде, а страдания прошу, желаю и ищу я себе. Мыслить и страдать -- вот грустная и неполная жизнь, до какой я только способен возвыситься. Но я верю, что этою жизнию я выстрадаю себе полную и истинную жизнь духа. Боже мой, как бы громко я стал смеяться, как бы горячо стал оспоривать, если бы года за два перед сим кто-нибудь стал меня уверять, что моя жизнь не в светлом веселии, не в радостном ликовании! Гадка моя жизнь, но не прогресс ли это?.. Спасибо тебе, Мишель: без тебя я не говорил бы теперь этого.
   Ну вот тебе все, собственно до меня касающееся, то есть все данные, по которым ты можешь судить о состоянии моего духа. Теперь буду отвечать на твое письмо. Но прежде скажу тебе, что ты поступил более нежели дурно, не давая о себе никакого известия. Мы все думали, что с тобою сделалось и бог знает что; что твои обстоятельства (семейные) просто ужасны. Этому причиною твой ребяческий характер. А сверх того, ты многого лишил собственно меня, потому что всякое письмо от друга дает мне жизнь, пробуждает во мне грусть... Бог тебе судья за это. Когда узнали, что я получил твое письмо, то все любящие тебя бросились ко мне с расспросами; Станкевич нарочно приезжал ко мне. Сечь тебя надо, Мишель, да приговаривать: не ребячься! Теперь приступаю к ответу на твое письмо.
   Я должен говорить с тобою о предмете, который сообщит полемический тон, следовательно, о предмете щекотливом, но, несмотря на то, не буду слишком распространяться сколько потому, что этот спор об аккуратности и гривенниках мне уже надоел, столько и потому, что хочу сказать тебе мое окончательное мнение об этом предмете, résumé всего, что говорил об нем прежде. В твоем письме нет любви -- повторяю тебе это, и не один, а вместе с Боткиным. Это письмо пуританское, в котором arrière pensée {задняя мысль (фр.). -- Ред.} есть -- наказание за грехи; это письмо отзывается религиею Ватикана, символ которой есть апостол Петр с мечом в руке. Беру назад мое слово, что в этом письме видны с твоей стороны гордость и тщеславие: нет, в нем видно только ожесточение против прошедшего твоего падения, с воспоминанием о котором у тебя соединялось воспоминание обо мне и Станкевиче19, а следовательно, и ожесточение против нас, впрочем, понятное и совершенно извинительное. Отсутствие же любви в твоем письме произошло, вероятно, от дурно избранного тобою способа поднять меня: ты для этого хотел расшевелить мое самолюбие. Это тебе удалось один раз, в том письме, в котором ты звал меня в Прямухино и говорил о своей горести видеть в грязи человека, в котором ты заметил начало великого. Повторяю, тогда это на меня подействовало; но в бытность на Кавказе я жаждал сочувствия, сострадания, слез, молений и прощения от дружбы, а не упреков; мысль о том, что ты живешь истинною жизнию, могла скорее ожесточить еще более меня, нежели порадовать. Болезнь подлая, гнусная, но, Мишель, только тот лекарь и хорош, который умеет понять болезнь и дать против нее настоящее лекарство. Ты ошибся в лекарстве, вот и все. Сверх того, твое осуждение Станкевича и твои местоимения "Я" и "Вы" произвели на меня более нежели неприятное чувство. Ты и в последнем своем письме ко мне20, соглашаясь со мною, что Станкевич человек генияльный, что он всегда будет показывать нам дорогу и пр., не говоришь мне: прав ли я, утверждая, что падение его было неизбежно и что он был бы величайший эгоист и подлец, если бы не пал, не пал глубоко, хотя и на время. Что же касается до коей будто бы ошибки насчет того, что назначение Станкевича есть страдание -- то ты не понял меня. Его рель, как и всех, есть блаженство, но только путем отречения от всякого личного счастия, как похищения у дели назначения: вот как я понимаю Станкевича, может быть, и ложно, но, по крайней мере, без противоречия истине. Возможность такого характера в человеке генияльном, призванном на великое дело, для меня не непонятна, хотя в самом себе, в отношении к самому себе, я ее и не понимаю. Напрасно ты говоришь, что будто я готов на кафедре обвинять тебя в самолюбии и тщеславии: не в этом, а в справедливости моего мнения об аккуратности готов я защищаться на кафедре. Но в этом отношении ты прав, и я тебя более не обвиняю, потому что понял причину, почему ты не можешь сойтись с этою мыслию. Но не менее, или и еще более прав и я, поддерживая эту мысль. Ты, верно, помнишь, что, исчислив все дурные обстоятельства, в которые ты вверг себя своею безалаберною жизнию, то есть обязательством перевести Шмита21, без убеждения в возможности исполнения, потом долгами, я спрашивая тебя: имеет ли все это влияние на твою внутреннюю жизнь, и мысль о долгах, о своей несостоятельности всякого рода угнетает ли твою душу до апатии, уничтожает ли твои прекрасные минуты? Повторяю теперь этот вопрос; ты отвечаешь на него: "Нет!" Хорошо! Это значит, что в тебе избыток внутренней жизни так велик, пламя чувства так ярко и сильно, что внешние обстоятельства не могут мешать первой и гасить и второго. Любезный Мишель -- я говорю это не шутя, потому что понимаю возможность этого, и именно в тебе более, нежели в ком-нибудь из наших общих знакомых, не исключая и Станкевича. Да, я тебя понимаю -- пойми же и ты меня. Я погибаю от мысли о долгах, которая грызет, как червь, корень моей внутренней жизни, охлаждает во мне все благородные порывы, производит тоску, апатию, отчаяние и нередко -- подумай об этом -- желание в разврате заглушить немолчный вопль нужды и обязательства. Знаешь ли ты, что иногда (теперь очень редко, а прежде это бывало часто) хочется напиться вина донельзя, чтобы забыться? Знаешь ли, что иногда, принимаясь с жаром за какое-нибудь хорошее дело, за изучение чего-нибудь, за сочинение, я бросаю его с отчаянием, когда мне говорят о пришедшем кредиторе или о том, что хлеба нет, и бегу куда-нибудь, как будто бы надеясь убежать от самого себя? Знаешь ли ты, что, пиша к тебе эти строки, я беспрестанно бросаю перо, чтобы у печки отогревать мои окоченевшие руки, потому что в комнате хоть волков морозь, а в кармане хоть выспись? Что ты на это скажешь? Но это не все, а начавши говорить, я люблю все сказать. Сатин в Пятигорске дал мне 200 рублей на покупку ему книг, преимущественно философских, с тем, чтобы, по моему же совету, он мог заняться философиею. Представь себе человека, убитого обстоятельствами, проводящего зиму в Азии, в мерзком городишке, чуждом всяких удобств жизни, где нет ни одной живой души -- что значит для него всякая книга, а тем более много книг, которые заставили бы его мыслить, ввели бы в жизнь высшую, абсолютную, заставили бы его сказать с гордостию: "Дух выше материи, человек выше обстоятельств, я блажен в моем несчастии". И что ж? Эти книги ему не посланы. Не подлый ли, не эгоистический ли это поступок? Лишить человека средства к просветлению -- Ее есть ли это более нежели смертоубийство? А между тем я ничего худого не сделал: мне приходилось дозарезу, и я надеялся в скором времени достать эти деньги. Надеялся --- подлое слово! Да кто мне дал право надеяться ни на что, на призрак какой-то? Вот все это-то, Мишель, грызет, подтачивает, как червь, корень, основу моей внутренней жизни и не только лишает мою жизнь ее полноты и гармонии, но и даже и редкие минуты ее отравляет и уничтожает. Я сажусь за дело, перевожу с немецкого или делаю что-нибудь другое,-- и что же? я дрожу от холода, руки мои не в состоянии держать перо, животная сторона моя громко дает о себе знать. Я бросаю перо и иду -- куда-нибудь, иногда в лавку Глазунова22, где часов 6 сряду болтаю черт знает что. В другое время, только что разделаюсь, то есть разохочусь делать, пользуясь гармоническим состоянием души,-- вдруг получаю записку, где мне напоминают, что за взятые мною 500 р. надо заплатить за месяц 30 р. асс., а в ответ пишу, нельзя <ли> этих денег за меня заплатить да еще достать мне сот восемь за такие же проценты -- и опять бегу куда-нибудь, чтобы убежать от самого себя, чтобы забыться во внешности -- ужасное забвение! Ну, ясно ли теперь тебе, что аккуратность жизни для меня есть единственное условие и возможность перехода в абсолютную жизнь? Бог и дух не в аккуратности -- я это знаю не хуже тебя; пустой человек не может жить в духе, хотя бы он был образец аккуратности и честности -- и это я понимаю не хуже тебя. С приобретением аккуратности я ровно ничего не приобрету для своей высшей жизни, но отстраню нечто внешнее, что мешает мне жить в себе, а не вне себя. Понятно ли? Представь себе человека, который имеет все элементы духовной жизни, понимает ее и стремится к ней, но который сделал несчастную привычку, например, пить, и эта привычка есть единственная причина, мешающая ему удовлетворить его святое стремление; вино отнимает у него разум, дает ему мгновенную и то ложную и неестественную жизнь, за которою следует ужасная смерть; представь себе, что в самом пьянстве, благодаря своей доброй организации, он понимает высшую жизнь, даже наслаждается ею минутами; представь себе, что он понимает свое ужасное положение, видит свое унижение, а между тем гибельная привычка уже обратилась ему в природу и болезненное состояние сделалось нормальным состоянием. Мишель, что же погубило этого человека? Отсутствие трезвости, а разве бог в трезвости, разве только стоит бросить вино, чтобы жить23 абсолютною жизнию, разве нет на свете тысячей, миллионов мерзавцев, скотов, которые в рот не берут хмельного? Ну, ясно ли, понятно ли для <тебя) это? Ты скажешь, что жалок, беден внутреннею жизнию тот человек, которого спасение зависит от пустой, призрачной внешности. Согласен, да что же мне делать, если я так беден внутреннею жизнию, так слаб волею? И неужели будет лучше, если я, сознавая свою бедность и слабость, свою зависимость от внешней жизни, не употреблю всех усилий освободиться от этой зависимости, нежели остаться в ней? Если бы по какому-то уродству организации я, например, не терпел бы зеленого цвета и видел бы, что не могу заниматься в комнате этого цвета, то не лучше ли, вместо того, чтобы, преодолевая мое отвращение, терять мои силы в пустой борьбе, я велел бы перекрасить мою комнату или переменил бы квартеру? А в природе есть такие странности, такие уродства, потому что природа человека искажена вследствие его падения. Ты знаешь, что организация, как форма духа, есть условие нашего развития. Темпераментов шесть: гармонический, нервический, сангвинический, холерический, меланхолический и флегматический, но нормальный, человеческий только один -- гармонический, а остальные пять суть большие или меньшие уклонения от него, большее или меньшее отсутствие нормальности. У тебя, например, темперамент гармонический -- а отчего? оттого что твой отец, женившийся сорока лет, не имел до женитьбы женщины, не был онанистом, не предавался сладострастным мечтам, не был пьяницею, обжорою, не был злым, глупым, подлым человеком. Твоя ли это заслуга, или дело случая? А мой отец пил, вел жизнь дурную, хотя от природы был прекраснейший человек, и оттого я получил темперамент нервический, вследствие которого я столько же дух, сколько и тело, столько же способен к жизни абсолютной, сколько наклонен к чувственности, сладострастию, нравственному онанизму; я родился с завалами в желудке. А ты? ты, воспитываясь в корпусе, зная все мерзости чувственности, питал к ним отвращение и никогда ими не увлекался: это потому, что сладострастие чуждо нормальному темпераменту. Будучи в Литве, ты поддался было обаянию чувственности, но отчего и как? От неудовлетворенной потребности духа: попадись тебе тогда хорошая книга или хороший человек -- и твоя чувственность умолкла бы, потому что твоя чувственность возбудилась не сама собою и не для себя, а вследствие пустоты внутренней. Я не таков: восьми или девяти лет, прежде нежели я понял физическое отношение женщины к мужчине, вид женщины уже производил во мне страстные чувственные движения! я a priori {интуитивно (лат.).-- Ред.} понимал то, что дитя может узнать только a posteriori; {на основании опыта (лат.). -- Ред.} в чем же заключается разница между нами? -- в темпераментах. Мне бы не хотелось примешивать к подобным рассуждениям твоих сестер, но дело идет об истине, а, сверх того, ты поймешь, что от этого мое благоговейное уважение к ним нисколько не ослабевает; итак, проведи параллель между ними и Бееровыми -- и ты увидишь повторение того же явления. Бееровы могут быть святы, но путем борьбы и при условии посторонних на них влияний; твои сестры родились святыми. Они не чужды борьбы, но их борьба чисто внутренняя, духовная, а борьба Бееровых -- но ты знаешь, что я хочу сказать. Я бы унизил не твоих сестер (их нельзя унизить), а самого себя, если бы предположил для них возможность хотя бессознательных нечистых движений, следовательно, об этом нечего и распространяться; нет, они чужды всех грехов тела, плоти, как-то: зависти, злости, ненависти, потому что все такого рода движения не в духе, а в плоти. И что ж? -- опять темперамент. Я не хочу и не думаю оправдывать этим чье бы то ни было падение и доказывать, что кто рожден не с гармоническим темпераментом, тому нет полной жизни; нет: я уверен и убежден, что дух всегда должен торжествовать над материею, что он может переменить самый темперамент назло природе. Но это значит, что мне труднее, нежели тебе, достижение совершенства: зачем же так, зачем же это неравенство даров природы? Я и этим опять-таки не думаю оправдывать свое падение, а хочу только доказать следующее:
   1) Чтобы, судя о ближнем, не отклониться от истины, должно брать в соображение все обстоятельства, органические, природные, воспитания и внешней жизни: только в таком случае мы и можем быть ему полезны, когда хотим действовать на его совершенствование; исключительность в этом случае есть деспотизм, который скорее раздражит и ожесточит падшую душу, нежели умилит ее для воспринятая истины.
   2) Всякий должен знать себя хорошо, основательно, должен смотреть на свои недостатки, как на болезни, потому что знание болезни дает знание нужного для нее лечения; чтоб быть здоровым, надо сперва узнать, чем я именно болен или что мешает моему здоровью, и потом или изгнать, или отстранить это мешающее.
   Я узнал мою главную болезнь и сказал тебе, что до тех пор, пока я не устрою моей внешней жизни, для меня нет внутренней, следовательно, совсем не то, чтобы устройство внешней жизни дало мне внутреннюю, но то, что устройство моей внешней жизни даст простор, не будет (не то, что помогать или прямо содействовать) мешать ей. Понятно ли? Моя ошибка (и то по-видимому только) состояла в том, что я хотел лечить и тебя тем же лекарством, не спросив тебя, та ли же у тебя болезнь. Я наконец понял тебя -- пойми же и ты меня. Я вижу теперь, что избыток внутренней жизни спасает тебя от влияний внешней, которая у тебя тоже очень гадка. Кажется, теперь я уж так ясно выразился, что уж более не о чем и спорить, и я должен бы был кончить на этом. Но я не кончу. Я докажу тебе, что, будучи неправ в отношении ко мне, ты неправ и в отношении к себе самому, не потому, чтобы ты был недобросовестен в этом случае, но потому, что ты еще не сознал моей истины и как будто боишься сознать ее, почему как будто избегаешь в письме своем всякого прямого объяснения насчет твоих внешних обстоятельств. Конечно, избыток внутренней жизни избавляет тебя от разрушительного влияния внешней; повторяю тебе, что я это понимаю и верю этому от всей души; но естественно ли это и может ли это продолжиться? Подумай об этом. Потом, так ли ты свободен от внешности, как тебе это кажется? Наконец, не сделал ли уже ты множества зла и себе, и ближним, и истине? Остановлюсь на последнем вопросе и разберу его подробнее не для пустого спора и не для того, чтобы навести на тебя апатию, введя тебя в грустное сознание твоих ошибок и их дурных следствий, но для истины и по долгу дружбы. Во-первых, обрати внимание на твои отношения к отцу твоему: ты объявил ему, что не хочешь служить, но посвящаешь себя знанию, и уехал в Москву. Все это было не в его правилах, но, узнавши, что ты даешь уроки, он одобрил это, и ты этим выиграл в его мнении. В самом деле, Александр Михайлович человек практический, и его невозможно убедить в истине, которая не в ладу с жизнию убеждающего; но оправдай на деле свое убеждение, и он одобрит его, хотя и не примет его. Если бы он увидел, что знание не мешает твоей внешней жизни, то есть если бы он увидел, что сумма твоих житейских нужд не превышает суммы твоих доходов, что ты, взявшись за дело, любишь его кончить; если б он увидел, что ты переводом Шмита принес бы пользу отечественному просвещению, приобрел бы о себе хорошее мнение со стороны графа и вместе с тем приобрел бы средства на выполнение любимейшего твоего желания -- путешествия в Европу,-- то, поверь, что, несмотря на разность убеждений, он всегда был бы с тобою в ладу и не доходил бы до горестной необходимости кривить правдою и быть явно, сознательно недобросовестным перед своими детьми. А его ожесточение за детский поступок тверских юношей24 -- что он значил? -- ожесточение против тебя. Он не понимал твоей высшей жизни и не понимал, что ты передаешь ее своим братьям: он понимал только, что передашь им свою безалаберную жизнь, и потому твое влияние на них огорчало его до глубины души. Разумеется, он был неправ, но не ты ли заставил его быть неправым? Он видел, что ты живешь в Москве для того, чтобы делать в ней то, что ты мог делать в Прямухине; что ты от него Ее требуешь денег, но своих не имеешь, а по его мнению (не совсем несправедливому) тратить деньги, не имея их,-- не хорошо. Я уже не говорю о следствиях перевода Шмита в отношении к самому тебе: ты, верно, знаешь, что сказал о тебе граф на этот счет, равно как и все неприятности, которыми этот несчастный перевод мучит тебя столько времени. Теперь о долгах. Взять денег у друга, хотя бы и с стеснением его, можно, но только при нужде, б которой ты не виноват; брать же деньги так, чтобы спутывать того, у кого берешь, вводите его в обязательство с пустыми людьми -- никуда не годится. Ты взял 600 р. у Ефремова на полгода назад тому два года; деньги не его, а отцовы. Ефремов, приехавши с Кавказу, много переменился: лицо его свежо, бодро, он уже не выражает носом чувств, потому что он бросил все свои глупости и беспрестанно занят делом. Сделай один шаг к добру, другой сам сделается: Ефремов чужд абсолютной жизни, но в известной степени для него доступна человеческая жизнь, да и даже не в известной, потому что, как можно определить эту известность? Итак, Ефремов поправляется видимо, нэ он человек слабый, и обстоятельства на него имеют большое влияние. Пока его родители нагло требовали от тебя своих денег, он не беспокоился об них; но теперь, когда онп слегка и вежливо напоминают ему об них и когда он знает, что поездка на Кавказ, болезнь матери и другие неблагоприятные обстоятельства в самом деле произвели нужду в деньгах,-- он беспокоится и просил меня написать к тебе об этом, но я, разумеется, сказал ему, что если бы у тебя были деньги, то ты прислал бы их и без напоминания. Как бы то ни было, только все это приводит Ефремова в беспокойство и апатию, и я очень погашаю неизбежность этой апатии. Потом (и это сообщаю тебе под тайною) я узнал от Боткина, что Кетчер горько ему жаловался, что ты взял у него на месяц сто рублей и, разумеется, теперь еще не отдал. Он человек семейный, содержит мать и сестер, деньги достает кровавым потом, а что всего важнее -- мог дать тебе ту сумму только на месяц. Ты знаешь, что он человек благородный, готов услужить всякому с собственным лишением, и если решился обнаружить Боткину, хотя под тайною, свое против тебя неудовольствие, так это не даром: может быть, твоя неаккуратность обошлась ему дорого, тем более, что о собственном лишении не стал бы хлопотать. Сверх того, от него же Боткин узнал, что твои частые просьбы денег, без отдачи старых долгов, так не нравятся Левашевым, что они в последний раз отказали тебе совсем не по неимению денег. Признаюсь, такого рода отзыв от таких людей очень неприятен, да и самые одолжения их хуже всякой нужды20. Я знаю, что твоя неаккуратность происходит из прекрасного источника. Напиши я теперь к тебе, что я в крайней нужде, что я погибаю,-- ты бросишься, как угорелый, по всем твоим знакомым, чтобы выкупить из беды приятеля. Это хорошо, но худо то, что ты это сочтешь делом легким, не стоящим внимания, тогда как заемная копейка должна казаться миллионом. Это -- прекраснодушие, и я теперь понимаю, отчего Станкевич в письме своем ко мне сказал, что прекраснодушие есть самая подлейшая вещь в мире. Твоя неаккуратность или, вернее, твоя детская, ветреная доверчивость и к обстоятельствам и к людям еще более уверили меня в справедливости слов Станкевича. Дело вот в чем: ты, зная, что Левашева добрая, но пустая женщина, никогда неспособная возвыситься до никакого ощущения мировой истины, по своей детской доброте оказывал ей больше доверенности, нежели сколько было должно: ты читал ей письма В. А. Дьяковой, из которых она вывела следующее премудрое заключение: твоя сестра обожает своего мужа, а ее развод с ним есть одна из самых смешных и детских твоих фантазий, и что, наконец, ты делаешь ее несчастною своим неуместным вмешательством. Кетчер, разумеется, той же веры насчет этого дела, и ты не можешь вообразить, с каким негодованием на тебя, или, лучше сказать, на твое глупое прекраснодушие, с каким мучительным чувством слушал я его нелепые рассуждения об этом. Мишель, ты забыл заповедь Спасителя: "не мечите бисера перед свиньями"27, ты забыл, что все святое жизни должно быть тайною для профанов. Боткин не видал твоих сестер, но понимает их по описаниям твоим, моим, Лангера; Боткин горько жаловался мне на тебя за это и говорит, что нелепые суждения Николая Христофоровича о твоей сестре для него -- нож вострый. Да, Мишель, по своим действиям ты истинно прекрасная душа, а это совсем не гармонирует с твоими идеями, это значит, что ты еще не перенес в жизнь своих убеждений и Станкевич во время оно поделом на тебя бесился. Смешно и грустно было мне, когда я узнал о твоих детских планах действования на Дьякова посредством Аксакова и Санечки Станкевича -- заметь: не Александра, а Санечки, то есть ребенка. Все это я говорю для того, чтобы убедить тебя, что неаккуратность и ее следствия если не убивают тебя теперь вследствие большого избытка твоей внутренней жизни, то рано или поздно, а заставят тебя сказать: "Я был бы не то, если бы не так жил". Слова, которых всего ужаса ты не в состоянии понять, потому что в твоей жизни еще не сделано ничего невозвратного, ничего, налагающего шрамы на самый дух. Пока есть время -- подумай об этом.
   Больше я об этом писать не буду. Все, что я ни писал -- истина, но истина практическая и потому неприятная. Тяжело и больно мне, что я измарал так много бумаги на то, чтобы доказывать, что 2X2 = 4. Если ты и этим не убедишься -- пиши, пожалуй, но я отвечать не стану, а лучше кончим наш странный спор лично при свидании.
   В обоих твоих письмах все, что ты говоришь прямо против моей мысли об аккуратности,-- только более утвердило меня в ее справедливости. Но чем ты меня задавил, уничтожил, втоптал в грязь, показав мне всю мою пошлость,-- это твои идеи об абсолютной жизни, которую ты так прекрасно преследуешь в религиозном развитии народов. Из этих рассуждений я понял, как огромен запас твоей внутренней жизни, как занимают тебя интересы духа, понял -- и оглянулся на себя -- и мне стало грустно. Прекрасная душа, нередко неразумное и легкомысленное дитя, часто совсем пустой малой в своей внешней жизни, ты, Мишель, высокая душа, олицетворенная мощь в своей внутренней жизни. И тем более обязан ты хранить, беречь силы твоего духа и не подвергать их пустой, но тем не менее изнурительной борьбе с призраками внешности. Ты благородный не в гражданском, но в этимологическом смысле этого слова, потому что ты получил от природы благую организацию, цены которой ты не можешь знать хорошо, но я, я знаю ей цену. Все ваше семейство -- феномен в этом отношении, и хотя "его благородие, ангел мой" немножко и срезался на этом, но и (у> него хотя горячая кровь и крепкое сложение есть28.
   Твое проклятое молчание (тоже -- следствие прекраснодушия) свело было меня с ума, и я не шутя чувствовал минутами какие-то дикие порывы, бросив все, хоть пешком идти к тебе. Так как я предполагал, что твои отношения с Александром Михайловичем дурны до последней степени, то и почитал за бесполезное писать к нему и уже не шутя было решался писать к Варваре Александровне, в убеждении, что беспокойство об участи друга будет для нее достаточным извинением в моей смелости. Ты просто измучил меня, безалаберная голова. Но теперь я спокоен и только с нетерпением жду тебя. Твой возврат в Москву будет для меня светлым праздником. Боже мой, сколько разговоров, новостей, подробностей, сколько жизни! Приезжай поскорей, а если еще не можешь скоро приехать, то уведомь об этом: я хочу писать к тебе большое письмо о творчестве. Я было на Кавказе растолковал его себе удовлетворительно и окончательно, но --
  
   О, коль судьба упруга!
  
   -- подлый человек Катков, стакнувшись с другим мерзавцем (именно с Егором Федоровичем)29, разбил в прах мою прекрасную теорию. Ту и другую (сколько ее понял) хочу изложить тебе в следующем письме, но не прежде, как получив от тебя известие, что ты еще не скоро приедешь. Александр Христофорович переводит с французского чью-то (забыл имя автора) историю философии и читал мне с Боткиным отрывок о Декарте, Малэбранше и Спинозе -- славная вещь! Спиноза -- вот еще гигант-то! Если в Прямухине есть энциклопедический словарь, то прочти в нем статейку "Бруно": ты увидишь из нее, что и Италия имела своего Спинозу30.
   Да еще вот что: возьми, пожалуйста, у кого-нибудь несколько уроков в каллиграфии: твоих писем читать нельзя. Последнее письмо прочел мне Боткин, да и то некоторые слова так и остались неразобранными. Читая твое письмо, мы больно похваливали тебя, а Боткин забыл даже болезнь свою (у него сделалась было костоеда). Зато и ругали, мошенник ты такой, ругали порядком тебя, во-первых, за спорные пункты, против которых я возражал в этом письме, а во-вторых, за неумение писать так, чтоб можно было читать. Я еще нападал и за незнание грамматики: ну, не стыдно ли тебе не знать, где ставить ѣ, где е. Ты пишешь: т-е-нь, гр-е-х, т-е-ло. Небось, по-французски не сшибешься в орфографии -- на что же это похоже? Устыдись и покайся.
   Боткин читал мне свою неконченную статью о "Роберте-Дьяволе" -- славная статья!31 Этот малой умеет писать, и если бы вздумал поучить Шевырева уму-разуму и принялся бы за это с большим жаром, то не охолодел бы на половине, как иные прочие -- понимаете? Засим имею честь кланяться, хоть бумаги немного и остается, да уж нечего писать.

Твой В. Белинский.

  

24. М. А. БАКУНИНУ

15 ноября 1837. Москва

Москва. 1837. Ноября 15 дня.

   Черт бы тебя взял, любезный Мишель! У тебя престранные поступки: размахнешься целою тетрадью, да и замолчишь на год. Уж сколько ты раз писал, что приедешь в Москву в ноябре, а в каких числах и даже в каком ноябре -- 37 или 38 года -- Ее пишешь. Лангер получил от тебя большое письмо, по ты напрасно трудился для него -- и до сих еще пор не прочел он его, потому что нет никакой возможности. Право, хоть уж бы у какого-нибудь дьячка поучился ты чистописанию или бы уж совсем перестал писать письма. О, если бы ты послушал, как мы тебя проклинаем за твою безграмотность! Но -- пора о другом. Скажу тебе новость -- я сбираюсь в Питер, и не шутя. Вместе с этим письмом отправил я на почту письмо к Николаю Полевому1. Ксенофонту Алексеевичу отказали -- и мне нечего делать в Москве2. Я хочу существовать и материяльно и нравственно и почему-то, не знаю сам, думаю, что только в Петербурге могу жить тем и другим образом. В мысли о Петербурге для меня есть что-то горькое, сжимающее грудь тоскою, но вместе с тем и что-то дающее силу, возбуждающее деятельность и гордость духа. Сверх того, я нуждаюсь, для поддержания моей деятельности, во внешних возбуждениях. Из-под палки нужды или необходимости я могу написать живую статью, да и все статьи мои не были бы написаны без понуканий типографских наборщиков и разных внешних принуждений. Еду в Петербург, буду там без вас, моих друзей, следовательно, буду один -- при этой мысли мне больно, грустно, но и отрадно в то же время. Я знаю себя: мне не надо спать, а московская жизнь, даря меня прекрасными минутами, усыпляет на остальное время. Мне надоело это. Хочу страдать, ко жить, то есть сознавать себя хотя бы в грустном чувстве добровольного лишения того, что составляло мою жизнь. А притом же хочу и делать, хотя могу и не делать. Итак, Мишель, приезжай скорее: не долго быть нам вместе. Конечно, и это дело может не состояться, но я думаю, что оно скорее состоится, нежели не состоится,
   Я познакомился с Левашевыми; в пятницу был у них. Со вторника, то есть с завтрашнего дня, даю у них уроки -- младшей дочери и старшему (Валеру) сыну. Добрые люди, прекрасные люди, но их мир не наш мир. Ах, братец, скажу тебе кстати славную новость: наш Нелепый3 со дня на день переменяется к лучшему и скоро будет благолепным в полном смысле этого слова. Чудесная душа, чистая, благородная душа этот господин Нелепый! Добрейший Василий Боткин с каждым днем делается добрее, хотя, по-видимому, это и невозможно. О себе не хочу ничего говорить, потому что это самая гадкая и до смерти надоевшая мне материя. Человек имеет право говорить о себе только в отношении абсолютной жизни, которою он наслаждается, а повторять целую жизнь: я неуч, я дурак, я жалок, я смешон -- глупо и пошло. Буду хорош и дурен молча. Петербург разделит мою жизнь на две половины, и если вторая будет не лучше первой, если она останется таким же призраком, то лучше молча, опять-таки молча, истаять и исчезнуть, подобно призраку. Подлецом я не могу быть, не могу деньгам, чинам или другим каким пошлостям внешней жизни жертвовать своим человеческим достоинством: с этой стороны я спокоен, и потому уверен, что, переехавши в Петербург, или буду жить в какой бы то ни было степени, но только конкретною жизнию, а не в призраке, или разрушусь постепенно, как разрушаются все призраки. К черту жалобы, немощь, отчаяние,-- надежда, смелость, твердость, сила -- вот что должен я ощущать в себе, и в самом деле, если я их еще и не ощущаю в себе теперь, то уверен, что ощущу, а эта самая уверенность за будущее есть уже признак улучшения в настоящем. Борьбы, страдания, слез, затаенных мук сердца -- вот чего прошу я теперь у судьбы и вот через что надеюсь я очиститься и перейти в жизнь духа. Ах, Мишель, как бы я желал увидеться с тобою скорее. Присутствие человека, сильного верою, дает веру, а вера есть -- все. Я теперь, во внешности моей, не много лучше прежнего, но начинаю яснее понимать многое. Беда только в том, что идея не проникает, не въедается, так сказать, в сокровенные тайники моего бытия, не овладевает всем существом моим. Я все понимаю как-то объективно, как будто отделяя сознание от себя. Может быть, это необходимый переход, может быть, так оно нужно; но боюсь собственный произвол принять за необходимость и влиянием судьбы оправдать свое бессилие.
   Немецкий язык мой идет плохо. Черт возьми, необходимость знания языков поставляет меня в область долга, а это самая гадкая область в царстве духа, но ведь надо же перейти ее, точно так же, как для того, чтобы достигнуть до места, где нам приятно быть, надо переехать через множество мест неприятных и вытерпеть все неудобства дороги. Взялся я за "Разбойников" Шиллера, но, кроме того, что эта пьеса не имеет для меня прелести новости, она написана таким фразистым и вычурным языком, что и знающие немецкий язык не могут многих мест понять, а я если не пойму одного места, то теряю охоту идти дальше. Читать Фихте тоже не хочется, потому что философский язык прост и однообразен, а мне знание немецкого языка нужнее знакомства с Фихте, потому что последнее должно быть следствием первого. Кроме же того, мне нужно переводить что-нибудь поэтическое: ты знаешь, что я еще стою на степени прекраснодушия и идея, соединенная с трудностию понять ее, скорее охладит, нежели возбудит во мне деятельность. Выбор мой пал на чудака Гофмана. Хочу приняться за него. Долго колебался между "Котом Мурром" и "Серапионовыми братьями": первое хорошо потому, что заключается в одной книжке, а второе тем, что переведено на русский и можно справляться с переводом в трудных местах4. К тому же я прочел 3 том этого сочинения и пришел в восторг от "Мейстерзингеров"5, этого генияльного произведения, в котором высказано преимущество бесконечного над конечным в искусстве6. Вот истинная сторона Гофмана! Его фантастическое -- болезнь духа, жизнь призрачная. Искусство как предмет искусства -- здесь Гофман велик, и его надо давать молодым людям для развития в них чувства изящного. А его Аннунцианта -- о, как хороша7. Решено-- читаю по-немецки "Серапионовых братьев".
   Прощай, Мишель. Желаю, чтобы "здравствуй" сказал я тебе не на письме, а в Москве.

Твой В. Б.

   Лангер взялся учить музыке моего племянника.
  

25. К. С. АКСАКОВУ

Между 16--20 ноября 1837. Москва

   Не знаю, почему ты так медлишь присылкою обещанных книг? Верно, не знаешь квартиры?1 Пришли мне с моим же мальчиком: 1) Беранже2, 2) Père Horiot {"Отец Горио" (фр.).-- Ред.}3, 3) мои статьи (я начинаю чувствовать потребность употребить их в дело, то есть переделать)4. Нет ли чего интересного для прочтения? Знаешь ли ты новость: Погодин затевает журнал5 и предлагает мне участие. Это пока тайна. Если не состоится то, известное тебе журнальное дело6 -- то, черт возьми, может быть, я и решусь. Но в таком случае сперва выторгую себе полную конституцию -- понимаешь?
   Составляю синтаксис. Думал о грамматике -- и опять с тобой не согласен. Выражение пространства -- имя, времени -- глагол; хорошо! Определительное -- оно что выражает -- пространство или время? Мне кажется, что было бы слишком произвольно заставить его выражать то или другое, тогда как оно не выражает ни того, ни другого. А числительные (пять, три, десять, третий, пятый, десятый) -- они что выражают? Оно, видишь, так да не так, потому что, кроме категорий пространства и времени, есть еще категории качества, количества, принадлежности и пр. У меня есть об этом поговорить с тобою. Но я вполне согласен с тобою, что предлоги и союз не частицы, а неизменяемые части речи, а частицы суть изменяемые части речи, таковы: нет (не есть), было, бы, не и пр., почему нет и не -- наречия? вздор: они частицы7.
  
   На обороте:
   Константину Сергеевичу Аксакову.
  

26. М. А. БАКУНИНУ

Между 15--20 ноября 1837. Москва

Москва. 1837. Ноября дня.

   Любезный Мишель, письмо твое1 произвело на меня несколько различных и даже противоположных впечатлений: во-первых, оно подавило меня удивлением, как тяжелою горою; во-вторых, оно опечалило меня и вместе обрадовало. Последнее впечатление очень сложно, так что я едва, едва могу отдать себе отчет в нем: тут есть радость и эгоистическая, подлая и человеческая, благородная. Но я хочу, чтобы письмо мое было последовательно, и потому начну с начала: ты был <...>; ты ревновал ко мне (кого же?) и питал ко мне неприязненное, жгучее чувство2. Когда я все это прочел, у меня руки опустились, и мое удивление было смешано с каким-то ужасом. Но ты, Мишель, хорошо сделал, что во всем мне признался; полная откровенность есть первое условие дружбы, и вот тебе тому доказательство: теперь я не только больше люблю тебя, но и больше уважаю. Я поставил тебя на ходули е моем мнении, я уважал тебя, как идеал, но мое уважение было холодно; теперь ты сам сошел с ходуль, ты показал себя в виде жалком, униженном, презренном даже, но теперь-то я уважаю тебя горячо, энтузиастически, ты облекся в моих глазах в какое-то фантастическое величие. Да, мой бедный и благородный Мишель, кто может делать такие признания, тот -- человек. Жалею, что ты не сделал этого прежде: может быть, ты тогда же бы прекратил свои страдания; но может быть всегда только предположение и часто равняется не может быть. Дух развивается во времени и в обстоятельствах: эти обстоятельства необходимы. Ты падал ужасно, но потому, что должен был падать, потому, что только таким путем мог ты дойти до своего настоящего развития. Падения твои теперь для тебя -- призрак, а существенно только то, что ты встал, и встал для того -- теперь я согласен с этим,-- чтоб больше не падать <...> Теперь -- второе обстоятельство. Оно было мне небезызвестно, потому что при отъезде твоем в
   Прямухино ты намекнул мне об нем, но оно все-таки тем не меньшим удивлением, смешанным с ужасом, поразило меня. Вспомни, Мишель, как дурно ты вел себя в отношении ко мне во время моего пребывания в Прямухине. О, ты вонзал мне нож в сердце и, вонзая, поворачивал его, как бы веселясь моими муками. Что это не фраза с моей стороны -- вот тебе доказательство: до последнего твоего письма (которое переменило мои отношения к тебе и положило начало истинной моей дружбы к тебе) я любил и ненавидел тебя3. Я любил тебя искренно, любил тебя для самого тебя, любил тебя за то, что одолжен тебе моим развитием столько же почти, как Станкевичу, любил тебя, потому что люблю всех твоих сестер такою любовию, которая облагораживает меня и служит мне залогом всего прекрасного в жизни, наконец, любил тебя за то, что одна из них имеет для меня доселе несколько большее значение, нежели прочие;4 и в то же время я ненавидел тебя минутами. Какое-то дьявольское наслаждение находил я в том, чтобы злословить тебя, рассуждать о твоем мальчишестве. По приезде в Москву с Кавказа я рассказывал К. Бееру, И. Станкевичу, даже Кетчеру (не говоря уже об Аксакове и Боткине) о моем споре с тобою об аккуратности, осуждал тебя за Шмита5 и прочее; этого мало: ты знаешь, что я по-своему толкую историю Станкевича, я верю, что не любовь была его фантазией, а, напротив, уверенность в ложности этого чувства была фаптазиею, вследствие спертой воли, чему причиною твое прекраснодушие; я и теперь в этом уверен, но теперь я об этом буду говорить, не осуждая тебя и не находя удовольствия осуждать тебя; но недавно -- поверишь ли? -- я намекнул об этом Николаю Христофоровичу, который, бог знает почему, знает главное-то. Я чувствовал, что я гадок, и принимался хвалить тебя, но в то же время чувствовал, что не от души. Твое предпоследнее письмо значительно примирило меня с тобою6, но червь ненависти все еще оставался в моем сердце; последнее письмо твое совершенно задавило его, и я дышу свободнее. Чтобы яснее высказать мою мысль, я должен тебе напомнить кой-какие случаи, где ты резал меня. Когда у вас было освящение7, вечером, когда все ужинали на разных столиках и представляли собою отдельные группы, сливавшиеся во что-то фантастическое целое, я был весел, был счастлив. Как-то подошел к Татьяне Александровне и начал от избытка сердца болтать вздоры, которые были довольно пошлою формою истинного чувства. Подходишь ты и -- как верно чувство симпатии и антипатии! -- я смешался. "Что это такое? -- говоришь ты,-- новый способ делать комплименты, говоря дерзости" {Я тогда же заметил, что Татьяна Александровна была как-то странно сконфужена этим; теперь я понимаю -- это оттого, что она лучше моего знала причину твоего поступка.}. Я чувствовал, что по всему моему телу, от лба до пяток, запрыгали острые иглы, что белье взмокло на мне и прилипло к телу, и понял, что есть оскорбления, которые могут засыпать, притаиваться, но не исчезать. Мне было непонятно только то, что глупая шутка и кадетское мальчишество могли так сильно оскорблять меня, и я обвинил себя в самом мелочном самолюбии. В другое время меня ужасно срезал за столом, по простоте своей, Илья; он срезал, а ты дорезал. Не буду говорить, какое действие производило это на меня. В первое мгновение это всегда бывало страданием, бешенством, смешанными с каким-то (почему не сказать правды?) удовольствием, а за всем этим следовала апатия, отупение, отвращение от жизни и самого себя. И каждый раз, когда ты унижал меня перед всеми ними своими грубыми выходками, я чувствовал к тебе более, нежели досаду, более, нежели негодование, что-то похожее на ненависть. Я писал вторую мою статью8, оканчивал ее, не мог себе уяснить хорошо идеи любви к женщине, начало которой чувствовал в самом себе, два дня жил я в себе, сосредоточенный, с сладкою болью в груди, с сладким страданием в душе, я чувствовал, мыслил, я ощущал в себе присутствие внутренней жизни; два дня, Мишель, два дня с неохотою, с досадою отрывался от пера даже для того, чтобы идти туда -- и что же, в эти два дня ты нарочно преследовал меня кощунством, смехом, пошлыми шутками... По приезде, как только я остался наедине с Станкевичем, то, при всем моем желании утаить от него мое новое чувство, я, ничего не высказывая, высказал ему все, увлекшись моим негодованием против тебя и жалобами на тебя. Он принял мою сторону, осуждал тебя -- и это было для меня целебным бальзамом. Помнишь ли, как у Бееровых я назвал тебя Александром Ивановичем9, а ты, чтобы отомстить мне за это, сказал: "Что? Александр? нет, я не Александр, а у меня сестра так Александра" или подобную пошлость. Помнишь ли, как у Боткина я назвал тебя опять Хлестаковым, а ты мне сказал, что ты знаешь кое-что за мною и можешь меня срезать еще хуже. Боже мой, думал я, что же такое этот человек? Зачем в нем так много доброго, прекрасного, зачем его дружба так много сделала для моего развития и зачем он в то же время мальчишка, глупец пошлый, словом, Иван Александрович Хлестаков? Из этого ты можешь заметить, что я твою неделикатность со мною объяснял офицерством, мальчишеством, и это-то меня бесило и оскорбляло больше всего. Для меня сноснее было бы думать, что твои такие поступки со мною имеют основанием скрытую ненависть, зависть или что-нибудь подобное; для меня сноснее было думать (по крайней мере, мне так казалось), что ты подлец, нежели то, что ты мальчишка. Последнее письмо твое сняло гору с души моей. Поступки твои со мною дурны, но источник их,-- Мишель, тот подлец, негодяй, черствая душа, кто бы осудил тебя за него10. Ты ненавидел меня (и, разумеется, любил в то же время: в твоем положении я понимаю возможность двух таких противоположных чувств к одному и тему же лицу); мои статьи были для тебя -- нож вострый; о, Мишель, как я понимаю это, как я теперь сострадаю к тебе в прошедшем, как я теперь люблю тебя, как мне хочется обнять тебя, плакать на груди твоей. Не могу решить, естественно ли твое чувство: это мог бы решить только один Гегель, а не мы, находящиеся под влиянием внешности и даже предания; как бы то ни было, только твое чувство меня пугает, кажется мне уродливым, чудовищным; но оно есть в тебе, Мишель, потому что ревность есть пробный и необманчивый признак этого чувства. Глупо было б обвинять тебя в нем, но я понимаю, что ты должен был ненавидеть меня, что мои статьи должны были для тебя быть -- нож вострый и что в то же время ты должен был ненавидеть и себя, сознавать себя подлецом, эгоистом, желать смерти себе. Все это мне понятно. Я помню, что, когда ты ходил обнявшись с Александрой Александровной, мною всегда овладевало минутное бешенство, за которым следовало несколько часов апатии, отвращение от жизни и самого себя, презрение к самому себе, а я -- ты сам это хорошо знаешь -- не имел ни малейшей причины ревновать тебя. Потом, я помню, какое неприязненное чувство питал к самому имени Вульфов11, какую могучую ненависть ощутил я в себе к кн. Козловскому -- а ведь оба были для меня совершенные призраки, люди невинные и неопасные. Наконец я помню, что когда, будучи на Кавказе, я не питал не только любви, но даже и воспоминания о ней, и когда Ефремов получил от Санечки Станкевича письмо, в котором тот ошибочно уведомлял, что в Прямухино едут и Поль, и Лангер, и Боткин, то меня покоробило при этом известии, и я впал в самую гадкую апатию. Поля я не знал, и он не существовал для меня, Лангера -- но с Лангером я вперед знал, что должно было случиться -- и не ошибся; следовательно, Боткин -- вот кто возмутил мою душу и отразил на несколько времени жизнь12. А я, Мишель, очень хорошо знал, что не имею никакого права ревновать; даже -- скажу более -- я очень хорошо чувствовал, что мое чувство ложно или, по крайней мере, так слабо и ничтожно, что недостойно ни меня, ни особенно того предмета, на который устремлено. Итак, Мишель, повторяю тебе, что я глубоко понимаю твое прошедшее положение в отношении ко мне, твою ненависть, зависть, желание оскорбить, внутреннюю борьбу и, наконец, то, что ты вследствие всего этого стал точно походить на Хлестакова. Твоя жизнь была призрачна, ложна, каши отношения были таковы же. Между нами не было и не могло быть истинной дружбы. Теперь я понимаю, что ты прав был с своими местоимениями Я и Вы, что в твоем письме ко мне не было гордости и пуританизма, но была истинная любовь: ты только не понял моего положения -- и вот причина наших недоразумений.
   Обращусь опять назад. Твое чувство и его проявления -- я уважаю то и другое, не исследуя ни их причин, ни их законности. Ты был страдальцем, и если бы в этом положении в минуту падения ты оклеветал меня -- и тогда бы я простил тебя искренно. Но ты обнаруживал гигантскую силу духа в самом падении. Мои статьи были для тебя -- нож вострый, а ты хвалил их, ты давал все способы торжествовать мне на твое мучение. Ты подозревал, что Татьяна Александровна меня любит, и, зная, что мои статьи есть лучшая, блестящая и самая сильная моя сторона, что только тут-то могу я высказать мои энтузиязм, мою прекрасную душу и что только этим я в состоянии увлечь женщину -- и ты, ты хвалил мои статьи, ты улаживал их чтение. Ты, Мишель, просто -- велик. Не прими моих слов за фразы, я пишу все это, что называется, сплеча, пишу тебе со слезами на глазах. Не самоотвержению твоему удивляюсь, не долгу; нет, то и другое есть призрак, потому что только любовь реальна; но силе духа твоего дивлюсь я. Стоицизм -- призрак сам по себе, но как выражение великих элементов в душе человека -- он есть нечто высокое и реальное. Им-то ты подавляешь меня: я чувствую себя ничтожным перед тобою и под ногами твоими говорю тебе, что люблю и уважаю тебя теперь более, нежели когда-нибудь. Помню я, что ты не присутствовал при втором чтении моей второй статьи (по случаю возвращения из Москвы Любови Александровны и Татьяны Александровны), что ты сошел к нам к концу чтения, и сошел в апатии, которая обдала меня холодом. Помню, что ты не присутствовал с нами, когда я читал поэмы Пушкина, и в тоске и апатии сошел к концу чтения. Эту апатию ты приписывал отсутствию в себе эстетического чувства -- и я поверил тебе. Друг Мишель, если теперь, в редкие минуты дисгармонии, ты с досадою на самого себя воспоминаешь о своем враждебном чувстве ко мне и обвиняешь себя в нем,-- брось это, как призрак, а я прощаю и благословляю тебя, как человек, христианин и твой друг, я -- повторяю тебе -- еще более люблю и уважаю тебя за твое неприязненное чувство ко мне, и мне от этого самому легче и лучше. Но довольно обо мне, поговорю о тебе.
   Ты еще и теперь не уверен, оставило ли тебя твое странное чувство. Как бы то ни было, но если оно было в тебе, то необходимо должно было быть -- и, кто знает? -- может быть, ты ему более или менее обязан своим теперешним переходом в высшую жизнь. Оно, как всякое чувство, относится к внутренней жизни, а во внутренней жизни нет случайностей и призраков: там все необходимо и действительно. Дух как в человечестве, как в народе, так и в индивиде развивается во времени и в обстоятельствах, и каждое обстоятельство, хотя бы даже внешнее, но имеющее влияние на внутренний мир человека, есть необходимое средство к развитию,--
  
   Все в жизни к великому средство!13
  
   Другое дело -- обстоятельства, накликанные нами на себя; но ты не выкликал своего чувства, которого ты, естественно, должен был страшиться. Итак, твое чувство было необходимо, но не истинно, то есть не конкретно, оно нужно было, как средство временное. Это можно решить одним вопросом: замечал ли ты в ней такое же к себе чувство? Если нет, то твое было ложно. Да, Мишель, я опять возвращаюсь к нашей прежней теории любви: факты, самые факты доказали мне ее истинность. Любовь есть гармония, а гармоння во взаимности. Кажется, я тебе уже и писал об этом14, применяя к себе. Потребность любви выходит из потребности осуществления, обособления, оконкретения, так сказать, истины в идее, в истине в явлении. Истина сама по себе есть нечто отвлеченное, есть Sein {бытие (нем.). -- Ред.}, но не Dasein: {существование (нем.).-- Ред.} нужен известный образ для осуществления этой истины, а этот образ должен быть человеческий, потому что человек есть по преимуществу истина в явлении. Почему же нужен человек другого пола, это я объясняю моею теориею гармонии в противоположности (вспомни мою вторую статью). Момент сознания любви есть момент вдохновения, а вдохновение, по Гегелю, есть внезапная способность оценить истину. Истина (отношу сюда и благо и красоту) одна, но проявления ее различны, точно так же, как поэзия одна, но есть поэзия Шекспира, есть поэзия Гете, есть поэзия Шиллера. Всякому нужна истина в известном образе, Вот почему из двадцати женщин, равно прекрасных и лицом и душою, можно, не колеблясь, полюбить и избрать одну. Родственность душ, а следовательно, и самых организмов решает выбор. Итак, когда мужчина встречает в женщине свою истину, или, вернее, свою форму истины, то он приходит в состояние вдохновения или находит в себе внезапно силу сознать эту истину. Эта теория верна. Прежде наша ошибка состояла в том, что мы думали, что <для> каждой души есть только одна родная ей душа, и потому сбились на фатализм. Нет, у миродержавного промысла нет лабораторий для подобных двойчаток, нет этой аккуратной и отчетливой экономии. Для каждого из нас существует множество родных душ, стоящих в отношении к нам на большей или меньшей степени родства; скажу более, для каждого из нас может существовать не одна душа в равной степени родства. Первая встреча решает нашу судьбу, и счастливая, разделенная любовь есть встреча с родною вполне душой, а несчастная, неразделенная, с душою, которая стоит в отношении к нашей душе только на некоторой степени родства и которая только тревожит нас, но не удовлетворяет. Такого рода любовь продолжается только до встречи с вполне родною душою, без этой же встречи она может не оставлять нас во всю жизнь, давая нам какое-то грустное и неполное блаженство. Меня всегда смущала любовь Татьяны к Онегину, как любовь глубокая и возвышенная, но не разделенная; теперь я уверился, что она не была неразделенною. Онегин человек не пошлый, но опошленный, и потому не узнал своей родной души; Татьяна же узнала в нем свою родную душу, не как в полном ее проявлении, но как в возможности, Онегин презирал женщин; победа без борьбы для него не имела цены. Он полюбил Татьяну, как скоро для его чувства предстало препятствие, борьба. И его любовь была глубока. Когда ты приедешь в Москву, то узнаешь един весьма любопытный факт на этот предмет15, происшествие, случившееся с человеком, которого если ты не знаешь хорошо, то знаешь хоть по имени и в лицо. Приятно, когда факты подтверждают умозрение!
   Итак, Мишель, оставляя в стороне возможность, истинность, естественность и законность твоего чувства, я хочу только показать тебе его ложность и призрачность, если оно не разделено. Не обвиняй себя за него -- это тоже нелепость, потому что это явление для тебя еще неизъяснимо, а почитать преступлением все необъясненное, значит подчинять себя преданию, а это подлее всего.
   Не успел я еще дописать до сих пор, как ко мне приехал Боткин, за которым я нарочно посылал, потому что твое письмо сильно поразило и взволновало меня. Я прочел ему главные места из пего, также и свое; он тоже сказал, что теперь еще более любит и уважает тебя, и что он желал бы видеть тебя, чтобы говорить и плакать с тобою. Но страннее всего то, что, привезши ко мне третьего дня письмо и не прочтя еще его (потому что у меня было много гостей), когда он поехал домой, то ему вспало на мысль, что ты любишь одну из сестер. Я не хочу распространяться о том, как он принял все это к сердцу. Что касается до меня, то мне кажется, что будто я недавно с тобою познакомился и приобрел в тебе нового друга. Твоя искренность потрясла меня, и я хочу тебе заплатить такою же сколько потому, что истинная дружба может существовать только при условии бесконечной доверенности и совершенной откровенности, столько и потому, что теперь меня ужасает мысль, что ты думаешь обо мне лучше, нежели я заслуживаю. Теперь моя неоткровенность была бы подлостию, желанием иметь над тобою какую-то поверхность. Первый грех твой есть заблуждение мальчишки, не видавшего ни в книгах, ни в людях свету божьего; второй, что ты умолчал об нем перед нами, хуже, но я понимаю, как тяжко для души пылкой и самолюбивой подобное признание: эта тяжкость показывает ее бессознательное отвращение к такому греху; твой третий грех -- я сожалею о тебе за него, но вместе и уважаю. А я? я не был мальчишкою и наконец видел свет божий, но отвертывался от него: молчал, как ты перед Станкевичем, который признавался мне в своем <...> я полон одним чувством -- какою-то грустною любовию к тебе. Впрочем, я и не виню ни тебя, ни себя за подобную скрытность: в этом тяжело признаваться, и если бы ты не сделал этого первый, то никогда не услышал бы от меня. Но -- повторяю тебе -- благородство твоего поступка как будто насильно заставило и меня быть благородным по отношению к тебе. С сих пор -- ничего не скрывать -- да будет нашею священнейшею обязанностию. Будем знать к любить друг друга такими, каковы мы в самом деле. Тяжело было мне написать эти строки, но стало легче, когда их написал.
   Но одного ли этого ты не знал во мне? Боже мой! сколько еще остается узнать! Одни порывы мелочного самолюбия чего стоят! Конечно, всякая претензия есть признак внутренней пустоты, <отсутствия> положительного достоинства, но когда же это достоинство сменит претензии на достоинство? Но нет, буду к себе справедлив: я лучше, и если бы я теперь был в Прямухине, то лучше захотел бы уронить себя в глазах твоих сестер, показаться им падшим, охладевшим, сухим, апатическим, без души и чувства, нежели говорить (иногда -- увы!) с поддельным или напряженным жаром, говорить о истине, об искусстве, о любви, словом, обо всем, чего нет в душе, по крайней мере на эту минуту, и что хочется показать, как присутствующее, чтобы не уронить себя во мнении. Да, Мишель, я никогда не забуду Прямухина -- оно было моим крещением, перерождением, но все-таки не было тем, чем могло бы быть, и все это оттого, что между мною и тобою был только призрак дружбы, а не дружба, были ложные отношения. Боже мой! как верно внутреннее-то чувство, которое мы называем симпатиею и антипатиею: по-видимому, между нами все было хорошо, а между тем все как-то не клеилось и не ладилось. Я еще удивляюсь, как все совершенно не разладилось, и приписываю это только несокрушимой силе твоего духа.
   Вероятно, любезный Мишель, тебя несколько удивляет, и удивляет неприятно, то, что я решился говорить с тобою о таком предмете, который тебе и так был хорошо известен и о котором мне не следовало бы говорить с тобою именно более, нежели с кем-нибудь другим? В первый раз я написал об этом тебе с Кавказа, написал от избытка чувства, потому что твое письмо (которое показалось мне пуританским) сильно взволновало меня16. Когда письмо было отправлено, мне стало стыдно и досадно на самого себя, но делать было нечего. Не было ли тут какой-нибудь посторонней причины, какой-нибудь arrière-pensée? {задней мысли (фр.). -- Ред.} Была, друг мой: я хоть и запрещал тебе говорить и писать ко мне об этом, но бессознательно надеялся, что ты меня не послушаешься. Что ж за польза была бы мне, если бы ты стал говорить со мною об этом и говорить тогда, когда я сам назвал мое чувство немного пошленьким и когда, следовательно, напоминать мне об нем значило бы оскорблять мое самолюбие? Пользы никакой: тут была цель без цели -- я не шучу, это правда. Может быть, не было ли тут какой-нибудь темной надежды узнать что-нибудь благоприятное и поддержать этим чувство, разлука с которым так неприятна? -- может быть. Но теперь мне нечего узнавать, я все знаю и хочу говорить с тобою об этом для продолжения признаний, для того, что между нами ничего не должно быть скрываемого, затаиваемого. Прошлого года, в незабвенное время моего приезда из Прямухина в Москву, я верил моему чувству, потому что оно давало мне прекрасную жизнь. Тогда мне не для чего было говорить с тобою об этом: я должен был ожидать, что мое чувство возрастет, укрепится, освятит и просветлит все бытие мое, даст мне силу и волю, жизнь и блаженство, вытеснит из меня все призрачное, что, словом, оно не будет стоять на одном месте, но будет идти вперед и, идя, приобретать новые силы; или если мне не суждено блаженство любви разделенной, то даст высокое страдание, в котором дух должен перегореть как в горниле, и приготовиться к той же цели, но только другим путем -- к абсолютному блаженству. В обоих этих случаях мне не для чего было вступать с тобою в какие бы то ни было объяснения по этому предмету: в первом случае, рано или поздно, но ты прервал бы свое молчание, во втором оно было бы для меня красноречиво и понятно. Но теперь, Мишель, теперь, когда должно расстаться с прекрасною мечтою, хотя это и больно для моего прекраснодушия, теперь молчание с моей стороны было бы следствием ложного стыда и выражением оскорбленного самолюбия. Конечно, я срезался, и срезался жестоко, не столько перед другими, сколько перед самим собою, и самолюбие мое очень страждет; но ошибка, как ошибка, оскорбленное самолюбие, разные глупости, фарсы и претензии (а их было довольно) пройдут и изгладятся из памяти, как все призрачное; но всегда останутся со мною прекрасные порывы прекрасного чувства и святая грусть, и святая радость, и все, что было тут истинного и потому прекрасного (а его было тоже довольно). Я никогда не забуду, что этот случай открыл мне глаза для созерцания истины, для которой я прежде был слеп, и если я теперь замечаю в себе от времени до времени значительные прогрессы, то ими обязан все этому же событию в моей жизни. Иногда наводит на меня апатию мысль, что я, может быть, уронил себя во мнении Александры Александровны, но если это так, то в этом виноват я же, и надобно стать выше своего самолюбия, чтоб не страдать за прошлые ошибки. Я знаю, что ты всегда уважал мое чувство, и это обстоятельство особенно понуждает меня высказать тебе всю правду, чтобы сойти с ходулей, на которые ты меня поставил, точно так же, как ты сошел с тех, на которые я тебя ставил. Однажды я остался ночевать у Боткина. "Послушай, Белинский, давно хотел я тебе сказать: Мишель мне сказывал, что ты любишь его сестру, но что, по несчастию, она тебя не любит; не это ли причина твоего бессилия перейти в полную жизнь духа?" Послушай, Мишель: никогда не слыхал я от тебя ничего положительного, что бы могло дать мне надежду; даже кой-какие твои выражения (если ты забыл их, я напомню тебе об них при свидании) подавали мне далекую и темную надежду; потом, никакое чувство не естественно без надежды, как бы ни была несбыточна подобная надежда; но я никогда не питал уверенности, и в то же время всегда ожидал отрицательной развязки; но несмотря на то, слова Боткина болезненно потрясли меня. Дня три я был сосредоточен, грустен, носил в душе своей страдание и вместе с ним веру, силу, мощь какую-то, а на четвертый почувствовал припадок чувственности, дни два бледнел, дрожал, трясся в жгучей лихорадке сладострастия и кончил тем, что поехал к Никитским воротам. Хорош -- не правда ли? Боже мой, неужели душа моя неспособна к глубоким и долговременным впечатлениям? Или -- и это еще хуже -- неужели я так ужасно загрязнен, развращен, обессилен ненормальною жизнию, неестественным развитием, что неспособен к истинному чувству? Или, может быть, необходимое следствие любви без взаимности это -- колебание между небом и землею? Но в таком случае осталось страдание, а страдание есть путь к блаженству, есть блаженство в сравнении с жизнию покоя. Но будем продолжать. Итак, я поехал к Никитским воротам, но уже это было не так, как прежде. Целые полгода не имел я женщины, целые полгода душил я в себе нечистые порывы и думал, что после, такого продолжительного воздержания умру от наслаждения. И что же? Мне было грустно, почти со слезами наслаждался я и увидел ясно, что это мнимое наслаждение, что я уже выше его. Прекрасно, превосходно! во что же далее? А то, что недели через три я повторил ту же историю, только едва ли еще не хуже: я взял на содержание девку. Поздравь меня, Мишель! Чтобы докончить тебе мою исповедь, скажу еще, что не только моя пошлая жизнь, но и высшая-то призрачна, потому что я создал себе какой-то фантастический мир и живу в нем. Мир этот прекрасен, входя в него, я чувствую себя человеком, ощущаю в себе любовь и энергию; но выходя из него, я с отвращением смотрю на действительность и вижу, что это жизнь ложная, призрачная, что в истинной жизни духа есть одна только прекрасная действительность и что для самоваслаждения духа не нужно ставить себя в разные невозможные положения. Но в чем же твой прогресс-то? -- спросишь ты меня. А вот в чем: я глубже понимаю истину, живее чувствую необходимость и потребность труда, как единственного выхода, предчувствую скорую перемену своей жизни, больше нахожу в себе веры и силы. Как прежде просил или желал я блаженства счастливой любви (увы -- не заслуживши его), семейственного счастья и пр. и пр., так прошу и жажду я теперь страдания. В Петербург, в Петербург -- там мое спасение. Мне надо войти в себя, разлучиться со всем, что мило,-- и страдать. Знаю, что ты будешь спорить против этого; но исключительность твой давний порок: ты весь мир хочешь лечить одним лекарством. Может быть, тебе еще хочется узнать, что же мое чувство теперь, в настоящую минуту: так же призрачно, как и прежде; но с того разговора с Боткиным я больше полюбил его и те часы, которые провожу с ним в разговоре о Прямухине и прочем, считаю блаженнейшими. Если ты приедешь, я для приличия по-прежнему покраснею, даже не ручаюсь за то, что я не побледнею; если ты заговоришь со мною об этом, я задрожу, у меня займется дух, снова начну грустить и -- жить! Надолго ли? До следующего случая, при котором ты или кто другой словом или намеком вызовет снова живое воспоминание. И это любовь, это жизнь? Нет, черт возьми такую жизнь -- мне мало ее. Труд и страдание, страдание и труд -- вот чего мне надо.
   Вот тебе мои признания -- они труднее твоих, потому что ты теперь находишься в состоянии гармонии и благодати, а я в состоянии какой-то пустоты, наполненной призраками. Но довольно об этом.
   Я не мог понять твоего письма ко мне на Кавказ, потому что никогда не подозревал, чтобы наши связи были так слабы. Но согласись и ты, что только после твоего последнего письма становится все ясно. Насчет аккуратности скажу тебе, что ты опять не совсем меня понял; но я уже не досадую на тебя за это, но даже радуюсь этому. Что всему источник -- любовь, об этом нечего спорить. Что любовь может предотвратить неаккуратность, но что аккуратность не дает любви -- это тоже святая и непреложная истина. Да, я это понимаю; но в то же время я допускаю большое влияние внешности, по крайней мере, на слабые характеры, каков мой. Аккуратность не дает мне любви, но неаккуратность убивает во мне любовь и жизнь. Кроме того, что всякая мысль о долгах убивает во мне все порывы к жизни, одно то, что, например, теперь три дня сряду ложусь в 2 часа, а встаю в 9 против обыкновения, вредя моему здоровью, отнимает у меня силу для занятия, в котором все мое спасение. Ты говоришь, что безалаберность нашей жизни произошла от отсутствия в нас благодати. Так -- но обрати внимание на то, почему мы, понимая все так хорошо, не могли ничего осуществить нашею жизнию: причина кроется в воспитании, в котором мы нисколько не виноваты. Человек тем и отличается от животных, что он весь зависит от развития. Ему надо привыкнуть не горбиться, не класть пальцев в рот. Есть вещи неважные, по-видимому, но которые не оставляют и просветленного человека, если привычка сделала свое дело.
   Третьего дня я увиделся с И. И. Лажечниковым, который мне сказал, что ты был у него и что ты, вероятно, приедешь по первому пути 17. Приезжай скорее, Мишель. Твой приезд оживит меня, да и, сверх того, может быть, нам уже недолго жить вместе 18. Желал бы написать тебе и более, но чувствую, что не кончу. Наш спор теперь выяснился, и мы кончим его на словах. Прощай,

В. Б.

  

27. M. A. БАКУНИНУ

21 ноября 1837. Москва

Москва. 1837. Ноября 21 дня.

   Любезный Мишель, сейчас получил от Ефремова еще твое письмо1, в котором ты грозишься новою тетрадью. Если это -- новые хлопоты об аккуратности, то, пожалуйста, не хлопочи -- черт с нею: она надоела мне, как горькая редька. Да и теперь же я ясно вижу, что мы оба не понимали друг друга. Ты совершенно прав, что дух свободен от внешности и что только чрез внутреннее просветление можно избавиться от ее враждебного влияния, но что рассчитывать свое восстание на аккуратности -- нелепо. Вижу, что я увлекся моею мыслию, или, лучше сказать, сознанием глубокости моего падения, и зашел слишком далеко. Но и в моей мысли есть основание -- и вот тут-то, в свою очередь, ты не понял меня. Ты не обратил внимания на два обстоятельства:
   1) Наша неаккуратность доводила нас до бесчестных поступков, но мы нисколько не были бесчестны, даже делая их.
   2) Сознание моих ошибок, или, вернее, моей зависимости от людей и ложного положения в общественном смысле, убивает во мне порывы к высшей жизни и редкие минуты гармонии превращает в апатию.
   3) Вопрос о следствиях неаккуратности относится только ко мне, а не к тебе.
   Объясню, как понимаю, эти обстоятельства -- и ты увидишь, что мы не понимали один другого и спорили по-пустому, так что наш спор произвел следствия благие и важные, но только не в том смысле и совсем иначе, нежели как мы ожидали. В жизни человека, то есть в его развитии, главное заключается во внутреннем, как данном, но несмотря на то, нельзя отвергнуть какого-то взаимнодействия и со стороны внешнего. Только в здоровом теле может обитать здоровая душа -- против этого нет спора. Конечно, и больной человек может блаженствовать духовно, но из этого отнюдь не следует, чтобы его блаженство не было полнее и совершеннее, когда бы его тело было здорово. Не хочу говорить о тебе -- тебе другой путь. Вспомним, что если мы оба развивались ненормально, то ты имеешь передо мною то преимущество, что ты до 20 лет находился в совершенной пустоте, а я с 14 лет (если еще не ранее) стал жить в призрачной полноте, если можно так выразиться, то есть уже чувствовал, что очень хорошо, и рассуждал, что очень худо, потому что в лета детства надо учиться и чувствовать, и что рассуждения без содержания есть пустые фразы. Кто развивался нормально, для того нужна только осторожность в отношении ко внешности. Кто развивался "анормально, тому необходима борьба с внешностию, потому что привычки целой жизни глубоко въедаются в наше существо. Напрасно ты думаешь, что если ты будешь жить жизнию духа, то не будешь делать ошибок. Возьму в пример наши долги денежные: как мы их наделали? Неужели, в самом деле, с сознанием, что это худо? Совсем не то: мы доверялись пустым надеждам, тогда как даже простой опыт уверяет нас, что ни на какие надежды в мире полагаться нельзя и что только надежда на свой труд, и то в настоящем, не обманчива. Ты думал, что Шмит принесет тебе верных тысяч десять2, что ж было предосудительного в том, что ты входил в долги -- ведь ты брал с тем, чтобы отдать. Итак, худо совсем не то, что ты делал долги, а то, что ты надеялся на то, что еще только должно было быть, но еще не было. Теперь, чтобы перевести Шмита, для этого должно было жить не в жизни духа, но пожить несколько времени в жизни долга, и так как этот перевод был предприятием чисто спекулятивным (в чем нет ничего худого, потому что удовлетворение материяльных потребностей неизбежно), то для исполнения его нужны были -- точность, усилие, постоянство и аккуратность, а не жизнь в духе. Я понадеялся на грамматику; мой расчет был вернее твоего, потому что я ее писал и, наконец, написал, был уверен (так же, как и теперь), что моя книга, сравнительно с другими того же рода, имеет большие достоинства и должна иметь большой расход; что же было худого, если я входил в долги, будучи уверен, что буду в состоянии уплатить их? Опять худо не то, что я входил в долги, а то, что надеялся на расход книги, которая еще только должна была разойтись, но еще не разошлась. Опыт жестоко подтвердил эту житейскую, опытную истину. Ты теперь читаешь Егора Федорыча3 и говоришь, что ты блаженствуешь -- верю, потому что понимаю возможность этого. Но ты блаженствуешь потому, что уже начинаешь одолевать Федорыча, а сперва ты только трудился в ожидании будущих благ, делал себе усилие, которое то же, что насилие, словом, прежде нежели ты достиг до желанного царства блаженства, ты перешел через скучное, сухое царства долга. Я сам стал бы читать Гегеля, но та беда, что не знаю по-немецки и что в мои лета приискивать в словаре слова, биться над смыслом предложения и периода, над значением слова, справляться с грамматикою очень скучно и гадко. А между тем это необходимо. Что же меня поддержит в этой призрачной, но неизбежной борьбе с внешностию? Конечно, мысль о награде. А что же даст возможность кончить ее? Тоже мысль о награде, скажешь ты. Нет, друг мой, эта мысль сама по себе, но одной ее недостаточно: тут нужно еще простое, практическое понятие о долге, о необходимости, о честности и аккуратности, наконец; тут нужно уметь посидеть дома, когда чувствуешь потребность оживиться беседою с другом или чтением какого-нибудь изящного произведения; тут нужно (на время, разумеется) расчесть время по часам и сделаться машиною, а то ни в чем не успеешь. Возьми-ко ты себе на воспитание мальчика да не распредели его занятий по часам, когда ему заниматься по-латыни, когда по-немецки, когда историею -- то и увидишь, что он не будет знать ни по-латыни, ни по-немецки, ни истории. Нет, брат, как хочешь, а есть внешность, которая требует, чтоб ей покорялись, если хотят быть от нее свободны. Дух свободен, но и он развивается в границах времени: Гегель мог явиться только в наше время, а не в XV или XVI веке. Самая свобода есть не произвол, но согласие с законами необходимости. Ты прав, приписывая свою безалаберную жизнь внутренней пустоте; но, Мишель, неужели ты думаешь, что для тебя было бы хуже, если бы ты при своей пустоте послушался аккуратности и положил бы себе за правило каждый день переводить хоть по полулисту (печатному) Шмита, давно бы его кончил и наслаждался плодами своего труда? Конечно, ты от этого все бы жил в призраке, но не приготовил бы себе горьких минут раскаяния, и мое письмо не произвело бы на тебя такого ужасного влияния. Я понимаю, в чем состоит конкретность жизни; понимаю, что основа и причина нашего совершенства, а следовательно, и блаженства, есть благодать божия. Хорошо! Вот пришла ко мне минута: я глубоко сознал пошлость и призрачность моей жизни, глубину моего падения; сердце мое полно, мне грустно, я плачу и вместе с тем чувствую в себе новые силы: это минута восстания, минута ощущения в духе благодати божией. Что ж я должен делать после этого? Ведь эта минута есть все-таки только минута, а не полная абсолютная жизнь, потому что эта последняя есть уже награда за подвиг, победа после борьбы. Минута эта кончится, и за нею должен следовать труд, стремление, а в этом труде много скучного, мучительного, много механического, внешнего. И вот тут-то аккуратность есть святое дело. Кто достиг высшей жизни -- для того она не существует; но пока человек еще в области прекраснодушия, она необходима, как одно из средств для достижения. Я знаю, что без побуждения, без внутреннего стремления все средства бесплодны; но знаю, что и без средств то и другое также бесплодно. Прекрасная душа живет минутами, и когда она бывает вне своих прекрасных минут, ее может спасать и поддерживать только чувство долга. Горька истина! Но если и в жизни целого человечества был такой огромный и продолжительный период долга, которого последним выражением был Кант и от которого эманципировал человечество первый Фихте, то и в жизни человека он необходим4. Не вздумай заключить по этому о моем падении, Мишель. Я понимаю долг, как необходимый переход, как неизбежную степень сознания, но не как абсолютную истину, и знаю, что конкретная жизнь только в блаженстве абсолютного знания и что человек -- сам себе цель. Впрочем, ты поймешь это: ты сам говоришь, что в эпохи твоего падения тебя спасал только один стоицизм; так и долг я почитаю спасением в минуты жизни вне бога.
   Но довольно. Я много говорил, но мне все кажется, что я еще не все сказал. При свидании объяснимся обстоятельнее. Может быть, и теперь я неправ, но все уверен, что мои понятия об аккуратности небезосновательны. Очень естественно, что я утрировал эту мысль -- так сильно она меня поразила. Моя ошибка состояла в том, что я слишком много ожидал себе от перемены моей внешней жизни, но я все-таки не отвергал, что только благодать есть основа и условие истинной жизни. Без любви жизнь может быть только благоразумна, но не разумна, а благоразумная жизнь для меня тождественна с подлою жизнию. Но еще раз -- довольно. Если будешь писать об этом -- не стану отвечать; поговорим лучше при свидании.
   Не могу тебе сказать, сколько обрадовали меня строки, написанные рукою Любви Александровны, и не удивительно: эта рука рождена для благословений больше, нежели рука всякого архиерея и митрополита, если благословлять, значит давать душе любовь, мир и гармонию. В самом деле, на меня повеяло прямухинскою гармониею, и я невольно задумался о лучшем времени моей жизни; мой восторг был бы полон, если бы его не ослабило бешенство на твою неграмотность: над этими строками, написанными четко и красиво, стоят две твои строки, написанные по-твоему: {Бога ради, Мишель, пиши поразборчивее: читать твои письма -- истинная пытка. Очень досадно, что человек, который так хорошо сочиняет, пишет так дурно. Лангер на тебя бесится: он бросил твое письмо, потому что ничего не мог разобрать в нем.} как ни бился я разобрать их, но не мог, а мне этого сильно хотелось, потому что они, как видно из первых строк, имеют отношение к тем строкам. Я мог разобрать только вот что: "Сестры сделали замечание, что (имрек)..." и только -- проклятая твоя рука! Поблагодари прямухинских жителей за память обо мне; поклонись им всем по разу, а Любовь Александровне три раза, и скажи им от меня, что если они "воспоминают приятное время, проведенное со мною", воспоминают его, как довольно приятный случай в цепи приятных случаев, из которых состоит вся жизнь их, то могу ли я не воспоминать о приятном времени, проведенном мною с ними, времени, которое представляется мне цветущим оазисом на бесплодной степи моей жизни? Пожалуйста, Миша, постарайся выразиться в этом случае как можно поделикатнее, и хоть ты не имеешь такого слога, как я, но когда захочешь, то говоришь не совсем дурно.
   В самом деле, последнее письмо твое написано не совсем дурно: оно подействовало на меня сильнее прежних, и мне кажется, что ты воскрес, будучи для меня давно умершим. Даже в самом себе замечаю я больше жизни. Теперь только бы и делал, что писал бы к тебе. Вот и теперь, хотел написать несколько строк, а вышла целая тетрадка. Обо многом подумал я поглубже и многое понял лучше. Даже мне сдается, что твое письмо ускорило мое восстание и что оно уже начинается. И это начало кажется мне тем надежнее и тем более меня радует, что оно выразилось не вспышкою, сильною и мощною, но всегда для меня бесплодною, но каким-то грустным углублением в самого себя. И, право, уже есть факты какого-то улучшения, которые поражают самого меня. Теперь я смотрю на письмо твое уже с другой точки зрения и нахожу, что в нем нет только снисхождения не к моей личности, но к моей слабости, что ты, пиша его, не понял моего положения, но что оно продиктовано любовию к истине и искренним желанием поднять меня. Но главное недоразумение все-таки произошло оттого, что между нами не были уяснены наши прежние отношения и в прошедшем не было истинной дружбы. Поэтому очень естественно, что твое первое письмо я мог понять только после последнего. Теперь, любезный Мишель, должна наступить новая эпоха нашей дружбы. Впрочем, будь беспристрастен: много было прекрасного и в прежней нашей дружбе. До моего приезда в Прямухино ты был для меня каким-то призраком, каким-то добрым малым, которого я любил за то, что он добрый малый; но когда я приехал в Прямухино и когда, при помощи другого влияния, ты открыл мне новый мир -- мир мысли, я был изумлен, подобно Мольерову "Мещанину во дворянстве", который удивился, когда он узнал от учителя, что он говорил прозою5. Я написал несколько статей, обративших на меня внимание, и никак не подозревал, чтобы развитые в них идеи были -- идеи a priori {интуитивные (лат.). -- Ред.}. Ты первый показал и доказал мне, что мышление есть нечто целое, нечто одно, что в нем нет ничего особенного и случайного, но все выходит из одного общего лона, которое есть бог, сам себе открывающийся в творении. Тогда я сам собою отбросил в моих понятиях многое, что не вязалось с целым и потому было ложным, было остатком прежних убеждений, сделавшихся теперь предубеждениями. С твоей стороны, ты сам говорил мне, что я помог тебе к уяснению идеи творчества. Итак, если в наших отношениях было много ложного, пошлого, то было много и прекрасного; дай же бог, чтоб теперь было в них одно прекрасное, без всякой примеси ложного и пошлого.
   Ты говоришь, что внешних, практических грехов у тебя было втрое больше моего: мое письмо (прошлое), вероятно, покажет тебе, что мне принадлежит честь этого первенства. <...> Теперь ты имеешь еще и то великое преимущество передо мною, что в своих признаниях показал мне гнусные рубища, в которых некогда ходил, но которые теперь сбросил с себя, чтобы облечься в одежды светлые, а я показал тебе рубища, которых остатки и теперь еще мотаются на моем теле. Когда ж и я оденусь в одежду светлую и нетленную?.. Право, мне в иные апатические минуты бывает досадно на природу, что, она дала мне такие превосходные начала, что я уже не могу удовлетвориться грязью жизни, в которой валяюсь, а не дала столько силы воли, чтоб я мог вырваться из нее. Иногда приходит мне мысль, очень подлая, если она есть глухой голос моего эгоизма, мысль, что так как развитие человека во времени и обстоятельствах общественных, то уж не должно ли мне быть именно такою дрянью, каков я есть, чтобы жить недаром для общества, среди которого я рожден? Ведь все, что eu есть, есть вследствие законов необходимости и должно быть так, как есть? Но для чего же я знаю настоящую истину? Разве она не должна б была освободить меня? Черт знает, что такое? Вот уж именно такое, что только поплевать на него да и бросить6.
   Жду ответа от Полевого7. Этот ответ решит мою участь. Впрочем, едва ли состоится это дело: остается только один месяц до нового года, а о программах "Северной пчелы" и "Сына отечества" и не слышно. Если это дело не состоится, тогда останется мне один источник содержания-- уроки! Горькая участь! Она грозит и душе и телу, потому что то и другое тупеет от насильственных занятий. Слишком много любви и совершенства, слишком много внутренней жизни надобно будет, чтобы üe пасть от такой жизни. А мне надобно будет много давать уроков, не говоря уже о том, что я должен уплатить все свои долги и должен иметь все нужное для жизни, мне надо скопить порядочную сумму денег, во-первых, для обеспечения брата, а во-вторых, для того, чтобы иметь какую-нибудь возможность посмотреть Европу.
   В Москве затевается новый журнал "Москвитянин", редакторы -- Шевырев и Погодин8. Можешь представить, что это такое? Мне стороною предлагалось сотрудничество, но черт возьми этих подлецов и идиотов, не надо мне их и денег, хоть осыпь они меня золотом с головы до ног. Представь себе: Шевырев хочет писать -- о чем бы ты думал? -- о безделке -- об эстетике Гегеля! Но что ни говори о Шевыреве, а я благодарен ему: он один доказывает мне, что во мне еще есть жизнь: между многими причинами, заставляющими меня желать переезда в Петербург, он (Шевырев) не последняя. Надеюсь 23 числа получить ответ из Петербурга; что-то будет?
   Когда ты, Миша, приедешь? Пожалуйста, напиши определеннее. Ты все говорил, что в ноябре, но вот уж и ноябрь на исходе, а тебя нет, как нет. Я так давно не видал тебя, что боюсь не узнать тебя в лицо. Что же я за глупец! Когда меня мучило сомнение насчет твоего положения, то не знал, к кому обратиться -- а И. И. Лажечников?9 Да я мог бы съездить к нему, и думаю, что если бы эта мысль тогда пришла мне на ум, то думаю, что я катнул бы.
   Сообщаю тебе, может быть, неожиданную для тебя новость: К. Беер и И. Станкевич вкусили от древа познания добра и зла. Первый краснеет ужасно, и не знаю почему-то нападает на тебя за твою дурную привычку читать проповеди... видно, ожидает от тебя большой; а второй говорит об этом деле прехладнокровно. Например, его кто-то спросил, сколько он дал, то есть заплатил. -- "О, нет, это по любви",-- отвечал он с комическою важностию. Странный молодой человек -- не знаю, как и понимать его.
   Мой адрес: на Стоженке, в приходе Воскресения, в Савеловском переулке, в доме полковницы Ефремовой.
   Прощай, Мишель. Жду не ответа на мое письмо, но самого тебя, собственною твоею особою.

Твой В. Б.

   Не знаю, где ты остановишься по приезде; по крайней мере, на всякий случай скажу тебе, что если ты можешь жить в большой комнате и притом зале, то у меня есть такая комната, и ты нисколько не стеснишь меня, занявши ее 19. Равным образом, если бы у тебя не было денег, то и насчет стола ты нисколько не стеснишь меня, и мне очень было бы приятно, если бы ты остановился у меня.
  

28. М. А. БАКУНИНУ

3 января 1838, Москва

1837. Понедельник 3 генваря.

   Что-то ты делаешь, Мишель? Скоро ли узнаю я об этом что-нибудь? Боткин нынешний день едет в Харьков; вчера я провел с ним последний вечер. Статья моя подвигается, хотя ы медленно. Впрочем, о первом представлении все кончил 1.
   Сейчас пью кофий и читаю книгу, лежа на кушетке, а собака моя, лежа подле меня, ворчит и лает на портрет Пушкина. Вот все, что пока мог написать к тебе. Прощай,

Твой В. Б.

  

29. А. А. БЕЕР

13 января 1838. Москва.

Москва. 1838 года, генваря 13 дня.

   Милостивая государыня Александра Андреевна! Благодарю Вас за доверенность, которой Вы меня удостоили и которой я знаю и побуждения и цену. Я совершенно согласен с Вами насчет того, что Варвара Александровна не должна ехать в Ивановское:1 это-то ее несторожное и необдуманное намерение и заставило Мишеля ехать в Козицыно. Письмо отца, о котором Вы уже знаете, было второю важною причиною, побудившею его окончательно уяснить все эти отношения, сколько запутанные, столько и пошлые. Уезжая, он дал мне слово писать каждый день и, по обыкновению, не сдержал его, почему я насчет его семейства и его самого нахожусь в такой же мучительной неизвестности, как и Вы.
   Почтеннейший Александр Михайлович является человеком очень двусмысленным, так что много, что мы все приписывали известной особе, должно теперь отнести к его италиянской политике2. Ужасный человек! Я теперь принял за правило верить только тем людям, которых могу почитать родными себе по чувству и взгляду на вещи. Бога ради, не увидьте здесь скептицизма: люблю людей, но презираю пошляков, а между теми и другими большая разница, хотя те и другие равно необходимые звенья в пени жизни. Впрочем, я со дня на день более и более мирюсь с прекрасным божиим миром и уверяюсь, что в нем все благо и истинно, даже и то, что прежде я почитал злом. Но с собою я еще не могу помириться, почему все еще живу в пошлой области прекраснодушия. Извините за эти подробности о себе самом, которых Вы не требовали; я потому решился говорить о них, что Ваше письмо пристыдило меня, показав мне, что Вы лучше меня умели понять жизнь, хотя я, и еще недавно, почитал себя ближе к истине. Впрочем, это меня радует: дай бог, что<бы> все, что достойно счастия, было счастливо. Постарайтесь достать себе "Современника" за прошлый год: кто не читал его, тот не знает Пушкина. О, какой великий поэт, какая огромная, глубокая душа! Я недавно узнал, чего лишилась в нем Россия3. Мое почтение Наталье Андреевне и Анне Константиновне; желаю, чтобы они так же помнили обо мне, как я об них.
   Благодаря случай, дозволивший мне писать к Вам, остаюсь преданный Вам всею душою

Виссарион Белинский.

   [Приписка К. А. Беера:]
   Приехал нонче в 5 часов утра. И потому не могу писать. Извините меня перед матерью. Белинский посылает твое письмо, Саша, к Мишелю.
  

30. М. А. БАКУНИНУ

24 января 1838. Москва.

1838, генваря 14 дня.

   Третьего дня, любезный Мишель, получил я от Костеньки письмо Александры Андреевны1 и через полчаса отправил его к тебе, а через два часа получил твое и даже разобрал его все, кроме двух слов2,-- ну да ведь нельзя же без того. Высокий слог в том и состоит, что его никто не понимает, а хороший почерк в том, что его никто не разбирает. Впрочем, ты молодец: заочно глажу тебя по головке и целую в лоб. Ты умница, одним словом. Мне совестно понуждать тебя скорым отъездом из Прямухина, где твое присутствие так счастливит многих, тогда как для меня оно было невыгодно по причине крутости твоего нрава и неуступчивости при моих попытках показать тебе мой военный гений. Но несмотря на все это. я бы желал, чтобы ты приехал поскорее: в следующую пятницу (21 числа) бенефис Мочалова3. Вчера я был у него, и он спрашивал, скоро ли ты приедешь. Я сказал, что, вероятно, ты поспеешь к его бенефису.
   От Лангера я получил тетрадку Шмита4, но другой не знаю где взять. У Аксакова цела книга, которую он отдал переплесть.
   От Станкевича я получил письмецо на мое, твое и Клюшникова имя5. Оно написано очень забавно, да жаль, что преисполнено обидными личностями на мою особу. Иван и Александр Станкевичи прибыли вчерашний день и были у меня -- славные ребята! К Боткину все сбирался писать в ожидании твоего письма, а теперь и ему пишу6.
   Вышла 1 книжка "Сына отечества" -- славный будет журнал7. Что за дивные вещи Пушкина в последних двух книжках "Современника"!8 Кстати: Кольцов приехал в Москву, и я прилагаю при сем его стихотворение.
  
             Лес.
   (Посвящено памяти А. С. Пушкина)
  
             1.
  
   Что, дремучий лес,
   Призадумался; --
   Грустью темною
   Затуманился?
  
             2.
  
   Что, Бова-силач
   Заколдованный,
   С непокрытою
   Головою в бой,--
  
             3.
  
   Ты стоишь -- поник
   И не ратуешь
   С мимолетною
   Тучей-бурею.
  
             4.
  
   Густолиственный
   Твой зеленый шлем
   Буйный вихрь сорвал
   И развеял в прах.
  
             5.
  
   Плащ упал к ногам
   И рассыпался...
   Ты стоишь -- поник
   И не ратуешь.
  
             6.
  
   Где ж девалася
   Речь высокая,
   Сила гордая,
   Доблесть царская?
  
             7.
  
   У тебя <ль> было --
   В ночь безмолвную
   Заливная песнь
   Соловьиная...
  
             8.
  
   У тебя ль было --
   Дни -- роскошество,--
   Друг и недруг твой
   Прохлаждаются...
  
             9.
  
   У тебя ль было --
   Поздно вечером
   Грозно с бурею
   Разговор пойдет.
  
             10.
  
   Распахнет она
   Тучу черную,
   Обоймет тебя
   Ветром-холодом.
  
             11.
  
   И ты молвишь ей
   Шумным голосом:
   "Воротись назад,
   Держи около!"
  
             12.
  
   Закружит она,
   Разыграется...
   Дрогнет грудь твоя,
   Зашатается;
  
             13.
  
   Встрепенувшися,
   Разбушуешься:
   Только свист кругом,
   Голоса и гул...
  
             14.
  
   Буря всплачется
   Лешим, ведьмою,--
   И несет свои
   Тучи за море.
  
             15.
  
   Где ж теперь твоя
   Мочь зеленая?
   Почернел ты весь,
   Затуманился...
  
             16.
  
   Одичал, замолк...
   Только в непогодь
   Воешь жалобу
   На безвременье9.
  

31. И. П. ПАНАЕВУ

26 апреля 1838. Москва

Москва. 1838 г. апреля 26.

   Любезнейший Иван Иванович, не могу Вам выразить того удовольствия, которое доставило мне Ваше милое письмо1. Я давно знаю Вас, давно полюбил Вас: во всем, что ни писали Вы, видна такая прекрасная, такая человеческая душа 2. Вы один доказали мне, что можно быть человеком и петербуржским3 литератором. Я не старался узнать, каковы Вы на самом-то деле (как говорят опытные люди, разделяющие жизнь на идеальную и реальную): я слишком верю моему чувству, чтобы иметь нужду наводить справки для его оправдания. Веря моему чувству, я был уверен, что и Вы любите меня, точно так же, как был уверен, что меня терпеть не могут разные петербуржские поэты, прозаики и знакомые и незнакомые со мною, и даже журналисты, переписывавшиеся со мною4,-- но, Вашу руку -- я жму ее, как руку друга! Вы не обманулись, оставивши в стороне и пустые приличия и ложный стыд.
   Благодарю, сердечно благодарю Вас за Ваше предложение -- быть мне полезным по журналу5. Эта помощь важна для меня. Теперь мне во что бы то ни стало, хоть из кожи вылезть, а надо постараться не ударить лицом в грязь и показать, чем должен быть журнал в наше время, показать это издателям изящных афиш и издателям толстых журналов с афишкою на придачу;6 но молчание -- скоро увидите сами и, надеюсь, заочно погладите по головке. Горе вашей петербуржской братьи, горе всем этим маленьким гениям, которые, после смерти Пушкина, напоминают собою слова Гамлета: "Отчего маленькие человечки становятся великими, когда великие переводятся?"7 Итак, помогите по мере возможности, а то Вас там разрывают по частям, по клочкам, литературные воронья, собиратели чужих трудов. Литература наша теперь хромает, как никогда не хромала: сам Полевой, этот богатырь журналистики, сам он только портит дело и добросовестно вредит ему хуже Сенковского.
   Первый No "Наблюдателя" позамедлился от разных обстоятельств, которые могли встретиться только при первом No; но он выйдет в Москве, когда Вы будете читать мое письмо;8 второй уже печатается, третий начнется печатанием завтра.
   Прощайте и пишите ко мне чаще, а я не останусь у Вас в долгу.
   Письма адресуйте на мое имя -- в дом Межевого института (Константиновского).
   Добрый А. В. Кольцов Вам кланяется9.

Ваш В. Белинский.

  

32. M. A. БАКУНИНУ

9--27 мая? 1838. Москва

   Любезный Мишель, с удивлением и радостию узнал я, что ты с Боткиным объяснился1. Почему же ты не хочешь объясниться со мною? Ты боишься, что я пущусь в мелочи? Стыдно, Мишель, тебе так грубо не понимать меня: не я ли писал к тебе (в том письме, из которого ты увидел, что я люблю тебя истинно), что "с тех пор, как ты сознался в своей непросветленной непосредственности, я уже не почитаю себя вправе говорить тебе об пей, потому что всякие с моей стороны повторения на этот предмет показали бы не любовь к истине и не желание добра к тебе, а желание оскорблять и мучить тебя"2. Ясно ли? Ежели я тебе высчитывал по мелочам факты твоей непросветленности -- я делал это с целию: я хотел подать тебе такое зеркало, в котором бы ты увидел не только пятна, но и едва заметные крапинки души своей. И я достиг моей цели: ты написал ко мне, что все, в чем я ни обвинял тебя, правда, что твоя непосредственность гадка, но что все это я высказал тебе с любовию, почему ты ничем этим и не оскорбился3. Нынче ты Боткину сказал, что твоя непосредственность была точно гадка. Но что ты это сознал глубоко в самом деле, это доказывается всего лучше твоею благородною решимостию исправиться, что очень видно. Не прав ли же я? А между тем, повторяю тебе: если я в письме не повторял тебе однажды высказанного (потому что ты в этом согласился со мною), то за какого же ты скота почитаешь меня, думая, что я буду столько неделикатен, грязен, чтобы говорить тебе в глаза о таких мелочах, которые совершенно пусты и ничтожны, но только потому важны, что принадлежали тебе. Что я не отвергал в тебе ни глубокой души, ни глубокого ума, одним словом, какого-то глубокого основания -- это также ясно, и если ты утверждаешь противное, значит, что ты не читал моих писем или не понял их. Что я тебя любил -- этому лучшим доказательством служит мое против тебя восстание: из чего я стану сердиться и говорить резкие истины (то есть то, что мне кажется истиною) такому человеку, который мне чужд? Нет, Мишель, ты не понял меня. Не хочу исследовать -- кто в этом виноват -- время обнаружит это; но мне больно, обидно встречаться с тобою pour sauver les apparences {чтобы соблюсти приличия (фр.). -- Ред.}. Я и теперь еще слишком люблю и уважаю тебя, чтобы выдерживать с тобою такую пошлую, светскую роль. Загляни к себе в сердце, спроси себя -- значу ли я что-нибудь для тебя: если получишь отрицательный ответ, то скажи или напиши мне, что между нами все кончено; если же наша прежняя дружба имела истинную основу, хотя и нелепую ферму, и если я для тебя что-нибудь значу, то не ребячься со мною -- поступи, как взрослый человек. Прежнего не воротишь, да его и не нужно; но для нас предстоит лучшее новое. Наша ссора для всех нас имела благодетельные последствия: мы теперь можем жить вместе, не мешая друг другу, мы оглянулись на себя, много с себя свергли дрянного, лучше поняли и себя и жизнь. Знаю, что отношения не устроиваются людьми, а возникают сами собою, и потому не хочу условливаться с тобою в наших отношениях: смотри на меня, как на доброго малого, у которого есть общие с тобою стороны, в которых он может с тобою делиться; я буду смотреть на тебя так же. Выйдут из этих отношений новые, лучшие, или мы останемся все при них -- что нам до этого? Пусть все будет так, как будет. По крайней мере, мы оба поступим не как дети, а как люди взрослые. Ты говоришь, что мне необходимо объективное наполнение; я говорю, что необходимо только то, что является как потребность, необходимо условливающая собою удовлетворение: останемся каждый при своем мнении. Я нападал на тебя не за твой образ мыслей об этом предмете, а за то, что ты не позволял мне иметь своего и презирал меня за него. Но теперь это кончено: я могу с тобою даже говорить об этом и буду с уважением слушать твои доводы, только требую и от тебя того же. Трудно было первое свидание мое с тобою, трудно по двум причинам, очень хорошо тебе известным. Когда ты ушел от Боткина, я был рад, с меня спала тяжесть. Это оттого, что я увидел, что ты пришел к нам для аппаратов4, которые я ненавижу больше явной и бесстыдной подлости, когда они употребляются с людьми, а не с скотами. Но второе свидание (в парке) было для меня лучше: ты был проще. Но когда ты был у меня, когда ты сказал мне, что твои приедут в Москву после отъезда Варвары Александровны5, то у меня вся душа встрепенулась от какого-то сладкого, дружелюбного чувства к тебе; мне показалось, что ты спешил меня обрадовать известием, что они остановятся не у Полторацких6, что освобождало меня от адской муки. Не знаю, верно ли было мое чувство и не обманулся ли я в значении твоих слов и намерения, с каким они были сказаны, но вот тебе факт: мое сердце быстро повернулось к тебе. Но твои отношения с Аксаковым набрасывали ужасную тень на тебя: нам всем казалось, что ты его ненавидишь. Теперь я узнал, что ты и с ним хочешь объясниться -- и мне стало легче. Мишель, полно ребячиться -- приходи ко мне завтра пораньше. Я буду один, а встаю я рано. Объяснимся. Уверяю тебя, что если б ты сам заговорил о мелочах, то я остановил бы тебя. А нам есть в чем объясниться: ты во многом меня и всех нас не понял. Я не буду нападать на тебя -- я буду защищаться. Но главное не в вопросе -- кто прав и кто виноват: вопрос этот решит время. Все ложное и призрачное исчезнет, а истинное останется и войдет в жизнь. Знаю, что и мы перед тобою были неправы (иначе и быть не могло); я написал к тебе два оскорбительные письма, оскорбительные и по содержанию и по форме; ты знаешь причину этого -- она извинительна, Мишель, но от этого тебе не легче. Итак, мы все еще находимся под непосредственным влиянием этого события, все еще больны ранами, которые оно нанесло нам, поэтому мы все не можем еще быть судьями в этом деле: суд требует беспристрастия, а больные всегда пристрастны. Итак, к черту все разбирательства правоты и неправоты; объяснить кое-что непонятое с той или другой стороны -- это другое дело. И в таком случае я тебе предоставляю роль обвинителя, а на себя беру роль ответчика, и не позволю себе говорить ни о чем, что тебя оскорбляет. Не прошедших, но настоящих отношений уяснение -- вот что всего важнее. Э, Мишель, право мы все не так худы, как думаем друг о друге; мы все друг друга любим и уважаем --так к чему же пустым ребячеством ставить между собою преграды? Всё хорошо, все благо -- и наша ссора -- хвала ей. Ты уже входишь в истинную действительность, ты себя перерабатываешь деятельно и сильно; а вследствие чего? Будь наши письма тихи, кротки -- и что бы вышло? длинная, бесконечная и бесплодная переписка. Но довольно: может быть, завтра переговорим больше. Жду тебя часов в 7 утра, и уверен, что ты приедешь.

Твой В. Б.

  

33. М. А. БАКУНИНУ

20--21 июня 1838. Москва

   (20 июня понедельник).
   Чудная вещь жизнь человеческая, любезный Мишель! Никогда так не стремилась к ней душа моя и никогда так не ужасалась ее. В одно и то же время я вижу в ней и очаровательную девушку и отвратительный скелет. И хочется жить и страшно жить, и хочется умереть и страшно умереть. Могила то манит меня к себе прелестью своего беспробудного покоя, то леденит ужасом своей могильной сырости, своих гробовых червей, ужасным запахом тления.
   Тебя удивляет, Мишель, эта прелюдия? Она и меня удивляет, и не знаю, сумею ли я высказать тебе все, что занимает теперь мою душу. Не думай, чтобы это относилось только к приезду в Москву давно ожидаемых прямухинских гостей;1 нет, в моей душе теперь большая сложная история. Она так запутана, что я не знаю, как и распутать ее. Но начало ее скрывается в моих к тебе отношениях, в нашей недавней размолвке. С нее и начну я.
   Не думай, Мишель, чтобы я хотел завести снова старые споры и счеты. Нет -- это будет новое, хотя и о старом, потому что все старое только теперь предстало мне объективно.
   Мишель, я был, я стонал под твоим авторитетом. Он был тяжел для меня, но и необходим. Я освободился от него только 16 числа этого месяца, то есть почувствовал мое освобождение2.
   В полемических письмах моих к тебе3 я гордо, с наслаждением, с похвальбою повторял, что твой авторитет свергнут с меня,-- я обманывался. Я походил на мальчишку, который не может без ненависти вспомнить о своем учителе, хотя уже и знает, что этот учитель не смеет более драть его за уши. Я сердился, и потому был неправ.
   Мишель, мы оба были неправы друг к другу. Мы нападали друг в друге не на определение, не на те недостатки и пошлости, которые сбрасываются и стряхаются, как пыль, но на наши субстанции. Мы заглянули в таинственное святилище сокровенной внутренней жизни один другого, и заглянули с тем, чтобы плюнуть туда, на этот святой алтарь. Ты отрицал во мне святость моего чувства; взбешенный этим, я бессознательно, не замечая этого сам, отрицал в тебе всякую основу достоинства.
   Это была болезнь. Теперь я здоров. Это письмо пишу к тебе с тем, чтобы узнать, здоров ли и ты. Мишель, ты исключил меня из круга твоих друзей, ты уверил себя, что у тебя со мною все кончено, что мы разошлись навсегда. Ты обманываешься, Мишель. Ты несправедлив к себе. О, поверь мне, что ты лучше, нежели ты о себе думаешь, что ты любишь меня, любишь глубоко и горячо...
   И я люблю тебя, Мишель, люблю тебя глубоко и горячо.
   Не надо говорить тебе, какое впечатление произвело на меня первое письмо твое к Боткину4. Сначала я взбесился, потом успокоился. Второе письмо твое, посланное с Егором, попалось ко мне; я читал его, бледный, трепеща всеми членами5. Но не письмо, а вид Егора привел меня в такое состояние. Письмо не могло произвести нового впечатления, но еще более укрепило старое. Это было в середу (15), я поехал к твоим; безумный, воротился я к Боткину и сказал ему: "Теперь-то я вижу, что моя дружба с Мишелем была мечта, отрывок из фантастической повести Гофмана, дьявольское наваждение; теперь-то я вижу, что между нами все кончено -- и очень этому рад -- мне легче".
   Проснувшись на другое утро, я увидел в новом свете и себя, и тебя, и все прошедшее. Но некогда. Приехал Ефремов. Сейчас едем к твоим, чтобы с ними идти в Кремль, в Оружейную палату.

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   Чудное дело письмо, Мишель: его надо или кончить за один раз или совсем за него не приниматься. Теперь надо мне продолжать начало, а начало-то и не годится...
   Сейчас воротился я с прогулки. Были в Оружейной палате и на Иване Великом. Я был и счастлив и несчастлив, и все от одной и той же причины. Нет, брат --
  
   Недоступно свята для людских вожделений,
   Дорога для земли и ее наслаждений!6
  
   Грустно!..
   Нет, никакую женщину в мире не страшно любить, кроме ее. Всякая -женщина, как бы ни была она высока, есть женщина: в ней и небеса, и земля, и ад, а эта -- чистый, светлый херувим бога живого, это небо, далекое, глубокое, беспредельное небо, без малейшего облачка, одна лазурь, осиянная солнцем!7

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   Но буду продолжать, что начал. Да, Мишель, я теперь совершенно освободился от твоего влияния -- и снова люблю тебя, только люблю глубже, горячее прежнего. Любовь есть понимание,-- это я недавно постиг. Простая истина, а я не знал ее!
   Наша ссора была благотворна. Причина ее заключалась в нашем взаимном требовании истинной дружбы и неспособности удовлетвориться призрачною. Взаимные наши призрачности производили ревущие, болезненные диссонансы в прекрасной гармонии, которую мы образовали взаимным влечением друг к другу, взаимною потребностию друг в друге. Надо было, чтобы все ложное, так долго скоплявшееся, прорвалось, как чирей. Я и теперь предвижу возможность таких переломов и потрясений в нашей дружбе, но уже в других формах. Нет, никогда не позволю я теперь сказать правды моему другу, если мне приятно или весело будет ее сказать. Кроме любви, все призрак и ложь, а любовь страдает за недостоинство своего предмета и, плача, с кротостию произносит своп приговоры. Кто не уважает чужой личности, чужого самолюбия, тот может только осуждать, а не исправлять. Ложно всякое слово, всякой звук, вырывающийся из страсти, а любовь не есть страсть; ее упрек есть жалоба, ее обвинение есть увещание, ее совет есть мольба. Да, Мишель, я чувствую, что я глубоко оскорбил тебя. Я не щадил твоих ран, я выбирал из них самые глубокие; я высказывал то, о чем достаточно было намекнуть, я с подробностию высчитывал то, о чем самый намек горек. Но я не раскаиваюсь в прошедшем: оно было выражением момента моего духа. Мне надо было перейти через этот момент, чтобы достичь до того, в котором нахожусь теперь. Мы оба были в ложном состоянии, и потому не понимали друг друга; хотели решить вопрос, и только больше запутывали его. В тебе было много пошлого и гадкого -- правда; но ограниченность есть условие всякой силы -- это сказал наш добрый, наш святой Василий, и сказал великую истину. Что такое Германия? С одной стороны, Фауст, Гете, Беттина, а с другой -- Вагнер, Мендель, Реттель; с одной -- Вертер, а с другой -- monsier Пикар Либерфинк8. Что такое Россия? С одной стороны, богатырь, которому море по колено, а с другой -- пьяный мужик, который валяется в луже. Так и человек: его достоинство есть условие его недостатков, его недостатки есть условие его достоинств. Меня оскорбляло твое безграничное самолюбие, а теперь оно для меня -- залог твоего высокого назначения, доказательство глубокости твоей субстанции. Ты никогда не был доволен своим настоящим определением, ты всегда его ненавидел и в себе и в других. Переходя в новый момент, ты требовал, чтобы и мы переходили в него, и ненавидел нас, вндя, что мы в своем моменте, а не в твоем. Это субъективность, ограниченность с твоей стороны, но сколько прекрасного, святого, великого в этой субъективности, в этой ограниченности. В моих глазах ты теперь есть не что иное, как выражение хаотического брожения элементов. Твое Я силится выработаться, но как ему суждено выработаться в огромных формах, то естественно, что эта разработка для тебя болезненна: в ней разрушение делается для создания, гниение для новой производительности. Твои странности, детство, легкомыслие, пошлость -- все это теперь для меня понятно. Ты был во многом неправ ко мне, но не по личности, как я думал прежде, а вследствие моментального состояния твоего духа. Теперь я глубоко понимаю тебя и потому глубоко люблю тебя: любовь есть понимание, то святое и органическое понимание, где одно чувство без выговаривания, а если выговаривание, то уже не отвлеченное, а такое, которое есть в то же время и ощущение. Да, я теперь люблю тебя таким, каков ты есть, люблю тебя с твоими недостатками, с твоею ограниченностию, люблю тебя с твоими длинными руками, которыми ты так грациозно загребаешь в минуты восторга и из которых одною (не помню -- правою или левою) ты так картинно, так образно, сложивши два длиннейших перста, показываешь и доказываешь мне, что во мне спекулятивности нет "вот на эстолько";9 люблю тебя с твоею кудрявою головою, этим кладезем мудрости, и дымящимся чубуком у рта. Мишель, люби и ты меня таким, как я есть. Желай мне бесконечного совершенствования, помогай мне идти к моей высокой цели, но не наказывай меня гордым презрением за отступления от нее, уважай мою индивидуальность, мою субъективность, будь снисходителен к самой моей непросветленности. Люби меня в моей сфере, на моем поприще, в моем призвании, каковы бы они ни были. Друг Мишель, мы оба не знали, что такое уважение к чужой личности, что такое деликатность в высшем, святом значении этого слова. Я теперь понимаю, как грубы, грязны, неделикатны были мои письма, как должны были они оскорбить тебя. Прости меня за них -- я умоляю тебя именем той святой любви, которая теперь так сладостно потрясает и волнует все существо мое. В благодатном царстве любви нет памяти оскорбления -- в ней она заменяется сладостию прощения. Я простил тебя за все, потому что понял необходимость всего, что было. Мое сердце горит любовию к тебе, и с каким бы упоением обнял я тебя в эту минуту, как страстно поцеловал бы я тебя! Ты нужен мне в эту минуту, я хотел бы опереться на твою мощь, попросить тебя, чтобы ты объяснил мне самого меня, поддержал бы меня. Я болен, я страдаю -- и чувствую в тебе всю нужду и понимаю всю бесконечность твоего значения в отношении ко мне. После Станкевича, я тебе больше всех обязан. По моей природе я противоположен тебе, но потому-то ты и необходим для меня. Для меня истица существует, как созерцание в минуту вдохновения, или совсем не существует. Ты, ты сделал ее для меня представлением, под которым я разумею выговоренное созерцание. Ты внес в мою жизнь мысль, которой я не люблю, но без которой нельзя жить10, без которой чувство переходит в хаос противоречий, пожирает само себя. У меня всегда была потребность выговаривания и бешенство на эту потребность. Результатом этой борьбы должно было быть отчаяние, оскудение жизни, судорожное проявление жизни в проблесках, восторгах мгновенных и днях, неделях апатии смертельной. Так и было со мною в Прямухине. Там я лицом к лицу в первый раз столкнулся с мыслию -- и ужаснулся своей пустоте. Это был ужасный период моей жизни, но я теперь понимаю его необходимость и начинаю мириться даже с моими статьями, в которых выразилась моя тогдашняя отвлеченность11. Я страдал, потому что был благороден, я принес в жертву моим конечным определениям все мои чувства, верования, надежды, свое самолюбие, свою личность. Это было нужно: тот не любит истины, кто не хочет для нее заблуждаться и приносить ей в жертву, как Молоху, все, чем живешь и радуешься... Прощай, Мишель. Шесть часов. Иду к Лангеру. У него концерт12. Все будут слушать слышимую музыку, а я буду созерцать видимую...

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   И я созерцал ее -- но что ж? Вот уже половина первого -- все спит, а я не хочу и не могу спать. Мне грустно -- я хотел бы плакать, рыдать, да нет слез. Мишель, зачем не могу я поговорить с нею хоть четверть часа, хоть десять минут, о чем-нибудь, хоть о пустяках, лишь бы слова мои были выражением состояния духа, а не наоборот, лишь бы они шли от души, а не прибирались мною. С нею говорил Ефремов и много других, все, кроме меня. Грустно, Мишель. Хочется умереть. Для меня существует гармония, есть своя доля, свой участок жизни, данный мне добрым богом, но только не тогда, когда я ее вижу... Боже мой, как я был счастлив, блажен с четверга Пасхи до твоего отъезда, сколько жизни, могучей жизни кипело во мне во время бранной переписки с тобою, а теперь? -- то вникание, то смертельная тоска. Каждый день ее вижу, и для чего?.. Я не могу выйти из созерцания моею Я, я не могу любоваться ею объективно, как чудным, прекрасным созданием божиим: я могу или смотреть на нее бесчувственно, апатически, или с смертельною тоскою. Неужели не видеть ее -- есть условие того небольшого счастия, которое еще дано на мою долю?..

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   Я скоро заснул, но сон мой был тревожен. Ничего не видал во сне, но что<-то> беспрестанно беспокоило воображение. Я решительно в ложном положении: или в состоянии равнодушия, очень похожего на бездушие, или в тоске безотрадной, в каком-то плаксивом созерцании своего дрянного Я. Надо выйти из этого состояния -- но как?
  
   Соловьем залетным
   Молодец засвищет,
   Без пути, без света
   Свою долю сыщет!13
  
   Хорошо бы так! Истинное блаженство состоит в умении все иметь, всем обладать, ничего не имея, ничем не обладая. Как ничем? А разве не мое -- это прекрасное небо, это лучезарное солнце, эта живая природа? Разве не мое все, что ни написал Пушкин, разве не мой "Гамлет"? Только надо уметь сделать это все своим. Вот тут-то и запятая. Вчера, например, я, варвар и профан в музыке, слушал septuo {Септет (лат.). -- Ред.} Бетховена с слезами восторга на глазах, трепетал от звуков, которые так неожиданно и так сильно заговорили моей душе; а в иное время я в Пушкине и "Гамлете" вижу одни буквы -- и больше ничего. Ох, эти проклятые интервалы! Минуты созерцания и промежутки одеревенения! Долго ли еще продолжится это? Да, Мишель, хочу попробовать опытом, тяжким опытом решить наш спор: восстань моя воля и возьми сама собою то, что не дается как благодать! Буду работать -- примусь за объективное наполнение, как другие принимаются за пьянство, за разгул, чтобы найти какой-нибудь выход. Если это будет бесплодно, если я в последний раз удостоверюсь, что воля -- призрак, то буду жить как-нибудь, утешая себя мы-лию, что когда-нибудь не буду же жить.

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   Обращаюсь, Мишель, к прерванной материи -- к моим отношениям к тебе. Тебя удивит или раздосадует, может быть, то, что я сказал, что ненавижу мысль. Да, я ненавижу ее, как отвлечение. Но разве может она приобретаться, не будучи отвлеченною, разве мыслить должно всегда только в минуты откровения, а в остальное время ни о чем не мыслить? Я понимаю всю нелепость подобного предположения, но моя природа враждебна мышлению, и только ты как-то мог овладеть мною и заставить меня обо многом подумать и подумать. Это было для меня и необходимо и благодетельно. Вот твое на меня влияние, вот чем <ты> вошел в мою жизнь. Нет, Мишель, ты не навязал на меня свой авторитет: его наложило на меня могущество твоей мысли, бесконечность твоего созерцания. Многое понимаю я теперь глубоко и понимаю через тебя. Теперь это мне ясно. Мое ожесточение против тебя произошло частшо от личностей, а частию от того, что я не хотел видеть в тебе никаких недостатков, и, видя их, хотел видеть в них достоинства. Незаслуженное уважение ненадежно и ломко. Это и случилось. Конечно, в этом виноват только один я. Твоя вина состояла в излишней субъективности, в излишней сосредоточенности в себе и в желании видеть в других то что происходило в тебе. Теперь я знаю твои достоинства, знаю и твои недостатки: на первые смотрю с любовию и уважением, на вторые с снисхождением, как на зло необходимое и -- я верю этому -- преходящее. Мало того: ты достолюбезен для меня во многих из твоих недостатков, и то, что в тебе так недавно приводило меня в бешенство, теперь восхищает меня своею достолюбезностию.
   Мишель, любить можно только субстанцию -- я понимаю это; но ведь субстанция сама по себе -- призрак: она узнается чрез определение. В человеке можно любить только его определение, как выражение субстанции. Как бы ни было пошло определение человека, но если в нем хоть проблесками высказывается глубокая и могущая субстанция -- оно и любезно и достолюбезно. Знаешь ли, отчего я обнаруживаю такое сильное ожесточение ко всем пошлым людям? Оттого, что не могу говорить с ними о пустяках, о вздорах. С человеком, которого я почитаю человеком, я готов целый день врать глупости, потому что знаю, что от глупостей могу перейти с ним к высшим интересам жизни, а от них опять к чему угодно -- и во всем у меня с ним будет интерес. Я это говорю к тому, чтобы показать тебе, что требую от человека не идеальности, а существенности, чтобы любить его. Если я люблю его -- его форма мне мила, и она заслоняет в нем содержание, как в художественном произведении. Когда я был на Кавказе и с грустию воспоминал о Боткине, он всегда представлялся мне с своею лысиною в своем бархатном камзоле, с своим веселым и добрым смехом, даже с своим заносчивым "извинитесь". В его лысине для меня тьма прелестей -- я влюблен в его лысину и его достолюбезность. Ты знаешь меня, знаешь, как много во мне пошлого и гадкого. Но в чем оно заключается? Подумай хорошенько и увидишь, что в пустяках. Моя непосредственность гадка оттого, что я имею привычку говорить, когда ни о чем не хочется говорить, и потому прибегаю к остроумию, которого мне не дал бог и которое у меня является в плоскостях. Теперь это у меня исчезает и скоро совсем исчезнет, потому что я учусь молчать, когда надо молчать, учусь дорожить словом, как выражением разума, и не смотреть на него, как на празднословие. Но когда, одушевленный негодованием, я, с обычною моею энергиею, выражаюсь сравнениями, которые беру где ни попало и которые не пропустила бы никакая общественная цензура, то Боткин от меня в восторге и видит в этом мою достолюбезность и любит меня за нее. Тоже и Станкевич. Я понимаю это: оно так и должно быть. Только выражение пустоты в человеке оскорбительно, и то по своей неэстетической форме. Да, Мишель, ты правду сказал, что мы все -- славные ребята. Между нами не было той дружбы, которой нам нужно, но всегда была сильная потребность ее -- и она-то соединяла нас. Кого соединит бог, того ничто и никто не разлучит, а нас соединил бог. В биографии Гофмана14 я вычитал, что Гофман не читал критик и рецензий на свои сочинения и был к ним совершенно равнодушен. Написав сочинение, он читал его своим друзьям; если оно нравилось им, его весь мир не мог переуверить, что оно дурно. Не то же ли и в нашем кругу? У нас нет пристрастия друг к другу -- мы говорим друг о друге, что чувствуем, и потому ценим взаимным судом и мало заботимся, что о нас думают другие. Когда я вам читаю мои статьи, мне бывает страшно -- я трепещу за участь написанного мною; вы хвалите -- я в восторге; вам не нравится, и я преспокойно отношу мое сочинение к неудавшейся попытке. Вы ко мне находитесь в таком же отношении. Конечно, у меня есть ареопаг пострашнее вашего...15 но -- молчание, молчание!16 Да, Мишель, еще раз: мы любим друг друга назло нам самим, назло нашей конечности, нашей ограниченности. Есть нечто существенное, что связывает нас. Разделяют нас призраки. Надо иметь силу тотчас сознавать их и убивать. Я верю твоему прекрасному призванию, верю, что ты достигнешь своей высокой цели. В тебе играет глубокая, могучая жизнь; твое созерцание бесконечно; твоя сила -- громадна. Я всех вас хуже, я даже не знаю, что я такое. Есть много такого, что уверяет меня в моей действительности; но как же еще много и такого, что уверяет меня, что я -- дрянь, так поплевать только, да и бросить.

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   Вчера я сказал Татьяне Александровне, что посылаю с ними огромное послание к тебе, вроде посланий св. Павла. "Стало быть, грозное,-- отвечала она мне;-- в таком случае мы не повезем его". Чистые, святые создания, как они любят тебя. Нет, не любят -- они боготворят тебя! И я понимаю это -- оно так и должно быть -- ты много для них сделал. Я и теперь думаю то же, что некогда сказал тебе: в твоих отношениях к ним есть примесь лжи и призрачности, но теперь это не смущает меня, потому что я уверился, что это необходимо и неизбежно (вспомни сравнение Марбаха с киноварью 17) и что это преходящее. Истина должна победить ложь, и это уже делается. Опыт -- великое дело; жизнь -- великая школа.
   Мишель, ты -- злодей, счастливец, каналья! Тебе есть кого любить всеми силами твоей сильной, могучей души, у тебя есть золотая связь с жизнию; тебе есть кому отдать все -- и душу, и жизнь, и кровь. Люби их -- это счастие, блаженство. Я знаю тебе цену -- она велика; но им я не знаю цены. Я никого не знаю выше Станкевича -- но что он перед ними -- ничто, меньше, в тысячу раз меньше, нежели ничто.
   В пятницу я провел часа два с Татьяной Александровной. (Мы приехали с Ефремовым и не застали ни Варвары Александровны, ни Александры Александровны.) Что за чудное, за прекрасное создание Татьяна Александровна! В первый еще раз предстала она перед моим созерцающим, понимающим и любящим внутренним Я во всей беспредельности своего значения, со всем ароматом букета своей души. Я смотрел на нее, говорил с ней и сердился на себя, что говорил -- надо было смотреть, любить и молиться. Эти глаза, темно-голубые и глубокие, как море, этот взгляд, внезапный, молниеносный, долгий, как вечность, по выражению Гоголя18, это лицо, кроткое, святое, на котором еще как будто не изгладились следы жарких молений к небу -- нет, обо всем этом не должно говорить, не должно сметь говорить.
   Ты хорошо сделал, что не приехал, хорошо для меня. Дело по внешности обошлось лучше, нежели я думал. Приехав в середу <к> вечеру, я встретил в первой комнате Александру Александровну, срезался ужасно, но теперь утешаюсь тем, что одна она видела крайнее мое смущение, потому что я уже несколько оправившись вошел в комнату, где сидела madame с Татьяной Александровной. Однако я все-таки был еще так смущен, что препочтительно поклонился двум горничным, принявши их за гостьев, и не знаю, как не подошел к ним к руке. Но этим и кончилось мое резанье; я даже во все это время не покраснел хорошенько, а только слегка, и то раз или два. Все вышло не так, как я думал. В середу я был в волнении, в четверг тоже;19 тут замерла вся жизнь, вместо того, чтоб разыграться. Напало вникание, сухость, апатия, словом, почти прямухинское состояние. Если бы, подъезжая к их дому или дожидаясь их у Лангера, я не чувствовал замирания сердца, если бы иногда, взглянув, не чувствовал какого-то волнения, то не знал бы, что и подумать, но по крайней мере решил бы вопрос. В понедельник сухость моя разрешилась в тоску -- мне стало легче. Вникание убило было меня, но я утешился мыслию, что, может быть, ты и прав, говоря, что вникание может быть благодетельно. Смотря на нее, постигая всю гармонию, всю светлость и ясность этой чистой, глубокой, младенческой души, я обернулся на себя: мне стало гадко. Оставалось бы наслаждаться объективным созерцанием и блаженствовать им, оставалось бы читать про себя эти чудные стихи.
  
             Ужель не можно мне
   Глазами следовать за ней и в тишине
   Благословлять ее на радость и на счастье,
   И сердцем ей желать все блага жизни сей:
   Веселый мир души, беспечные досуги,
   Все -- даже счастие того, кто избран ей.
   Кто милой деве даст название супруги20.
  
   Но -- увы! мне приходили на память другие стихи, вот эти --
  
   Я не могу скитаться одиноким,
   В страданьях жить надеждою одной,
   Дух обольщать наград венцом далеким
   Я не могу... Увы! я весь земной!
   Мне грудь нужна, мне надобны объятья,
   Мне надо сердца верного ответ,
   Чтоб темные расчеты, предприятья,
   Грел, освещал души невинной свет!2l
  
   Это думал я -- животное, пошляк! Грустно, Мишель,-- хочется умереть.
   Скажи мне: зачем такие противоречия в жизни, зачем мне дано понять достоинство того, чего я не стою, чем бы я мог быть счастлив, но чему я не могу дать счастия, а следовательно, чем и сам не могу быть счастлив. Ведь счастие-то жизни для меня навсегда убито. Где вы, золотые мечты о жизни вдвоем, хоть какой-нибудь, только вдвоем! Простите навсегда. Чувствую, как я врал, фантазируя о возможности для меня какого-нибудь счастия -- помнишь, в тот вечер, когда на мой счет так мило фантазировал Боткин. Счастливое время, тогда в мечте существовало хоть какое-нибудь счастие, представлялся хоть какой-нибудь выход!..
   В четверг вечером они были у Лангера, пошли в сад, где Лангер представил им Боткина. Потом опять пошли в комнаты; уж смерклось, а Александра Александровна исчезла. Я понял, где она -- она убежала в сад и упивалась им. Боже мой! Что значит, как, по каким законам бытия возможен этот беспрестанный отзыв на призыв природы и жизни, это беспрестанное кроткое, безмятежное волнование такой глубокой, такой прекрасной жизни? И столько прелести, очарования, святости!
   Оставалось бы бескорыстно, ничего не желая, созерцать, молиться и блаженствовать, но --
  
   Увы! я весь земной!
  
   Читал я им сцены из "Ромео и Юлии" 22, но прочел так пошло, безжизненно, что теперь досадно, зачем я испортил в их глазах это дивное создание. Читал я им "Песню о купце Калашникове"23, но лучше бы у меня отсохнул язык, нежели так гадко читать. Только некоторые песни Кольцова я прочел, как должно. Приписываю мою неудачу тому, что при чтении я должен был обращаться к madame votre mère {вашей матери (фр.). -- Ред.}. Кстати: она очень любезна со мною -- приглашала в Прямухино -- я сконфузился и отказался или почти отказался, и она на другой день при всех (и при мне) изъявила свое удовольствие от моего отказа, разумеется, в виде сожаления. Приглашала Лангера, Боткина, особенно Ефремова. Весь этот народ волнуется, сбирается, фантазирует, зовет меня, а я... да черт знает, что такое я.
   Прощай, мой милый, крепко, крепко обнимаю тебя. Утешь меня хорошеньким письмецом. Под словом хорошенькое я разумею такое, в котором ты занялся бы преимущественно мною и попробовал бы объяснить мне самого меня. Не знаю, стоит ли это труда.

Твой В. Б.

   Вот тебе, Мишель, еще -- не письмо, а приписка. Чудная вещь душа человеческая! Было мне тяжко, грустно. Кончивши письмо, поехал я обедать к Боткину. Он теперь блаженствует -- и на столе v него стоит бутылка рейнвейну, а лицо так и сияет. Нынче опять музыка, так удивительно ли, что гармония заранее посетила его. Я дал ему прочесть мое письмо, оно ему понравилось, мы потолковали -- и мне стало легче. Пришел Лангер, и Боткин начал объясняться в любви к нему. У Лангера такое чудное лицо -- оно так и сияет удовольствием. Печаль спала у меня с сердца, и я возликовал. Теперь пять часов, через полчаса надо ехать за Москворецкий мост. Ты, чай, думаешь -- не поеду, нет поеду, ей-богу же, поеду, так-таки и поеду. Право, как славно стало на душе, и светло и размашисто -- море по колена. Я уж не рефлектирую, но живу органическою духовною жизнию. Славная минута! Отчего не все минуты в жизни такие? Мне остается полчаса до выезду, а светлое небо покрывается облаками, как будто гроза хочет разыграться. Вот тебе и раз! В восемь часов они хотели быть у Лангера, а в 6 Варвара Александровна имела благосклонность пригласить меня к себе. Если бог пошлет грозу -- то не хорошо: нарочно съезжу на Стоженку объясниться с ним24. Кстати: Иван Петрович сказал Ефремову, когда тот говорил ему о своем намерении ехать в Прямухино с Петром Петровичем: "Вы все хлопочете о человеческой помощи, а меня и не думаете попросить".
   Кольцов вчера познакомился с твоими. Варвара Александровна осыпала его комплиментами и ласками, была с ним любезна, как нельзя больше.
   Васенька Боткин -- славный малый: блаженствует и пьет рейнвейн.
   Мишель, поклонись от меня Александру Михайловичу и Любви Александровне. Что она? О, как я люблю ее, как я желаю ей здоровья и счастия!
   Прощай.
  

34. М. А. БАКУНИНУ

18--19 июля 1838. Москва

   <...> мне то, что для тебя дороже всего в мире; ты возжег во мне новое пламя, развил в росток то, что во мне было зерном. Этот факт невольно просится теперь под перо мое. Ты не дал мне никакой положительной надежды, но превратил в надежду совершенную безнадежность. Я был уверен, что тебе, как брату, и еще в таких отношениях с ними, невозможно не знать положительно -- да или нет, что ты знаешь, но только не имеешь духу сказать мне горькую истину. И что же? -- ты мне сказал: "Не могу сказать ни того, ни другого, но ты теперь переменился -- вот увидишь, и тогда -- может быть"1. Мишель, это не упрек: что было -- то прекрасно, и если б в моей воле было воротить прошедшее -- я не захотел бы; если много горя, много страданий дали мне твои слова, то много и блаженства узнал я через них, много дивных и совершенно новых дотоле созерцаний они же дали мне.
   Благословен закон судьбы. За будущее не боюсь: люди гибнут без возврата от страсти, а я питал чувство -- и не бесплодно было для меня это чувство, и самое страдание от него есть блаженство, высокое блаженство в сравнении с прежнею прозябательною жизнию. Но обращаюсь к тому, что подало мне повод к этому воспоминанию. Чтобы полюбить мужчину -- женщине не нужно дожидаться его просветления. Если его настоящее определение бесконечно ниже его субстанции, если оно нелепо, дико, гадко -- она будет страдать от этого, будет плакать, что любит скотину, но все будет любить этого скотину. Да -- таков уже неизъяснимый закон судеб, и волтерианцы напрасно вооружаются против этого2. Ему даже не нужно и высказывать себя перед нею: она и без того узнает в нем то, чего нужно ей, по русской поговорке -- душа душе даст весть. Мы были с тобою волтерианцами и -- щелкнулись о действительность, которой не умели понять. Боткин для этого второе доказательство. У тебя были фантазии на его счет, но как ты с ними срезался! Знаешь ли ты, что он, мошенник такой, обоих нас надул. Он умел понимать и ценить письма Татьяны Александровны, как выражение души глубокой, энергической и поэтической, но любил письма Александры Александровны за эту неопределенность, за этот аромат женственности. Она являлась ему во сне прежде, нежели он ее увидел, и когда он поверил видение с подлинником, то нашел сходство во взгляде. Она поразила его с первого взгляда, и с первого свидания он уже положительно сознал в себе чувство, в котором ни одной минуты не сомневался3. До дня обморока он плавал в эфире блаженства, без тоски, без порываний. Да, он не таков, как я. Пушкин для меня написал этот стих --
  
   Ты любишь горестно и трудно 4.
  
   Да, я не могу и не умею иначе любить, как горестно и трудно, и на несколько минут блаженства я получил от моего чувства целые месяцы страданий, горя, апатии. Я завидую ему. Обморок ее показал ему всю глубину его чувства, перевернув все существо его. Это еще более было усилено тем, что я пересказал ему твой разговор. К этому еще надо присовокупить мучительную ревность и ненависть к Лангеру. Но теперь он снова вошел в свою обычную гармонию и из мокрой курицы снова сделался орлом. Он написал к тебе сердитое письмо5, но не верь ему -- он в меланхолии. Оп приписывает свое распадение твоему неделикатному допросу. Допрос твой точно был неделикатен, и я понимаю -- почему. Ты видел кругом себя осуществление таинства жизни, видел его и б Боткине, почему не пустое любопытство заставило тебя допрашивать его, то есть ты хотел узнать, как он там ревизует,-- больше сущность и поступки6 его. Но ты знал, что это дело щекотливое и, не зная, как приняться за него, решился сделать это шутливым образом, а не прямо, как бы следовало. В этом твоя ошибка, но я понимаю ее причину и извиняю тебя: когда хочешь хитрить, то всегда перехитришь. Причина же его распадения совсем не в этом, он еще сам себя не понимает -- глуп, мой отец. Вот мы так люди опытные -- мы все знаем. Чувствительные поэты не даром сравнивают любовь с розою, у которой есть шипы. Даром ничто не дается; он поблаженствовал и за это должен был поплатиться. Душа его по преимуществу гармоническая, но так как она в то же время и глубокая и энергическая, то еще и не того отведает -- погоди. Мы старые воробьи -- нас на мякине не надуешь.
   Теперь еще немного обо мне. Не бойся за меня -- я не паду. Мне только не надо видеть, не надо встречаться, а то огонь снова уляжется под пеплом. Теперь я вижу ясно, что я питал не страсть, а чувство, чувство же не убивает, а страдание для нашего брата -- вещь хорошая. Стерпится-слюбится и вперед пригодится. Недаром вчера заставил я себя писать к тебе это письмо: вот уж другой день (теперь 10 часов вечера), как пишу я его без отдыху и совершенно вышел из моего апатического состояния. Болезнь моя кончилась. Это был не флюс, не укушение мухи, а угорь внутри носа -- от него и опухоль на лице и легкая лихорадка во всем теле. Теперь -- присох, совсем присох, только пока небольшая нашлепка на носу, да вот у Християна Ивановича попрошу пластырь7. Третьего дня был в театре Петровского парка -- видел там одну ложу, но в ней были другие лица... Давали "Артиста". Степанов божественно передражнивал Каратыгина8, публика хохотала, и я хохотал не столько за себя, сколько за других. Мой смех был грустен, и смешной водевиль поверг меня в грусть, но я рад чужой радости, весел чужому веселию. Нет, Мишель, если бы в моей руке был меч и власть карать и миловать людей, я не сказал бы ей --
  
   И все губил, все ненавидел,
   За то, что я тебя любил9,
  
   Нет, я бы только миловал, счастливил, и все во имя ее... Нет, только страсть губит и искажает человека, но чувство, во всяком случае, возвышает его. Сознаю в себе силу жить и находить прелесть в жизни. Хочу работать и чувствую к этому и охоту и силы. У мужчины должно быть дело в жизни -- ему стыдно быть мокрою курицею. Страдай и делай, грусти, но не унывай -- вот мой девиз отныне. Ложная надежда ставила меня в ложное положение. Завтра же принимаюсь за неметчину -- уж не вырвется теперь проклятая. То-то разделаюсь с другом моим -- Федором Иванычем10 -- задам же ему! Да, Мишель, еще раз -- все будет хорошо. Но знаешь ли -- две вещи пугают меня: апатия, но от нее буду отделываться напряженною работою. Но -- другое -- ты знаешь что: от него работа не защита -- это я уж знаю по опыту. И оно тем более страшит меня, что я постоянно в каком-то дон-жуановском расположении. То, что прежде у меня бывало порывом отчаяния, что я считал грехом, подлостью, преступленьем -- теперь лишь представься случай -- не поколеблюсь ни минуты воспользоваться. И это у меня перешло в какое-то постоянное убеждение. В самом деле, если скупая жизнь не дает ничего -- надо вырвать у нее хоть что-нибудь, насладиться хоть чем-нибудь. Мишель, меня не любила ни одна, никакая женщина, ни высокая, ни пошлая -- ни от одной, и ни от какой не видел я себе ни малейшего предпочтения. Мне кажется, что на моем лице лежит печать отвержения и что за него меня не может полюбить никакая женщина. Тяжело так думать, а делать нечего -- приходится так думать. Хочется жить, а жить значит чувствовать, испытывать, ощущать жизнь. Боткин рассказал мне сцену, которою начинается "Вильгельм Мейстер",-- и у меня душа содрогнулась от дикого восторга11. Надо же узнать, что оно там такое и как -- то есть больше сущность и поступки, а я ничего. И самая чувственность, выходящая из полноты жизни, представляется мне таинством, от которого трепещет душа моя, жадная упоения. Богата жизнь, много сокровищ скрывает она, да не всем дает их, так отнимем же у нее хоть что-нибудь. А результаты, а раскаяние? -- А, черт возьми! все, все давай сюда, все возьмем на себя, все понесем, только бы жить, черт возьми, жить!..
   Но нет, что бы ни было, а уж не паду до конца, до невозможности восстания. У меня есть ангел хранитель, светлый ангел -- это воспоминание о том рае, где я был недавно. Туда, туда буду я удаляться моею фантазиею, чтобы жить высокою и таинственною жизнию, чтобы освежаться и очищаться от пыли жизни. В Прямухине у меня была фантазия, которая часто занимала меня, когда я бродил по саду, по берегу реки и по Кутузовой горе. Вот она -- я думал: если бы я разбогател, то купил бы себе поместье, с таким местоположением, которое было бы копиею с Прямухина. Развел бы такой же сад, построил бы такую же мельницу, такую же фабрику, такую же кузницу, церковь, наконец, такой же дом. Внутренние покои, неизвестные мне, заколотил бы наглухо, чтобы никогда ни моя и ничья нога не вступала в это святилище, а остальные убрал бы так же, как в Прямухине, и жил бы один, и бродил бы по саду и по всем заветным местам, и, забывшись, ожидал бы встречи с кем-нибудь. То -- вот не отворится ли дверь святилища и не выйдет ли кто-нибудь разливать чай, то -- вот не мелькнет ли за деревьями розовое платье с белым корсажем, то -- не услышу ли мелодические голоса, которые кличут друг друга этими родственными именами, которые я не смею произнести самому себе, в тиши моего кабинета... То-то было бы роскошное упоение тоскою и грустью!..
   На другой день по приезде в Москву накупил себе цветов -- целых пятнадцать горшков -- два резеды, три левкоя трех цветов, один гвоздики, один жасмина; но у рабочего стола моего стоят четыре растения, каждое аршина в два вышины: ежемесячный розан, гераниум, волькамерия и -- прямухинский знакомец -- агапандус, лиловые цветки которого я каждое утро щипал и разрывал у вас с какою-то досадою на балконе сада. Хочу купить еще какое-нибудь животное -- кролика или ежа, чтоб было что-нибудь любить, за чем-нибудь ходить и что-нибудь ласкать. Птиц в клетках не терплю. Но цветы будут состоять под особым моим покровительством, и я накуплю еще новых. Все это в воспоминание Прямухина.
   Букет довез в жалком положении, и так как я сам был в жалком положении и физически и нравственно, то только в субботу вечером вспомнил, что их надо посадить в воду. Опавшие листы с благоговением собрал и завернул в бумагу, чтобы предать всесожжению. Опавшие цветки розы и маку разложил по книгам. Но букет как ни завял, а некоторые цветы ожили, особенно гвоздики, которые и теперь -- как сейчас сорваны, желтые все воскресли, а синие все завяли, но чеснок, данный мне Александрой Александровной, здравствует, а какое-то колючее растение с синими цветочками, данное мне ею же, завяло совсем. Каждый день сам переменяю в стакане воду и грустно иногда любуюсь букетом. Когда он совсем завянет, разложу его по книгам, и ни на один листок его не ступит ничья нога. Так как я и твой букет смешал с этим, то и он в чести.
   Иван Петрович говорит, что он неохотно отпускал Петра в Прямухино, думая, что его звал туда один ты, а не по желанию всего семейства и особенно его старшин, но теперь благословляет его, и как брат и как -- Ѳ -- 12, на пребывание там, сколько будет нужно. Он говорит, что у него есть предчувствие, что он вылечит ее 13. Мишель, его можно затащить в Прямухино -- теперь у него ваканционное время, и он сам говорит, что если леченье пойдет успешно, то готов ехать. Ему бы это было очень полезно. "Поезжай",-- говорю я ему нынче. -- "А зачем? -- разве чтоб освежиться. Есть больные, которых выносят на солнце, но одни из них выздоравливают, а другие только загорают,-- я боюсь только загореть",-- отвечал он мне.
   Кланяйся от меня всем. Александру Михайловичу буду сам писать 14. Ефремова и Петра облобызай за меня. Петру скажи, что Иван только ждет от него письма, чтобы отвечать ему. Да еще скажи ему, что князь 15 надеется успеть в определении его в институт.
   В Черной Грязи мы ели малину -- в Москве давно уже продается, а у вас в саду еще и не поспевала. Разницы градуса два -- а в климате есть уж значительное изменение. Прощай -- пора спать -- 12 часов ночи. Обнимаю тебя.

Твой В. Б.

   Ух, как рука устала! И сколько намахал!
   С нетерпением жду от тебя письма и здесь прилагаю известное тебе письмо Станкевича 16. В письме к Ивану Петровичу си так пишет о своем адресе: во Франкфурт, на имя Метцлера и компании, с передачею ему; но присовокупляет к этому -- не знаю почему -- "адрес дадут тебе братья".
  

35. А. П. ЕФРЕМОВУ

1 августа 183S. Москва

Москва. 1838, августа 1 дня.

   Душенька Ефремов, тысячу раз благодарю тебя за твое милое письмо: оно доставило мне несколько сладостных минут1. Ты все жалуешься -- ободрись! Ты болен -- зато есть Петр Ключников, который в медицине -- собаку съел и о котором, если он вылечит Любовь Александровну2, я хочу написать статью в "Наблюдатель", чтобы доставить ему бессмертие (то есть Ключникову, а не "Наблюдателю": последний и так уже бессмертен, хотя статья Мишеля и ввергла было его в неизлечимую болезнь3). Чтоб быть здоровым душевно -- вот тебе рецепт: бери у жизни то малое и бедное, которое она тебе даст, и делай вид, что больше ничего не хочешь: авось надуешь. Главное дело, бойся фантазий. Оно бы ничего -- фантазия красит жизнь, да мы-то с тобою глупы: судьба хочет нам дать оплеуху, а мы подставляем рожу, думая, что она хочет поцеловать нас. К черту все мечты... Хорошо только, что под носом, что можно рукой достать. Самая ограниченная, самая пошлая действительность лучше жизни в мечтах. Послушай, Ефремов: если бы судьба сделала тебя нищим и заставила бы тебя есть хлеб с водою -- ведь у тебя достало бы столько гордости, чтобы не плакать о соусах (так ты в Новочеркасске плакал об ужине4),-- почему же у тебя недостает гордости, чтоб быть довольным тою жизнию, которая тебе дана: ешь ее и не морщись. Будь всегда весел, иногда и сгрустни для разнообразия -- только не будь мокрою курицею. Стреляй, ешь, пей, читай, переводи, пиши, гуляй -- разве этого мало? Надобно только каждую минуту быть занятым -- чем бы то ни было -- вот и все. Поезжай в Италию: знатная земля, меня и самого так вот и тянет туда: в одном ухе кричит поезжай, в другом не езди, пропадешь, как курица. А я поеду, ей-богу, вот так-таки и поеду. Денег нет, да судьба даст, а не даст -- я скажу ей -- не нужно: ей же будет досадно. Ты уведомляешь меня, что тетка Мишеля назвала его за столом, с необыкновенным чувством и выражением, дураком и что с этим большая часть публики была согласна; я пристаю к большинству -- большинство никогда не обманывается. Поцелуй трижды Петра и скажи ему, что сочиненная им мне настойка ни к черту не годится: от нее у меня сделалась постоянная боль под ложечкою, которая теперь проходит, как я перестал пить. Нельзя ли придумать другого пьянства? Все пьют, отчего же я, черт меня возьми, не пью, разве они лучше? Пиши ко мне чаще: я теперь совершенно один. Я буду тебе отвечать, и каждое письмо мое будет наполнено разными остроумными колкостями насчет Мишеля.

Твой В. Б.

  

36. И. И. ПАНАЕВУ

10 августа 1838. Москва

Москва. 1838 г. Августа 10.

   Любезнейший Иван Иванович! Долго ждал я Вашего письма, ко мое долгое ожидание было с избытком вознаграждено: Ваше письмо показало мне, что я приобрел еще спутника на пути жизни к одной цели1. Я не умею понимать ни любви, ни дружбы иначе, как на взаимном понимании истины и стремлении к ней. Уверен, что когда с Вами увидимся, то возможность осуществится и стремление к дружбе сделается дружбою. Не нужно больше слов -- пусть все развивается само собою из времени и обстоятельств. Для зерна нужна земля, чтоб сделаться деревом; для дружбы, как и для всякого чувства,-- возможность дружбы. Я сказал, что я разумею под возможностию: для нас эта возможность уже слишком ясна -- остальное довершит время.
   Вы пишете, что желали бы видеть меня издателем журнала с 3000 подписчиков, а я бы охотно помирился и на половине: "Телеграф" никогда не имел больше, а между тем его влияние было велико. "Библиотека для чтения" издается человеком умным и способным2, и издается им для большинства, и потому очень понятен ее успех. Журнал с таким направлением, которое я могу дать, всегда будет для аристократии читающей публики, а не для толпы, и никогда не может иметь подобного успеха. Но я не знаю, почему бы мне не иметь 1500 или около 2000 подписчиков. Но видите ли: для этого нужно объявить программу перед новым годом, а не в марте или в мае, и программу нового журнала с новым названием, потому что воскресить репутацию старого, и еще такого, как "Наблюдатель", так же трудно, как восстановить потерянную репутацию женщины3. Сверх того, в Москве издавать журнал не то, что в Петербурге: в нашей ценсуре (московской) царствует совершенный произвол: вымарывают большею частию либеральные мысли, подобные следующим: 2X2 = 4, зимою холодно, а летом жарко, в неделе 7 дней, а в году 12 месяцев. Но это бы еще ничего -- пусть марают, лишь бы не задерживали4. VI No мог бы выйти назад тому две недели, но 5 листов пролежали больше недели в кабинете Г<олохвастова>. Снегирев и сам мог бы вычеркнуть все, что ему угодно, но он хочет казаться пред издателями добросовестным, а перед начальством исправным, а мы должны терпеть5. В 6 No я поместил переводную статью "Языческая и христианская литература IV века. Авзоний и св. Паулин";6 языческой и христианской и святого ценсор нам не пропускает,-- каково Вам покажется? Вы знаете, что владелец "Наблюдателя" -- Н. С. Степанов; у него есть все средства, сверх того -- хорошая своя типография. Если бы ему позволили объявить себя издателем, как Смирдину, начать журнал с нового года и в 12 книжках, как "Библиотека для чтения) и "Сын отечества",-- то дело бы пошло на лад. Эти три обстоятельства: объявление имени издателя, который по своим средствам может иметь право на кредит публики, новый план журнала и настоящее время для его начала -- могли бы дать содержание для программы и из старого журнала сделать новый. Конечно, если бы к этому еще позволили переменить его название -- это было бы еще лучше, но на это плоха надежда. Еще лучше, если бы ко всему этому мне позволили выставить свое имя, как редактора, потому что В. П. Андросов охотно бы отказался от журнала и всех прав на него7. Но зачем говорить о невозможном? По крайней мере, мы хотим попробовать насчет первых трех перемен-- имени Степанова, 12 книжек и начала с нового года8. Надо сперва прибегнуть к графу Строгаиову. Пока об этом не говорите решительно никому. Я уверен, когда придет время, и если Вы что можете тут сделать чрез свои связи и знакомства, то сделаете все.
   Ваши вкусоводители9 точно люди добросовестные и благонамеренные -- они немножко и дерут, зато уж в рот хмельного Ее берут 10. Шевырев -- это Вагнер. Он на лекции объявил, что любит букву...11 Хочу написать историю русской литературы для немцев -- пошлю в Германию к Аксакову, он переведет и напечатает. То-то раззадорю наш народ. Уж дам же я знать суфлеру Кёнига!12
   Я понял, о каком великом драматическом гении пишете Вы ко мне: этого гения я разгадал еще в 1834 г. У меня очень верен инстинкт в литературных явлениях; издалека узнаю птицу по полету и редко ошибусь...13
   Совершенно согласен с Вами насчет философских терминов, что делать -- погорячились и. Говорите мне правду смело, только этим Вы можете доказать мне свое дружеское расположение. Первая Ваша правда мне понравилась, но оговорки были напрасны. Кланяйтесь от меня Николаю Ивановичу Надеждину15. Рад, что Вам поправился Аксаков 16. Это душа чистая, девственная и человек с дарованием. Когда Вы приедете в Москву, то увидите, что в ней и еще есть юноши. Как жаль, что Бакунин живет в деревне! Как мне хотелось познакомить Вас с ним. Но я познакомлю Вас с В. Боткиным, которого музыкальные статейки, вероятно, Вам понравились. Он же перевел "Дон-Жуана" Гофмана и переделал статью "Моцарт) 17. Еще я познакомлю Вас с Клюшниковым -- очень интересный человек. Элегия в IV No "Опять оно, опять былое) -- его. Стихотворение Красова "Не гляди поэту в очи" не относится ни к Пушкину и ни к кому18, а его "Дума" относится к Жуковскому. Понравилась ли Вам повесть в 1 No? Она принадлежит Кудрявцеву, автору "Катеньки Пылаевой" и "Аптонины"19. Это человек с истинным поэтическим дарованием и чудеснейшею душою. И с ним я познакомлю Вас. Он дал мне еще прекрасную повесть "Флейта"20. Странно, что Вы прочли еще только два No "Наблюдателя", когда их вышло уже пять. Роман Степанова разругаю, потому что это мерзость безнравственная -- яд провинциальной молодежи, которая все читает жадно. Если бы это было только плохое литературное произведение, а не гнусное в нравственном смысле, то я уважал бы пословицу -- de mortuis aut bene, äut nihil {о мертвых или хорошо, или ничего (лат.). -- Ред.}21. Благодарю Вас за обещание резного товара -- жду его с нетерпением -- нельзя ли поскорее22. Харьковский профессор Кронеберг изъявил свое согласие на участие. В 6 No его статья "Письма"; статья очень невинная, но ужаснувшая нашего цензора23. Читали ли Вы в 5 No статью "О музыке"? Таких статей не много в европейских, не только русских журналах. Серебрянский -- друг Кольцова, который и доставил мне статью24. Представьте себе, что этот даровитый юноша (Серебрянский) умирает от изнурительной лихорадки. Очень рад, что Вам понравилась моя статья о "Гамлете". В 3 No самая лучшая; я сам ею доволен, хотя она и искажена: Булыгин вымарывал слово святой и блаженство, а на конце отрезал целые пол-листа25. Напишите, как Вам понравилась моя статья об "Уголино"26. Жаль Полевого, но вольно ж ему на старости из ума выжить. Что там за гадость такую он издает. "Библиотека для чтения" во сто раз лучше: для большинства это превосходный журнал. Нет ли слухов о Гоголе? Как я смеялся, прочтя в "Прибавлениях", что Гоголь, скрепя сердце, рисует своих оригиналов. Во время оно и я сам то же врал...27 Скажите мне, что за человек Струговщиков? У него есть талант, он хорошо переводит Гете, по крайней мере, получше во 100 раз Губера, который просто искажает "Фауста". И не мудрено: он понимает Вагнера -- как классика, а Фауста -- как романтика. Я хочу растолковать ему, что он врет28. Если Вы знакомы с Струговщиковым, то попросите у него чего-нибудь для меня; я с благодарностью (разумеется, невещественною) поместил бы29. Уведомьте меня, что за человек Бернет? У него есть талант, который может погибнуть, если он не возьмется за ум заблаговременно30. Я желал бы с ним познакомиться. Обещался мне Ф. Кони отдать для цензуры г. Корсакову две статьи, но что-то о них ни духу, ни слуху31. Не знаете ли Вы чего-нибудь об этом? Прощайте. Жду от Вас скорого ответа и с нетерпением ожидаю Вас самих в Москву. Я и сам собираюсь в Питер и весною думаю непременно побывать, если будут средства32.

Ваш В. Белинский.

  

37. В. П. БОТКИНУ

12 августа 1838. Москва

Москва. 1838. Августа 12 дня.

   Любезный Васенька -- 100 поцелуев тебе в лысину за твое милое письмо. Знаешь ли, что в отсутствии я еще больше полюбил тебя, и потому твое письмо, длинное, против твоего обыкновения и лени, подарило меня сладкою минутою 1. Что нужды, что ты пишешь мне в нем почти об одной музыке: общее во всем дает себя знать, где только есть оно. Жду твоего возвращения в Москву, как светлого праздника, крепко, крепко обниму тебя, друга, брата души моей!..
   Друг, ты несправедлив к себе, да уж, видно, так суждено богом, чтобы все порядочные люди и хвалили и бранили себя невпопад. Не отрицаю тех достоинств, которые ты приписываешь мне, но не хочу говорить о себе, боясь быть или пристрастным, или несправедливым к себе. Никто из нас не знает самого себя. Это самосознание есть удел действительности, а мы все идеальны, пошло идеальны, и, сверх того, отвлеченны. Друг! уединение -- святое дело! Оно подвинуло меня вперед: я еще очень много глубоко почувствовал то, что недавно выговаривал, как конечное определение рассудка. Но все это еще не то, чего надо. А надо действительности, которая бы могла удовлетворить. На действительность я смотрю практически, как на твердость духа, вследствие равенства самому себе. Знанию, науке -- решительно кланяюсь, но учиться или заниматься для полности духа готов, и при маленьком интересе готов на принуждение, на усилие воли. Признаю торжественно элемент воли, но не тот, против которого недавно так горячо вооружался. Все дело в том, чтобы ловить истину в ее целости, в конкретном единстве всех ее сторон, так, чтобы одна сторона не только не отрицала другой, но необходимо условливала ее. Работаю тяжко, по целой неделе не одеваюсь -- все жаль оставить свою любезную комнату и тихий труд, целитель больной души. Но все еще много ленюсь, предаваясь фантазиям, часто в лице моем видны размышление и физиономия. Ох, эти фантазии, черт бы их взял! Но как много еще дают они мне. Но я не даю себе распускаться и иногда умею ловко прибрать себя в ежовые рукавицы. Что бы ни было, а уж сделаю из себя рабочую машину, хотя бы это стоило чахотки. Видно -- кому чины, кому палаты, а мне все новые заплаты на старые штаны. Спасибо и за то. Труд -- единственный выход. Нынче разобрал кое-как главу из "Вильгельма Мейстера". Чудо, прелесть! Мне начинает нравиться приискивать в словаре слова и посредством немногих данных и собственных соображений доискиваться до их таинственного значения. Надеюсь превзойти Вагнера2. Не тужи, Васенька, поживем подольше -- будем дураками.
   Всего не могу пересказать в коротком письме. Много нового внешнего, связанного с внутренним, и во внутреннем беспрестанные новости. Я узнал, что и я люблю и ненавижу вместе. Да, поверхность озера души моей тиха и светла, а на дне черти. Все это высказывается больше непосредственно -- чрез физиономию и размышление. Например, когда я прочел в твоем письме, что тебя вывело из дисгармонии воспоминание о "Sonate pathétique" {"Патетической сонате" (Бетховена) (фр.). -- Ред.}, где-то разыгрываемой робкими пальцами -- то мне стало неловко, как будто сказал какую глупость или проигрался, словом,-- не хорошо. О, Васенька, понимаю возможность лютой к тебе враждебности, если бы ты был счастлив3. Я прочел "Клавиго" Гете4 -- его превозносил Мишель, и еще некто5 советовал мне прочесть. Только теперь вспомнил я, что мне хотелось найти пьесу дрянною. Так как я читал ее духовными очами и еще с таким чувствованыщем против нее, то и не мудрено, что, может быть, не мог вникнуть. Мне было весело, теперь только сознаю это, что она не произвела на меня никакого впечатления. Тотчас разругал ее и Гете и послал к Мишке письмо6. Вдруг приходит Катков и говорит, что если б Гете ничего не написал, кроме "Клавиго", и тогда бы он был великий гений. Иван Петрович говорит почти то же. Видно, что я срезался -- посрамихся окаянный. Мне было то досадно, то весело, что я срезался: черти возятся на дне озера7. Мишель теперь напишет целую книгу в 12 томах, чтобы доказать мне мою ошибку, не подозревая того, что ларчик просто открывался8. Пусть пишет -- мы прочтем. Прочел я "Майрата", половина повести (где Серафина) -- прелесть; остальное -- чистая болезненная субъективность Гофмана. Кудрявцев написал мне новую повесть "Флейта" -- чудную вещь9. Она вырвала у меня несколько слез и расшевелила Змею воспоминания 10. Целый деиь душа моя плавала в музыке, состоявшей немного из диссонансов, но больше из грустной мелодии. (Мои музыкальные сравнения похожи вот на что: блондин или брюнет, нет, больше шантрет11.) Эту повесть пошлю в Прямухино. Туда поехала Н. А. Беер; я с нею виделся и вспомнил много, и сердце понеслось далече. Да, поверхность озера гладка и чиста, но на дне кроются тайники бурь. От Мишеля, кроме известного тебе письма 12, пока одни обещания писать. Что-то напишет. С Кудрявцевым больше и больше схожусь. Он доказывает мне возможность для меня новой дружеской связи во всей обширности этого слова. Чудная, глубокая душа!
   Друг, ободрись, не думай о себе. Поговорю о тебе. Наши похвалы друг другу имеют святой смысл. Это не размен комплиментов, не задобривание чужого самолюбия в пользу своего. Нет, это поддержка одного другим, святой союз, основанный на стремлении к истине. Послушай, как я думаю о себе. Глубоко уважаю Мишеля, потому что глубоко понимаю его. Душа бездонная, как море! Но это не заставляет меня уже оборачивать на себя. Я знаю, что если в нем много такого, чего нет во мне, то и во мне много, чего нет в нем. Каждый из нас есть своего рода самобытное явление, и нам не должно делать себя аршином другого, и другим мерить себя: это фальшивая мера. Кто из нас больше, кто меньше -- этого никто из нас не может знать. Разумеется, что он кажется мне выше меня, и очень может статься, что это так в самом деле. Всякий человек с истинным достоинством меньше всего видит свое собственное достоинство и больше всего недостатки, а в отношении к другим наоборот. Я в тебе вижу (и очень ясно) то, чего не вижу ни в себе, ни в Мишеле, другими словами, вижу в тебе самобытное явление -- тебя; ни каждый из нас тебя, ни ты каждого из нас заменить (то есть сделать ненужным) не можем. Скажу тебе откровенно, что у нас есть большое перед тобою преимущество -- наши возможности (а не действительности, которых ни у кого из нас нет) более определились; каждый из нас яснее, нежели ты, видит свою дорогу. Но что касается до элементов -- я отказываюсь их мерить. У меня не было ни одной минуты, в которую бы я сознал свое над тобой превосходство в этом отношении; а я не перед всеми бываю так скромен. Напротив, много было минут, в которые я живо сознавал твое надо мною преимущество. Не стыжусь сказать, что в последнем случае я мог ошибаться, то есть признаю возможность ошибки, но точно так же и признаю возможности правды.
   Друг, кто не обинуясь высказывает такие мнения, тому можно поверить. Я встретил в жизни только одного человека, которому безусловно поклонился и теперь кланяюсь и всегда буду кланяться -- ты знаешь, о ком я говорю 13. Потом я встретил еще двух человек, с которыми стать наравне посчитаю за честь 14. Об Иване Петровиче судить не смею: может быть, он всех нас лучше. Больше я никому не кланялся и ни с кем даже не становился вровень. Начинаю думать, что это не обман самолюбия, а сознание истины; думаю так потому, что не стыжусь высказать этого вслух. Прежде я бывал минутами самонадеяннее, но скрывал это тщательно, равно как и минуты самого жестокого разочарования в себе. Результат всего этого -- мои слова должны иметь для тебя вес. Моя дружба (то есть мое непосредственное чувство к тебе) выдержала важную пробу: вспомни нашу бранную переписку с Мишелем. Мне даже смешно, что я так утешаю тебя. Но я понимаю твое состояние и понимаю цену такого утешения, как мое. Я помню, что подобные утешения со стороны моих друзей (и сколько раз от тебя!) выводили меня из отчаяния. Недаром наша дружба так крепка, недаром мы так любим друг друга и так нуждаемся один в другом. Ободрись, ты болен и скоро выздоровеешь. Ты становишься на колени перед моими глубокими интересами: я тебе скажу их -- жажда блаженства в любви -- вот все мои глубокие интересы. Знаю, что есть и другие, столь же сильные, но в них для меня видна какая-то ясность, противоположная таинству жизни. А ты, разве твое брожение не есть требование жизни? Разве ты не страдаешь? Радуйся -- ты страдаешь, а блаженны плачущие -- тии бо утешатся 15. Нет, мой глупый Васенька, в тебе я вижу много, много интересов, больше, чем в себе, и глубже. Не думай, что это может быть опровергнуто моею же мыслию, что я к себе неправ, потому что не могу себя знать. Если я неправ, то кто же поручится за твою правоту, а взаимная наша неправота в этом случае -- добрый знак! В тебе тоже есть черти, по крайней мере, я знаю одного чертенка, который стоит доброго черта и который мне очень не по сердцу. Вот он-то все и крутит. Да плюнь на него. Я с своим бился, бился, а он от рук отбился, и я дал ему волю. Впрочем, от него есть славный ладан -- работа. В минуты отдыха можно давать ему волю кутить, только надо держать его в руках. Пусть бесится, но с позволения. Вот твое положение относительно конторки и анбара 16 -- не знаю, что и сказать, хоть за Иваном Александровичем 17 послать, так в ту же пору. Это уж реши собственным умом, а я только могу сказать, что понимаю всю гадость твоего положения. Это хуже, чем мое учительство, которое ограничивается 9-ю часами в неделю 18. Без субъективного интереса всякое дело -- наказание божие.
   Музыка, музыка, черт с тобою! Хотел бы любить тебя, но должен ненавидеть, потому что ты меня не любишь. Меня не любит все, что я люблю. Пока, впрочем, я мог бы помириться с жизнию, если б одно -- хоть что-нибудь похожее на чувство. Это сведет меня с ума. Я теперь понял источник всех моих страданий, всех зол моей жизни, узнал, отчего я так часто и так низко падал, падаю и буду падать. Это от ложного удовлетворения истинной потребности. Пока не будет для меня хоть сколько-нибудь истинного, хоть временного удовлетворения этой жажды -- заперто для меня царство духа. Мишель тотчас закричит, что не должно ограничивать своей жизни ничем внешним -- да кричи сколько угодно, хоть раздери горло, а я знаю, что знаю. Законы общего одни, но общее является под условием индивидуальности. Надо влезть в мою шкуру, чтоб узнать, чего мне нужно. Только поэтам предоставлена завидная участь вполне высказывать себя, а нашему брату и то хорошо, коли удастся намекнуть.
   Уведомь меня, скоро ли ты приедешь -- буду считать часы и минуты. Сколько новостей! Ух! Стихи Кольцова дрянь19. Кстати новость: Нелепый бранит французов хуже меня, на чем свет стоит: конечный народ20, у которого не было искусства, который не понимает искусства. Каково? Иван Петрович со дня на день становится лучше. Катков -- славный малый, но я всех лучше. К Кронебергу отослал письмо. Прощай.

Твой В. Б.

   В Москве другой уж день как хорошая погода -- право, не лгу. Скоро 12 часов. Небо мрачно, но звезды блещут ярко. С час назад прочел твое письмо21, а вот уж готов и ответ. Завтра пошлется.
   Пора спать и мечтать: чертенок начинает возиться, озеро волнуется.
  

38. М. А. БАКУНИНУ

13--15 августа 1838. Москва

Москва. 1838. Августа 13.

   Друг, Мишель, предчувствия не обманывают: они тайный голос души нашей. Когда я уезжал из Прямухина, мне сильно, очень сильно захотелось в последний раз взглянуть на нее. "Скоро ли мы увидимся?" -- спросила она меня, и я потерялся при этом вопросе; грудь моя сжалась, а на глазах чуть не показались слезы1. Нынешний день я отослал к тебе мое письмо, вместе с письмом Василья;2 после обеда поехал с Катковым к нему. Душа моя перенеслась в Прямухино и глубоко страдала. С Катковым я поехал к Левашевым, от них пришел в половине одиннадцатого; увидел на столе твое письмо. Почему-то я не бросился распечатывать его, хотя давно и жадно ждал от тебя письма. Я раздевался, ходил по комнате, придумывал себе разные дела, которыми надо заняться прежде прочтения письма. Наконец, распечатал, прочел -- в глазах у меня потемнело, закапали слезы...3 Я побежал наверх, к моему доброму князю; 4 для меня было счастием, что подле меня был человек, к которому я мог побежать. "Умерла!" -- вскричал я, бросив ему твое письмо; "письмо из Прямухина! она умерла",-- повторил я. На лице князя изобразилось умиление; он набожно перекрестился и сказал: "Царство небесное!" Друг, я верю твоей вере в бессмертие, верю, что ты теперь находишься в состоянии глубокого созерцания истины. Отчаиваться, мучиться от ее смерти было бы грехом: тихо грустить, молиться -- вот что надо делать. На этой земле она была вестницею другого мира, и смерть ее есть не отрицание, но доказательство этой другой жизни. Смерть знакомого человека всегда наводит на меня суеверный ужас, так что я вечером и ночью боюсь быть один. Только гордость помешала мне заставить спать в моей комнате брата, племянника и мальчика, когда я услышал о смерти Вологжанинова5. Но теперь, теперь меня оскорбило бы присутствие человека. Я чужд страха. Пусть явится она мне во сне, пусть явится она мне наяву: в том и другом случае я увижу кроткое, ангельское лицо, услышу небесный голос, который даст мне веру и надежду, что не тщетны и не призрачны мои порывы к блаженству, что оно будет моим, хотя здесь я и не найду его. Да, ее смерть -- это откровение таинства жизни и смерти. Зачем не был я свидетелем ее последних минут? Нет, не напрасна была моя последняя поездка в Прямухино: 6 я вижу в этом волю неба, доказательство, что и я имею отца, который печется обо мне. Мне надо было усвоить себе это бледное, кроткое, святое, прекрасное лицо, с выражением страдания, не победившего силы духа, силы любви благодатной, этот голос, которого нельзя лучше назвать, как голосом с того света... Да, благодарность небу! я знал, я видел ее,-- я знал великое таинство жизни, не как предчувствие, но как дивное, гармоническое явление. Нет, если несчастие когда-нибудь одолеет меня и я паду под его бременем, я, который некогда видел ее, еще здоровую, прекрасную, гармоническую, полную веры в блаженство жизни, в осуществление лучших, святейших мечтаний души своей, а потом, бледную, больную, и все прекрасную, все гармоническую,-- что я тогда буду? Мишель, слова не клеятся, хоть душа и полна; кладу перо. Скоро полночь. Буду ходить по комнате и мечтать о жизни и смерти. Завтра воскресенье, письма послать нельзя. Может быть, завтра и еще что-нибудь напишу тебе.

В. Б.

   Нет, Мишель не хочу спать, не хочу ходить -- хочу беседовать с тобою, с твоим духом, который невидимо присутствует <при> мне. Я плачу -- слезы льются беспрерывно -- и они святы, эти слезы. Душа моя расширилась, и я причастился таинству жизни. Не страдаю я, а болею, и не за нее -- это было бы грешно, это значило бы оскорблять ее святую тень; нет, мне представляется этот святой старик7, тихо плачущий, кротко несущий тяжкий крест ужасного испытания. О, в эту минуту я стал бы перед ним на колена, как ты пишешь ко мне, я поцеловал бы его руку, обнял бы его колена и пролил бы на них мои слезы. Мне представляется эта бедная мать, которая была чужда для всего остального и не выходила из комнаты своей милой угасающей надежды, любимейшего дитяти своего сердца. Я не сомневаюсь, что Варвара Александровна любит горячо всех своих детей, но в то же время понимаю возможность этой исключительной, субъективной любви к одной из всех. Любовь есть связь из тысячи явных, открытых нитей и миллиона тайных, невидимых. Надо каким бы то ни было образом лишиться для себя любимого человека, чтобы самому для себя узнать силу своей любви к нему. Половина сердца оторвана с кровью, лучшая мечта, самый благоуханный цвет жизни исчез навсегда. Какая потеря -- бедная мать! Передай ей, Мишель, мои слезы, мои рыдания, которые задушают меня. А та, которая не видала ее последних минут, которая отделена была от нее таким пространством, та другая бедная мать, которая с слезами и рыданиями обоймет своего сына, который с изумлением посмотрит на нее и сам заплачет, не зная о чем...8 Я теперь вышел из себя, из этого болезненного созерцания своих утрат, своих страданий, я вижу все твое семейство, еще более соединенное общею потерею, вижу вас всех, грустных, но спокойных, несчастных, но твердых... Мишель, чувствуешь ли ты около себя мое незримое присутствие? Мой милый, как бесконечно, как глубоко люблю я тебя в эту минуту. Не говори мне, что мы разошлись с тобою, не верь этому. Мы живем в одном; нас разделяют частности, призрачности, нас соединяет общее, святое. Крепка наша связь, неразрывна, пока мы будем расходиться только в болезнях наших индивидуальностей. Неужели ты поверил мне, моим письмам, когда я себе ни в чем не верю, когда я беспрестанно перехожу из одного состояния в другое? Но довольно, у меня охоты <нет> говорить о себе. До другого времени. Мишель, если ты в силах это сделать, опиши мне все подробности ее кончины: после подробностей смерти нашего божественного Спасителя для меня всего интереснее, всего священнее подробности ее смерти. У меня были утраты в жизни, и много могил представляется моему воображению в часы грустного раздумья; но истинную, действительную потерю я перенес только одну -- она общая с тобою и со всем твоим семейством.
  

Августа 14 дня.

   Сейчас был у Лангера и принес ему горькую весть -- он принял ее к сердцу. Чудесный человек! Я провел с ним часа два; не нужно говорить тебе о предмете нашего разговора. Кроме того, мы говорили об искусстве и жизни. Лангер глубокая душа! Мне стало легче после беседы с ним. Жена его тоже с участием приняла известие: за это она показалась мне прекрасною. Я ужасно люблю Эдку, и потому в болтовне с ним нашел какое-то грустное удовольствие.
   -- Я опять поеду в Прямухино.
   -- Зачем? к кому?
   -- К Сасе -- к невесте.
   -- Разве ты любишь ее?
   -- Люблю -- она хорошая.
   -- Нет, она не хороша.
   -- Нет, она нарядная.
   -- Нет, не нарядная.
   -- А ты дурак.
   -- Так ты только к ней поедешь?
   -- Нет, и к Титане.
   Бедный Коля страдает золотухою.

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   А, Мишель, так вот в чем был тот выход, о котором мы так часто с тобою толковали! Смерть развязала гордиев узел5. Теперь еще остается узел. Бедный Николай! Ты говоришь, чтоб я не писал <к> нему: мудрено и писать-то! Впрочем, об этом надо подумать. Ведь он должен же узнать 10.
   Во вторник пишу к Боткину. Впрочем, ты и сам написал к нему11. Он будет глубоко огорчен. Но ни Лангер, нп он не погут так живо чувствовать этой потери, как я. Они жалеют о ней больше за живых, они не знали ее самое, как знал ее я. Для меня она -- святая. Я не могу и не умею определить моего к ней чувства. Любить, как сестру -- здесь не имеет смысла: без родства и родственных отношении нет родственной любви. Всему должно быть свое имя. Сверх того, в моем чувстве слишком много благоговейного, святого обожания. Она для меня -- святая: лучше не умею выразиться. Но и это не все выражает. Без тоски и горя, без ревности и жажды взаимности -- нельзя больше любить женщину. И нет более прекрасного, живого образа -- осталась прекрасная, поэтическая мечта. Не оставляй же меня, прекрасная мечта, будь яркою звездочкою, когда небо будет облачно, а дорога незаметна и сбивчива!
   Досадно, что из писем нельзя дознаться, которого числа скончалась она. Конечно, тебе было не <до> аккуратности в числах. Как досадно, что письмо можно послать только завтра. Пиши, Мишель, ко мне, пиши больше и подробнее. Если мои письма могут доставить тебе какую-нибудь отраду -- скажи: ты часто будешь получать их. Видно, у вас все хороши, если Петр нужен как лекарь. Я теперь с маленькою лихорадкою буду распечатывать твои письма.
  

Августа 14.

   Вот уже в четвертый раз принимаюсь говорить с тобою, любезный Мишель; и не знаю, о чем говорить, и не могу победить желания говорить -- так и тянет. Значит, что мне хотелось бы видеть тебя, быть вместе с тобою, сидеть и глядеть на тебя, не говоря ни слова. Воображаю живо твое грустное лицо, которое я всегда так любил. В грусти особенно являешься ты мне просветленным и сливаешься духом с моим духом. В грусти ты имеешь для меня особенное значение, которого не умею выразить. В грусти твое лицо для меня -- модель для скульптора, для живописца. Если бы кто на портрете твоем уловил бы это таинственное выражение, столь мне знакомое и любезное, я был бы счастлив, имея такой портрет. Это был бы истинный портрет -- портрет духа твоего. Бывая в грусти, ты молчишь, но твое молчание так много, так красноречиво говорит мне, или поешь -- и тогда твое пение для меня лучше всякой музыки в мире. И таким-то теперь я вижу тебя. Но я знаю, ты теперь тверже, сильнее, нежели когда-нибудь; ты за всеми смотришь, читаешь в душе всех, и твое сильное слово готово поддержать всякого. Ты глубоко веришь в жизнь, я это знаю. И потому-то ты имеешь над всеми такое влияние. В минуты слабости я ни к кому бы не обратился, кроме тебя. Да, Мишель, что за дело до разности мнений: мы разно думаем, но думаем об одном, а это одно -- бытие в его бесконечности, его глубине. Зачем нам радоваться, что полемический тон для пас уже невозможен: это хорошо, как шаг вперед, но это еще бедная сторона нашей дружбы. Она дала нам лучший дар: когда удар судьбы отяготеет над одним из нас, мы все принимаем его, все чувствуем его на себе и страдающий не остается один в своем страдании, непонятый, чуждый участия. И зато удары судьбы не лишают нас силы, но дают нам новую. Вот самый пышный, самый благоухающий цвет нашей дружбы. Мы так богаты ее дарами, что не должны обращать внимание на многое, что других могло бы обогатить. Что же до разности мнений,-- это не должно смущать нас. Теперь, когда я нахожусь в созерцании бесконечного, теперь я глубоко понимаю, что всякий прав, и никто не виноват, что пет ложных, ошибочных мнений, а есть моменты духа. Кто развивается, тот интересен каждую минуту, даже во всех своих уклонениях от истины. Пошлы только те, которых мнения и мысли не есть цветки, плоды их жизни, а грибы, нарастающие на деревах. Но и эти люди мне теперь не пошлы, даже не жалки, в презрительном смысле этого слова. Им не дано жить в духе; я не скажу, чтобы их должно было жалеть, но смело скатку, что их не должно ни ненавидеть, ни презирать. Когда в душе любовь, то и их любишь объективно, как необходимые явления жизни. Зачем же говорить, как о чем-то грустном и неприятном, о разности понятий с человеком, родным себе по духу? Я знаю, что должно стремиться к освобождению от субъективности, к абсолютной истине; но что ж мне делать, когда для меня истина существует не в знании, не в науке, а в жизни? Много прошел я курсов, но важнейшим была первая поездка в Прямухино. С этих пор я подружился с тобою и с этих пор тебе известна моя жизнь, как своя собственная. Ты сообщил мне фихтеянский взгляд на жизнь -- я уцепился за него с энергиею, с фанатизмом; но то ли это было для меня, что для тебя? Для тебя это было переход от Канта, переход естественный, логический; а я -- мне захотелось написать статейку -- рецензию на Дроздова 12, и для этого запастись идеями. Я хотел, чтобы статья была хороша -- и вот вся тут история. По возвращении с Кавказа я был в переходном состоянии,-- дух утомился отвлеченностию и жаждал сближения с действительностию. Катков, сколько мог, удовлетворил этой жажде Гегелем 13, но тут был нужен ты -- и ты снова явился мне провозвестником истины. Это был второй курс 14. Он беден результатами -- это все были семена. Третий мой курс 15 -- помнишь вечер у Боткина? Все существо мое было потрясено в основании. В первый раз луч счастия, блаженства рассеял для меня мрак лжи, в первый раз через счастие узнал я много истины; но не такова моя натура, чтобы черпать в источнике счастия. Наступила новая эпоха: я горько плакал в полночь, когда все спало, и узнал много, чего но мог узнать через мое полусчастие, которое предшествовало этой эпохе. Вчера я опять горько и вместе сладко плакал, тоже в полночь -- и это для меня новый курс, новый шаг на пути к истине. Видишь ли, как я создан: каждый мой прогресс в знании есть повесть, прекрасная, поэтическая повесть, то с улыбкой, но больше с слезами и страданием. Ты скажешь, что и у тебя так же точно; так же, Мишель, но только и не так. Я слишком далек от мысли, чтобы ты жил в отвлеченном мышлении, вне созерцания, вне влияния со стороны жизни: так живут Вагнеры; 16 но для тебя жизнь есть поверка знания, для меня наоборот. Другими словами, ты в жизни рационалист,-- я эмпирик. Тебя может удовлетворить истина только в сознании, в философском развитии, в логической необходимости; для меня она существует не столько сама по себе, сколько по способу, каким она мне представляется: если она блестит радужным блеском образа -- она моя. Ты никогда не доволен своими определениями; я удовлетворяюсь ими вполне. Ты всегда хлопочешь, всегда беспокоишься о дальнейшем проникновении в истину; я перехожу в новый момент тогда только, когда старый опошлится, начнет тяготить, мучить меня. В этом случае ты похож на деятельного купца, который чем богатее, тем больше хлопочет о приобретении; я бедный лентяй, которого голод и холод заставляет взяться за дело, но который, пока есть в кармане грош, не тронется с места. Две разные натуры, два разные явления. Я теперь делаю, работаю, тружусь; но что меня заставило приняться так деятельно за занятие? Не думай, чтобы живое стремление к истине -- нет: сознание, что теперь я погиб без дела -- ты знаешь вследствие чего. Я деятельно занимаюсь журналом, но это оттого, что природа дала мне живую потребность практической деятельности, или, лучше сказать, это от того, чего я не знаю. Это так -- мне нравится, мне хочется -- больше ничего. Такова моя индивидуальность, и другою быть не может. Ты доходишь обстоятельствами жизни до известного определения и тотчас исследуешь, не субъективное ли оно, и хлопочешь, как из него выйти; я сижу в нем -- и доволен. Когда ты отдохнешь и будешь в состоянии отвлечься от тоски по своей утрате, то перечти снова все мои письма после отъезда из Прямухина в последний раз: ты увидишь в них бездну противоречий, которые выразили мое состояние. У меня все убеждения сильны, потому что я не умею вполовину предаваться им. Иная мысль живет во мне полчаса, но как живет? -- так, что если сама не оставит меня, то ее надо оторвать с кровью, с нервами. Нет, друг мой, всякий человек есть явление самобытное и может жить и развиваться только в своих формах. Я много раз принимал истины по их логической необходимости, но они никогда не входили в меня глубоко, а приставали ко мне снаружи и тотчас отваливались. И потом жизнь наводила меня на них -- и тогда я принимал их с убеждением. Тебя должно удивлять, что я иногда с важностию и многословием говорю в моих письмах о таких истинах, о которых ты часто от меня слышал: это значит, что я почувствовал то, что прежде только знал -- а в этом большая разница. Я понимаю, что значат твои слова, что ты прежде только знал о существовании нашей дружбы, а теперь чувствуешь это. Тебе логика и диалектика помогает конкретно уловлять истину, а мне для этого нужно или непосредственное передавание, или влияние внешних обстоятельств, которое бы настроило мой дух к состоянию, в котором можно принять эту истину. Я совершенно понимаю, почему ты не хочешь писать в журнале; ты прав, и я глубоко уважаю тебя за это. Но я -- если я соврал -- мне это нипочем; меня одно может привести в дисгармонию -- это если я холодно соврал. В этом случае мы с тобою всегда будем расходиться; но это не помешает нам любить и уважать друг друга. Знаешь ли, что ты для меня особенно интересен именно этою противоположностию мне? Ты дополняешь меня, и потому я не умею представить себя без тебя. Между нами слово мы имеет особенное значение. Наше мы образует какое-то Я. Пора нам в этом убедиться. Бога ради, прошу тебя остерегаться делать о мне заключения по моим письмам. Если бы тебе случилось получить от меня письмо решительно пошлое -- не бойся за меня: я не могу оставаться долго во лжи, и может случиться так, что в то время, когда ты читаешь мое пошлое письмо, я пишу прекрасное, которое опровергает первое. Все дело в том, что для меня момент есть истина, далее которой я ничего не могу и не хочу видеть. Такие истории с тобою в отношении ко мне, думаю, не раз уже случались: одно письмо тебя охолождало ко мне, оподозривало в твоих глазах всю мою сущность, а следующее за тем возбуждало ко мне большую любовь, большее уважение. О человеке нельзя заключать скоро, и я -- могу сказать это без гордости,-- я именно из таких людей, которые не поддаются скорым заключениям. В нашу полемическую переписку я получил хороший урок в отношении к тебе: я хотел сделать тебе решительное определение, решительный приговор -- и жестоко срезался, так срезался, как во всю жизнь не срезался и как никогда уже не срежусь. Я не стыжусь об этом вспомнить, потому что этот урок мне был нужен.
   Вчера вечером, как нарочно, сделалась дурная погода после прекрасного дня. Весь день нынче небо серо, и дождь падает мелкими каплями. Я рад этой погоде: она гармонирует с состоянием моего духа, и я желал бы, чтоб она продолжалась, я желал бы, чтобы вся природа являлась в трауре и сетовала вместе со мною. Да! вспомнил!
   Я знаю, на чем мы разошлись. Послушай: знание всякой действительности, чтоб быть истинным, должно быть конкретно; конкретность состоит в единстве всех сторон, всех элементов предмета, в примирении всех его противоположностей, так чтобы одна противоположность условливала другую и гармонировала с нею необходимо. То, на чем мы разошлись, кроме нормальности, о которой речь впереди, того я не понимаю конкретно. Мне вдруг представились новые стороны, которых я прежде не видел. Эти стороны выдались, отделились от целого -- и одно уж это показывает, что я впал в отвлеченность. Я тем живее понимаю это, что тут вмешалась моя личность, что тут говорили раны, глубокие раны моей души. Все это я знаю, но б то же время новые стороны действительны; надо примирить их с прочими, слить, а этого-то я пока и не могу сделать. Я уже переходил и к старому понятию, но вижу, что оно уже не годится и что к старому не возвращаются, но старое делают новым. Это я понимаю; но в то же время я глубоко убежден, что и ты в противоречии, в отвлечении, что и ты не схватил действительности и колеблешься. Когда-нибудь мы об этом поговорим побольше. Предмет наших рассуждений для меня свят, и ты не можешь опасаться, чтобы я оскорбил твое чувство. Я не почитаю себя обязанным во имя дружбы выговаривать то, чего не хочется выговаривать; но когда это потребность души -- то нам стыдно и грешно молчать,

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   Нынче я вспомнил о билетце ее руки и посмотрел на него. Отыщу завтра письмо твое, в котором есть приписка ее руки17,-- все это было для меня святынею, но теперь получает большее значение. Вспомнил я многое -- все разговоры ее со мною, все, что было в 36 году. Вспомнил я эти тонкие, посинелые уста, которые пели:
  
   Не жилица я
   На белом свету.
  
   Вспомнил я этот грустный голос, в котором слышно было такое тихое и такое глубокое Sehnsucht {чувство томительной тоски (нем.). -- Ред.} и который, бывало, раздавался из круглой комнаты,--
  
   Полетела б я до тебе,
   Да крылец не маю,
   Чахну, сохну -- все горую,
   Всяк час умираю 18.
  
   Да, много воспоминаний, но они не рвут души, а грустно услаждают ее. Одно в них мучительно: хотелось бы еще хоть на минуту возвратить прошедшее. Оно так живо, как будто вчера было, а уже невозвратимо. Не умею высказать тебе моего ощущения. Странное дело, Мишель, когда я распространился о себе, на меня напал суеверный страх; я с волнением и боязнию осматривался, каре бы страшась увидеть ее... шорох... шум дождя -- все пугало меня. Теперь я возвратился к ней -- и страх оставляет меня. Скоро полночь. Прощай. Завтра допишу и отошлю письмо. О, Мишель, если мое письмо подарит тебя хоть каким-нибудь приятным ощущением -- скажи мне: ты сделаешь меня счастливым. Я боюсь, чтоб мое слово не охолодило моего чувства. Это было бы оскорблением ее святой тени. Мишель -- ты прав: она жива, если жизнь не призрак, а жизнь не призрак!

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15 августа.

   Погода разгуливается, небо проясняется -- утро чудесное, но для меня оно не изменило своего грустного, траурного характера. Все мои занятия прерваны, и если у меня в душе гармония, то внешним образом я в разорванности. Ни за что не хочется приняться -- все бы думал о ней или писал к тебе. Только вчера вечером догадался я, что она умерла 6 числа, в прошлую субботу, и я несколько раз читал записку Петра. Теперь мне другое пришло на ум: мне представились похороны; она лежала в гробу, как живая, и на ее умершем лице выражалась та же гармония, то же спокойствие, та же грация, которые были ее отличительными свойствами при жизни; но вы все, оставшиеся в живых -- твои сестры, Мишель,-- они женщины -- у них способность любить так сильна -- мне страшно подумать. Когда опустили гроб в могилу и начали засыпать его землею и вам всем представилось, что у вас насильно отнимают милое, кровное... Да, все это мне представилось теперь в первый раз и очень живо, и изо всех Александра Александровна выдалась -- и что же? там, где я поставил черточку, там остановился, чтобы прочесть письмо Ефремова 17, которое вот сию минуту получил. Из него я узнал, что не относя -- за кого надо было бояться больше всех. Но время лучший лекарь душевных болезней -- тихая грусть сменит глубокое страдание, а свободный дух восторжествует над расстроенностию организма. Теперь пиши чаще -- всякое твое письмо будет пугать меня, но молчание будет убивать медленною смертию. Посылаю письмо на почту.
  

39. М. А. БАКУНИНУ

16--17 августа. 1838. Москва

Августа 16.

   Поутру отослал я свое большое письмо на почту1, а теперь, вечером, принимаюсь за другое к тебе, любезный Мишель. Друг, я ничего не могу делать, как только думать о ней или писать к тебе. Душа рвется к тебе, к вам. Ведь я твой, ваш, родной всем вам? -- Да, теперь я узнал это очень ясно. Ваша потеря -- моя потеря. Я разорван; не могу ничего делать; все интересы замерли в душе. Письмо Ефремова от мертвой оборотило меня к живым 2. Я вижу все твое семейство. Отец тихо плачет,-- слезы старца -- это что-то рвущее душу и вместе умиляющее ее. Святой старик!3 Мать смеялась -- это победа горести над духом, высшее страдание, какое только может быть. А сестры? -- одна несколько дней не принимала пищи, была в каком-то обмороке; другая удивляла своею твердостию. Друг, я понимаю, вполне понимаю, глубоко понимаю то и другое явление. Это одна и та же сила -- только в различных проявлениях. Сила страдания происходит от силы любви, и от той же любви происходит и сила терпения. Здесь и слабость, с одной стороны, и сила, с другой,-- были одно и то же явление. Страшно подумать, что это может иметь влияние на их здоровье, и без того слабое и расстроенное. Вот теперь-то, Мишель, употреби все силы, все свое влияние на них. Не верь уверениям в спокойствии. Для них долго не будет спокойствия. Боже, какой день, какая картина! И мне жаль, что я не был там, мне кажется, что я бы должен был у вас быть эти дни. О, как бы я упился страданием и с какою бы ненасытимою жаждою пил его! Зачем был на земле этот светлый божий ангел? Неужели только для того, чтобы научить людей страдать с терпением? Люди от этого в выигрыше, а она? -- Живет общее, гибнут индивиды. -- Но что же такое это общее? -- Сатурн, пожирающий собственных детей? Нет, без личного бессмертия духа жизнь -- страшный призрак. Нет, она жива и блаженна, и мы будем некогда живы и блаженны. Мишель, не думай, чтобы я предавался крайности. Нет, понимаю цену здешней жизни. Жизнь везде одна и та же. Вопрос не во времени, не в месте, а в конечности или бесконечности. Если мое Я вечно -- для меня <нет> страданий, нет обманутых надежд; не там, но всегда -- вот в чем мое вознаграждение. Человек и при жизни умирает несколько раз. Разве ты теперь то самое, чем был назад тому 20, 10, 5 лет; по разве ты помнишь переходы из одной эпохи в другую? Ты не видел, не замечал, как ты рос физически, по вырос и очень помнишь, даже и теперь, что был гораздо ниже. Сформировалась организация -- дух начал жить -- и бесконечное развитие, без перерывов, без переходов, но с изменениями, с переходами, будет жизнию. И кто здесь, на земле, исчерпает всю жизнь, по крайней мере, в той возможности, какая дана ему? А где мера этой возможности? Бесконечное -- бесконечно в буквальном смысле. Нет старца, который бы взял с жизни полную дань. Что же юноша? цветок, еще не распустившийся. И будто его жизнь кончилась? Кончилась,-- ничто не кончается, но бесконечно развивается, бесконечно углубляется в жизнь. Нет смерти! Только мертвые хоронят мертвых. Воскресение Христа не есть же символ чего-нибудь другого, а не воскресения... Наша конечность боится этих вопросов и оставляет их в стороне. Чего мы не постигаем, то для нас -- темные места в Евангелии. Нет, там каждая буква есть мир мысли, и скорее прейдет земля и небо, нежели одна йота из книги жизни! Я верю и верую!
   Сколько было мест, которые с торжествующею улыбкою пропускала без внимания, как бы из снисхождения, наша конечная, слепая мудрость и в которых после мы же открыли глубокий смысл. Что мы знаем? Не скажу, что ничего -- ничего не знать, значит ничего не иметь, а мы уже приобрели нечто. Чего мы еще не постигли -- то должно быть свято: придет время, прозрим и непонятное будет понятно и неестественное естественно. Да -- жив бог -- жива душа моя! Тайны гроба -- самые глубокие тайны; их разрешает смерть, и смерть не должна быть страшна.
  

Августа 17.

   Засыпаю с мыслию о ней и просыпаюсь с тем же. Иногда и сам не знаю, о чем именно думаю, знаю только, что о чем-то важном, вникаю -- и вижу, что все о том же. Что бы я ни делал, хотя бы даже, забывшись, засмеялся над шуткою Ивана Петровича -- у меня всегда на сердце какая-то грустная arrière pensée {задняя мысль (фр.). -- Ред.}. Петр теперь решительно ближе ко мне, чем его брат. С Петром у меня теперь есть неисчерпаемое общее. Всю жизнь будет он мне рассказывать одно, и никогда не расскажет4. Нынче посылаю письмо к Боткину, где зову его скорее в Москву и жалуюсь на мое одиночество5. Да, я теперь один, совершенно один, и это минутами тяготит меня. Князь6 и Клюшников вчера вздумали доказывать мне, что грусть по милом умершем есть эгоизм. Чудаки! Я заговариваю с ними о ней, но не клеится как-то и становится досадно на себя. Ведь они не знают ее, не знают их, одним словом, не знают Прямухина, а его содержание, его сущность не передаваемы; надо видеть само явление, чтобы понять его. Знаешь ли что: мне жалко тех людей, которые не видели ее. Мне все представляется, что живых они, может быть, и увидят; но кто же даст им верное понятие о ней? Явление для меня есть по преимуществу откровение истины; никогда мысль не откроет мне того, что открыли явления. Кто не видел этих явлений, тот мне представляется как будто лишенным духовного крещения, и я прощу ему неверие в жизнь.
   Пушкин как будто знал ее; эти стихи написаны как будто к пей:
  
   Увы, зачем она блистает
   Минутной нежной красотой?
   Она приметно увядает
   Во цвете юности живой...
   Увянет! Жизнью молодою
   Не долго наслаждаться ей;
   Не долго радовать собою
   Счастливый круг семьи своей,
   Беспечной, милой остротою
   Беседы наши оживлять
   И тихой, ясною душою
   Страдальца душу услаждать.
   Спешу в волненья дум тяжелых,
   Сокрыв уныние мое,
   Наслушаться речей веселых
   И насмотреться на нее.
   Смотрю на все ее движенья,
   Внимаю каждый звук речей,
   И миг единый разлученья --
   Ужасен для души моей7.
  
   Да, в 36 году она напоминала эти стихи: тогда она была и весела и беспечна и проливала вокруг себя воздух рая. Бывало, сесть против нее, смотреть на ее ангельское лицо, на ее грациозные движения -- значило забыть всякое свое горе и беспечно, сладко забыться в какой-то поэтической дремоте. А ее пение, эти тонкие, посинелые уста...
   Кстати о стихах. Вот еще стихотворение:
  
   Под небом голубым страны своей родной
        Она томилась, увядала...
   Увяла наконец, и верно надо мной
        Младая тень уже летала;
   Но недоступная черта меж нами есть.
        Напрасно чувство возбуждал я:
   Из равнодушных уст я слышал смерти весть
        И равнодушно ей внимал я.
   Так вот кого любил я пламенной душой
        С таким тяжелым напряженьем,
   С такою нежною, томительной тоской,
        С таким безумством и мученьем!
   Где муки, где любовь? Увы, в душе моей
        Для бедной легковерной тени.
   Для сладкой памяти невозвратимых дней
        Не нахожу ни слез, ни пени8.
  
   Когда он9 был болен, Константину с чего-то вздумалось прочесть эти стихи; он содрогнулся и сказал: "Да, бывают такие странные охлаждения!"
   Боже, не имела ли она всех прав на жизнь, на счастие, на блаженство? Кто же достоин всего этого, если не она? И что же -- она-то и выпила всю чашу страданий и мук. Где же справедливость? Ум оскорбляется, сердце возмущается. Нет -- не обманчивы таинственные предчувствия сердца: она живет и блаженствует. Смерть была для нее не прекращением страданий, но наградою за них, новою, лучшею жизиию.
  
   Восстань с лучом преображенья
   В твоих лазоревых очах.
   Лети, лети в края отчизны,
   Оковы тлена в прах сорви,--
   И с ним пребудь в единой жизни,
   В единой зиждущей любви! 10
  
   Это его стихи. Да, с ним в единой жизни. Я знаю, он не будет больше любить. Теперь он будет развязан и свободно начнет свою жизнь страдания, которой он всегда так жаждал. Кто глубок духом -- тот откажись заранее от счастия. Глубина духа есть страшный дар -- она венец, но терновый. Такой человек не променяет своего страдания на счастие людей обыкновенных, но не раз воскликнет:
  
   Ох, тяжела ты, шапка Мономаха! 11
  
   Ты великую истину сказал: жизнь и прекрасна и ужасна вместе.
   Как-то легче становится, когда я пишу к тебе. Душа рада страдать: есть какое-то упоение для нее в страдании; но организм утомляется, и потому если я не пишу, то впадаю на минуты в сухость, в скуку; тогда вдруг вспоминаю слово, движение -- и на глазах навертываются слезы, а рука тянется невольно к перу.
   Она вспомнила обо мне накануне смерти; спасибо тебе, что ты не забыл об этом сказать мне.
   Прежде она любила фантазировать о своей смерти, а перед смертью стала бояться ее, стала бояться даже заснуть. Я понимаю это так: прежде еще была надежда на выздоровление, бессознательная надежда; надежда кончилась -- и страх овладел душою. Этот страх для меня есть доказательство, что неестественно душе помириться с мыслию об уничтожении и любовь к жизни здесь есть любовь вообще к жизни, к беспрерывному, нескончаемому существованию. Равнодушие к смерти есть конец жизни. Бесстрашное спокойствие неестественно. Таинство гроба ужасно: перед ним содрогается все живущее, всякая душа, как бы ни была она огромна, глубока и просветленна. Великий переход совершается с страданием. В страдании родится человек, в страдании и умирает. Право существования должно купить дорогою ценою. В этом я вижу доказательство того, что жизнь есть великое благо. Что достается легко -- то ничего и не стоит. Желание смерти показывает самое ложное и призрачное состояние духа. Те жестоко ошибаются, которые думают, что умереть легко, когда сильна вера в личное бессмертие: жизнь должна быть дорога каждую минуту, потому что и там и здесь -- жизнь одна, и кто не любит здешней жизни, тот не найдет и будущей. Отвержение здешней жизни есть отвержение всякого бытия. Для духа нет места, нет отечества: дух везде равен самому себе. Человеку сродно желать лучшего; стремление туда понятно как момент; как момент понятно и охлаждение к здешней жизни. Но кто примет момент за непреложную истину, за нормальное состояние -- тот жестоко заблуждается. На краю могилы, занесши одну ногу в гроб, в страшных мучениях и с полною верою в бессмертие буду скорбеть о земной жизни, и смерть не уведет, а оторвет меня от ней. Без глубокой, страдательной любви к земной жизни мне непонятна жизнь по ту сторону гроба. "Жить, жить -- во что бы то ни стало!" -- восклицал с страшным движением умирающий Гофман 12. Во времена оны -- это было бы для меня признаком души слабой и ннчтожпой, теперь я вижу в этом силу.
   Надо подумать, как поступить с Николаем 13. Ведь ему надо же все узнать; ведь он узнает же все и сам. Приготовлять его к этому -- странно: он все поймет. Не знаю, написать ли к Константину Аксакову, который теперь в Люцерне, или написать в Удеревку 14, к Санечке. Что тут делать?
   Боже, что будет с бедною Варварою Александровною, и как вы уведомите ее об этом? Ей будет тяжелее всех вас: есть какое-то утешение быть при последних минутах умирающего, по крайней мере, нет ничего мучительнее и ужаснее, как мысль -- я был тогда далеко -- он умер без меня!..
   Повесть "Флейта" 15 нынче будет переписана, а завтра пошлется. Прощай, мой милый. Скажи мне -- в каком ты состоянии находишься?
  

40. А. В. КОЛЬЦОВУ

25 августа или 5 сентября 1838. Москва

   <...> твоей нет пьески во 2 No "Современника"; она будет напечатана в 7 No "Наблюдателя" <...> 1
  

41. М. А. БАКУНИНУ

10 сентября 1838. Москва

Москва. 1838. Сентября 10 дня.

   Любезный Мишель, чем больше живу, тем глубже сознаю и постигаю справедливость многих твоих мыслей, от тебя первого мною услышанных. Я мало принес жертв для мысли, или, лучше сказать, только одну принес для нее жертву -- готовность лишаться самых задушевных субъективных чувств для нее. Но я сделал в сфере мысли великое движение (великое для меня) -- и этим преимущественно обязан тебе. Я брал мысли готовые, как подарок; но этим не все оканчивалось, и при одном этом я ничего бы не выиграл, ничего бы не приобрел: жизнию моею, ценою слез, воплей души, усвоил я себе эти мысли, и они вошли глубоко в мое существо и сообщили мне ту разумную прозрачность, о которой ты говоришь мне в своем последнем письме 1. Мне скоро тридцать лет -- важное обстоятельство! Есть русская пословица: кто в 20 лет не силен, в 30 не умен, тот ни сильным, ни умным никогда не будет. Великая истина! Замечая важный прогресс мысли в моем развитии, ты упустил из виду это обстоятельство и не дал ему должного значения. Много, много мыслей услышал я от тебя первого. Одна из них: "жизнь великая школа",-- и ее-то теперь повторяю я каждый день с грустным раздумьем. Ты -- первый уничтожил в моем понятии цену опыта и действительности, втащив меня в фихтеянскую отвлеченность, и ты же первый был для меня благовестником этих двух великих слов. Сначала я их услышал от тебя с удивлением и остался только при нижайшем почтении к ним, смутно подозревая в них какой-то таинственный и важный смысл, по не сознавая его. Такова моя натура: с напряжением, горестно и трудно 2, принимает мой дух в себя и любовь, и вражду, и знание, и всякую мысль, всякое чувство; но приняв, весь проникается ими до сокровенных и глубоких изгибов своих. Так в горниле моего духа выработалось самобытно значение великого слова действительность. Я бы сказал ложь и глупость, сказав, что я действителен и постиг действительность; но я скажу правду, сказав, что сделал новый великий шаг в том и другом. Теперь более, нежели когда-нибудь, ощущаю в себе недостаток действительности и в жизни и в понятии, и в то же время теперь больше, нежели когда-нибудь, ощущаю и великий успех в том и другом и возможность полного и скорого перехода в то и другое (для себя). Я гляжу на действительность, столь презираемую прежде мною, и трепещу таинственным восторгом, сознавая ее разумность, видя, что из нее ничего нельзя выкинуть и в ней ничего нельзя похулить и отвергнуть. Я думаю точно, так же о жизни, о браке, о службе, словом, о всех человеческих и общественных отношениях, как и все практические люди, столько еще недавно презираемые и ненавидимые мною, и в то же время я думаю обо всем этом совершенно не так, как они. Да -- так и не так! Долг, нравственная точка зрения, самоотвержение, пожертвование собою, благодать, воля, свобода в благодати, прямота действий, политика, брак по любви, брак по расчету, чувство в изящном, вкус в изящном, чувство, приличие -- словом, все самые противоположные понятия получили для меня какой-то целостный смысл и уже не дерутся между собою, но образуют целое здание со многими сторонами, одну общую картину из разных красок, жизнь из бесконечно разнообразных элементов. Теперь я понимаю, что искусственное (отвлеченное) сознание есть просветление естественного, но что результаты их одни и те же, потому что истинное сознание есть естественное, просветленное искусственным. Часто, часто приходит мне на мысль Александр Михайлович, и я думаю, как бы теперь-то мог я с ним сойтись, как бы еще много принужден я был сделать ему уступок, но уже как бы много и у него выторговал их. Я бы ему не сказал ничего нового, но примирил бы некоторые из его созерцаний с его понятиями. Он знает жизнь, и жизнь знает его; во многом уже оправдала она его перед тобою, но еще несравненно в большем оправдает -- это ты увидишь и, может быть, очень скоро. Он никогда не был с тобою недобросовестен, но, сознавая могущественную силу в логике и диалектике твоих мыслей и решительно не видя ни того, ни другого в твоей жизни, он принужден был противопоставлять отвлеченности отвлеченность и часто говорить и действовать вопреки своих убеждений. Но об этом после, а сперва скажу, что это мое письмо есть окончание предшествовавшего3, в котором я далеко не все высказал, что хотел высказать. Постараюсь это сделать как можно полнее, удовлетворительнее, чтобы не родить недоразумений. Тем более почитаю это нужным сделать, что не уверен -- буду ли по получении от тебя ответа писать к тебе в этом духе.
   Действительность! -- твержу я, вставая и ложась спать, днем и ночью,-- и действительность окружает меня, я чувствую ее везде и во всем, даже в себе, в той новой перемене, которая становится заметнее со дня на день. Давно ли я спорил с тобою, что не хочу и не обязан терять времени и принуждать себя с людьми чуждого мне мира? Помнишь наш спор втроем, при четвертом -- каменном госте?4 И что же? Я теперь каждый день сталкиваюсь с людьми практическими, и мне уже не душно в их кругу, они уже интересны для меня объективно, и я не в тягость им. Захочу ли я высказать горькую правду человеку, мне чуждому, то чем я враждебнее ему по моей натуре и моей сформировке, чем более заслуживает он горькой и резкой правды,-- тем голос мой тише, трепетней, но от любви к нему на эту минуту, тем слова мои деликатнее, полнее любви, и потому действительнее. Есть люди, которые только виною могут пробудить во мне мгновенную любовь к себе, если только я должен говорить им правду о их вине. Это перемена -- и большая. Дикость моей натуры со дня на день исчезает: грусть смягчила и просветлила ее. Я конь рьяный, горячий, но уже выезженный. Мои сношения с людьми только одно делает еще тягостными, но именно потому, что это одно есть болезнь, от которой я еще только хочу начать выздоравливать. Это то горькое, мучительное, как раскаленным железом прожигающее душу чувство, которое наслано на меня судьбою, как насылаются бури на засохшую почву, чтобы увлажилась и принесла плод свой сторицею. Да, я снова начинаю верить, что и моя буря пройдет мимо, чтобы ярче засияло солнце моего духа, и при одной этой мысли его лучи, еще слабые и бледные, пробиваются сквозь мглистые тучи, заволокшие его. Но еще надо потерпеть, пострадать. Будь так! Моя натура крепка, и нужны тяжкие удары молота судьбы, чтобы пробить ее и дать ей истинную форму. Поступление в институт5, сближение с князем имело для меня бесконечные следствия в постижении действительности. С ненасытимым любопытством вглядываюсь я в эти пружины, в эти средства, по наружности стать грубые, пошлые и прозаические, которыми созидается эта польза, неблестящая, незаметная, если не следишь за ее развитием во времени, неуловимая для поверхностного взгляда, но великая и благодатная своими следствиями для общества. Пока есть сила, я сам решаюсь на все, чтобы принести на алтарь общественного блага и свою лепту. К нам приехал попечитель 6, назначил у себя в комнатах экзамены выпускаемым ученикам; я ожидал своего экзамена без робости, без беспокойства, сделал его со всем присутствием духа, смело, хорошо; попечитель меня обласкал, я говорил с ним и -- не узнавал самого себя. Он просил меня, чтобы я в моих учениках видел больше людей практических и преподавал бы им мою науку, применяя ее к жизни, то есть уча их складно и ловко писать деловые бумаги по межевой части, приготовившись для этого сам. Я все обещал искренно и выполню добросовестно. Да, действительность вводит в действительность. Смотря на каждого не по ранее заготовленной теории, а по данным, им же самим представленным, я начинаю уметь становиться к нему в настоящих отношениях, и потому мною все довольны, и я всеми доволен. Я начинаю находить в разговоре общие интересы с такими людьми, с какими никогда не думал иметь чего-либо общего. Требуя от каждого именно только того, чего от него можно требовать, я получаю от него одно хорошее и ничего худого. Нет ничего идеальнее (то есть пошлее), как сосредоточение в каком-то круге, похожем на тайное общество и непохожем ни на что остальное и враждебное всему остальному. Всякая форма, поражающая людей своею резкостию и странностию и пробуждающая о себе толки и пересуды, -- пошла, то есть идеальна. Надо во внешности своей походить на всех. Кто удивляет своею оригинальностию (разумеется, такою, которая большинству не нравится), тот похож на человека, который приехал на бал в платье странного или старинного покроя для показания своего полного презрения к условиям общества и приличию. Недаром общество заклеймило таких людей именем опасных и беспокойных; впрочем, если бы оно назвало их пустыми, то было бы правее. Теперь единственное мое старание, чтобы всякий, знающий меня по литературе и увидевший в первый и во сто первый раз, сказал: "Это-то Белинский, да он, как все!" Простота, и если сила и достоинство, то все-таки в простоте,-- вот главное. Простота, соединенная с внутренним достоинством, если возбуждает толки, то всегда в пользу человека, потому что она всех располагает к нему; но возбудить о себе толки чем-то странным, непохожим на ежедневность, обыкновенность -- теперь это для меня хуже, чем прославиться пьянством, буйством и тому подобными добродетелями. Страсть рисоваться свойственна не одним Хлестаковым, это болезнь почти всех людей, даже сильных и глубоких духом, но еще находящихся в состоянии идеальности, еще не понявших значения действительности. По крайней мере, я о себе скажу, что рисовался не на живот, а на смерть, без всякого желания рисоваться. Так Шиллер в большей части своих произведении фразер, не будучи фразером. Ложное положение всегда ставит на ходули, от которых спасает или природное чувство простоты, или выход в действительность. Недавно узнал я еще великую истину, бывшую для меня тайною, хотя я и думал понимать ее. Я узнал, что нет людей падших, изменивших своему призванию. Я теперь не презираю человека, погубившего себя женитьбою, затершего свой ум и дарования службою, потому что такой человек нисколько не виноват. Действительность есть чудовище, вооруженное железными когтями и железными челюстями: кто охотно не отдается ей, того она насильно схватывает и пожирает. Вот почему прекраснейшие люди, подававшие о себе блистательнейшие надежды, часто опошляются. Иной всю жизнь мечтал о какой-то небесной женщине, а женился на тряпке; иной всю жизнь мечтал о благе общественном, а потом преспокойно, добившись тепленького местечка, берет взятки. А между тем оба эти человека могли бы далеко уйти. Но видишь ли, в чем дело: есть коллизия, род полиции или смирительного дома судьбы, которая наказывает за отпадение от господствующей идеи общества; она-то женит и выдает замуж, она-то определяет к службе, потому что общество требует, чтобы все женились, выходили замуж, служили. Чем выше были мечты человека, чем важнее был бунт человека против общества, к которому он принадлежит,-- тем ужаснее смирение и наказание за это. Да, вместо женщины -- тряпка, вместо подвизания на поприще общего блага -- взяточничество. Действительность мстит за себя насмешливо, ядовито, и мы беспрестанно встречаем жертвы ее мести. Личное свободное стремление, не примиренное с внешнею необходимостию, вытекающею из жизни общества, производит коллизии. Это для нас то же, что fatum {рок (лат.). -- Ред.} древних. Да, живи не как хочется, не как кажется должным, а как начальство велит, а это начальство -- общество гражданское. Там, где женитьба и замужество есть что-то вроде непременной обязанности -- там женись и выходи замуж (последнее особенно) или поневоле, и не зная как и не помня как, стремглав слетишь в эту пропасть. То же и служба в России. Спроси падшего человека -- как дошел он до своего опошления, и увидишь, что оно было неизбежно, необходимо и что он совершил его, как бы с завязанными глазами. Кроме коллизии, в этом важную роль играет еще и идеальность. Человек мечтал о небесной женщине, но эта женщина была идея, а не живой образ, одностороннее отвлечение вроде шиллеровских женщин. Он мечтал об общем благе и личном своем участии в нем; но это благо было мечтательное, а не действительное. Стремление к нему было рисующееся, ходульное, а не простое, где человек хочет только делать что-нибудь, чтобы не быть без дела, хочет делать без претензий и делает добросовестно. Из крайностей переходят в крайности. Есть факт, что многие самые ужасные, самые фанатические инквизиторы испанские смолоду были отчаянными вольнодумцами, неверами и кощунами; есть также факты, что из изуверства переходят в неверие. Идеальный человек, не встречая нигде своей идеальной женщины, потому что ее нигде нет, приходит в отчаяние и уверяется, что грязная и пошлая действительность есть истинная действительность. Вот тут-то судьба и ставит свою ловушку или свой капкан, куда идеальный человек и попадает, как мышь. Обыкновенно он женится на судомойной тряпке, и часто еще без всяких выгод для обеспечения жизни; часто его жена -- дурна, глупа, пошла и бедна. И это очень естественно. Он не понимал действительности, не понимал, что не всем суждено любить (то есть влюбиться), быть любимыми и жениться по любви, почувствованной и сознанной прежде, чем вошла в голову мысль о женитьбе; но он не понимал и того, что выход есть совсем не. противоположность, что, кроме пошлого расчета, есть еще расчет человеческий, имеющий в виду удовлетворение лучшей стороны своей человеческой природы, что рассудок не есть единственный выход из состояния чувства, но что то и другое может действовать в ладу, не мешая одно другому. Боюсь опошлить мою мысль словами: она у меня в созерцании и еще не сознана, но я глубоко чувствую ее истинность. Если же он останется упрямо при своих мечтах, даже не веря им,-- тогда действительность казнит его иначе, но только все-таки отнимая, сокрушая его силу, его достоинство. Обманутый в своих стремлениях, он скажет, что здесь юдоль плача и испытания, но что всё там, и самый лучший его выход будет -- мистицизм. Я начинаю понимать, наконец, Марью Афанасьевну, эту необыкновенную и генияльную женщину. Среди проблесков ее великого ума промелькивает какое-то идиотство -- это общая участь девственной старости, тут действуют причины физиологические. Она на старости лет кокетничает, делает гримаски, приличные только четырнадцатилетней девушке, начинающей сознавать, что она девушка и прекрасна: желание нравиться не проходит в женщинах и с сединою и морщинами; из этого закона не исключена ни одна женщина, как бы ни глубока она была; такова уж натура женщины, таков уж неизъяснимый закон судеб, и волтериянцы напрасно против этого вооружаются7. И очень понятно, что болезнь старости, страшно издевающаяся над девственницами, делает кокетство так отвратительным. С пламенною, бесконечною любовию Марья Афанасьевна соединяет враждебность и ненависть ко всем женщинам и только с мужчинами может ладить. Наталия Андреевна осмелилась любить Николая, несмотря на то, что Марья Афанасьевна оставила его за собою,-- и она возненавидела эту девушку, достойную всякой любви, всякого уважения. Восторг мужчины от твоих сестер есть личная, кровная ей обида, которой она не простит до гроба. Понятно мне и ее отрицание материнского чувства, ее отвращение к детям. Все эти противоречия в глазах моих так конкретно слились, проникнули и условили одно другое, что я скорее бы не понял отсутствия таких диких, чудовищных противоречий. Это казнь действительности, казнь, которая лютее с каждым годом, с каждым днем, с каждым новым седым волосом. Казацкая жизнь сделала ее платье чем-то похожим вместе и на юбку и на штаны. Девическая старость, как отрицание естественного и самобытного развития женщины, поселила в ее душе подле любви -- эгоизм, подле ума -- идиотство; понимая гадость претензий в других, она не видит их в себе. Все это должно быть так и не может быть иначе. Но я говорю это не с тем, чтобы судить и осуждать ее; нет, пусть отнимется у меня язык, которым я говорю, рука, которою я пишу, если я тем или другим изреку приговор падшему ближнему. Везде виновата одна необходимость, разумная необходимость. Понимаю мужчин, сделавших пошлую партию, и еще более понимаю женщин, сделавших пошлую партию; прощаю тех и других, но женщин особенно, и в обоих случаях -- в несчастном браке и искажении вследствие девственной старости. Знаешь ли что? -- Женщина холодная, без души и сердца,-- такая женщина менее способна ошибиться в браке и выйти за пошляка, если она сама умна; но чем женщина глубже, выше, святее, тем возможнее для нее такой faux pas {ложный шаг (фр.). -- Ред.}... Это противоречит логике, но здесь невольно вспомнишь слова велемудрого мужа Шевырева -- "по логике-то так, да на самом-то деле иначе". Развитие женщины по преимуществу -- в жизни, в живой действительности; мысль для нее имеет гораздо меньшую важность, хотя также до известной степени необходима и для нее. Для нее брак -- единственный разумный опыт жизни и единственная действительность. У нас, в России, это особенно. Девушка у нас лишена всякой свободы, и на ее свободу общество смотрит, как на своеволие, которое предосудительно и в мужчине, а в ней тем более. Ей нельзя идти гулять, нельзя быть в театре, в обществе, нельзя предаться свободно никакому чувству, никакой мысли: эгид матери нужен ей каждую минуту. Брак для нее есть освобождение, начало самобытности. Как ни предавайся она своим фантазиям, а общество возьмет свое, и рано или поздно она почувствует на себе его удары, а выходом будет или ранняя смерть, или искажение и уродливый брак. Повторяю: действительность есть чудовище, вооруженное железными когтями и огромною пастью с железными челюстями. Рано или поздно, но пожрет она всякого, кто живет с ней в разладе и идет ей наперекор. Чтобы освободиться от нее и вместо ужасного чудовища увидеть в ней источник блаженства, для этого одно средство -- сознать ее. Вижу, Мишель, торжествующую улыбку на устах твоих: ты лукаво усмехаешься, видя, что я выдаю тебе за новость твои же идеи и развиваю мысль, которая составляет сущность твоей жизни и предмет твоих порываний и усилий. Но погоди улыбаться: до сих пор, за исключением приложений, в которых я отчаиваюсь когда-нибудь сойтись с тобою, мы согласны; но отсюда-то, то есть от заключения и достижения цели, мы и разойдемся. Что значит сознать действительность? Есть два рода людей, совершенно противоположных и заключающих в своем промежутке множество родов, о которых мне не нужно говорить, как о не идущих к предмету речи. Первый род -- это люди, одаренные от природы инстинктом истины, простотою, нормальностию. Иногда они совсем не рассуждают о действительности, иногда очень пошло рассуждают, но действуют всегда в духе ее, постигают ее инстинктом и сами суть не иное что, как олицетворенные действительности. Но есть люди другого рода: эти превосходно понимают действительность в мысли, но живут совершенно вне ее. Я не принадлежу ни к той, ни к другой категории, но ближе к первой, хотя и испорчен идеальностию и ходулями. Ты совершенно, с ног до головы, есть представитель людей второго рода. Я не знаю никого равного тебе в силе и могуществе мысли. Ты -- голова светлая, логическая. Ты превосходно мыслишь о действительности, и на этом поприще я отказываюсь от всякой борьбы с тобою, заранее признавая себя побежденным. Твое мышление не хитросплетения, не слова без содержания, но выговаривание широкого и глубокого созерцания. Если бы это было не так, то в твоих идеях не было бы общности, целости, органической соответственности. Ты можешь, как и все мы, не оценить, не попять истинно художественного произведения, но не можешь восхититься вздором и фразами. Конечно, увлекаясь построениями, ты впадаешь иногда в субъективность и в Орлеанке8 видишь не фразу на ходулях, но поэзию; но что до этого -- у кого нет субъективных пристрастий, вследствие заранее составленных теорий? Я сам в этом грешен еще больше тебя. Но что много говорить об этом. Верь, что я искренно уважаю твою мыслительность и почитаю ее выговариванием глубокого созерцания. Итак, что ты ни говоришь о действительности -- все это любо слушать и всему этому я многим, многим обязан. Но когда дело дойдет до применения, до осуществления жизнию своих понятий -- ты тут не борись со мною, потому что в этом отношении ты никогда не знал действительности. Хочешь доказательств? Я буду выбрасывать их тебе полными горстями, а пока ограничусь одним фактом, очень резким и вполне тебя характеризующим. Вероятно, ты уже прочел письмо Боткина9, из которого и увидел, что восстание Лангера существовало только в твоей мысли, а больше нигде. Не влечение к нему, вследствие слития твоего духа с его духом, указало тебе на это мнимое восстание, а логические построения, вследствие которых оно тебе казалось необходимым. Не думай, чтобы в этих словах высказывалось отрицание в тебе чувства; нет, в них высказывается твое недоверие к своему чувству, вследствие идеальности и отсутствия простоты в твоей жизни. Это результат добровольного отторжения от живой действительности в пользу отвлеченной мысли, от жизни в пользу книги. Добрый Лангер не думал и падать, не только восставать, а был просто самим собою. Он художник и может любить сто раз в жизни, и любить вдруг несколько субъектов. Я понимаю такие натуры: они называются не всегда Красовыми и Лангерами, но иногда Пушкиными и Гете. Лангер любит по-своему, и я ничего не вижу в этом худого, хотя и сознаю себя решительно неспособным любить мимоходом таких женщин, как каждая из твоих сестер, а не отдать себя одной всего и навсегда. Чувство, внушенное Лангеру Варварою Александровною, было глубже и святее, но и оно носило на себе характер его страстной, художнической души. Он рассказывал Боткину, что однажды, оставшись с нею наедине, почувствовал мурашки по телу от мысли -- не будет ли чего? -- разумея под этим пожатие руки, поцелуй и подобную тому ласку. Прежде меня это взбесило бы и навсегда убило бы в глазах моих Лангера, но теперь, кладя руку на сердце, признаюсь, что еще я не уверен, чье чувство проще и нормальнее -- мое или его, и на которое взаимность и ответ женщины возможнее -- на мое или на его. Чувство Лангера к Александре Александровне в Прямухине (в Москве он был занят Татьяною Александровною) было еще проще, только уже не <в> святом значении этого слова, потому не в святом, что эта девушка кажется мне слишком святою для возбуждения до такой степени простого чувства; но Лангер этим нисколько не унизился, а Александра Александровна нисколько этим не унижена в моих глазах, и чем святее для меня Александра Александровна, тем достолюбезнее Лангер с своим чувством к ней. Чистое потому и чисто, что не может замараться ничем чуждым ему и вне его находящимся. Когда Александра Александровна заметила ему, что он опошлился,-- то он и не понял ее даже и воротился в Москву с враждебностию к ней за то, что ее сентиментальность и романтическая чувствительность заставляла ее искать счастия где-то далеко, тогда как, по его мнению, оно было подле нее -- в особе Лангера с селадонскою фризурою. Он так понял эту глубокую и могучую субстанцию, что не догадался, что ей сентиментальность гораздо несвойственнее, чем ему селадонство. Но так понял он ее; что делать -- у всякого свой образ мыслей, своя манера понимать действительность, и если ты режешься на этом по-своему -- почему же ему не резаться по-своему? Когда Боткин растолковал ему ее сентиментальность, то есть как она смотрела на его ухаживания (иначе не умею выразить его чувства) и что она ему выговорила,-- то Лангер был более удивлен и раздосадован (разумеется, не на себя), нежели усовещен и уличен в чем-то не худом, а мелком, и теперь утешает себя гризеткою, с которою возобновил свою интригу. Все это очень достолюбезно, и за все это я от души люблю Лангера. Именно я его полюбил недавно, с тех пор, как из этой истории узнал его действительно. Вот тебе и восстание! Это так мило-смешно, что мысль об этом заставляет меня добродушно смеяться иногда в самые тяжелые мои минуты. А вот тебе, кстати, и другой факт, доказывающий твое неприсутствие в действительности: когда они приехали в Москву, ты прислал с ними письмо к Боткину, в котором, намекая на меня, говорил, что ни от кого не хочешь земной дружбы, но чувствуешь небесную к Николаю, Боткину и Лангеру;10 Лангер же к тебе никогда, и особливо в то время, не чувствовал не только никакой дружбы, ни земной, ни небесной, но даже и ни малейшего расположения. Он этого давно уж и не скрывает. Ему с его полною, простою и притом нисколько не развитою природою труднее, чем с кем-нибудь, сойтись с тобою. По-моему, так ошибаться в своих отношениях к людям, и тем более отношениях человеческих в высшем значении этого слова, значит: не знать действительность, а щелкаться и стукаться об нее, и во всем этом нет нисколько простоты, но все это ужасно мудрено, и все это вследствие отрешения от простого инстинктивного чувства и стремления решать мыслию и мышлением то, что понимается просто и легко. Из всего этого я вывожу следствие, что можно превосходно понимать действительность мыслию и в то же время быть совершенно вне ее. Вся жизнь твоя -- доказательство этого. Я даже готов остановиться на мысли, что ты будешь философом, профессором, будешь другим пояснять действительность, будешь другим давать возможность познавать жизнь и пользоваться ею, а сам пропустишь ее мимо носа и только, зажмурив глаза, воскликнешь: какое амбре!11 В самом деле, ты совсем не жил, ты еще не знаешь того, что хорошо известно всякому, даже и не бывавшему в семинарии: акта жизни, который есть таинство даже вне чувства любви. Это нисколько не согласно с твоею любознательности"). Любознательность смела до торжества над естественным сознанием, и самое грехопадение ее не только не ужасает, но еще заманчиво увлекает. От этого тебе чего-то недостает, и этот-то недостаток ужасно способствует твоей отвлеченности и призрачности. Он придает тебе что-то странное, чтоб не сказать -- нелепое. Этого нельзя доказать, но это видно. И что вся твоя жизнь? Ты еще и не намеревался начать жить. Жизнь есть: в детстве -- шалости, резвости; в юности -- любовь, упоение, кипение страстей, разгар чувственности (в высоком и в обыкновенном значении этого слова), в лета возмужалости -- потребность чего-то
   более глубокого, более существенного. Ты в восторге от В. Мейстера, от кутилы Эгмонта 12 -- видишь в них откровение жизни, но сам и не чувствуешь охоты жить хоть сколько-нибудь похоже на них. Твоя субъективность и отвлеченность приходит в бешенство, замечая в ком-нибудь из друзей минуту подобного разгула жизни -- ты тотчас в этом увидишь падение. Я сам, обращаясь назад, вижу в своей жизни одни страдания, апатию, падение, восстание, грех, покаяние, и все это вследствие отвлеченности, идеальности, пошлого шиллеризма, натянутости, претензий на генияльность, боязни быть простым добрым малым. На я хватился за ум и теперь за поцелуй, за улыбку охотно плюну на философию, на науку, журнал, мысль и на все. Ощущения, волнования жизни -- эта главное; а там можно и пофилософствовать -- этак, как выкинется -- иногда прозою, а иногда и стишками 13. Ты как-то не мыслию поверяешь жизнь, а жизнию меришь мысль и жизнь вечно подводишь под мысль. У тебя жизнь забота,-- и отсюдова эти беспрестанные поверки, справки, выговаривания каждого своего движения, вникание. Впрочем, я еще думаю о тебе -- и это мне приятнее думать,-- что ты еще не выработался, ты еще слишком молод, слишком мало знал жизнь, а как она обхватит тебя да начнет теребить, так ты и узнаешь, что такое действительность не только в мысли, но и на деле, а это у тебя как-то слишком резко разделено. Сознание моментов своего духа вне действительного волнования жизни -- не далеко ведет. Кажется, бежишь, а в самом деле -- ни с места. Ты возразишь, что ты пережил много бурь семейных; но, во-первых, такая жизнь одностороння, а во-вторых, ты много обстоятельств создавал, думая бороться с действительными обстоятельствами. Повторяю еще раз: глубоко уважаю твою мыслительность, твои понятия, твой взгляд на многие стороны жизни, вижу во всем этом или в большей части всего этого глубину, истину, как выражение глубокого, обширного созерцания; но в жизни твоей ничего не вижу, кроме какого-то фантастического скачка через действительность. И это-то навело меня на сознание того, что знание действительности состоит в каком-то инстинкте, такте, вследствие которых всякий шаг человека верен, всякое положение истинно, все отношения к людям безошибочны, ненатянуты. Всякий ко мне стоит так, как поставила его ко мне действительность, и я ко всякому так же. Разумеется, кто к этому инстинктуальному проникновению присоединит сознательное, через мысль, тот вдвойне овладеет действительностию; но главное -- знать ее, как бы ни знать, а этого знания нельзя достигнуть одною мыслию -- надо жить, надо двигаться в живой действительности, быть естественну, просту, походить на всех, походя только на одного себя. Если моя непосредственность произведет на другого резкое впечатление в мою пользу -- это меня порадует; но если на меня все будут пялить глаза, видя во мне что-то необыкновенное, не похожее на пошлую ежедневность порядочных людей, что-то странное, то лучше хочу быть пошляком, нежели чем-нибудь примечательным. Я в первый приезд в Прямухино обратил на себя внимание всех и каждого и сделался в ваших краях притчею во языцех, пошли толки, что я тебя порчу, что мы философы и пр. и пр. -- все это вследствие того, что я был пошл до гадости, рисовался, походил на семинариста, который, в первый раз вырвавшись из своей бурсы на свет божий, по своим ученическим тетрадям стал переучивать весь свет и на всех людей стал смотреть с высоты своего бурсацкого величия. Ты скажешь, что это был момент духа: так, я согласен, но все то же могло б быть иначе, если б не было недобросовестности, ходуль, фразерства, рисования, отсутствия простоты, вследствие претензий быть необыкновенным человеком. Некогда я очень великодушно и снисходительно снабдил тебя именем Хлестакова 14, а теперь вижу, что я жестоко нарушал права собственности во вред себе и что, по крайней мере, надо было бы поделиться без обиды друг другу этим характеристическим названием.
   Да, Мишель, я уже не тот -- говорю это смело. Со мною воспоследовал новый великий переворот. Действительность, действительность! Жизнь есть великая школа! -- восклицаю я, вставая и ложась спать, днем и ночью. Эти слова мною были услышаны от тебя первого. Но у меня есть еще слово, которое я твержу беспрестанно, и это слово мое собственное, и притом великое слово. Оно -- простота. Боже мой, как глубок его таинственный и простой смысл! Это океан, без дна и берегов, и в то же время мелкий, светлый ручеек, который насквозь виден. Кто снова не приобрел простоты, утраченной идеальностию, тот не живет и не знает жизни, и жизнь того не знает. Вся его жизнь -- парад и рисование; содержание само по себе, а форма сама по себе. После этого нашему брату не мудрено увидеть во сне свою отвлеченность. Понимаю Николая, понимаю эту великую, генияльную душу: он давно тосковал по этой простоте, он первый объявил гонение претензиям, и в этом отношении я бесконечно обязан ему: при нем я всегда был проще. Он чувствовал себя не довольно простым, а жаждал простоты: вот почему он так завидует людям, может быть, не далеким, но действительным, которые поэтому в самом деле лучше и выше его. Вот почему он и мне отдавал преимущество перед собою. Если однажды, когда я ему сказал, что сесть подле любимой женщины и приклониться головою к ее плечу есть блаженство, он ответил мне, что его блаженство выше и я не в состоянии понять его,-- то как часто после он говорил мне чуть не со слезами, что я нормальнее, простее его в понятиях о любви. Он готов был всегда и написать и перевести статью для журнала, но не терпел, чтобы его и в шутку называли литератором. Это означает глубокое чувство простоты. Я -- литератор, потому что это мое призвание и мое ремесло вместе. Если я в себе замечу какие-нибудь литературные замашки, даже маленькое литературное кокетство -- это меня не огорчит, потому что это не что иное, как значок цеха. Но разные штучки не литератора, а человека -- бить, черт возьми, бить их без милосердия. Чувствую, что со дня на день глубже понимаю действительность и глубже вхожу в нее сам. Когда до нее достигну совершенно -- до этого мне дела нет -- сделается само собою, выработается и вытанцуется из жизни, а я не хочу делать из жизни урока к сроку, заботы. Но что меня всего более радует -- это какая-то самобытность, спокойная и твердая уверенность в себе, которая выражается не в одних словах, но и в делах. Начинаю -- и успеваю: все выходит так, как думал, потому что думал верно. Что ненадежно, о том не говорю, что сбудется, а говорю -- может быть. С людьми практическими лажу вследствие знания их; в каждом из них с интересом изучаю род, тип, а не индивида. Все это хорошо. Много еще старинки, оставшейся по преданию, по воспоминаниям, по привычке; все это колотится без пощады, особенно по идеальной части. Каждый день что-нибудь замечаю и щелкаю. Но и прогресс очевиден: каждый день замечаю что-нибудь новое и хорошее. Одно... но это болезнь -- бог милостив -- вылечусь, еще буду жить. Главное дело -- не заноситься, брать, что под руками, и, за неимением лучшего, пировать чем бог послал.
   Чем дальше в лес -- тем больше дров,-- говорит мудрая пословица русская. В самом деле так. Мои отношения к ней и к ним 15 с часу на час поясняются все более и более. Я давно все почувствовал и ощутил, я теперь сознаю -- ход естественный, и тут ошибка, конечно, возможна, потому что невозможного ничего нет, но более невозможна, нежели возможна. Чувствую, что в прошедшем письме я слишком жестоко напал на тебя за твое молчание о том, о чем бы мне хотелось знать и о чем ты несколько раз обещал меня подробно уведомить. Может быть, ты и в самом деле хочешь быть моим другом во всем, кроме одной стороны твоей жизни, не почитая меня достойным посвящения в ее таинства, даже уже известные мне и имеющие ко мне прямое отношение; но еще скорее может быть, что я и ошибаюсь, но что тебе просто-напросто нечего было писать ко мне об этом предмете. Что касается до моих вопросов о них вне отношении ко мне, то я подозреваю, что ты не мог потому отвечать на них, что сам растерялся, видя во всех отношениях противные твоим идеям и действиям результаты, видя, что действительность не лошадь, которою можно управлять по воле, по кучер, который правит нами и преисправно похлестывает нас своим бичом. Это должно быть так и не может быть иначе, и если еще не было, то будет -- и очень скоро, что ты с ужасом остановишься перед развязкою, которую присочинит оскорбленная тобою действительность к сочиненной тобою завязке. Отвечать же на вопросы о них и ней по отношению ко мне ты не мог потому, что нечего было отвечать, и ты, чтобы не остаться в неизвестности насчет действительности, сочинил или вывел из разума свою, уверяя меня, что "я им родной по духу, и дух мой стал ближе к их духу, и они заметили и почувствовали это приближение". Может быть, это и так, только я ничего этого не заметил и не почувствовал. Слитие духом, какого бы рода оно ни было, всегда найдет себе форму, в которой и выразится. Для этого довольно слова, взгляда, движения; но я ничего этого не видел, а что видел, та и теперь заставляет меня глубоко и тяжко страдать. Люди в моем положении часто говорят: "я не хочу сострадания -- оно оскорбило бы меня". Это вопль души, стон от тяжкой раны, и в этом им никто не должен верить, тем более, что в этом они и сами себе не верят. Нет! есть бесконечно мучительное и, вместе с тем, бесконечно отрадное блаженстно узнать, что нас не любят, но тем не менее ценят, нам сострадают, признают нас достойными любви и, может быть, в иные минуты, живо созерцая глубину и святость нашего чувства, горько страдают от мысли, что не в их воле его разделять. Да -- есть, есть упоение, вместе горькое и сладкое, грустное и радостное, есть безграничный Wollust {наслаждение (нем.). -- Ред.} узнать, что, не имея значения любимого человека, мы тем большее против прежнего имеем значение просто человека, что к нам питают не холодное уважение, которое хуже, обиднее презрения, но уважение, в котором есть своего рода живая, трепетная любовь вследствие живого слития с нашим духом, живого проникновения в нашу сущность и даже чувства эгоизма, столь понятного в таком случае. Такое к нам отношение трепетно, свято боготворимого нами предмета особенно важно для нас и для того, чтобы, переживя эпоху испытания, успокоивши и уровнявши порывы мучительной страсти, мы могли бы, как магометанин к Мекке, обращать на этот боготворимый предмет взоры нашего духа с грустным, но сладостным чувством, и в святилище своего духа носить его образ светлым, без потемнения, всегда достойным обожания, во всем лучезарном, поэтическом блеске его святого значения; чтобы, при воспоминании об нем в минуту грустного раздумья у нас в душе было светло, легко, блаженно, а не восставало какое-то жгучее чувство обиды, оскорбления... Это, Мишель, понятно и без объяснений. И что же? -- мое чувство, возбужденное во мне впечатлением ее непосредственности во отношении ко мне, говорит мне, что не мой удел даже и эта печальная радость и это грустное утешение. Как нарочно Боткин подкрепил во мне это чувство фактом. Ты сказал ему, что она писала к тебе из Москвы, что мой приход смутил ее и что, зная о моем к ней чувстве, ей неприятно (или тяжело, может быть) было меня видеть. Понятно! Так неприятно видеть человеку собаку, которую он изуродовал пулею, подстрелив ее по ошибке вместо зайца. Боткин утешал меня, говоря, что из этого факта еще ничего нельзя вывести положительного, что он мог переврать слова, которые и ты сам мог сообщить ему неверно. Все это так; но мое чувство... я верю ему; притом же, если б это было не так, если б тебе было писано и говорено что-нибудь такое, в чем бы высказалось ко мне это уважение, в котором есть своего рода живая любовь, это святое, небесное чувство сострадания женщины, которая имела несчастие внушить достойному человеку чувство, которого не может разделить; если бы все это было,-- то неужели, Мишель, ты, имея человеческую душу, понимая все человеческое, любя и уважая меня, не поспешил бы тотчас же, даже не дожидаясь моих вопросов, полувопросов и намеков, сообщить мне все и тем оживить минутою горького счастия бедное, разбитое и одинокое в своих страданиях сердце и влить в его зияющие раны этого жгучего и вместе прохлаждающего бальзама? Ты бы это и сделал: уважая тебя, я не могу в этом сомневаться, но тебе нельзя было этого сделать по недостатку фактов, и чтобы потешить себя и меня, ты вывел из разума слитие духа, как прежде вывел восстание Лангера и небесную дружбу его к тебе. Знаю, Мишель, что это выражение покажется тебе горько, ядовито, обидно и что я должен бы сказать то же, да не так: но ведь это выражение сказал не я, а глубокие, зияющие раны избитого, истерзанного, на тысячи кусков разорванного сердца. Это вопль души, тяжко страждущей. Помню: мой приход жестоко смутил ее, так жестоко, что я не мог не заметить этого, хотя мое смущение было еще больше, так что я едва держался на ногах и мне казалось, что пол подо мною колеблется и дом валится набок 16. Это смущение я принял в хорошую сторону; но чувство всегда верно, никогда не обманывает в делах сердца: во мне было только смутное движение радости, какое-то не вытанцовывающееся ощущение, как будто мысль не договоренная, прекрасные стихи без конца. На другой день я вспоминал об этом смущении уже без всякого движения, как о встрече с знакомым -- не больше, и выводил из этого, что моя любовь мелка, пошла и недостойна даже меня самого. А действительность, ты мудра и премудра -- ты знаешь, что делаешь. На 4 день были они у Лангера, сидим мы все в гостиной, кто-то, вошедши из залы, сказал, что приехал Поль,-- и я очень хорошо заметил смущение, как будто бы краску в лице -- она вышла в другую комнату, откуда явилась через минуту, но уже без смущения. С этой минуты я все понял, и с этой минуты началась моя пытка. Да, человеку нельзя видеть без смущения кошки, собаки, которую он не нарочно поранил. Ведь это тоже сострадание! Смешно жаловаться, но я не жалуюсь: я только хочу обогатить тебя фактом действительности; смешно просить, чего не хотят дать, но я ничего и не прошу: я только хочу показать тебе, что не все то бывает, что бы, казалось, должно быть по всем законам необходимости. Всякой чувствует, мыслит и поступает, как знает и как хочет: смешное на стороне того, кто этим огорчается и хочет для себя перевернуть действительность. Но я ничего этого не хочу. Я не плакса -- я умею страдать и не падать, я много могу вынести, и в страдании мне изменит скорее организм, нежели дух. В самом теперешнем безотрадном моем положении у меня бывают минуты светлые, минуты разгула души, и я субъективно умею читать эти стихи:
  
   Я пил -- и думою сердечной
   Во дни минувшие летал
   И горе жизни скоротечной
   И сны любви воспоминал.
   Меня смешила их измена,--
   И скорбь исчезла предо мной,
   Как исчезает в чашах пена
   Пред зашипевшею струей!17
  
   Я умею субъективно читать еще и другие стихи:
  
   Когда король комедий не полюбит,
   Так он -- да просто -- он комедии не любит 18.
  
   Но я худо бы отрекомендовал себя, если бы умел только с жгучим чувством оскорбления и ненависти читать эти два стиха и если бы я умел видеть ее только с одной стороны. Нет, благодарность ей, благодарность им: она и они возбудили все силы моего духа, открыли самому мне все богатство моей природы, привели в движение все тайные, сокровенные родники заключенной во мне бесконечной силы бесконечной любви и заставили их бить и разливаться обильными волнами. Она и они, открыли глазам моим таинство жизни, просветлили, освятили храм духа моего, через нее и через них я прозрел и узнал жизнь и возлюбил жизнь, узнал истину и возлюбил истину. Пусть они меня забудут, вычеркнут мое имя и мой образ из списка своих воспоминаний -- что нужды? --
  
   Оно во мне, хотя и не со мной 19.
  
   Таинство совершено, великий акт духа свершился -- остальное не так важно. Моего у меня никто не отнимет, потому что мое в духе. Да, в моем духе, в его неведомых, сокровенных глубинах и она и они, и я буду носить их в душе моей, доколе буду жить, доколе будет биться и трепетать и пламенеть огнем жизни горячее сердце. Но, Мишель, я страдаю не за себя, хотя в то же время и за себя: я хотел бы, чтобы тот образ, который для меня имеет большее значение, сохранился в душе моей во всей своей просветленности, во всей бесконечности своего глубокого значения, без потемнения, без малейшего пятнышка и чтобы его божественное, святое достоинство ослепляло мои взоры, как сверкающая одежда серафима. Я могу о себе думать и меньше, чем стою, и больше, чем стою, но как бы то ни было, но у меня душа человеческая, и она стоила бы лучшего отзыва, большего внимания. Ведь они все для меня -- какие-то образы, подсмотренные мною на небе, в пророческом сне. Все, что я высказал тебе о них против них -- все то я высказал по праву, потому что купил это право дорогою ценою... А она -- она имеет для меня двойное значение, я вижу в ней два предмета: один из них я называю она, а другой включаю в слове они -- не умею лучше выразить моей мысли. Да, пусть она уважает меня -- что мне за дело до этого --
  
   Оно во мне, хотя и не со мной!
  
   Этот образ, для изображения которого нет слов, нет красок, нет образов, это создание, очаровательное и небесное в самых уклонениях своих от действительности, это лицо, этот голос, эти волны темных локонов -- и все, и все -- все это никогда не оставит меня, потому что я могу еще представить себя счастливым или несчастливым новым чувством, но встретить в жизни что-нибудь, не высшее, не равное, но подобное -- нет, это невозможно! Это было откровение тайн бытия, озарившее меня в живом поэтическом образе. И это относится не к одной ней, но и к ним. Да, нельзя, невозможно больше, выше ценить их. Но ценить значит понимать, а понимать значит видеть не призрак, отвлеченный от живого образа, а самый живой образ. Тебя, верно, изумило мое прошлое письмо и не менее изумит это: мой язык покажется тебе нов, неожидан, смел. Ты слышал от меня одни восторженные похвалы, видел одно восторженное удивление -- сочувствовал моему восторгу и разделял его, не видя лжи в самой его истинности. Да, теперь-то я вижу и сознаю, что неразделенная любовь есть чувство истинное и в то же время ложное. Любить значит понимать конкретно, действительно, видеть все стороны любимого предмета, не отделяя их и не делая из каждой из них отдельного образа, но во всех них видя один образ. Я боготворил в них их субстанции, глубокие, гениальные, их могучие природы, которые и теперь буду боготворить до тех пор, пока сохраню мое человеческое достоинство, мою способность понимать и чувствовать прекрасное жизни. Но я забыл, что, кроме субстанции, еще нужно определение, что это определение, особенно у женщин, формируется жизнию и что чем выше человек, тем бесконечнее в нем возможность совершенствования и искажения. Я принимал на веру всякое их слово, всякий поступок. Я не смел судить -- я смел только удивляться. Моя идеальность и призрачность видела великое в их идеальности и призрачности, и поэтому меня часто смущало и мне не нравилось то, что действительно было в них просто, нормально и велико. Варвара Александровна была особенно камнем преткновения для моей пошлой мудрости.
   Я холодно удивлялся ей, когда думал о ней, и глубоко любил ее, когда смотрел на нее, не думая, в немом созерцании. Да, и у меня бывали минуты простоты, но я упрекал себя за них, как за падение, начинал мыслить и -- делался ослом. Более всего смущало меня ее замужество. Теперь я понимаю ясно, что такая ошибка20 может быть уделом только двух крайностей -- или пошлой женщины, или великой женщины. Да, Варвара Александровна -- великая женщина, и в этом я уже никогда не переменю моего образа мыслей. Ее ошибка теперь не смущает меня и не только не унижает ее в моих глазах, но бесконечно возвышает. Не умею отдать отчета в моей мысли, но для меня она ясна. Ее письмо ко мне изумило меня: что-то пахнуло на меня великим, но непонятным мне, а я имел похвальное обыкновение не уважать, чего не понимаю -- поэтому я многого святого и великого в жизни не умел оценить. Я взирал на Варвару Александровну с высоты моего паяснического, шутовского величия и осмелился осуждать ее за слабость в деле развода с мужем. Ей попалась моя записка. Вот начало ее письма ко мне: "Она (записка) дала мне то спокойствие, которого давно уже искала тщетно,-- Вы отдали мне справедливость -- я благодарю Вас за это -- Вы не знаете и не можете знать, какое добро Вы сделали мне этим -- давно уважение людей тяготит мне душу. Да, Белинский, я слабое, падшее творение..."21 Надо списать все письмо от слова до слова, чтоб дать понятие о бесконечном величии, бесконечной глубине этой громадной души, отрицающей в себе всякую истинную сущность. Это письмо только удивило меня; чудилось мне в нем что-то таинственное, но я не был в состоянии понять: дело было слишком просто, и потому показалось мне мудрено. Чтоб понять его, надо было пройти чрез длинный ряд мучений, пережить целую бурную эпоху страданья и столкнуться с действительностию. Теперь мне понятно это сомнение в себе, эта скромность: это есть мучительное стремление к действительности души, еще чувствующей себя вне действительности. Ей не дали силы твои мысли, она была ими запугана, но не приняла их в себя -- от этого ее спасла ее крепкая, самобытная натура и невольное пребывание в действительности, а не в мечтах и фантазиях о действительности. Она мать, и созерцала многое такое, о чем еще и не мечтала наша пошлая мудрость. Она чувствовала, что есть узы, которые развязать совсем не то, что сбросить башмак с ноги. Я понимаю, почему она чувствовала такое сострадание к Дьякову и почитала себя виноватою перед ним. Я теперь многое понял. Огородник Крылова, точно, умнее философа22. Прочти эту басню -- в ней глубокий смысл. Я хочу сказать,-- кто чего не испытал, тот может об этом прекрасно рассуждать, но понять -- это другое дело. Передо мной теперь носится образ Варвары Александровны, я вижу это робкое выражение лица, слышу этот робкий голос -- когда она выговаривала о чем-нибудь свое мнение или спрашивала чужого мнения -- даже моего. Это было дитя, скромное дитя, которое всех почитает умнее себя -- даже меня, Белинского 36 года. Я всегда буду знать мое место при ней, но тогда я при ней был просто пошляк в буквальном значении этого слова, И. А. Хлестаков, который самому Загоскину готов сказать, что "Юрий Милославский" его сочинение 23. Но я понимаю это детство, эту детскую робость. Тогда она была принадлежностию всех их, но в ней выражалась резче, потому что она всех их выше. Змеиная мудрость и голубиная простота есть удел величия. Нечто подобное есть и в Николае, сколько это может быть в мужчине. 36 год, зачем прошел и никогда уже не воротишься! Нет, я верю, что воротится не только 36, но и 34, который был еще лучше (я имею важные причины так думать)--я верю этому. Если я не увижу его, то услышу о нем, может быть, и его гармоническое, благоухающее, простое веянье прольет блаженство в мою душу! Ложь непрочна, и истина должна восторжествовать. Спасение только в сфере истины,
  
   Но туда выносят волны
   Только сильного душой24.
  
   Их души сильны и могучи. Но если это, с одной стороны, есть ручательство за выход в действительность, то, с другой, это же может грозить и ужасною коллизиею: сильные души по недостатку упругости иногда ломаются и находят свой выход там. Сильная душа имеет свойство железа -- закаляться и делаться булатом; хорошо, если форма истинна, но получивши ложную, он ломается, а не изменяется. Свинец можно в день перелить во 100 различных форм. Да, чем глубже душа, тем бесконечнее в ней возможность и совершенствования и искажения.
   Петр мне говорил, что ощущение запаха ладана и присутствия умершей сестры в груди, как всякое ясновидение, есть признак дурной: дело может кончиться ужасною и скорою катастрофою. Возьми свои меры, Мишель, Ты их ввел в царство мысли и дал им новую жизнь, но я имею сильные причины думать, что им сильно, сильно хочется туда. Когда еще они не знали достоинства мысли, их спасало от этого желания простое чувство покорности провидению. Последнее мне лучше нравится. Такой уж у меня образ мыслей теперь.
   Татьяна Александровна писала в Москве к Лаягеру письмо, в котором с грустию жаловалась, что ей не дано понимать музыку, потому что она (по ее мнению) не так поняла одно место из квартета25. Это сомнение в себе, выраженное со всем простодушием и всею сплою глубокой души, живо и глубоко тронуло меня и Боткина. Однажды в Прямухине он сказал ей, что она напрасно не доверяет своему чувству, что места в квартете нельзя было понять вернее и глубже, как поняла она. (Боткин забыл, что он еще не так далек в мысли, чтобы верить своему чувству в деле музыки и оправдывать чужое чувство.) Татьяна Александровна отвечала ему: "Что я знаю? -- надо все знать не чувством, а мыслию". Они оба замолчали. Я бы сделал то же. По крайней мере, я рад, что не слышал этого сам, и жалею, что Боткин рассказал мне это. Не сердись на меня, Мишель: это мое субъективное мнение -- плюнь на него. Может быть (чего не может быть? -- Я всего ожидаю), может быть, ты скажешь мне, что я мог бы поберечь свои мнения про себя. Не могу -- видит бог -- не могу! Для меня любить значит иметь право высказывать всякую мою задушевную мысль. Все отношения должны основываться на истине. Кто мне не скажет правды, тот мне не друг, а кто обидится ею от меня, называя меня другом, тому я буду в состоянии простить это, не сердясь на него, и решась впредь не подавать ему никаких поводов оскорбляться мною. Великий боже! девушка, такая глубокая, в такой степени доступная изящному, отказывается добровольно от того, что составляет ее сущность -- от своего чувства, и для чего же? Для какой-то мысли, которая никогда не будет ее уделом, если она не захочет променять своего значения прекрасного, поэтического, небесного создания на значение femme savante! {ученой женщины (фр.). -- Ред.} Стало быть, они уверены, что для них теперь не существует наслаждения искусством, потому что они еще далеко не проникли его мыслию, для чего нужно огромное изучение, множество ученых сочинений? Для женщины искусство не существует во всей полноте и сущности своего значения; в этом согласны все великие люди, и я и Гегель. Этих двух авторитетов и для тебя должно быть достаточно. Но женщина может многое в искусстве глубоко понимать непосредственно, своим чувством, особенно такие произведения, которых субъективное понимание есть в то же время и объективное. Музыка для женщины доступнее всех искусств, потому что менее прочих уловима мыслию, и я понимаю, отчего они музыку любят больше поэзии. Они, Мишель, многие произведения, особенно музыкальные, могут чувствовать так, что их ощущение может перевести на понятие разве какой-нибудь Рётшер. И они отрекаются от своего понимания, от своей глубокой, бесконечной способности наслаждаться тем, что должно составлять высочайшее их наслаждение!.. Да это значит отрекаться от самого себя, от своей сущности, от своей действительности!.. Непонятно! Или это блуждание в пустых пространствах, населенных образами без лиц, или я поглупел, опошлился. Не знаю -- голова кружится. Если они правы, то, видно, истина не для меня и не для истины, и мне надо с нею раскланяться. Мудрено, не просто... Я помню, как они шутили над словами субъективный и объективный, почитая их невыговариваемыми для себя и странными даже в нашем мужском разговоре; я помню, как они шутили над Натальей Андреевной, которая в своих письмах часто употребляла слово абсолют; в этих шутках, в этом отчуждении от подобных терминов высказалась глубокая, нормальная природа, верное женственное чувство, а между тем они вздыхают о знании, о мысли! В ложном положении человек всегда противоречит себе.
   В прошедшем письме я намекал тебе об одном факте, доказывающем их резкую перемену; я не хотел говорить о нем, потому что больно мне вспоминать его; но теперь расскажу и его, чтобы уже не осталось ничего рассказывать и повторять одного и того же, если мы еще будем продолжать переписываться об этом предмете, и чтобы я не мог упрекнуть себя в недосказанности, если это письмо будет последним об этом предмете. Ты был в Торжке, мы гуляли. Пропускаю хождения по доскам и бревнам, хождения, оправдываемые авторитетами Беттины и Гете26, следовательно, не оригинальные и потому, как думаю я, неуместные. Зашел разговор о порыве, который увлекает летать по звездам. Как-то, не помню, замечено было, что смерть удовлетворит вполне этому порыву. Я заметил Александре Александровне, что нельзя определить, как мы будем бессмертны, хотя и можно верить, что будем бессмертны, и что будем бессмертны в теле, при условии пространства и времени, и что, следовательно, летание по звездам есть -- мечта, но не мысль. Вдруг отвечают на мое замечание, но отвечают не мне и никому, а всякому и каждому, кто бы ни почел это ответом себе. Ответ, или возражение, состояло в том, что ничего нельзя и не должно определять, потому что когда что-нибудь определишь, то станет самому гадко и пошло, как говорит Мишель. Этот ответ мне, адресованный безлично, был совсем не возражением, потому что я именно это-то и заметил -- но что нужды, ответ или возражение, было тем не менее сказано таким тоном, в котором высказывались и совершенное уничтожение моей мысли без всякого уважения к ней, и совершенное убеждение в справедливости своей мысли, и, наконец, какая-то жалость, какое-то сострадание к моей слепоте, и что-то вроде наставления мне, и что-то такое, как будто нелепость моего мнения оскорбительна для слуха других27. Но я никогда не сумею выразить всего, что было лестного для меня, моей личности и моего самолюбия в этом тоне, а в нем было много, много... И, говоря все это, были так прекрасны, так очаровательны, что тяжелое и неприятное впечатление, смутившее и поразившее меня всею своею силою, было тем тяжелее и неприятнее. Я обвинял себя в мелком самолюбии и даже согласился, что моя мысль была нелепа, хотя моя мысль именно была та же самая, которою мне и возразили так сильно. Я еще тогда только чувствовал перемену, ко не сознавал ее: сознание озарило меня в Москве, и уже давно, но смерть Любови Александровны на время закрыла от меня совершенно эту сторону моей жизни, которая теперь тем в большем свете снова предстала мне. Да, теперь ясно вижу несомненную пользу в развитии в мысли: оно дает, особенно женщине, самобытность и уверенность в себе. Прогресс очень очевиден: простые девушки, которых вся жизнь была любовь и вера, но любовь и вера простые, вытекавшие из их простых, святых и глубоких непосредственностей, уже не только чувствуют, но и знают. Конечно, краеугольный камень этого знания есть два магические слава -- "Мишель говорит", но женщины иначе и не могут знать. Для них слова любимого мужчины не потому истинны, что в самом деле истинны, но потому, что они его; для них поступок любимого человека не потому прекрасен, что в самом деле прекрасен, но потому, что он его поступок. Прежде я презирал такую любовь и с состраданием говорил, что Любовь Александровна не может любить другою любовию и что ее любовь никогда бы не удовлетворила меня; а теперь я чувствую и знаю, что только такая любовь женщины могла бы меня удовлетворить и что всякая другая любовь, основанная на сознательном понимании любимого субъекта, есть порождение логических хитросплетений и самолюбивых, эгоистических потребностей. Женщина не мужчина, и, чтобы понимать и любить ее, надо понимать и любить ее как женщину, просто, а не как идеал или героиню. Кто видел в любимой женщине идеал, того любовь могла заключать в себе много глубоко истинных элементов, но в своей целости была что-то уродливое, неестественное. Впрочем, в моей природе много нормальности, и мое сострадание к Любови Александровне было в мысли, а чувство мое, назло мысли и к величайшему моему огорчению, восхищалось ее любовию, простою, тихою, но глубокою и сильною, как это лучше всего доказала трагическая катастрофа... Да, мысль много глупостей заставляла меня говорить, и теперь, вспоминая прошедшее, я часто восклицаю:
  
   О философия! ты срезала меня!28
  
   И иначе не могло быть, потому что все ощущения были искажены воспоминанием. Еще не чувствуя потребности любви, я, будучи мальчишкою, уже составил себе идеал любви и любил сообразно инструкции, данной этим идеалом. Прочтя биографию Александра Македонского, я готов был три дня ходить, скривя шею, чтобы походить на македонского героя. Прочтя "Разбойников"29, я готов был заткнуть за жилет деревянный кинжал. Все это естественно, но ничего бы этого не было, если бы мое отрочество и часть юности были проведены в учении, за грамматиками и словарями, а не за романами, если бы я все прочел в свое время. Натура, предоставленная самой себе, должна исказиться. Воспитание -- великое дело. Теперь, разбирая мои чувства, самые святые, самые истинные и которые есть признак и доказательство, что у меня есть истинная и глубокая сущность, что природа была мне не злою мачехою, но доброю, нежною матерью, я нахожу в них еще так много ложного, натянутого, пошлого, оставшегося от чтения даже первых романов, прочтенных мною, и от ощущении, сформировавшихся еще в детстве и бессознательно, по преданию, живущих во мне. Идеальность есть моя хроническая болезнь, которая глубже засела в мой организм, чем геморрой. Простота во мне была, когда я забывался, переставал мыслить или даже когда и мыслил, но сам собою, без влияния авторитетов или под влиянием бунта против авторитетов. Теперь вдруг настало время разделки за старые грехи. Я как будто спал и проснулся от удара грома. Значит -- зерно принесло свой плод, и плод созрел -- настало время жатвы. Все вышло и выработалось из жизни. Теперь более, чем когда-либо, чувствую свою недействительность и более, чем когда-либо, чувствую свою к ней близость. Надо хорошенько рассчесться с прошедшим и совершенно разрушить его для будущего и совершенно освободить будущее от прошедшего. Надо начать новую жизнь,-- жизнь простоты, жизнь не необыкновенного существа, рожденного на диво миру, а простого доброго малого, который живет, как живется, и думает, и мыслит, и сознает, как умеет, жизнь, но в то же время знает, где надо последовать простому <далее часть текста утеряна> блеск потока, из-за черных кустов, при фантастическом блеске луны, когда ночью едешь дорогою и душа лелеется и сладко дремлет на колыбели мечтаний, колокольчик прерывисто и заунывно побрякивает, а усталые лошади медленно всходят на гору... Да, все, все явления жизни, где только слышится душе незримое присутствие бога живого. Они -- святые,-- им нет другого имени. Их природы ангельские. Я это знаю, чувствую, глубоко чувствую, хотя в то же время и вижу, что они уклонились от своей первобытной простоты, которая делала их так высокими, так великими от своей святой непосредственности, которая поражала всех -- и умных и глупых, и добрых и злых. Желаю и надеюсь, что этот докторский плащ мысли, который так не пристал к ним, скоро спадет с них, и они снова возвратятся к своей первобытной, святой и милой простоте. Их счастие -- мое счастие, и я горячо желаю, чтобы судьба усыпала путь их цветами и дала им то счастие, которого они вполне достойны.
   Вот тебе, Мишель, моя исповедь. Может быть, ты заметишь в ней враждебность к себе. Эта враждебность, точно, есть, но она уже не прежняя, не та, что была во время нашей полемической переписки: она не к лицу, а ко лжи; она не вследствие оскорбленного самолюбия, а вследствие любви к истине. Ложь есть во всяком, но правда для того и говорится, чтобы убивать ложь и водворять истину. Я не боюсь, не раскаиваюсь, не упрекаю себя, что высказал то, что думаю о них: отныне я не стыжусь моих ощущений, боясь нанести оскорбление своему самолюбию ошибкою. Думай, что хочешь, и пусть думают они, что хотят о моем теперешнем заблуждении, если оно точно заблуждение или покажется тебе и им заблуждением. Не должно допускать ложных отношений, а для этого надо быть искренними и не бояться оскорблять чужое самолюбие. Лучше никакие, чем ложные отношения. Я почел бы себя подлецом, если бы не высказал всего, что просилось из души с таким напряжением. Пока я писал к тебе это письмо, а я писал его несколько дней, я ничего не мог другого делать и ни о чем другом думать.

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   Почему ты не хотел побольше написать ко мне о Варваре Александровне? Что она, как она, спокойна ли, счастлива ли и все, все, что может дать понятие о ее положении.
   Верно, ты не получил повести Кудрявцева30, что ничего не сказал о ней? Для меня прочтение ее было шагом вперед. Такая глубина в такой простоте!

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   Катерина Гавриловна просила меня передать тебе свой поклон и свое участие о твоей потере. Я познакомился с Петром Яковлевичем. Прощай. Рука устала, и дух утомился -- не могу ни писать, ни думать -- надо рассеяться, а <после> приняться за свою работу, которую запустил вследствие этих двух огромных писем. Прощай.

Твой В. Б.

  

42. Н. В. СТАНКЕВИЧУ

5--8 октября 1838. Москва

Москва. 1838, октября (?) дня.

   Друг Николай, много и во многом и тяжко виноват я перед тобою. Я к тебе не писал, но в этом не виню себя: я был в себе, в своих личных интересах, своих радостях, своих страданиях, я пережил великую эпоху моей жизни, получил от судьбы самый важный урок; не мог писать к тебе -- мешали и обстоятельства и судьба1. Потом я тебя осуждал, учил, поучал,-- намерение было похвально, исполнение пошло2. Это обыкновенное следствие добровольного отречения от своей сущности, своей самостоятельности по причине разных философских влияний. Кто пляшет под чужую дудку, тот всегда дурак. Прости, брат,-- это последняя глупость.
   Наконец, я собрался писать к тебе -- и в первый раз письмо к тебе -- для меня тяжелый долг. Я бы и не стал совсем писать, но вижу, что, кроме меня, этого сделать некому. Приготовься услышать печальную весть: ее уж больше нет: она умерла, как умирают святые -- спокойно и тихо. Катастрофы не было: тайна осталась для нее тайною3. Болезнь убила ее. За месяц до смерти П. Клюшннков лечил ее. Он говорит, что для спасения ее опоздали пригласить его целым годом. По крайней мере, он облегчил ее страдания, и она так полюбила его, что ей становилось легче от его присутствия. Если бы не Станкевич (говорила она ему за день до смерти), я вышла бы за вас замуж. Умерла она 6 августа. 15 июля я приехал в Москву из Прямухина, где пробыл 10 дней с Боткиным. В это время три раза видел я ее: лицо желтое, опухшее от водяной, но все прекрасное и гармоническое. С ангельским терпением переносила она свои страдания. Тяжело быть вестником таких новостей... но бог милостив -- и сохранит тебя. Ах, Николай, зачем не могу я теперь быть подле тебя и вместе с тобою плакать... Я плакал, много плакал по ней -- но один. -- Будь тверд.
   С Мишелем я совершенно разошелся4. Уважаю его -- но любить не могу. Много пользы сделало мне его знакомство, но дружба наша была призрак, потому что не выработалась из жизни, а вышла из отвлеченных понятий об общем. Сказал бы тебе побольше и об этом, и о себе, и о "Наблюдателе", и о всех наших общих друзьях, знакомых и обо всем -- но тебе теперь не <до> того. Боюсь оскорбить твою печаль. Если теперь тебе нужны мои письма -- скажи скорее,-- и к тебе полетят тетради. Друг,-- великая перемена произошла во мне: я наконец понял, что ты называешь (и так давно называл) простотою и нормальностию. Ты был пошл и идеален не меньше нас, но ты всегда носил в душе живое сознание своей пошлой идеальности и идеальной пошлости и живую потребность выхода в простую, нормальную действительность. Опыт великое дело: он много растолковал мне. Моя история кончилась не так, как твоя: на меня просто наплевали, и я благодарю за это судьбу: в противном случае, со мною повторилась бы твоя история5.
   Друг, не предавайся отчаянию. Есть fatum {судьба (лат.).-- Ред.}, которая, не отнимая нашей воли, играет нами. Наша воля должна состоять в сознании необходимости всего и свободной покорности всему, чего не миновать.
   Прощай. Обнимаю тебя.

Твой В. Белинский.

  

43. М. А. БАКУНИНУ

12--24 октября 1838. Москва

Москва. 1838, октября 12 дня.

Еще одно, последнее сказанье -- и летопись окончена моя!1

   Сегодня, Мишель, получил я от Боткина, обедая у него, письмо твое; теперь уже вечер, а я только что прочел его и тотчас же засел за ответ. В твоем письме высказано предположение, что я не буду отвечать на него; и это предположение вполне бы оправдалось, если б не одно обстоятельство: в твоем письме я увидел два письма -- одно к ненавидимому и презираемому врагу, а другое -- к другу. Верь мне, Мишель, хотя я и жалкий добрый малый2, которого ожидает скорая и неизбежная погибель в пошлой действительности, но я умею (не хуже всякого, даже лучше многих) отличить живое от мертвого, гнилое от свежего, слабое от могучего, хитросплетения от выражений души, -- и я в последней половине твоего письма увидел жизнь, движение, душу, любовь. Когда ты начал говорить о том, к чему ты стремишься, твое письмо из длинной диссертации о действительности и обо мне, бедном, погибшем добром малом, превратилось в живую огненную импровизацию, которая дошла до моей души (потому что, хоть я и добрый малый, bon vivant {кутила (фр.).-- Ред.} и bon camarade {хороший товарищ (фр.). -- Ред.}, но до меня не может не дойти ничто задушевное, горячее, чему причиною и то, что, будучи добрым малым, я еще и чиновник по части ощущений и непосредственного чувства). Да, последняя половина письма твоего примирила меня с тобою, успокоила благотворно, сняла с тебя проклятие, которое после твоего письма с копиею, которому пет приличного имени, приличного эпитета, я холодно и спокойно изрек на тебя. Я остаюсь при моих убеждениях, выраженных мною в моих трех длинных диссертациях о действительности, и твоя длинная диссертация о действительности только еще более убедила меня в истинности моих убеждений; но что касается собственно до тебя, как до лица, то твое письмо (то есть остальная половина его) заставило меня почувствовать, что у меня были против тебя предубеждения и что в чистом элементе моих длинных диссертаций есть и ложные элементы. И до этого сознания -- повторяю -- меня довела не твоя диссертация, а та жизнь и энергия, которыми проникнуто каждое слово последней половины твоего письма. Дружба наша, Мишель, кончилась: еще до получения этого твоего письма я сознал уже, что между нами никогда не было полной, истинной, а следовательно, и никакой дружбы, а была какая-то странная связь, потому что мы любили друг друга объективно, а не субъективно, сколько вследствие того, что нас связала судьба (и ты знаешь -- чем3), столько и вследствие того, что мы не могли не признать друг в друге истинного человеческого достоинства. И потому, Мишель, эти объяснения будут последними; они необходимы: я хочу оправдаться перед тобою, как перед человеком, если не как перед другом, хочу самого тебя сделать судьею нашего прошедшего. И в то же время, по чувству ли самолюбия, или по сознанию своей правости, хочу защитить себя от твоих нападок, которые приписываю тому, что ты умышленно не понял меня.
   Начинаю с Петра. Не признаю ни неделикатности, ни бессознательного и никакого неблагородства в его поступке. Сделай это я, поступок мой был бы просто подл и гадок, без всяких околичностей. Если бы даже твои родители сами предложили мне посредничество и потребовали моего мнения в семейном деле,-- и тогда даже (вследствие моих новых понятий о действительности) я не выразил бы ясно моего убеждения, а постарался бы отделаться так, чтобы не оскорбить обеих сторон. И это оттого, что я слишком хорошо (для постороннего человека) знаю ваши семейные отношения, будучи введен в них тобою (а не самовольно вошедши в них, как наглец) и проживши у вас в доме три месяца4. Не умею выразить тебе яснее и лучше моей мысли, но глубоко чувствую, что подобный поступок с моей стороны был бы или подл, или глуп. Но что касается до Петра, то извини, Мишель: в его поступке я ничего не вижу, кроме благородного, чистого и святого. Петр поступил в этом случае ни больше, ни меньше, как Петр. В моих длинных диссертациях я на его счет сделал намек, который может навести тебя на ложное заключение: тогда мне так показалось5, потому что тогда я весь сидел в моей idée fixe; {навязчивой идее (фр.). -- Ред.} теперь я вижу все прямее и яснее, потому что на все смотрю спокойнее, сверх того, один посторонний факт решительно доказал мне мою ошибку, то, что объективный восторг я принял за субъективный. Но тем яснее для меня благоговейная любовь, религиозное уважение Петра к твоим сестрам. Когда он говорит о них,-- его лицо просветляется. Он даже сознал, что его поездка в Прямухино будет иметь решительное влияние на всю его жизнь. Прав ли он, или ошибается,-- но только он сумел соединить удивление к ним с сожалением о них, с сожалением, которого они, конечно, от него не требовали и которое могло их оскорбить, но которое он тем не менее почел себя вправе не только иметь, но и изъявить. Желая им добра (по своим понятиям), он почел за священный долг осуществить это желание (опять-таки сообразно с своими понятиями, из которых человек не может выйти). И теперь ни ты, ни твое семейство, ни целый мир не в состоянии его убедить, что он сделал что-нибудь не только положительно худое, но даже отрицательно нехорошее. Почему же он почел себя вправе так фамильярно, так родственно войти в объяснения с Варварою Александровною, и на это есть достаточная причина: она со слезами жаловалась ему на тебя, что ты лишил ее и Александра Михайловича любви дочерей (в чем сами они ему признались -- насчет матери -- как в вещи очень обыкновенной). Что же он сделал худого или неприличного? Сообрази еще то, что он весь, с головы до ног, медик и что для него нарушение гигиены есть уголовное преступление, смертный грех, не прощаемый ни здесь, ни там,-- и дело покажется тебе еще проще. Напрасно ты сердишься на него за нарушение скромности, составляющей священную обязанность врача: он прочел мне из своего письма только то, что мог прочесть, не нарушив своих медицинских обязанностей, то есть выпустив все, что непосредственно касалось до их здоровья или нездоровья. Тебе он не отвечал потому, что твое письмо взбесило его: он увидел в нем не дружеское письмо, которого ожидал, а короткую диссертацию о жизни, и все сбирался ответить тебе, что ни в чьих советах не нуждается и хочет жить просто, чтоб прожить лет со сто. Прибавлю о Петре еще то, что его посредственного влияния на мои длинные диссертации было едва ли не больше, чем моего посредственного влияния на его взгляд на некоторые предметы. О письме же его к Варваре Александровне я даже и узнал только тогда, как оно было уже отослано на почту. Петр до всего дошел собственным умом. Отрекаюсь от всякого участия в его поступке, хотя -- повторяю -- и не уверен, чтобы отсоветовал ему его, если б мог: я боялся играть судьбою и оставил все на волю действительности, сделал laissez-aller {предоставить вещи самим себе (фр.).-- Ред.}. Что я имел с ним частые разговоры (а не совещания, как ты очень остроумно и очень невпопад выражаешься),-- это правда, и мне никаких разговоров, ни о ком и ни с кем, никто запретить не может. Об этом я даже не хочу и распространяться. Но вот о чем не могу умолчать -- будто бы они перестали быть для меня святынею. Тем более не могу умолчать об этом, что твой упрек сделан мне с грустию и любовию. Нет, Мишель, и теперь их имена для меня святы, и я не употребляю их всуе, не разглашаю о их падении и даже не говорю о них и с Иваном Петровичем, которому, разумеется, и без меня многое должно быть известно через брата. Только с одним человеком6 (кроме Петра) говорю я о них, да это потому, что я говорю с ним обо всем, что составляет главнейшие интересы моей жизни. Повторяю тебе, Мишель, что несмотря на то, что ты называешь моими предубеждениями против них, они по-прежнему остаются для меня святы. Если я приписал им (истинно или ошибочно) нечто призрачное, недостойное их, то причину этого нашел в тебе; а все святое, прекрасное приписал одной их дивной субстапции и божественной непосредственности. Непосредственность для меня и в мужчине есть мерка его достоинства, о женщине нечего и говорить: вся ее сущность состоит в непосредственности. Таких же непосредственностей, какие составляют сущность твоих сестер,-- я еще не встречал, и с грустию признаюсь, что сомневаюсь и встретить. Да, по-прежнему они -- лучшее видение моей жизни, лучшее чудо ее, первейший и главнейший интерес, и я люблю, уважаю их и интересуюсь ими гораздо более, нежели сколько то нужно для моего счастия и спокойствия. Перечти без предубеждения мои длинные; диссертации,-- и ты убедишься, что для того, чтобы любить их так, как я люблю их, надо быть именно тем и таким, чем и каким описал ты меня во второй половине твоего письма, то есть надо иметь неиссякаемый, живой источник необъятной, святой, благородной любви. Да, Мишель, больше любить я не могу и не умею. У меня на это много доказательств, которые, разумеется, вполне ясны и убедительны только для меня. Смерть твоей сестры на этот счет много пояснила меня самому мне. Не хочу продолжать спора по предмету моих обвинений против них, не хочу по многим причинам: я уже все сказал и нового ничего не могу сказать; это ни к чему не повело бы; это и без того оскорбило их и тебя. Но если бы и ты вызывал меня на новые объяснения -- этого мало, если бы (мне нужно сделать такое нелепое предположение, чтобы яснее выразить мою мысль), если бы и сами они вызывали меня на него -- то получили бы один вежливый ответ человека, который, кроме любви, истины, имеет еще понятие и о приличии. Во мне, Мишель, тоже есть и самолюбие и гордость. Не только с оправданиями и объяснениями, но даже и с любовью, дружбою и даже простым знакомством ни к кому навязываться не буду. У меня есть даже и сила -- это я недавно узнал: я хоть с кровью, но могу оторвать начисто от сердца все, что составляло его жизнь, оторвать навсегда. Если меня не поняли, если не умели или не хотели понять моего поступка, или, наконец, не хотели дать себе труда отделить его от побуждения, если сам по себе он показался дурен,-- то жаль, а делать нечего. Тут остается одно -- сказать, махнувши рукой:
  
   Когда король комедий не полюбит,
   Так он -- да просто -- он комедию не любит7.
  
   Так точно, когда человек, введя меня в семейные тайны, самые святые и неприкосновенные, после скажет мне, что-де неблагородно ввязываться в чужие дела -- и тут один выход: эти же два прекрасные стиха. И потому я пишу о них в последний раз, пишу с тем, чтобы оправдаться перед тобою, как перед человеком, который, как человек, есть для меня и очень, очень нечто. Я не раскаиваюсь в том, что высказал в моих длинных диссертациях: я действовал с благородною целию, чуждою всяких личных расчетов, действовал почти в полной уверенности не выигрыша, а проигрыша, наконец, действовал по глубокому убеждению. Жалею, если результатом всего этого было только то, что я их оскорбил. Если бы я это знал, то не написал бы ни слова. Как человек, я могу, вследствие досады, писать к другому человеку только с целию оскорбить его; но их -- нет! кто мог хоть на минуту подумать это, тот не знал и не знает меня, мою сущность, индивидуальность, природу, тот отрицает во мне все человеческое. Ты, Мишель, почитаешь причиною моих на них нападок ревность к тебе (да, ревность -- будем называть вещи собственными их именами), и ты обвиняешь меня в ней с такою любовию, так человечески просишь, чтоб я не обиделся. Мишель, Мишель, эти твои слова потрясли все струны моей души, и потрясли их сладостно, отрадно. Нет, я не сержусь на предположение, хотя и ложное само по себе, но высказанное так человечески, так благородно -- жму от души твою руку и повторяю тебе, что в последней половине твоего огромного письма нет слова, за которое можно б было обидеться, потому что нет слова, которое не вышло бы из души, не трепетало бы любовию, жизнию, благодатью. Мишель, Мишель! Напиши мне письмо в сто листов, наполни его клеветами, ложью, обидами, подлостями -- но пусть в нем будет 10 строк, вышедших из души,-- и я пойму, оценю эти 10 строк. Не соглашаюсь с тобою насчет подозрения в ревности к брату; но скажу, что твои отношения к ним и их любовь к тебе -- нет, словами не выразишь того, что они производили во мне: они были проклятием моей жизни целые два года. Но несмотря на это -- не соглашаюсь насчет ревности,-- ее не было и не могло быть; тут были другие причины, которые я тебе уже высказал. Но -- кто знает? может быть, в твоем предположении и есть часть истины. Знаешь ли что: полная и совершенная истина не есть удел человека (исключение остается за одним, но то не человек, а богочеловек); мои отношения к твоим сестрам так странно-интересны для меня самого с психологической стороны, что я могу смотреть на себя, как на объект. В человеке ложь и истина так слиты, как составные части киновари, по прекрасному сравнению Марбаха8. Кто в самых глубоких, самых фанатических убеждениях своих не предполагает возможности ошибки с своей стороны -- тот чужд истине и никогда в ней не будет. Итак, я человек, и могу ошибаться, могу быть неправым в самой правоте своей. В моих отношениях к твоим сестрам так много личного, близкого к моему Я, что -- бог же знает! может быть, что-нибудь как элемент и замешалось в истину, чтобы подпортить ее. Но, Мишель, это предположение только, а не сознание.
   О твоем предположении о причинах странности и запутанности наших дружеских отношений, столь полных недоразумений и отрицаний, буду говорить в своем месте. Я сознал причину этого явления, вполне сознал. Теперь мне ясно все в наших отношениях. Ты говоришь, что в моих глазах, по моему понятию, ты -- пошляк, подлец, фразер, логическая натяжка, мертвый логический скелет, без горячей крови, без жизни, без движения. Отвечаю: да, Мишель, к несчастию, с одной стороны, это правда. Ты в моих глазах раздвоился, и в тебе одном я видел два различные существа: одно прекрасное и высокое, могучее и глубокое; другое -- пошлое донельзя, до невозможности. Движения и жизни я никогда не отрицал в тебе. Но теперь вижу, что дурная сторона твоя была преувеличена в моих глазах, а почему -- о том узнаешь ниже. Мы были в ложных отношениях друг к другу, и потому невпопад и хвалили и бранили один другого. Но об этом в своем месте.
   В начале твоего письма, проникнутом желчным и бешеным остроумием, есть фраза, по-видимому, очень неважная, но крепко зацепившая меня.
   Живая, существующая женщина -- не трагедия Шиллера, которая, окруженная магическою сферою искусства, остается вечно прекрасною, несмотря на всевозможные нападки не понимающего ее вникания.
   Мишель, пора нам оставить эти косвенные и безличные указания на лица; пора дать волю друг другу думать, как думается. Верю твоему уважению к Шиллеру,-- поверь же и ты моему неуважению к нему. У каждого из нас есть свои причины, и оба мы правы. Разумеется, истинное мнение, или (вернее) истинное понимание этого предмета, должно быть,-- и, может быть, кто-нибудь из нас уже и в нем, но пока нет возможности согласиться -- оставим быть делу, как оно есть. Может быть, я и ошибаюсь (человеку сродно ошибаться, говорит Евангелие9 -- и то же говорит толпа, руководствуемая простым эмпирическим опытом); может быть, я и ошибаюсь, но -- право -- слесарша Пошлепкина, как художественное создание, для меня выше Теклы10, этого десятого, последнего, улучшенного, просмотренного и исправленного издания одной и той же женщины Шиллера. А Орлеанка11 --что же мне делать с самим собою! Орлеанка, за исключением нескольких чисто лирических мест, имеющих особное, свое собственное значение, для меня -- пузырь бараний -- не больше! Повторяю: может быть, я и ошибаюсь и, понимая Шекспира и Пушкина, еще не возвысился до понимания Шиллера, но я не меньше тебя самолюбив и горд и не меньше тебя доволен и удовлетворен моим непосредственным чувством для воспринятия впечатлений искусства, без которого невозможно понимание искусства. Когда дело идет об искусстве и особенно о его непосредственном понимании, или том, что называется эстетическим чувством, или восприемлемостию изящного,-- я смел и дерзок, и моя смелость и дерзость в этом отношении простираются до того, что и авторитет самого Гегеля им не предел. Да -- пусть Гегель признает Мольера художником,-- я не хочу для пего отречься от здравого смысла и чувства, данного мне богом. Понимаю мистическое уважение ученика к своему учителю, но не почитаю себя обязанным, не будучи учеником в полном смысле этого слова, играть роль Сеида12. Глубоко уважаю Гегеля и его философию, но это мне не мешает думать (может быть ошибочно: что до этого?), что еще не все приговоры во имя ее неприкосновенно святы и непреложны. Гегель ни слова не сказал о личном бессмертии, а ученик его Гешель эту великую задачу, без удовлетворительного разрешения которой еще далеко не кончено дело философии, избрал предметом особенного разрешения13. Рётшер философски, с абсолютной точки зрения, разобрал "Лира", а Бауман кинул на это гигантское создание царя поэтов, Христа искусства, несколько своих собственных взглядов, уничтоживших взгляды Рётшера (именно на характер Корделии)14. Следовательно, промахи и непонимание возможны и для люден абсолютных, граждан спекулятивной области, и, следовательно, всему верить безусловно не годится. Глубоко уважаю и люблю Марбаха, этого философа-поэта в области мысли; но его прекрасные объяснения второй части "Фауста" мне кажутся логическими натяжками, мыслями, взятыми мимо непосредственного чувства, без всякого его участия15. Опять повторяю -- понимаю возможность ошибки с моей стороны и в этом случае; но символы и аллегории для меня -- не поэзия, но совершенное отрицание поэзии, унижение ее. И знаешь ли, Мишель,-- правду говорит пословица: нет глупца, который бы не нашел глупее себя,-- я не один такой еретик. Кудрявцев, которого эстетическое чувство и художественный инстинкт имеют тоже свою цену и которого светлая голова больше моей доступна мысли, Кудрявцев, недавно прочетший Марбаха и восхитившийся им,-- обрадовался, когда услышал от меня эту мысль, потому что и сам думал то же. Приятно иметь товарищей в резне и ошибках!
   Не буду писать возражений на твою антидиссертацию против моих диссертаций о действительности, не буду потому, что ты прошел молчанием мои главные и фактические доводы, и ответил кое на что, а более всего на то, чего я и не думал говорить или если и говорил, то не так и не в том смысле. Но сделаю несколько беглых заметок и возражений.
   Совершенно согласен с тобою в определении значения и достоинства действительности: оно так хорошо, что я теперь лучше понимаю то, что чувствовал и предчувствовал на этот предмет.
   Напрасно ты выводишь из моих слов заключение, что "действительность легко понять -- стоит только смотреть на нее без всяких предубеждений". Оно и так, да не так. Я разумел действительность не в ее общем и абсолютном значении, а в отношениях людей между собою. Справься с моими письмами, и увидишь, что ты не так понял меня. Разумеется, всякий понимает действительность потолику, поколику понимает ее -- ни больше, ни меньше; но много есть задач и поступков, к которым идет стих Крылова "А ларчик просто открывался"16, и ничего нет смешнее, как Хемницеров Метафизик, рассуждающий в яме о времени и веревке, вместо того, чтобы воспользоваться тем и другим для своего спасения17. Много есть вещей, на которые стоит только взглянуть попростев, чтобы понять их, и особенно много таких вещей в житейских делах и отношениях. Здесь должны бы следовать факты, но я уже писал тебе о них; но так как ты об этом умолчал, то и не почитаю себя вправе возобновлять некончившийся спор, который, сверх того, и никогда не окончится. Без руля и компаса не годится пускаться в море; но, по моему мнению, лучше пуститься в него совсем без руля и компаса, нежели, по неведению, вместо руля взять в руки утиное перо, а вместо компаса -- оловянные часы. Я уважаю мысль и знаю ей цену, но только отвлеченная мысль в моих глазах ниже, бесполезнее, дряннее эмпирического опыта, а недопеченный философ хуже доброго малого. Надо развиваться в мысли, учиться; но, недоучившись, не надо перестроивать на свой лад действительность и других людей. Здесь опять должны б следовать факты -- да ты уже слышал о них от меня...
   Напрасно ты твердишь беспрестанно, что я отложил мысль в сторону, отрекся от нее навсегда и пр. и пр. Это доказывает, что ты, невнимательно читав мои письма, создал себе призрак и колотишь себе по нем, в полной уверенности, что бьешь меня. Это, наконец, смешно и скучно. Повторяю тебе: уважаю мысль и ценю ее, но только мысль конкретную, а не отвлеченную, и уважаю мысль, а не мою мысль; но чувство мое вполне уважаю и вот почему: мое созерцание всегда было огромнее, истиннее, мои предощущения и мое непосредственное ощущение всегда было вернее моей мысли. Однажды навсегда: человек, который живет чувством в действительности, выше того, кто живет мыслию в призрачности (то есть вне действительности); но человек, который живет мыслию (конкретною мыслию) в действительности, выше того, кто живет в ней только своею непосредственностию. Понятно ли? Ясно ли? Еще пояснение -- примером (без примеров и фактов у меня ничего не делается, потому что без них я ровно ничего не понимаю). Петр Великий (который был очень плохой философ) понимал действительность больше и лучше, нежели Фихте. Всякий исторический деятель понимал ее лучше его. По моему мнению, если понимать действительность сознательно, так понимать ее, как понимал Гегель; но много ли так понимают ее? Пятьдесят человек в целом свете; так неужели же все остальные -- не люди?
   Мой эмпирический опыт, Мишель, не совсем эмпирический; ты поторопился немного своим приговором. А все оттого, что не понял меня. Я мыслю (сколько в силах), но уже если моя мысль не подходит под мое созерцание или стукается о факты -- я велю ее мальчику выметать вместе с сором. Объясню это фактом: некогда я думал, что поэт не может переменить ни стиха, ни слова; мне говорили, что черновые тетради Пушкина доказывают противное, а я отвечал: если б сам Пушкин уверял меня в этом -- я бы не поверил. Такой мысли я теперь не хочу и не ставлю ее ни в грош.
   Напрасно ты также отрицаешь во мне всякое движение: желаю всякому так подвигаться, как я двигался от масленицы (за день или за два до твоего отъезда к Беерам18) прошлого года до минуты, в которую пишу к тебе это письмо. Мои письма к тебе, которые тебя так восхитили, мой журнал19, в котором ты также многим (собственно моим) восхищаешься,-- показывают, что моего движения -- довольно с меня. Да, Мишель, меня не станет, не хватит для большего движения, и если вперед пойдет так же -- я доволен. Не бойся, что я сделаюсь Шевыревым или Погодиным: твое опасение, конечно, внушенное тебе любовию ко мне, совершенно излишне. Для меня это совершенно невозможно, и вот почему: эти люди опошлились оттого, что вышли из бесконечной сферы благодатного созерцания в конечную сферу своей мысли. Нет, Мишель, я не буду любителем буквы, ни книжным спекулянтом. Повторяю: оставь сбою мысль, как ложную и несправедливую, что во мне оканчивается или когда-нибудь окончится движение: я слишком беспокоен для этого. Не боюсь за мою будущую участь, потому что знаю, что буду тем, чем буду, а не тем, совсем не тем, чем бы сам захотел быть. Есть простая мысль, принадлежащая бессмысленной толпе: "Все в воле божией"; я верю этой мысли, она есть догмат моей религии. "Воля божия" есть предопределение Востока, fatum {рок (лат.). -- Ред.} древних, провидение христианства, необходимость философии, наконец, действительность. Я признаю личную, самостоятельную свободу, но признаю и высшую волю. Коллизия есть результат враждебного столкновения этих двух воль. Поэтому -- все бывает и будет так, как бывает и будет. Устою -- хорошо; паду -- делать нечего. Я солдат у бога: он командует, я марширую. У меня есть свои желания, свои стремления, которых он не хочет удовлетворить, как ни кажутся они мне законными; я ропщу, клянусь, что не буду его слушаться, а между тем слушаюсь, и часто не понимаю, как все это делается. У меня нет охоты смотреть на будущее; вся моя забота -- что-нибудь делать, быть полезным членом общества. А я делаю, что могу. Я много принес жертв этой потребности делать. Для нее я хожу в рубище, терплю нужду, тогда как всегда в моей возможности иметь десять тысяч годового дохода с моей деревни -- неутомимого пера. Говорю это не для хвастовства, а потому, что ты задел меня за слишком живую струну, не отдал мне справедливости в том, в чем я имею несомненное и не совсем незначительное значение. Я уже не кандидат в члены общества, а член его, чувствую себя в нем и его в себе, прирос к его интересам, впился в его жизнь, слил с нею мою жизнь и принес ей в дань всего самого себя. У меня тоже есть дело, которое не ниже и не хуже дела всякого другого. Я знаю, что будет со мною, добрым, несносным и смешным малым, если бог не даст мне ни хорошей и доброй жены, ни милых детей, ни порядочного состояния (почетного имени в гражданстве я не желаю, потому что не сомневаюсь его иметь, и даже теперь имею его в известной степени); да, я знаю, что будет со мною, добрым, несносным и смешным малым: для меня не будет в жизни блаженства, и жизнь не будет блаженством, но всегда будут минуты блаженства -- ложка меду да бочка дегтю. И это оттого, что я есть Я, что мимо этих смешных идиллических и непонятных для великих людей условий я не понимаю и не желаю никакого блаженства. Да, я по-прежнему буду делать, буду жить, чтоб мыслить и страдать20, многим, может быть укажу на возможность блаженства, многим помогу дойти до него, многих заставлю, не зная меня лично, любить, уважать себя и признавать их обязанными мне своим развитием, минутами своего блаженства; но сам, кроме минут, буду знать одно страдание. Так, видно, богу угодно. Не всем одна дорога, не всем одна участь. В этом случае я позволю себе сделать тебе указание на собственное твое семейство, потому что это указание не может быть оскорбительно ни для него, ни для тебя. У тебя четыре сестры; все они или каждая из них представляет собою особное прекрасное явление, но одна отделилась ото всех и отделилась резко21. Это та, которой уже нет и которую вы все так справедливо называете святою. Она пользовалась блаженством жизни, как своею собственностию: благодать, гармония, мир, любовь были не качествами, украшавшими ее, но, вместе взятые, представляли собою живое явление, которое вы все называли сестрою своею. Страдание вследствие внутренней разорванности и томительных порываний было чуждо ее натуре; но другие: им хорошо знакомо страдание, оно есть необходимое условие их индивидуальностей. Видишь ли,-- не все люди на один покрои, и часто то, чем один пользуется ежедневно, как пищей и воздухом, другому дается, как праздничное блюдо,-- про воскресный день. Я знаю, что тебя это не приведет в смущение, ты скажешь, что для всякого есть выход в мысли и всякий может достигнуть абсолютного, полного, без перерывов блаженства посредством мысли. На это я не возражаю тебе, потому что это выше моего понятия, моего созерцания. У меня надежда на выход не в мысли (исключительно), а в жизни, как в большем или меньшем участии в действительности, не созерцательно, а деятельно. Но не об этом дело; обращаюсь к моему сравнению. Но на земле -- блаженство есть исключение, и эта святая, этот чистый небесный ангел должен был расплатиться дорогою ценою за свое блаженство: то, что должно было упрочить его блаженство, осуществить его таинственные предчувствия, то и погубило его -- и он в страданиях оставил эту прекрасную, но бедную землю,-- как прекрасно и верно ты выразился в одном из своих писем ко мне,-- и улетел туда, где лучше, чем здесь. Теперь другое сравнение, которое еще ближе идет к делу. Вот два характера -- Боткин и я. Он всегда в гармонии и всегда в интересах духа: ко всем внимателен, со всеми ласков, всеми интересуется; читает Шекспира, немецкие книги, хлопочет о судьбе и положении книжек "Наблюдателя" часто больше меня, покупает очерки к драмам Шекспира22, по субботам и воскресеньям задает квартеты, в которых участвует собственною персоною, с скрыпкою под подбородком, ездит в театр русский и французский,-- словом, живет решительно вне своего конечного Я, в свободном элементе бытия, всегда веселый, ясный, светлый, доступный мысли, чувству, и ежели грустит временем, то все-таки без подавляющего дух страдания. Смотрю на него -- и дивлюсь. А я -- не только все страдание, самое блаженство мое тяжело, трудно и горестно23; любовь и вражда, новая мысль, новое обстоятельство -- все это во мне тяжело и трудно и горестно. Только в немногие минуты и часы, когда я бываю добрым малым и, чуждый всякой мысли, без видимой причины, бываю весел, в каком-то музыкальном состоянии -- только тогда и дышу свободно и весело. Недавно сказал он мне, что грустно было бы ему стоять над моею могилою, потому что в ней было бы схоронено бедное, разбитое сердце, жаждавшее жадно блаженства и никогда не знавшее его. Что ж с этим делать? Ему бог дал -- мне нет -- его воля! Ты скажешь: надо мыслию достигнуть... а я отвечу... да нет -- я ничего не отвечу тебе. Драма жизни так устроена, что в ней нужны персонажи всех родов: видно, и моя роль нужна. Если б зависело от меня, я попросил бы другой, да видишь -- этих просьб не уважают -- велят быть, чем им, а не мне, хотелось бы быть. Итак, буду играть роль, которая мне дана, и буду подвигаться к той развязке, которая мне предназначена. Что же касается до моего развития,-- если оно было до сих пор, то будет и после, и ты ошибаешься, думая, что оно остановилось. Нет, оно идет, как шло, и так же будет идти, если ты не лжешь, что оно шло. Мои отношения к мысли останутся теми же, какими были всегда. По-прежнему меня будет интересовать всякое явление жизни -- и в истории, и в искусстве, и в действительности; по-прежнему буду я обо всем этом рассуждать, судить, спорить и хлопотать, как о своих собственных делах. Только уже никогда не буду предпочитать конечной логики своей своему бесконечному созерцанию, выводов своей конечной логики бесконечным явлениям действительности. Есть для меня всегда будет выше знаю, а премудрые слова премудрого Шевырева: по логике-то так, да на деле-то иначе, всегда будут для меня премудры.
   Только дурное расположение духа, яснее -- злость, пробудившаяся вследствие оскорбленного самолюбия, могли тебя заставить сказать о bon vivant и bon camarade и религию Беранже делать моею релпгиею24. Против этого не почитаю за нужное и оправдываться. Не только моими письмами не подал я повода к подобному заключению, но одной уже моей инстинктуальной, непосредственной и фанатической ненависти к французам и всему французскому достаточно для того, чтобы защитить меня от подобных комментарий.
   Ты называешь мой взгляд на действительность механическим. Я этого не думаю, но возражать тебе не буду. В логике я не силен, а фактов ты не любишь. Впрочем, я понимаю, как труден и невозможен для решения между нами подобный вопрос. Погодим, посмотрим,-- пусть теорию каждого из нас оправдает наша жизнь. По моему ограниченному понятию действительность человека состоит в его пребывании в действительности, которое выражается тождеством его слова и дела, успехом его в том, в чем он почитает себя необходимым успевать. Я видывал людей, которые таким непосредственным образом успевали не в одних пошлых житейских предприятиях, но и в том, что составляет человеческую сущность их жизни.
   Нападая на меня за то, что я будто бы отвергаю необходимость распадения и отвлеченности, как необходимых моментов развития,-- ты опять колотишь по призраку, тобою же самим созданному, думая бить меня. Но от этаких побой больно не мне -- а ты только устанешь и отколотишь себе руки. Отвергнув необходимость распадения и отвлеченности как моментов развития, я отказался бы от здравого смысла и показал бы себя человеком, с которым нечего толковать и спорить, жалея времени, бумаги и чернил. Нет, ты меня не понял, или -- что вернее -- не хотел понять, потому что это тебе было выгоднее, нужнее, нежели понять меня. Самый важный период моего распадения и отвлеченности был во время моего пребывания в Прямухине, в 1836 году. Но это распадение и эта отвлеченность были ужасным злом и страшною мукою для меня только в настоящем, а в будущем они принесли благодатные плоды, заставив меня сурьезно подумать и передумать обо всем, о чем я прежде думал только слегка, и стремиться дать моему образу мыслей логическую полноту и целость. Итак, меня нисколько не мучит мысль, что я был в распадении, в отвлеченности, во время моего пребывания в Прямухине; но мне горько и обидно вспомнить, что я, будучи в этом распадении, в этой отвлеченности, был еще в недобросовестности, рисовался, становился на ходули. Ты помнишь, какую фразу отпустил я за столом и как подействовала она на Александра Михайловича; но знаешь ли что? -- я нисколько не раскаиваюсь в этой фразе и нисколько не смущаюсь воспоминанием о ней: ею выразил я совершенно добросовестно и со всею полнотою моей неистовой натуры тогдашнее состояние моего духа. -- Да, я так думал тогда, потому что фихтеянизм понял, как робеспьеризм, и в новой теории чуял запах крови. Что было -- то должно было быть, и если было необходимо, то было и хорошо и благо. Повторяю: искренно и добросовестно выразил я этою фразою напряженное состояние моего духа, через которое необходимо должен был пройти. Но когда я забыл приличие, за ласку и внимание почтенного и благородного старца начал платить дерзким и оскорбительным презрением его убеждений и верований, не почел нужным, живя в его доме и пользуясь его хлебом-солью, предложенным мне со всем радушием, не почел нужным, ради приличия и здравого смысла, прибегнуть в некоторых отношениях к неутралитету и внешностию прикрыть мои внутренние отношения к нему; когда учительским тоном и с некоторою ироническою улыбкою говорил с твоими сестрами, которые без мыслей и рассуждений своим глубоким и святым чувством жили в той истине, которой я в то время даже и не предчувствовал,-- тогда я был недобросовестен, пошл, гадок. Но и это еще ничего бы, если бы все это проявлялось непосредственно и бессознательно -- тогда это показало бы пошлое состояние духа; но худо то, что я чувствовал, понимал свои проделки и фигуры; совесть и здравый смысл (а это было одно из таких обстоятельств, где почтенный здравый смысл -- все), совесть и здравый смысл громко кричали мне в оба уха, что я фарсер, фразер, шут, но я собственноручно затыкал себе уши хлопчатою бумагою гаерского величия. Боже мой! как живо, как глубоко чувствовал я, что чтение второй статьи было бы самым пошлым, диким, шутовским и мерзким поступком; но... мне надо было блеснуть моим уменьем пописать и почитать...25 Я бы мог прочесть эту статью одним им, так что, кроме тебя и их, никто о ней и не знал <бы>, или -- еще лучше, дать им самим прочесть. И что же? -- Я в другой раз читал ее особенно для Татьяны Александровны и Любови Александровны, воротившихся из Москвы; я видел, как трудно было выбрать время для этого проклятого чтения, видел их нерешительность, чуть ли даже и неохоту, понимал причину всего этого... но мне надо было поддержать мою глупую роль, надо было идти наперекор моему непосредственному чувству и здравому смыслу, чтоб не изменить теории, созданной не Фихте, а моим фразерством, моею недобросовестностию, моею охотою рисоваться... Роль была противна моей природе, моей непосредственности, но я почел долгом натянуться, изнасиловать себя... И вот я читаю во второй раз мою статью -- старик ходит из залы в спальню через гостиную (где я ораторствую, с напряженным восторгом за отсутствием свободного, вследствие сознания пошлости своего поступка), ходит и покрякивает,-- а потом самым деликатным, самым кротким образом намекнул мне, что это ему неприятно... мне было гадко от самого себя,-- но я был философ и даже совесть и здравый смысл принес на жертву философии фразерства (потому что истинная мыслительность тут была не виновата). Итак, видишь ли, Мишель, я не упрекаю себя за кровожадный образ мыслей, потому что он был действительно моим убеждением в то время, был необходимым моментом моего развития; я прощаю себе много пошлостей и с другой стороны: там, по крайней мере, важна была причина и могла свести с ума, хотя при большей добросовестности я избег бы большей части пошлостей и с этой стороны. Но многого я не могу простить себе (потому что это многое отнюдь не было моментом, а было просто недобросовестностию, которая оправдывалась логическими натяжками, и этого многого легко б было совсем избежать, следуя внушениям непосредственного чувства и здравого смысла. Представь себе человека, который имеет душу живу, чувство, ум, понимает пошлость громких фраз и живописных положений -- вдруг полюбит девушку и, не позаботясь справиться о ее взаимности, при всех людях подошел бы к ней с пышным жан-полевским объяснением и клятвами в вечной любви26 -- и все это от презрения к обыкновениям и приличию; не похож ли бы он был на Хлестакова, который говорит о себе, что "хочет заняться чем-нибудь высоким, а светская чернь его не понимает"?27 -- Это я, Мишель, это моя история того времени и причина большей части тогдашних моих мучений. А все отчего? -- от-ïoro, что чувство говорило одно, а логика другое, и еще потому, что, льстя своему самолюбию, я насильно отвлекался от всего, в чем видел себе щелкушку, и заставлял себя осуществлять пошлые идеи. Неужели это момент? Если хочешь -- момент, но ведь и пьяное состояние есть тоже момент в этом смысле. Когда я говорил о головах,-- у меня чувство и ум были согласны в чудовищном убеждении и отвлеченная мысль была поэтому конкретною,-- и я в этом не раскаиваюсь. Но натягиваться верить тому, чему не верится, отдаться мысли, которой нет в созерцании и которая в противоречии с созерцанием -- это значит предаться логическим хитросплетениям. Отсюдова до недобросовестности, фразерства и ходули -- один шаг, потому что, сделавши раз опыт вертеть по воле своими убеждениями и верованиями через логические выкладки, после уж нипочем играть истиною, как воланом. Я нисколько не смущаюсь нашею общею охотою обращать всех на путь истины -- и Вульфов и Дьякова: это даже достолюбезно, и именно потому, что было моментом. Воспоминание об этом забавляет меня; но, чувствуя в душе отсутствие истины, благодати, любви и ощущая в ней пустоту и убожество, говорить учительским тоном и с чувством своего превосходства с такими существами, которые были полны любовию и благодатию и своею святою непосредственностию жили в истине,-- это не момент, а пошлость, шутовство; потом дойти до забвения приличий, до самых смешных глупостей, ораторствовать в чужом доме и за приязнь, ласку и хлеб-соль платить дерзостями,-- это тоже не момент, а черт знает что -- только поплевать да бросить28. К чести моей скажу, что ни Боткин, ни Клюшников и никто (не говорю уже о Станкевиче, которого непосредственное чувство -- мистицизм, как мы некогда называли его, и верный такт делали решительно неспособным к такой идеальности), и никто не дошел бы до такого момента. Момент условливается необходимостию, а призрачность -- случайностию, и в этом большая разница. Итак, Мишель, я и не думал нападать на моменты своего развития. Я даже примирился и с католическим периодом моей жизни, когда я был убежден от всей души, что у меня нет ни чувства, ни ума, ни таланта, никакой и ни к чему способности, ни жизни, ни огня, ни горячей крови, ни благородства, ни чести, что хуже меня не было никого у бога, что я пошлейшее и ничтожнейшее создание в мире, животное, скот бессмысленный, чувственный и отвратительный. Да, я признал и сознал и необходимость и великую пользу для меня этого периода: теперешняя моя уверенность в себе и все, что теперь есть во мне хорошего, всем этим я обязан этому периоду, и без него ничего хорошего во мне не было бы. У Ивана Петровича Клюшникова этот момент был еще ужаснее, потому что чуть не довел его до смерти или сумасшествия; но зато Иван Петрович теперь олицетворенная гармония, благодать, святость. Фихтеянизм принес мне великую пользу, но и много сделал зла, может быть, оттого, что я не так его понял: он возбудил во мне святотатственное покушение к насилованию девственной святости чувства и веру в мертвую, абстрактную мысль. Кто понимает действительность отвлеченно, но в то же время и живо -- тому еще не за что клясть своего прошедшего и даже можно благословлять; но кто, не понимая мысли, увлекается только ее логическою необходимостию без внутреннего, чувственного убеждения в ее истинности, тому есть за что сердиться на себя. И опять-таки скажу, твой фихтеянизм имел другое значение, нежели мой: ты и понимал его глубже и он для тебя был последовательным переходом из одного момента в другой; а я прогулялся по нем больше для компании, чтобы тебе не скучно было одному. Ты все твердишь, что ты и не думал насильно втаскивать меня в него; правда, потому что и не мог этого сделать, ведь я не ребенок, а ты не сумасшедший, сорвавшийся с цепи из желтого дома. Здесь я невольно дошел до другого вопроса, соприкосновенного с этим, до вопроса о твоем авторитете надо мною и Боткиным прошлою весною. Ты говоришь, что это обвинение так нелепо, что ты не хочешь и оправдываться. Понимаю твою тайную заднюю мысль: ты хочешь сказать, что не твоя воля, старание и усилия, а твое превосходство над нами невольно наложило на нас этот авторитет. Если хочешь, в этом есть своя сторона истины: мы ставили тебя высоко, очень высоко, невольно увлекаясь сильным движением твоего духа, могуществом твоей мысли, этим тоном непоколебимого убеждения в своем образе мыслей,-- и это было хорошо; но мы подгадили дело унижением самих себя на твой счет, робкою, детскою добросовестностию. Первое было истинно, потому что в тебе все это есть, и за все это тебя нельзя не ценить очень, очень высоко,-- и ты по праву пользовался нашим уважением и почитал его своею собственностию; но второе было ложно,-- и твоя ошибка состояла в том, что ты никогда не хотел дать себе труда вывести нас из ложного понятия о нашем ничтожестве перед тобою. Ты об этом пункте, может быть бессознательно, только умалчивал и только своею непосредственностию высказывал истинное свое мнение о нас, которое было таково: "Вы сами по себе люди с весом и достоинством, люди недюжинные, но я знаю свое превосходство над вами". Сверх того, во всех спорах на твоем лице и в твоей непосредственности выражалась (и очень ясно) такая задняя мысль: "Ты можешь мне и не поверить, можешь со мною и не согласиться,-- вольному воля, спасенному рай, но в таком случае ты пошляк". А нам не хотелось быть пошляками в твоих глазах, потому что это значило для нас в самом деле быть пошляками,-- и мы заставляли себя убеждаться в непреложной истинности твоих идей. Разумеется, это было тяжким игом, которое самостоятельные натуры не могли долго носить на себе. Так (отчасти, впрочем) принял я от тебя фихтеянизм; так Боткин убедился, что ему надо учиться философии, бросить амбар и не сметь писать статей о музыке. Отсюда вечная враждебность в наших отношениях к тебе. Я никогда не забуду (есть вещи, которые никогда не забываются), какую явную холодность и какое явное презрение стал ты мне оказывать, когда я наотрез объявил тебе, что хочу жить своею жизнию, своим умом, развиваться самобытно, хочу издавать журнал и судить и рядить в нем, ничего не зная, ничему не учась. Я никогда не забуду, как однажды, пришедши домой из бани и заставши меня у Боткина, ты не хотел сказать мне слова, но с злою и насмешливо-презрительною улыбкою принялся за книгу, которую, по моем уходе, тотчас же бросил, по обыкновению, для болтовни с Боткиным. Вот в чем заключалась гадкая сторона твоего авторитета (а в нем была и хорошая сторона) над нами, которая заставила нас с таким ожесточением и остервенением восстать против тебя и произвела первую полемическую переписку. Я знаю и уверен, что ты всегда обоих нас и любил и уважал, но объективно и как явления, достойные внимания, любви и уважения, но низшие в сравнении с тобою. Это всегда высказывалось в твоей непосредственности и высказывалось так резко, что даже добрый Кетчер, чуждый нашего круга и отношений, один раз при тебе сказал (под видом шутки), что ты нас надуваешь. И ты наконец это выговорил, или проговорился. В первый раз -- по приезде в Москву после полемической переписки, обедая с Боткиным вдвоем: "Васенька и Висяша вздумали меня учить". В самом деле, с нашей стороны это была непростительная дерзость! Нам надо было только поучаться у тебя, а мы вздумали, в свою очередь, поучить тебя! В другой раз ты это выговорил (или проговорился) мне в Прямухине, у себя в комнате, вечером, в задушевном разговоре о важном для меня предмете... помнишь?..
   Здесь кстати возразить на твою мысль о прозелитизме. Ты говоришь, что я, вместе с тобою, бесновался этою, впрочем, очень понятною страстию, что мои письма к тебе и мой журнализм выходят из нее же. Так, но дело часто не в деле, а в манере, с которою оно делается, или в непосредственности человека, которая одна дает делу колорит и характер и условливает худое или хорошее действие его на других. Потом, во всем есть мера, и всему есть мера. Пока дело идет об идеях, вне их применения к жизни, я был не меньше тебя смел на поприще прозелитизма; но когда дело касалось до применения -- я имел благоразумие, знаешь, этак немножко в сторону или по крайней мере не имел никогда ни охоты, ни силы преследовать человека в качестве ментора и постоянно поддерживать и удерживать его на указанной ему мною дороге. Нет, Мишель, только в кровавый, безумный период моей отвлеченности, в 1836 году, я смело давал Рецепты от всех душевных болезней и подорожные на все пути жизни. Но и тогда, если бы попросили моего совета в важном обстоятельстве жизни и я знал бы, что мои совет решит участь человека,-- я -- нет, страшно подумать, что я дал бы его; но если бы и дал, то создал бы себе этим жгучий ад. Начиная же с моего восстания против тебя еще в великом посту нынешнего года, я уже сказал себе -- ни! Журнал -- дело другое: его действие общее, которое не рассчитывает на известную индивидуальность известного человека. Что же касается до писем к тебе, то ниже ты увидишь объяснение, почему я ими срезался, а я ими ужасно срезался...
  
   Я не стану доказывать ложности его (Клюшникова и твоего мнения насчет сестер и на мой собственный счет; ты, может быть, скажешь, что это был бы лишний труд и что трудно и невозможно было бы разуверить тебя в мысли, основанной на стольких данных и на мнении толпы, глупый голос которой, по твоей теперешней философии, есть святой голос истины; почему знать? -- может быть, я нашел бы в своем запасе трансцендентальностей и логических штук такие доказательства, которые могли бы потрясти даже твою страшную действительность с ее стальными зубами и когтями.
  
   Мишель, это место в твоем письме так понравилось мне, что я почел нужным выписать его и на твою лирическую выходку ответить таковою же. Во-первых: в твоем длинном письме, первая и большая половина которого, точно, богата трансцендентальностию и логическими штуками, я не нашел решительно ничего, ни слова, ни буквы, что бы могло потрясти мою железную действительность с ее стальными зубами и когтями; но нашел очень много такого, что еще более укрепило ее. Во-вторых: не хочу и не почитаю себя более вправе подтверждать своего мнения насчет того, что я уважаю не меньше тебя, но не могу не заметить, что это мнение было основано мною не на мнении глупой толпы, а на мнении и непосредственном впечатлении моем и таких людей, которые, без всякого сомнения, далеко глупее и ниже тебя, но которые, тем не менее, в глазах моих люди, достойные всякого уважения, и не только ничем не ниже и не хуже меня, но скорее, может быть, что выше и лучше меня. В-третьих: я никогда и не думал уважать мнение толпы, которая толпа в салонах и на площадях, и в кабаках и которая убивает бессмысленным злословием честь женщины, счастие мужчины, благосостояние семейства. Нет, но я всегда глубоко уважал и буду уважать тот народ, о котором сказано: "глас божий -- глас народа", и который, есть живая, олицетворенная субстанция, которой образованные люди суть определения, есть резервуар идеи, действий, осуществляемых и сознаваемых индивидами. Есть разница между толпою, обществом и народом. Кстати, выпишу тебе мнение Гейне на этот счет:
   Масса, народ не любит насмешки. Народ, как гений, как любовь, как лес, как море, по природе важен; он чуждается остроумного злословия гостиных и объясняет великие явления глубоким, мистическим образом29,

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   Но добрый малый никак не должен позабывать, что терпимость, добрадушие и уважение к чужим непосредственностям должны быть его главными свойствами; в противном случае он из доброго превращается в несносного малого.
  
   Правда, Мишель, истинная правда. Это самое я уже давно хлопочу растолковать тебе, и вижу, наконец, что ты начинаешь понимать...
  
   Добрый малый никак не должен позабывать, что его непосредственность не более, как его собственная, частная, ограниченная непосредственность, и потому она не может быть меркою, законом для других непосредственностей, которые имеют точно такое же право на свободу и самостоятельность, как и она.
  
   И это, Мишель, точно такая же святая и непреложная истина, как и та, если бы Я сказал: "Никто (добрый малый или недопеченный философ -- все равно) не должен забывать, что его мышление есть не более, как его собственное, субъективное, частное и ограниченное мышление и что он не имеет никакого права наказывать кого бы то ни было своим презрением за право сметь свое суждение иметь30, и что, в противном случае, от него могут отпасть все люди, которые горячо его любили за его прекрасную, глубокую сущность, и сделать удачную попытку, чтоб не остаться в долгу, померять своею непосредственностию его непосредственность, для оправдания пословицы: как аукнется, так и откликнется, и из судьи сделать его подсудимым, и с судейских кресел, на которых ему было так ловко и хорошо восседать и произносить свои приговоры, ссадить его на скамеечку". Что правда, то правда!..
  
   Добрый малый не должен забывать, что, отказавшись от всякого идеализма, то есть от всякой претензии узнать истину, и от всякой самостоятельной и свободной мысли, он выходит из характера доброго малого и делается несносным и смешным, когда он позволяет себе изрекать анафему и посылать ватиканские громы на других людей, во имя своей бедной, ограниченной непосредственности.
  
   И это точно такая же святая истина, как и та, если бы Я сказал: "Никто (то есть ни добрый, несносный и смешной малый, ни недопеченный философ) не должен забывать, что или не должно умышленно приписывать другим того, чего, они не говорили и не делали, или что должно лучше понимать их слова и поступки, а не мерить их на свой аршин". Да, он (то есть добрый малый или недопеченный философ) не должен разуметь под идеализмом стремление к истине, когда этим словом ему явно и ясно выразили фразерство, ходули, блуждание вне действительности, рисование собою, романическое и философское интересничание, желание своим положением, словами и поступками показывать свое величие над чернию и толпою и каждый день твердить: "хочешь заняться чем-нибудь высоким, а светская чернь тебя не понимает", словом, то пошлое прекраснодушие, которое воспел великий поэт Шиллер в "Разбойниках", "Коварстве и любви", "Фиеско" и во многом другом и которое Жан-Поль выразил, как клятвы друзей при луне и пр. и пр. Он (то есть добрый малый или недопеченный философ) не должен обращение к разумной простоте и отсутствие прекраснодушных претензий толковать обращением к той простоте, которая только просто ест и пьет и состоит в невежестве и отсутствии духовных интересов, но, напротив, ему бы следовало (по законам добросовестности) понять эту простоту, как желание, сознавши (например) необходимость знания немецкого языка, не кричать о своем намерении скоро приняться за него, но приняться в самом деле, или не кричать совсем; взявшись сделать дело, точно сделать его, вместо того чтобы явиться к тому, кто дал дело, с эффектными объяснениями и пр. и пр. Он (то есть добрый малый или недопеченный философ) не должен забывать, что, давши своему другу право писать обо всем, что, получивши от него первую посылку ватиканских громов, сказавши: "Между нами является новый предмет полемики -- будем спорить",-- ему бы следовало, хоть из уважения к самому себе, не сердиться и не язвить за эти громы, но если они ему не нравятся, просто сказать бы, что он их не хочет больше получать.
   Итак, вот тебе, Мишель, мои ответные пункты на твои вопросные пункты. Согласись, что ответы стоят вопросов. Что делать? -- говоря со мною таким языком, надо быть готовым услышать язык еще резче. Я не люблю уступать, это не в моей натуре. Построениями и выводами меня не затуманишь и не запугаешь. Окончание письма твоего, чуждое выводов и построений, но проникнутое силою, жизнию и любовию, гораздо больше озадачило меня; но начав писать ответ, я снова принужден был перечесть 15 листов твоего письма, написанных по вдохновению злости, возбужденной обиженным самолюбием, и я сам воодушевился... Твои советы доброму малому очень хороши, но ты ближе попал бы, куда надо, если бы вместо их дал следующий:
   "Добрый малый имеет право говорить правду только друзьям и своим людям, а с чуждыми и внешними себе, хотя бы то и прекрасными явлениями жизни, должен только рассуждать о правах дружбы и только от них принимать правду".
   Я не хотел говорить о том, о чем ты не хочешь (по известным тебе и не безызвестным мне причинам), то есть говорить о них31, но должен еще раз упомянуть. Мои письма их оскорбили-- я не ожидал этого,-- потому что был бы подлый и пошлый человек, если б взялся за такое дело, зная вперед, что результатом его будет только оскорбление. Но кто виноват, что я написал такие письма и заговорил о них таким тоном? Кто виноват во всех этих недоразумениях, которые вновь и с такою силою восстали между нами? На этот вопрос легко отвечать: ложность наших взаимных отношений. В дружбе, как и в любви, нет страха, потому что дружба, как и любовь, есть гармония двух понимающих друг друга субъектов, соединенных общим в их частных индивидуальностях, обстоятельствами жизни и самою привычкою. Друг мне тот, кому все могу говорить. Я его обвиняю; обвинения эти жестоки, но неосновательны; что ж из этого? -- Мой друг через это еще больше сознает свою правоту, свое превосходство передо мною в вопросном деле и выгодность своего положения передо мною. Чем резче, неприличнее тон моих писем, тем спокойнее и деликатнее он отвечает; я ругаюсь -- он советует не горячиться напрасно, чтоб после не было стыдно. Мои нападки становятся все резче, жесточе, мои выражения несноснее; он советует на время прекратить спор или делает что-нибудь другое, только совсем не то, что сделал ты со мною. Мои письма смесь правды с ложью (как это всегда, бывает в делах человеческих); мой друг признается в справедливых обвинениях, благодарит меня за них и просит впредь не скрывать от него правды; ложные обвинения отрицает без желчи, злости и остроумия, именно потому, что они ложны. Я, Мишель, эмпирик, и потому бешенство за обвинения или оскорбления их толкую простою русскою пословицею -- правда глаза колет. Нет, не было и нет между нами дружбы: последний твой поступок ясно доказал мне это. Ложные отношения произвели ложные следствия. Надо, наконец, уяснить дело. Ты догадываешься, что мы не друзья: в письме ко мне ты намекнул об этом, в письме к Боткину ты выговорил это. Давно пора! Но я сознал это тотчас по получении твоей записки с копиею.
   Было время, и ты говорил мне: "Белинский, как любят тебя сестры: ты вошел в жизнь их". Недавно ты писал ко мне, что они еще более любят меня теперь, и дух их теперь еще более слился с моим духом. Вижу, Мишель, что я дурно растолковал значение слов твоих, что я худо понял мои отношения к ним, почтя себя вправе довести через тебя мое мнение о их положении, которое показалось мне странно; Мишель, прошу у них прощения в моем поступке, неуместном и пошлом, как вижу теперь сам; прошу прощения и у тебя за поступок мой с ними...
   Но что касается до тебя,-- с тобою у меня другие счеты и другие объяснения. Тут я имел право и ошибиться, опираясь на твои слова, или -- вернее сказать -- на твою ошибку того же рода.
   Я познакомился с тобою в 36 году. Твоя непосредственность не привлекла меня к тебе -- она даже решительно не нравилась мне; но меня пленило кипение жизни, беспокойный дух, живое стремление к истине, отчасти и идеальное твое положение к своему семейству,-- и ты был для меня явлением интересным и прекрасным. Но задушевного, непосредственного, инстинктуального влечения, повторяю, у меня к тебе не было. Две другие причины завязали еще более нашу дружбу. Тогда я думал, что не личность, не непосредственность человека завязывает узел дружбы: я стремился к высокому, ты также, следовательно, ты мне друг: вот тогдашние (недавно, очень недавно сделались они для меня прошедшими) мои понятия о дружбе. Сверх того, имя твоих сестер глухо и таинственно носилось в нашем кружку, как осуществление таинства жизни,-- и я, увидев тебя первый раз, с трепетом и смущением пожал тебе руку, кап их брату. До отъезда твоего в Прямухино ты был занят Веерами, и обстоятельства не сближали нас. Ты стал давать уроки -- послал к дядюшке билет визитный "maître des mathémathiques M. Bacounine"; {учитель математики М. Бакунин (фр.). -- Ред.} так как я тогда любил идеальность, а не простоту,-- этот поступок восхитил меня. В истории твоей с В. К. Ржевским32 мое чутье чуяло больше шуму, нежели сущности, но понятие восторжествовало над непосредственным чувством -- и ты еще выше стал в моих глазах. Я видел, что ты пристально читал Фихте и был от него в восторге: это еще более подняло тебя в моих глазах. Ты перевел несколько лекций Фихте для "Телескопа"33, и в этом переводе я увидел какое-то инстинктуальное, но сильное знание языка русского, которому ты никогда не учился, увидел жизнь, силу, энергию, способность передать другим своп глубокие впечатления. Я стал смотреть на тебя, как на спутника по одной дороге со мной, хотя ты шел и своею. Все это еще более возвысило тебя в моих глазах, и должно было возвысить,-- и я все более и более смотрел на тебя, как на друга. Станкевич уехал34. Вскоре после него и ты умчался в Прямухино. Прощаясь со мною, ты звал меня к себе; от этого приглашения (как теперь помню) у меня потемнело в глазах и земля загорелась под ногами. Но я не умел представить себя в этом обществе, в этой святой и таинственной атмосфере; но, тем не менее, твое приглашение было доказательством твоей любви и уважения ко мне. Это я умел оценить. Ты уехал. У меня уже в то время давно завязалась история с гризеткою, дорого стоившая мне. Финансовые обстоятельства мои были гадки донельзя. Ты прислал мне семьдесят пять рублей своих денег. Здесь, Мишель, я остановлюсь, чтобы показать тебе, что не только твои худые стороны не закрывают от меня хороших, как ты думаешь, но что и на самые худые твои стороны, взятые сами по себе, я смотрю беспристрастно, без враждебности, и что при исчислении твоих пятен эта мнимая враждебность есть не что иное, как глубокое, болезненное оскорбление, и оскорбление все за тебя же. Ты, Мишель, составил себе громкую известность попрошайки и человека, живущего на чужой счет. В самом деле ты много перебрал и перепросил денег; но я -- разве я меньше тебя делал и того и другого? -- думаю, что решительно больше. Я должен даже Марье Афанасьевне, князю Голицыну, Н. Ф. Павлову, Аксакову-отцу (сыну -- тоже, да это особая статья, которая, однако ж, тем неприятна, что известна Аксакову-отцу). И что же? на меня никто не смотрит, как на попрошайку, как на человека, живущего на чужой счет, никто, даже и те, на чей счет я действительно живу; а на тебя это обвинение пало, как проклятие, даже со стороны твоих друзей. Отчего это? Тут есть две причины. Первая -- ты просишь и берешь легко и легкомысленно; все видят, каких мучений стоит мне это и какую важность придаю я всякому гривеннику, который я беру у других. Вторая -- я тружусь, и тружусь, как вол, с самоотвержением, с презрением собственных выгод, а между тем бедствую совсем незаслуженно -- это всем известно, и за это мне никто не ставит в вину того, что в самом деле вина, потому что с большею расчетливостию, строгостию к себе, ограничением себя я бы в половину мог избежать ужасной необходимости быть попрошайкою и жить на чужой счет. Ты, напротив, пальцем о палец не ударил для снискания себе денег; твои труды неизвестны обществу -- ты о них только трубил и провозглашал. Но я понимаю самое твое легкомыслие и легкость в попрошайстве -- их источник твое идеальное прекраснодушие. Для тебя спросить у другого "нет ли у тебя денег?"--все равно, что спросить "нет ли у тебя щепок?",-- и ты берешь деньги, как щепки; но зато ты и отдаешь их, как щепки. Я не помню, чтобы когда-нибудь, имея в кармане десять рублей, ты не готов был отдать мне пяти, а если я представлял крайнюю нужду, то и всех за исключением полтины на четверку табаку или двугривенного на извозчика. Семьдесят пять рублей были не первыми и не последними, как о том ниже следует. Этого мало: имея деньги, ты и не дожидался, чтобы я у тебя попросил, а спрашивал: "Висяша, не нужно ли тебе денег?" И ты давал и те, которые брал у других, и те, которые получал с уроков. Это я помню и умею этому дать настоящий смысл, прямое значение. И потому, когда я говорю о тебе с друзьями, с нашими, со стороны попрошайства -- то моему красноречию нет пределов -- в нем и филиппики и ватиканские громы; а когда чужой человек нападает на тебя с этой стороны, то я очень понимаю возможность оправдать тебя, и мне и досадно, и больно, и этот чужой человек в моих глазах -- гадкий человек. Часто, бывало, видя, с какою легкостью отдавал ты мне последние деньги, я спрашивал себя -- таи ли я готов отдавать тебе свои, и находил, что нет, и в этом видел свою гадость, а твое величие. Теперь я смотрю на это истиннее, потому что смотрю простее: все дело и вся разница была в том, что я понимал цену этого проклятого металла, трудность доставать его, а ты нет; другими словами, бессознательно я был действителен в этом отношении, а ты был олицетворенное прекраснодушие. Недавно, вчера, узнал я, как горько и тяжело мне слушать нападки на тебя людей прекрасных, но не знающих тебя и судящих о тебе по твоей внешности (которая, точно, очень не хороша), а не по сущности твоей, которая прекрасна. Ты знаешь Дмитрия Щепкина. Он вчера заговорил со мною о тебе, и признался, что ни к кому не чувствовал в жизни такой враждебности и ненависти, как к тебе, и мало людей так высоко уважал, как тебя. Это твоя участь, Мишель, благодаря твоей непосредственности, которой ты не хочешь сознать. Ты оскорбил Щепкина тем, что в спорах с ним забывал его Я, что в твоем тоне было что-то гнетущее, оскорбляющее, какая-то претензия на авторитет, какое-то презрение к чужой личности, наконец, неделикатный и оскорбительный тон и еще что<-то> пошлое, кадетское, отталкивающее в непосредственности. Это же впечатление производил ты и на покойника Барсова. "Когда Бакунин одушевлялся и говорил, я слушал, заслушивался и не мог наслушаться его,-- говорил Щепкин;-- когда батюшка сбирался и поручал мне пригласить вас всех к себе,-- первое мое попечение было, чтобы Бакунин был у нас, но терпеть его не мог; вызывал его на споры, чувствовал глубокость и истину его доказательств, и не соглашался, чтоб только досадить ему". Это факт, Мишель,-- подумай об этом. Но не о том дело, а дело в том, что во мне вдруг родилось сильное желание защитить и оправдать тебя, и я как будто почувствовал возможность этого, и в самом деле, во многом соглашаясь с ним, я заставил его смотреть на тебя иначе в этом отношении. Потом он коснулся внешней стороны твоей жизни, о которой много слышал не худого, а гадкого в Петербурге, в свою весеннюю поездку туда. Тогда мне стало больно и досадно, и я стал с жаром доказывать ему, что все это совершенно правда только для людей, знающих тебя с одной внешней твоей стороны, а для тех, которые знают твою внутреннюю жизнь, все это нисколько не уничтожает твоего значения, как человека с глубокою и сильною душою, потому что они хорошо знают источник твоих недостатков. Да, Мишель, здесь кстати сказать мне, неужели ты думаешь, что я нападаю на тебя только из удовольствия нападать на тебя, оскорблять тебя? Мало же знаешь меня, если так думаешь. Я, Мишель, не мальчишка и не злой человек -- поверь мне. Я хотел только указать тебе на твои темные стороны и был вправе это сделать по тем отношениям, которым охотно верил между нами. И неужели все обманываются? Нет, Мишель, это факт: пожить с тобою в одной комнате -- значит разойтись с тобою. Но расходятся двояким образом с человеком: или признавая его не стоящим ни дружбы, ни приязни, ни знакомства, или признавая в нем даже великое, но в то же время видя в нем что-то чуждое ему, которое уничтожает возможность связи с ним, не уничтожая высокого о нем мнения. Это твоя участь. Петр приехал из Прямухина с враждебностию к тебе, тщательно скрывая ее ото всех, кроме брата; от меня особенно. Я хотел узнать его мнение о тебе -- и хвалил тебя: он холодно соглашался со мною; я переменил тактику и заметил ему, что в тебе есть много и нехорошего, которое всего резче высказывается в твоих отношениях к людям и особенно друзьям: Петр встрепенулся тогда и сказал, что ты гнетешь чужие самостоятельности, оскорбляешь самолюбие. Чем же? -- спросил я его. Он почти не знал чем и не нашел ни одного важного факта, но отвечал, что -- всем: Из всего этого ты выведешь мудрое заключение, что я силюсь доказать тебе, что ты подлец, фразер, труп, логический скелет и пр. и пр.,-- не торопись, Миша. Так как после этого письма я не предполагаю продолжения переписки между нами и так как я его пишу только потому, что ты обязал меня к этому второю половиною твоего длинного письма,-- то и спешу пояснить тебе мои к тебе отношения, и прошедшие и настоящие, и определительно и ясно высказать тебе мое о тебе мнение, так чтобы ты не имел возможности вкось и вкривь толковать его. Имей терпение прочесть все это повнимательнее. Обращаюсь к истории нашей дружбы.
   Итак, в то время у меня кипела история с гризеткою. Я открыл тебе ее, и ты принял в ней искреннее участие. Станкевич тогда был на Кавказе, и переписка с ним шла бы медленно, а мои раны требовали скорого лечения. И ты лечил меня, лил на них отрадный бальзам (сравнение старое, но верное). Ты смотрел на мою историю, как на падение, но иначе тогда ты и не мог смотреть на нее; ты призывал меня к восстанию, говоря, что видишь во мне зародыш великого. Несмотря на то, что ты не понимал дела, твой голос был мне полезен по ходу и развязке моей истории; тяжело было бы мне без твоих писем, и если я не впал или в бешеное, исступленное отчаяние, или в мертвую апатию -- этим тебе я был обязан. Ты начал настоятельно звать меня в Прямухино; от этого зову у меня мучительно и сладостно содрогалась душа,-- она что-то предчувствовала... Я приехал. Пропускаю все обстоятельства до того дня, как я отпустил за столом мою резкую фразу, через неделю после прочтения моей первой статьи. Скажу только, что мне было хорошо, так хорошо, как и не мечталось до того времени: событие превзошло меру и глубину моего созерцания и моих предощущений. Это меня все более и более связывало с тобою. Я видел твои старания и усилия давать мне средства выказать себя с самой лучшей стороны. По с этого времени (с знаменитой фразы) начались диссонансы в наших отношениях. Я стал замечать в тебе и любовь и ненависть ко мне. Первая казалась мне естественною, потому что я сам искренно любил тебя; второй я и не подозревал по простоте моей, а видел в ней не больше, как дурные манеры, вследствие дурных привычек и легкомыслия. Это было ужасное время, Мишель. Тут вмешалась и моя собственная пошлость, грубая, дикая и чисто животная непосредственность, фразерство, ходули, хлестаковство, словом, натянутая идеальность, вследствие внутренней пустоты и стремления заменить ее мишурною внешностию, отсутствие нормальности, естественности и простоты. Но и этим не все кончилось: тут еще вмешалась ложность положения, произвольно (или почти произвольно) себе данная, то есть ложное чувство, в котором истинна была только потребность чувства, наконец (что греха таить?), чувство, которое часто, очень часто, я насильственно развивал в себе, насильственно отвлекаясь от всего прочего, чтобы дать призраку вид действительности. Не виню себя за это: что было -- должно было быть, и, кроме того, потребность-то была все-таки и сильна и истинна. Да, чувство это не развивалось бессознательно, не закрадывалось в сердце украдкою, непосредственно, нормально и просто. За это я и поплатился -- и поделом: будь, дурак, простее и добросовестнее с собою и самовольно не давай себе того, в чем судьба отказывает. A force de forger on devient forgeron {Игра слов: Привычка ковать делает кузнецом. Здесь в смысле: Привычка воображать делает фантазером (фр.). -- Ред.} -- правда, и потому жаль, что правда; но из кузнецов-то выходить тяжело -- и то правда -- но не шали бритвою -- обрежешься, а иногда и зарежешься, а коли уж обрезался или зарезался -- не жалуйся -- не черт виноват. Я так и хочу делать -- и уже успеваю. Но несмотря на все -- эти три месяца 36 года, все до одного дня и часа, хотя они и были для меня адом, но и теперь от одного воспоминания о них я чувствую веяние рая. Что делать? -- такова натура человека: есть -- проклинает, было -- жалеет, зачем не есть.
   Мы уехали торжественно; для нас был от сей стороны гром и от той стороны гром35,-- ну точь-в-точь, как "Угнетенная невинность, или Поросенок в мешке"36. В Москве началась новая эпоха нашей дружбы, дикая и чудная. Твоя враждебность ко мне росла не по дням, а по часам, как пшеничное тесто на опаре. Ты как будто взял в отношении ко мне в руководство слова знакомого тебе капитана: "Бью тебя, когда мне угодно и сколько мне угодно", и в самом деле бил, когда и сколько угодно, и бил с такой стороны, с какой и врагов не бьют. Справедливость требует заметить, что с этой же щекотливой стороны ты в иные минуты лил в мою болеющую душу бальзам сладкого, искреннего и святого участия и этими минутами выкупал недели и месяцы. Я жаловался Станкевичу и стал находить особенное наслаждение осуждать тебя и с другими со стороны неделикатности, самой грубой и дикой. Но я все-таки был далек от мысли о твоей враждебности и никогда сомнение в действительности нашей дружбы не тревожило меня ни сознательно, ни бессознательно: для меня дело шло просто о неделикатности, вследствие офицерских привычек. Ты в моем понятии стоял высоко и был так выше меня, что твою дружбу я почитал более снисхождением ко мне, нежели чем-то таким, на что я имел право, и я приписывал ее какой-то бессознательной любви ко мне, а не тому, чтобы ты увидел во мне свое, родное. Наконец, мне стало невыносимо, и только квартира В. К. Ржевского сводила меня с тобою, а уже не внутреннее влечение. Николай заболел -- страшная действительность вытанцовалась, и это поправило паши отношения, заставив тебя обратиться ко мне и разделить со мною свое тяжкое горе. Мелочи и пошлости замерли (а не умерли) перед ударом судьбы. То же самое обстоятельство поправило мои отношения и к Николаю: я сделался необходим для обоих вас. Во мне было маленькое чувствованыще против Николая: я обвинял его в том, в чем все были равно виноваты и собственно никто не был виноват. Мало-помалу обстоятельства перевернулись снова: твоя непосредственность начала противеть мне уже без всяких личных отношений с твоей стороны ко мне. Я замечал то же самое чувство (только глубже и сильнее) и в Николае. По приезде нашем из Прямухина он назвал тебя Хлестаковым, но добродушно и в шутку; тут он повторил это название, но только уже совсем не в шутку. Я с удивлением узнал, что со мною он был к тебе еще очень милостив, но Клюшникову и Каткову отзывался о тебе с презрением и ненавистию. Ты для меня имел глубокое и таинственное значение с одной стороны (известной тебе)37, и, сверх того, мой образ мыслей и некоторые стороны характера были очень близки с твоими: он это знал и остерегался меня. Но тем не менее собственное мое непосредственное чувство против тебя было подкреплено его враждебностию. Сверх того, еще с самого возвращения из Прямухина у меня завязывался узел новой дружбы с Боткиным, к которому я старался приходить так, чтоб нам можно быть только вдвоем, к которому я шел всегда, как на свидания любви, с каким-то мистическим волнением. Я не замечал в нем ни одного поступка, ни одной выходки, которые бы обнаружили в нем (по тогдашним моим понятиям) огромную и глубокую душу, но в котором я почему-то чувствовал ее и был в ней уверен. Эта новая связь была тогда для меня благодетельным отводом. Наконец, ты поехал в Прямухино -- это снова подмазало скрыпучие вереи нашей дружбы. По обыкновению моему, от твоего приезда я ожидал чего-то важного для себя, такого, в чем не мог сознаться самому себе. Все это было похоже на связь двух супругов, не любящих друг друга, но по необходимости соединенных общими выгодами, не в сущности, а во внешности связи заключенными. Ты возвратился -- и твоя поездка ничего не решила для меня; но ты сказал, что они любят меня, что я вошел в их жизнь. Это было новым подкреплением наших дружеских отношений. Наконец, настал час разлуки. Это было ужасное время для меня: физические страдания, душевные страдания, потом еще другие, безотрадные страдания -- все это, вместе взятое, сделало то, что во мне человек умер -- остался один самец. Холоден и ужасен был мой разврат. Наконец, холодно простился я с тобою, который скоро должен был ехать в Прямухино, холодно я простился с Станкевичем, который должен был скоро ехать за границу,-- и я заключил из этого, что я подлец.
   До Воронежа мы видели осень, гадкую, холодную и грязную; за ним мы увидели чистое, безоблачное небо, ощутили веяние весны. Душа моя растворилась для любви, послышав зов весны и встрепенувшись от чистого неба и лучезарного солнца. Сидя в бричке, я читал "Годунова", и если теперь почитаю себя вправе судить о нем, то обязан этим тому непосредственному чувству, которым глубоко воспринял в себя это шекспировское создание38. На Кавказе завязалась у меня с тобою нравственная переписка. Серные ванны истощили мою жизненность, и я стал -- живой труп; чувство умерло, и душа болела только сознанием гадости прошедшей жизни. Безотрадная будущность, стесненность положения -- представляли мне возвращение в Москву путешествием в гроб. Хотелось умереть. Чужие гривенники жгли мне руки и душу. Это была разделка за прошлое. Я пишу к тебе о моих мучениях в чаянии утешения от тебя, приписываю наши страдания дурной жизни, неаккуратности. Знаешь ли, Мишель, что эта нравственная переписка была началом нынешней и что нынешняя есть ее продолжение или ее окончание. Да, это так. Жду с нетерпением от тебя ответа -- и получаю его. С получением этого ответа началась новая эпоха нашей дружбы. Ты вырвался из душной атмосферы конечного рассудка, конечного произвола и конечной воли -- и перешел в свободный элемент благодати, и был горд своею новою жизнию. Но этот переход был не полон, и ты не расчелся с прошедшим, потому что впоследствии много (хотя и меньше) повторилось прошедшего, и, сверх того, в тоне письма твоего мне показалось много совсем не благодатного. Особенно поразила меня легкость, с которою ты говорил в нем о своем намерении расстаться с нами перед нашим разъездом и намекал, что это и всегда будет тебе легко сделать, если мы не будем понимать друг друга, а это у тебя значило -- если не будем думать одно. Меня обдало холодом, и тут в первый раз проникло в мою душу сомнение в действительности нашей дружбы. Я вспомнил, что за разность убеждений ты очень легко разрывал уже и не такие связи... вспомнил одно письмо... обморок... удовольствие, с каким ты писал это письмо и читал его мне... и прочее39. В первый раз ясно представилось мне, что идея для тебя дороже человека. На словах я и сам думал часто тоже; но на деле всегда поступал иначе. Я начал мои нравственные письма к тебе и, по случаю болезни Клюшникова, выразил мои понятия о том, что человек дороже идеи и что основанием дружбы, как и всякой любви, должна быть бессознательная симпатия, влеченье -- род недуга40. Я возвратился в Москву. Переписка моя с тобою продолжалась. Наконец, я получил от тебя письмо, из которого увидел ясно, что и ты умеешь сознавать и признавать в себе свои темные и черные стороны. Из него же я узнал и причину твоей враждебности ко мне -- и простил тебя. Ты стал велик в глазах моих своим признанием, и я только тогда убедился, что ты в самом деле находишься в состоянии благодати. Благодатное состояние духа родит и благодатные действия. Кроме того, я услышал от тебя такие признания, которые выговариваются только друзьям. Я заплатил тебе таким же признанием41. Отношения наши опять пошли хорошо, и лучше, чем когда-либо, потому что <я> узнал о твоей ко мне дружбе по фактам, а не по рассуждениям, а ведь эти две вещи часто разногласят. В своей же дружбе к тебе я никогда не сомневался. Ты приехал, переехал ко мне, разделил со мною все, что у тебя было, и еще так, что большую часть предоставил мне. Я тратил твои деньги,-- и это было для меня пыткою, но не потому, чтобы меня тяготило твое одолжение, а потому, что меня тяготило твое положение, будущность которого была очень плоха со стороны внешней жизни, в которой без денег плохо. Ты предвидел поездку в Прямухино и хотел уберечь нужную для нее сумму денег. Я тебе сказал, что их нет, что нам нечем жить,-- и ты, вместо того, чтобы сделать хоть какую-нибудь гримасу, в грустном раздумье стал ходить по комнате и петь "Без разуму люди", что я очень любил слышать. Никогда не видал я от тебя столько любви ко мне, в твоей непосредственности столько благородства, в твоей душе такого широкого размета, во всей твоей индивидуальности, и внутренней и внешней, такой поэзии, такой львообразности, как в этот день. Воспоминание о нем всегда будет живо во мне, и под этою формою ты всегда будешь существовать для меня. Еще перед этим у меня были с тобою некоторые объяснения, в которых ты принял такое участие, что я еще более убедился в твоей любви ко мне. Словом, никогда наша дружба не была в лучшем состоянии, как тогда. Не говорю уже о том благодетельном влиянии, которое ты имел на меня уничтожением нравственной точки зрения во имя благодати, сообщением идей, которых я без тебя и теперь бы не знал. Поверь, Мишель, что мне не только не тяжело и не трудно, но даже легко и приятно признаваться в этом. Одно только подгадило наши тогдашние отношения: это твоя шутка, в которой выказалась вполне вся дурная и грязная сторона твоей непосредственности и от которой меня и теперь тошнит,-- это нахождение большого сходства одной особы42 с Беттиною и никакого во мне с Гете. Конечно, это правда, но зачем же было это говорить, зная мои отношения к этой особе, как будто бы оно и без того так не стояло? Может быть, ты, Мишель, и забыл об этом -- я и сам забыл было, да вспомнил по случаю получения от тебя известной записки с копиею. Переезд мой в институт был новою эпохою нашей дружбы43. Ты оставил меня, не сказавши мне об этом, съехал от меня к Боткину, как бы украдкою. В этом, конечно, было больше ребячества, нежели чего-нибудь действительно дурного, но44 я во второй раз содрогнулся за нашу дружбу. Сверх того, я почувствовал, что против меня образуется сепаратная коалиция, что обо мне начинаются толки и пересуды, что моя особа подвержена анализу. Месяцем раньше -- это меня зарезало бы; но во мне уже совершился великий процесс духа, и я в первый раз сознал свою силу, самобытность и действительность {свою, Мишель). Ты приходишь ко мне и объявляешь, что не имеем права писать и печататься по недостатку объективного наполнения и действительности, а главное потому, что ни один из нас не может определить ни музыки, ни поэзии так, чтобы после нас никому не осталось об этом сказать ни слова. Но ты поздно пришел ко мне с этими идеями и не расчел, что они могли быть истинны только для тебя, как выражение твоего моментального состояния; моя диалектика была слаба перед твоею, но во мне были уже слишком сильны, глубоки и действительны некоторые убеждения,-- и я делал свое без помехи, с жаром и энергиею, нимало не чувствуя влияния твоих построений. Тут я сделал одну ошибку: мне бы, зная превосходство твоей диалектики над моею, не надо было входить с тобою в споры, но я не остерегся и часто невольно предавался досаде и выходил из себя, приводимый в бешенство твоими парадоксами и бессилием поколотить тебя за них. Ты дошел до того, что стал наказывать меня явным презрением и присоединил к коалиции Аксакова. Я все видел -- грустил, но уже но унывал, не предавался апатии, потому что нашел в себе силу опереться на самого себя. Тут я написал письмо к Станкевичу45, из которого ты увидел, что немножко поспешил своим заключением обо мне, что я не такой пошляк, каким ты меня хотел сделать и для себя и для других, и что, наконец, мое чувство было не так гадко и отвратительно, чтобы на него можно было плевать. Ты в этом сознался; сказал мне, что в последнее время твоей жизни со мною наши отношения опошлились; я дал тебе заметить, что вольно же тебе было их опошливать. Но вполне ты не мог победить своей ко мне враждебности. После оратории "Paulus"46 были толки о том -- что бы значило, что музыка не производит на меня никакого впечатления, а так как впечатление от всякого произведения искусства есть не что иное, как музыкальное состояние, то и должно быть, что у меня нет эстетического чувства. Я видел, что уж подбираются к моей сущности и хотят ее немножко распечатать, чтобы увидеть, не содержится ли в ней доноса или просто переписки47. По-прежнему стихи Гете:
  
   Лишь тот и жизни и любви достоин,
   Кто каждый день их с бою достает48,
  
   читались с припевом: "Белинскому это не нравится" и вообще с некоторою ироническою улыбкою на мой счет. Но я был в новом для меня состоянии -- я торжествовал светлый праздник воскресенья, в котором не было ни тени горя и грусти, но одна чистая, безграничная и святая радость, словом, это было лучшее время моей жизни, цвет моего бытия,-- и был слишком далек, чтобы обращать внимание на подобные выходки и смущаться ими. Только ложное положение и мучительное состояние Боткина минутами огорчало меня, но так как я слишком хорошо понимал источник его страданий и никогда не сомневался в его дружбе ко мне,-- то и сидел у моря да ждал погоды. Предчувствия и ожидания не обманули меня: с грустью объявил ты мне, что и с Боткиным твои отношения опошлились, что он питает к тебе какую-то враждебность. Я не обрадовался этому, но мне стало тебя искренно жаль. Пришел Боткин,-- и на его лице я прочел невыразимое страдание духа, вследствие ложного положения. Я подошел к нему и сказал, что вылечу его. Я сделал это с таким движением, которое произвело на тебя эффект, Боткин послал к тебе свое желчное письмо, в котором довольно удачно и верно объектировал для тебя некоторые твои стороны49. Я послал комментарии к этому письму. То и другое было для тебя неожиданно, в том и другом было много правды, но то и другое не испугало тебя за самого себя, а только взбесило. Ты стал доказывать, что со мною твоя дружба была основана на сродстве наших сущностей, а Боткин к тебе пристал. "Я его хвалил, а он меня",-- писал ты. Как мне было понимать тебя? Как мне было понимать твою дружбу к кому бы то ни было? Тогда я принял этот поступок за подлость: теперь в нем вижу доказательство, что у тебя с Боткиным в самом деле никогда не было дружбы и что он тебя, а не ты его любил; жаль только, что эту истину ты выговорил в слишком пошлой форме. Это обстоятельство накинуло тень и на мои к тебе дружеские отношения и значительно посбавило с них цепы. Кому легко развязаться с одним -- тому не трудно разделаться и с другим. Кто играет таким словом, как дружба, тому ничего не стоит играть и друзьями, а согласись, что быть игрушкою очень не лестно. Наконец, ты приехал в Москву. По трепету, с каким я встречался с тобою, я видел, что еще люблю тебя; но ты только узнал, что нисколько меня не любишь. В этот-то приезд ты отпустил Боткину свою знаменитую фразу: "Васенька с Висяшей вздумали меня учить",-- фразу, которая обнаружила, в каких отношениях ты всегда почитал себя с нами. А почему же и не поучить, Мишель, если есть чему поучить? Ведь мы охотно учились у тебя. Авторитет и дружба -- вода и огонь, вещи разнородные и враждебные; равенство -- условие дружбы. Пока мне нужен был твой авторитет,-- я нес его и не почитал его авторитетом, а восставал только против непосредственности, когда она была несносна. Когда же авторитет более стал не нужен, тогда он сделался тяжким, обидным и унизительным игом, и я сбросил, стряхнул его. Авторитет налагается непосредственно, бессознательно; когда же с ним лезут, то становятся несносны и смешны. Станкевич никогда и ни на кого не налагал авторитета, а всегда и для всех был авторитетом, потому что все добровольно и невольно сознавали превосходство его натуры над своею. В этом смысле авторитет иго благое и бремя легкое. Вообще, дело в том, чтобы его признали другие сами; когда же он навязывается, то лопается сам собою. Равным образом и превосходство человека признается другими, а ему самому часто (если не всегда) менее всех бывает известно.
   Ты уехал, стал писать к Боткину50 -- ко мне нет. Наконец приехало в Москву твое семейство. Увидевшись с ними, я тотчас отправился к Боткину и прочел у него письмо о небесной Дружбе, из которой я был выключен. Я имею причины и неразделенную любовь не почитать действительною; но неразделенная дружба, где один страдает, другой не понимает, показалась мне чем-то даже смешным и комическим. Но потому ли, что я все еще искренно любил тебя, или потому, что мне (вследствие моей натуры) труднее, нежели кому-нибудь, разрывать связи, которые я почитал кровными, или по оскорбленному самолюбию, или, наконец, по всему этому вместе взятому,-- только выключение тобою меня из числа своих друзей так живо тронуло и оскорбило, что Боткин стал меня утешать всеми доводами логики. Может быть, меня особенно оскорбило твое мнение, что со мною можно иметь только земную дружбу, как есть женщины, к которым можно чувствовать только земную любовь,-- и это тем более могло оскорбить меня, что я чувствовал в этих словах выговорение твоего истинного мнения обо мне, как о явлении. Но, проснувшись на другое утро, я вдруг ощутил себя в свободном элементе жизни, где исчезают все мелочности, случайности, где все понимаешь, все любишь. Не знаю, было ли это пробуждением моей прежней любви к тебе, или объективное созерцание тебя, как чудного и прекрасного явления жизни, вне всяких отношений ко мне,-- только сердце мое забилось живою, трепетною любовию к тебе, которая вполне и выразилась в моем письме к тебе, которое ты получил через них51. Я приехал в Прямухино, не чувствовал к тебе враждебности, но не ощущал и любви; твое присутствие сжимало, стесняло и смущало меня как-то странно. Вдруг ты уезжаешь в Торжок дожидаться там Петра. Поездка эта была в тебе порывом, и порывом благородным, святым. Мы с Боткиным получили от тебя по записке52. Ко мне ты писал коротко, просто, но многозначительно, энергически и с любовию. Ты избавил меня от утешений, поняв, что для человека в моем положении и с моею душою они излишни; ты избавил меня йот рассуждений, потому что был в элементе глубокого созерцания жизни. Ты писал, что, сидя в комнате трактира, обдумываешь свое предисловие к Беттине53, поешь, грустишь, понимаешь всю затруднительность дел, весь ужас будущего -- и счастлив. Я это понял и оценил -- и ты предстал мне во всей своей глубокой сущности, во всем свете своего значения, могущий, просветленный, львообразный. Твою записку я берегу, как святыню, и такою она останется для меня навсегда. Ты приехал, и в тот же вечер я имел с тобою разговор, примечательный для меня по его содержанию и еще потому, что в нем ты проговорился своим истинным мнением об нас обоих. Мои чувства и понятия в то время были так смешанны и находились в таком хаотическом брожении, что я был далеко не в состоянии определить впечатления, произведенного на меня твоею обмолвкою, и вообще мои отношения к тебе превратились в инфузорий. Помню только, что мне были крайне не по сердцу твои похвалы и особенно проявления твоих восторгов при виде силы, с которою я терпел то, что не все терпят с силою. Я чувствовал (но еще смутно), что любовь к человеку в общем еще не есть любовь, что сливаться в общем можно со всяким, для кого только существует общее, но любить можно только некоторых, словом, что истинная любовь есть что-то мистическое, таинственное, и есть любовь к индивиду, а не его достоинству, к частности, а не к общему, отвлеченно представляемому от частного. Это верно и понятно. Ты знаешь Богданова: я до сих пор не знаю, что составляет сущность жизни этого человека, в чем его общее, но горячо люблю его, черт (знает) за что, и уверен, что для нашей дружбы, для того чтобы я не скрыл от него никакой задушевной тайны, недостает только влияния обстоятельств внешних, то есть привычки, жизни вместе и т. п. Но я очень хорошо понимаю, что мог бы не сойтись и с самим Пушкиным как с человеком, боготворя его как поэта. Это так, а почему -- не знаю и не имею потребности знать. Думаю, что этого и нельзя, да и не нужно знать. Это таинство, мистерия духа. Наконец, мы стали собираться в дорогу. В этот день я провел с тобою несколько сладких минут, которые навсегда останутся для меня памятны. Но простился с тобою холодно, хотя ты прощался со мною и горячо. Может быть, в этом ты увидишь противоречие -- но мне что до этого? -- я вижу в этом факты и хочу представить их тебе добросовестно, не искажая; а что этим, может быть, подам тебе оружие на самого себя -- и до этого мне дела нет. Я хочу добраться истины, а не торжествовать победу -- это-то и есть теперешняя моя действительность с железными когтями. Перед прощаньем ты как-то странно и загадочно говорил со мною о Боткине, как бы удивляясь тому, что он все еще только дилетант, тогда как мы с тобою уже определились в нашем назначении. А с ним говорил, что любишь меня объективно. Я понимаю цену всякой объективной любви,-- твоей особенно. Замечу только, что во всем этом бездна противоречий, странностей и недоразумений, которые все вышли из ложности взаимных наших отношений. По возвращении в Москву я писал тебе много и часто, и эти письма были дифирамбами любви. Но в них я был весь в себе, или в той буре, которая еще была в самом сильном разгаре своем, и потому уяснение моих отношений не могло быть их содержанием. Но первая (которую я считаю второю и продолжением нравственной) наша полемическая переписка была не кончена, а только прервана внешним образом. Мира не было, а только перемирие, наскоро сделанное. Поэтому в первых моих письмах до смерти Любови Александровны уже скоплялась эта буря, которая разразилась в длинных диссертациях. Уже и там я бессознательно, в виде вопросов, выговорил многие сомнения, тогда еще неясные для меня, и письма неистощимой любви скоро бы превратились в длинные диссертации, но смерть Любови Александровны, которая глубоко и религиозно потрясла меня, снова отвлекла меня и от самого себя, и от тебя, и от всего прочего. Утихла и эта буря, и вдруг во мне выговорилось то, что только прежде чувствовалось. Сухость твоих писем, выразившаяся в обилии рассуждений, возвращение Боткина из Нижнего и Петра из Прямухина помогли процессу совершиться окончательно. Я написал тебе первую мою длинную диссертацию и получил на нее в ответ следующие строки: "Любезный Виссарион, сейчас получил твое письмо. Поверь мне, оно меня не оскорбило: я принял его, как письмо человека, любящего меня и не имеющего от меня никаких тайн. Ответ мой будет доказательством истины моих слов... Письмо твое требует длинного, отчетливого ответа,-- и я буду отвечать тебе, буду говорить с тобою, как с самим собою. Выскажу все, что сумею высказать. Между нами явился новый предмет для полемики; да, для полемики: будем называть вещи их именами". Предчувствуя темно ложность наших отношений, я еще в первой длинной диссертации намекал, что ты мне друг не во всем, что у тебя есть стороны жизни, закрытые для меня, что ты не примешь моей правды, оскорбишься ею и пр.; но несмотря на то послал тебе вторую длинную диссертацию, которую скорее можно назвать импровизациею, мгновенно и без перерывов вырвавшеюся из взволнованной, потрясенной души. Благодаря неистовству моей натуры, я весь сидел в предмете моих диссертаций, забыв все остальное, как чуждое мне, отрешившись от всех интересов, составляющих сущность моей жизни,-- и мои диссертации были написаны, как бы без моего ведома, по какому-то вдохновению. И вдруг я получаю от тебя уверение, что ты понимаешь источник и побудительные причины моего поступка, что ты видишь в нем человека, который тебя любит и который не имеет от тебя никаких тайн. Тогда я написал третью длинную диссертацию, которую и начал похвалами тебе, что второе отрицание54 ты выдерживаешь тверже, благороднее. В самом деле, кроме прочих и многих причин, побудивших меня на подобную откровенность, было еще и желание узнать, сделать последний и удовлетворительный опыт: друзья ли мы, или только играем комедию и фразами заменяем дело, а комедии и фразы мне уже крайне надоели и опротивели. И что же?-- вдруг я получаю ругательную, насмешливую записку, написанную вместо чернил слюною бешеной собаки55, упитанную желчью, злостью, всеми гадостями, до которых в состоянии унизиться дух человеческий. В этой записке все прошедшее было отринуто, сознано комедией, фарсом, обманом. Положим, что мой поступок был бы подл, если бы я научил Петра написать его письмо к Варваре Александровне (я не боюсь, как ты, слов подлый и подлец: все люди подлецы, и истинная подлость состоит не в том, чтобы делать подлости, а в том, чтобы, делая их, не сознаваться; только нравственно-французская точка зрения может из подлеца делать такое ужасное слово, которое навсегда клеймит человека и не оставляет ему выхода ни в любви, ни в благодати); положим, говорю я, что мой поступок (если бы он был моим) был и подл; не должен ли бы он был оскорбить тебя вдвойне, втройне -- и за себя, и за меня, и за нашу дружбу -- и не должно ли бы в твоем ответе быть больше грусти, страдания, скорби, нежели злости и яду? Нет, Мишель, если бы ты любил меня хоть немного, то никогда не был бы в состоянии сбросить связь со мною, как изношенный сапог или потасканный галстук; нет, ты написал бы мне так: "Любезный Виссарион, не ожидал я от тебя такого поступка: глубоко оскорбпл он меня -- я не заслужил его -- бог с тобою. Не могу признать всего прошедшего за призрак, не могу легко расстаться с тобою; но, бога ради, оставь меня со стороны моего семейства; думая и рассуждая о нем так, ты прав в отношении к себе, но не к нему". И что же? -- вместо этого бешенство, злоба; толкование о том, что сестры для тебя слишком святой предмет, чтобы ты мог говорить о них со всяким. Как эти слова гармонируют с теми, которые выписал я из прошлого письма! Злой человек, скажи мне: что я сделал худого, в чем мое преступление? Неужели в том, что я не хотел от тебя иметь никаких тайн и почитал за подлость не сказать тебе и таких истин, которые могли для тебя быть жестоки, но как истины (по крайнему моему разумению) были для тебя необходимы? Не говорю о них: они никогда не понимали меня, поэтому неудивительно, что не поняли и теперь. Я, может быть, и виноват перед ними тем, что не понял моих отношений к ним, тем более, что они никогда не говорили мне, чтобы между мною и ими существовало какое-нибудь родство и дружеские отношения. Они оскорбились -- и этим открыли мне глаза на действительные отношения между мною <и> ими: быть так! -- но я все-таки перед ними чист и прав и, кроме ошибки в понятии отношений, ни в чем не виноват перед ними. Но и это вина не большая, если сообразить, что, во-первых, ты ввел меня в эту ошибку, а во-вторых, что я писал к тебе и говорил тебе, а не им. Но ты -- куда девалась твоя философия, твоя вера в могущество истины и мысли? Ты, три года твердивший нам, что истинно только то, что действительно, а действительно то, что выдерживает всякое отрицание и не боится истины, но в ней находит свое оправдание и опору; что в дружбе должны быть только истинные отношения и полная откровенность, что недобросовестно и подло нам иметь друг о друге затаенные и скрываемые понятия; ты, позволявший себе говорить нам всякую правду, всякую истину! И это дружба? И ты еще не догадался, что никогда и никому не был ты другом, а следовательно, и не имел друзей? Ты хотел смотреть на нас сверху вниз -- и называл себя нашим другом? Вот тебе полная и подробная история нашей дружбы. Даю тебе факты -- выводи результаты. А я скажу только то, что никогда не был ты мне другом, но я тебе был им, потому что ничего заветного не было у меня от тебя и ничто не могло оскорбить меня в тебе до желания разорвать связь, и что если я обвинял тебя во многом дурном, то с целью открыть тебе глаза, а не для разрыва, не для того, чтобы наслаждаться созерцанием твоих черных сторон. Ты пишешь к Боткину, что я считаю тебя пошляком и только мажу тебя по губам твоею субстанциею. Мишель, Мишель! горько мне слышать это,-- горько, как новое Доказательство, что не было между нами дружбы и что не понимал и не понимаешь ты меня. Нет, всегда признавал и теперь признаю я в тебе благородную львиную природу, дух могущий и глубокий, необыкновенное движение духа, превосходные дарования, бесконечное чувство, огромный ум; но в то же время признавал и признаю: чудовищное самолюбие, мелкость в отношениях с друзьями, ребячество, легкость, недостаток задушевности и нежности, высокое мнение о себе насчет других, желание покорять, властвовать, охоту говорить другим правду и отвращение слушать ее от других. Для меня эти противоречия представляют единое целое, одного человека. Ты -- богатое соединение самых прекрасных элементов, которые еще находятся в брожении и требуют большой разработки. Не мертвый абстракт, не логический труп, а олицетворенная философия Спинозы: ты пламенеешь неистощимою любовию к богу, но богу как субстанции всего сущего, как к общему, оторванному от частных явлений, и еще никогда не любил ты субъекты и образы индивидуальные. Как в индийском пантеизме живет один Брама, все рождающий и все пожирающий, и частное есть жертва и игрушка Брамы -- тени преходящие, так и для тебя идея выше человека, его образ мыслей выше его непосредственности,-- и ты приносишь его на жертву всерождающему и всепожирающему Браме своему. Вот мое мнение о тебе, и мнение искреннее. Не скрою от тебя, что не раз ты глубоко падал в моем понятии, и именно во время первой полемической переписки и по получении записки с копиею; но и тогда представлялся ты мне не мелким и ничтожным человеком, пошляком без души, сердца и силы, а демоном человеческой природы, падшим ангелом,-- и тогда, в часы вечера, являлся мне твой образ, бледный, искаженный, в виде вампира, по синим устам которого струится теплая кровь,-- и я чувствовал тот фантастический ужас, который проникает душу, когда слышишь во "Фрейшюце"56 заклинания Каспара и адские подземные хоры, глухо-режущими диссонансами вторящие им. Никогда не почту я пошляком человека, которого называл своим другом и которому признаю себя много обязанным в моем развитии; мне дико, странно и больно уверять тебя в этом. Эти уверения давно бы должны быть лишними между нами. Я верю, что теперь и ты высоко меня ценишь и глубоко понимаешь (вне отношений к себе), так верю, что если бы ты стал уверять меня в противном самыми оскорбительными словами и поступками, я бы уже не поверил тебе. Я уверен, что мое письмо к тебе последнее, потому что если бы ты и стал отвечать мне (чего я, впрочем, не ожидаю), то у меня недостало бы больше ни желания, ни охоты продолжать спор, исполненный умышленных недоразумений; но несмотря на то, я чувствую, что хоть мы и расстаемся, но ты всегда будешь ко мне близок, потому что так или сяк, но ты глубоко вошел в мою жизнь, и я не могу отрицать какого-то сродства с тобою, основанного не только на сродстве субстанций, но и на каком-то сходстве индивидуальностей, при всем их несходстве. Еще замечание, которое со всяким другим было бы излишне, но с тобою необходимо: твое прекраснодушие, страсть к авторитету и прозелитизму, словом, все твои темные стороны, не исключая и чудовищного самолюбия, в моих глазах имеют один источник с твоими человеческими сторонами, но все дело в том, что материялы требуют еще большой переработки -- что и заставило меня говорить тебе правду. Кстати, о сродстве. В самом деле, между нами есть что-то общее -- это разрушительный элемент; и в то же время в нас есть что-то противоположное, враждебное: что для меня составляет сущность, значение жизни, то для тебя -- хорошо между прочим; основа и цель твоей жизни для меня -- хорошо между прочим. С обеих сторон -- отчаянная субъективность, и много диссонансов производила враждебная противоположность наших субъективностей. Сила, дикая мощь, беспокойное, тревожное и глубокое движение духа, беспрестанное стремление вдаль, без удовлетворения настоящим моментом, даже ненавистью настоящему моменту и к себе самому в настоящем моменте, порывание к общему от частных явлений -- вот твоя характеристика; к этому надо еще присовокупить недостаток задушевности (Gemüthlichkeit), нежности, если можно так выразиться, в отношениях с людьми, близкими к тебе. От этого-то тебе так легко было всегда говорить и повторять: "ну расстанемся, так расстанемся" или "коли не так, так и не нужно" и тому подобное; от этого-то ты так давил собою всех и любовь к тебе всех и всякого была каким-то трудом. По крайней мере я не умею иначе выразить моего чувства к тебе, как любовью, которая похожа на ненависть, и ненавистью, которая похожа на любовь. Так как ты, Мишель, имеешь необыкновенную способность вкривь и вкось толковать чужие речи и мысли, то почитаю нужною следующую оговорку: не подумай, чтобы я отрицал в тебе любовь; нет, я знаю, в сокровенной глубине твоего духа скрыт неиссякаемый источник любови; но эта любовь пока еще устремлена на абсолют, как на субстанцию, а не на явления. Твоя кровь горяча и жива, но она (если можно употребить такое сравнение) течет у тебя не в жилах, а в духе твоем; у меня дух живет в крови, горячей и кипучей, и он тогда действует во мне, когда кипит моя кровь, и моя кровь часто закрывает собою, и от глаз других и <от> меня самого, мой дух. Поэтому я или весь трепетная, страстная, томительная любовь, или просто ничто, дрянь такая, что только поплевать, да и бросить, а так как любовь живет во мне минутами, то, Мишель, я очень хорошо знаю себе цену в остальное время...; от этого же я ревнив в дружбе, и всякая попытка любить для меня -- ад; от этого страстность скрывает и закрывает мою глубокость, и я понимаю, как ты мог весною ошибиться на мой счет с известной стороны моей жизни. Но дело в деле, и все эти параллели между мною и тобою есть не что иное, как попытка уяснить странность наших отношении. Из этой же противоположности с тобою вытекает и то, что отвлечение -- не моя сфера, и мне душно и гадко в этой сфере, и в мысли, как мысли собственно, я играю роль слишком не блестящую; моя сфера -- огненные слова и живые образы -- тут только мне и просторно и хорошо. Моя сила, мощь -- в моем непосредственном чувстве, и потому никогда не откажусь я от него, потому что не имею охоты отказаться от самого себя и объявить себя призраком. Но я понимаю достоинство мысли и, сколько могу, служил и служу ей. Чувство -- огонь, мысль -- масло. Знаю, что в моих длинных диссертациях к тебе есть, и непременно должны быть, сбои ложные стороны, вследствие быстрого перехода моего в новый момент, в новую сторону жизни; субъективность тоже должна была взять свое; но в то же время знаю, что ничего не вышло из-под моего пера вследствие пристрастия, умышленного и сознательного искажения истины, и -- повторяю -- мои диссертации должны были взволновать, огорчить тебя, но не могли и не должны были оскорбить тебя. Если они произвели такой эффект на тебя -- этому причина та, что в них много, много истины, которую тебе помешали принять и признать только одно из двух обстоятельств: или твое чудовищное самолюбие, или то, что эта истина услышана тобою от человека, которого ты никогда не любил и которому никогда не был другом. Ты спросишь, может быть, как позволил я себе, отрицая твою дружбу, написать в этом письме столько злого, оскорбительного для тебя? Отвечаю: мне надобно бы отвечать тебе, если не с любовию, то с хладнокровием, чтобы иметь совершенный верх над тобою; но на этот раз у меня недостало ни того, ни другого. На твою ругательную записку с копиею я отвечал тебе в начале письма с хладнокровием, а в конце -- с любовию, и точно так же ответил бы тебе и на последнее огромное письмо твое, если бы оно все состояло из одной злости, желчи и оскорблений; но так как в остальной половине его я увидел силу, любовь, благодать, то на злость и ответил злостью. На это я имею свои причины, которые скрываются в моем характере: с кем я ругаюсь, с тем у меня еще не все кончено; но как скоро с кем у меня все кончено, тот не услышит от меня обидного слова. По получении твоей записки с копиею я решил, что у меня с тобою уже все кончено, и твое большое письмо крайне удивило меня. Первая половина его не бесила и даже не сердила меня, а только давала мне какую-то дикую силу -- ответить на злость злостью и доказать тебе, что в бешенстве и ядовитом остроумии я никому в свете не уступлю; вторая половина твоего письма привела меня в умиление, и я начал мой ответ тебе с любовию; но когда стал вновь перечитывать твое письмо, чтобы возразить на главные пункты -- я снова вознеистовствовал.
   Кончено ли между нами все или нет -- суди сам. Ты легко можешь решить это по действию, которое произведет на тебя это письмо: если, несмотря на него, увидишь возможность дружбы, полной, истинной, как взаимного права говорить друг другу все, не спрашивая себя, как это подействует и что из этого выйдет,-- давай руку -- моя с тобою. Если увидишь, что нет -- скажи коротко и кротко -- и ты будешь прав; в таком случае, не забывай меня, а я никогда не забуду тебя, благословляю твой путь и желаю тебе всего благого в жизни... В обоих случаях выполни мою самую искреннюю и задушевную просьбу: пришли мне копию с письма, которое ты получил от меня перед моим приездом в Прямухино, это мне нужно. Но, бога ради, не вздумай возвратить мне его: это до глубины души оскорбило бы меня, потому что, если бы ты с ножом в руках потребовал от меня своих писем, я бы не отдал их тебе. Прошедшее свято.

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   С лишком две недели назад я написал к Станкевичу письмо, в котором уведомил его о ее смерти...57 -- Что-то будет? Он пишет к брату, что его обижают, если хотят щадить; впрочем, кроме болезни, он ничего не предполагает.
   Пришли мне два письма Боткина ко мне из Нижнего58. Да, бога ради, пришли часть сочинений Жуковского, где "Овсяный кисель", при моем отъезде из Прямухина ее не могли найти, и из-за нее я перенес маленькую неприятность -- книга чужая и требуется.

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   В 8 No "Наблюдателя", в статье "Петровский театр" у меня есть выходка против людей, которые в французском языке не уступают французам, а русской орфографии не знают:59 Чаадаев принял ее на свой счет и взбесился. Теперь самому стыдно стало. Он же говорил, что слышал от кого-то или сам читал, что в одной немецкой газете пишут о тебе, Мишель, как о единственном человеке в России, который с ревностию занимается немецкою философиею. Дай-то бог, я этому рад. Желал бы и о себе что-нибудь прочесть, хоть по-английски (для этого выучился бы). Да -- черт возьми, очень хочется быть генералом, повесят тебе кавалерию через плечо60.

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   Вышла книга какого-то Гофмейстера "Жизнь Шиллера"61 -- Боткин от нее в восторге. Гофмейстер умный и теплый человек, кажется, немного понюхал Гегеля. Жизнь Шиллера лучше всякого романа, и в жизни его нельзя не полюбить. Гофмейстер говорит о нем с любовию, но сочинения его щелкает без милосердия; "Дон-Карлоса" ставит ниже "Разбойников", а "Фиеско" называет аллегорическими представлениями отвлеченных идей. Об "Орлеанке" и "Валленштейне" будет говорить в 3 и 4 томе, которые еще не вышли -- что-то скажет -- интересно. О Гете я узнал штучку -- в молодости он учинил святотатственный и безбожный поступок: исказил "Ромео и Юлию", то есть переделал. Но раскаялся и не напечатал, не так, как Шиллер, который, исказив "Макбета", напечатал свое искаженье.

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   Прощай. Так или сяк, но навсегда твой.

В. Белинский.

   Октября 24.
  
   Пока писал это письмо, сделался болен, но начинаю оправляться.
  

44. Н. В. СТАНКЕВИЧУ

8 ноября 1838. Москва

Москва, 1838, ноября 8 дня.

   Друг мой Николенька, я не сомневался, что мое письмо подействует на тебя так, как оно подействовало, и только эта уверенность и могла решить меня написать его1. Тяжело твое положение, но оно уже лучше прежнего -- теперь страдание для тебя жизнь, а не смерть. Понимаю твои слова: "Но вины не снимаю с себя"2. Было время, когда я назвал бы тебя за это мистиком, но теперь я уже не тот, и твой мистицизм для меня есть не слабость ума, испугавшегося истины, а трепетное ощущение таинства жизни, жизнь в любви. Если бы ты знал, как подействовали на меня слова Вердера, переданные тобою в письме!3 Как глубоко понял я их! Новый свет, новое откровение озарило меня при чтении их. Вот такую философию я уважаю, хоть и никогда философом не буду. Она не отрицает мистических верований сердца, но разумом оправдывает их, она не превращает жизни в сухое понятие, в мертвый скелет. Меня напугали философиею, во имя ее меня хотели уверить, что я пошляк, ничтожный человек, потому только, что моя кровь горяча, а сердце требует любви и сочувствия. И я поверил добродушно. Но есть русская пословица: кто в двадцать лет не силен, а в 30 не умен4, тот ни силен, ни умен никогда не будет. Мне 28 лет, и я узнал, что буду умен, и узнал, что или философия вздор, или ее не понимают. Разумеется, философия отстояла себя в душе моей, а некоторые авторитеты шлепнулись5. Теперь дышу свободнее. Слова Вердера озарили меня еще больше и еще более утвердили мою веру в философию. Какой это должен быть человек! И как много должно значить его участие к тебе! "В ее письмах, говорил он, веял ему дух другой жизни"6 -- не умею объяснить тебе, что веет мне в этих словах: тут и мысль глубокая, и музыка, поэтический образ. Есть же на свете такие люди, которые одним выражением умеют передать весь благоухающий букет своей непосредственности, всю сущность свою. Вердер для меня теперь не понятие, но живой образ -- я как будто видел его где-то и когда-то. Он не отстает от меня. Чудный, святой человек! О, если бы я узнал еще, что он с грустцою от каких-нибудь воспоминаний, сердечных мистерий, что мир божий хотя и так хорош для него, что он не находит в нем ничего, что бы требовало его поправки, а между тем собственно для себя желал бы поправить что-нибудь, в то же время сознавая разумную необходимость всего и так, как оно есть... Прекраснодушие! Но к чему философские маски -- будь всякий тем, что есть.
   Благодарю Грановского за письмо. Отвечать ему буду, а теперь некогда7. И это письмо пишу для того больше, что завтра почта, а мне хочется, чтобы ты получил от меня что-нибудь поскорей. Спасибо ему за его может быть; однако попроси его осуществить это может быть8. Нельзя ли ему написать что-нибудь вроде беглого очерка всех новых сочинений в Германии по части истории? Уж то-то бы поклонился ему!
   Ну, Станкевич, право, что-то не пишется -- я не совсем здоров, и одна мысль, что должно написать к завтрему -- лишает меня силы писать. В пошлых утешениях ты не нуждаешься, а любви во мне на эту минуту что-то нет: должно быть, она побеждена болью в животе, легкою тошнотою и головокружением -- обыкновенными моими болезнями по вечерам. Фраз писать рука не поднимается. Буду лучше исподволь готовить тебе большое письмо9.
   С Мишелем я расстался. Чудесный человек, глубокая, самобытная, львиная природа -- этого у него нельзя отнять; но его претензии, мальчишество, офицерство, бессовестность и недобросовестность -- все это делает невозможным дружбу с ним. Он любит идеи, а не людей, хочет властвовать своим авторитетом, а не любить. С весны я пробудился для новой жизни, решил, что каков бы я ни был, но я -- сам по себе, что ругать себя и кланяться другим на свой счет -- глупо и смешно, что у всякого свое призвание, своя дорога в жизни и пр. Ему это крайне не понравилось, и он с удивлением увидел, что во мне самостоятельность, сила и что на мне верхом ездить опасно -- сшибу да еще копытом лягну. Началась борьба -- перепискою. Он был изранен, выслушал горькие истины, выраженные энергическим языком. Примирился. После этого-то я был в Прямухине. После опять война10. Он опять с миром, а я пишу ему, что прекраснодушные и идеальные комедии мне надоели. Спор о простоте играл тут важную роль. Я ему говорил, что о боге, об искусстве можно рассуждать с философской точки зрения, но о достоинстве холодной телятины должно говорить просто. Он мне ответил, что бунт против идеальности есть бунт против бога, что я погибаю, делаюсь добрым малым, в смысле bon vivant et bon camarade {кутила и хороший товарищ (фр.). -- Ред.} и пр. А я только хочу бросить претензии быть великим человеком, а хочу со всеми быть, как все. Но это тебе непонятно. Я изложу тебе подробно всю кампанию -- пришлю даже планы сражений. Ты услышишь чудеса. Пока скажу немножко: те чудные существа высшей человеческой и женственной природы -- они теперь хлопочут об мысли, не доверяют своему непосредственному впечатлению в наслаждении музыкою и поззиею, советуют всем молодым людям заниматься объективным наполнением, преимущественно философиею... Что? Как тебе это покажется:
  
   О философия, ты срезала меня!11
  
   Да, Николай, простое, живое чувство, задушевность, преданность человеческим интересам там уже не много значат и мало ценятся: там требуют мысли, знания и вздыхают о мысли и знании, без которых (для них!!!) нет любви, нет жизни. Я Мишеньке все и расписал откровенно и энергически; он взбесился и прислал мне в ответ анафему; я не струсил и повел дело так, что он растерялся, стал противоречить себе и запросил мира12. Действительность вытанцовалась и колотит его нещадно. От всех, даже от Петра Клюшникова, он услышал то же, что от меня. Бог с ним. А я тебе все подробно изложу, ты ведь любишь прочесть иногда что-нибудь забавное. Это будет поэма, в которой побивается Улисс 12 самым нехитрым (но здоровым) витязем.
   Помнишь ли, Николенька, мои дикие вопли против скульптуры и вообще греческого искусства? Порадуйся -- я поумнел. Новый свет озарил меня, и греки предстали мне в лучезарном блеске, как народ, который больше евреев имеет право на название божиего народа. Скульптура для меня теперь -- божественное искусство. С Шиллером я совсем рассорился. Бог с ним -- потешился он надо мною, а теперь я не под законом, а под благодатию. Женщин его -- очень не жалую. Вообще, как поэт -- он потерял для меня всякое значение13. Может быть, тут проявляется дикость моей натуры,-- так и быть -- буду сам по себе. Читал ли ты статью Рётшера "О критике художественного произведения"?14 Она переведена в "Наблюдателе" Катковым, переведена чудесно, и мы кое-что уразумели из нее. Статья важная -- и я таких не писывал; только трудна для понимания. Но обо всем об этом -- после, и очень скоро.
   Посылаю тебе письмо Ефремова ко мне. В то время он был там и все видел. Возврати мне их, также и записку Петра15. Прощай, мой милый. Уведомь меня, долго ли ты намерен пробыть в Берлине, не вздумаешь ли летом к нам. Нельзя ли тебе прислать нам твоего портрета -- это общее желание всех нас, и ты бы несказанно обрадовал нас, исполнив его. Прощай. Прилагается при сем письмо Мишеля16. Теперь он пишет к тебе уже ne свысока, а очень скромпо. Чтобы не оставалось пустой бумаги -- ест тебе стихотворение Кольцова:
  
   Жарко в небе солнце летнее,
   Да не греет оно молодца:
   Сердце замерло от холода,
   От измены моек суженой.
  
   Пала грусть-тоска глубокая
   На кручинную головушку,
   Мучит душу мука смертная,
   Вон из тела душа просится.
  
   Я пошел к людям за помочью --
   Люди с смехом отвернулися;
   На могилу к отцу, матери --
   Не встают они на голос мой!
  
   Замутился свет в глазах моих --
   Я упал в траву без памяти.
   В ночь глухую буря страшная
   На могиле подняла меня.
  
   В ночь, под бурей, я коня седлал,
   Без дороги в путь отправился --
   Горе мыкать, жизнью тешиться,
   С злою долей переведаться!17
  

45. В. П. БОТКИНУ

10--16 февраля 1839. Москва

   Нет, я не могу, я не в силах молчать. Чувствую и вижу, что, кажется, настает для меня время, в которое я должен буду сосредоточиться, запереться, замкнуться в самом себе и забыть навсегда, что такое участие людей, что такое участие дружбы. Пусть настает это время, если надо ему настать; но пока я еще не вполне убедился, что оно настало -- хочу, Васенька, поговорить с тобою, как с другом, как другу, открыть тебе истинные мои страдания, истинные раны моей души, которых ты не знаешь, но о которых ты, может быть, только догадываешься, если еще догадываешься... Друг Василий, великая и страшная тайна -- личность человека; я узнал это по себе в последнее время. Цель християнской религии есть -- возведение личности до общего, возвышение субъекта до субстанции. -- "Приидите ко мне все обременении и труждающиеся, и аз упокою вы"1 -- говорит она, и в этих словах заключается вся важность, какую християнство дает личности. Потому-то прощение и неосуждение предписывает оно, как одно из главных своих оснований. Да, пока человек в сфере общего -- я сужу его, я претендую знать его; но как скоро из сферы общего уходит он в сокровенные тайники своей индивидуальности -- я могу о нем только скорбеть и молиться, могу его только прощать... Так предписывает абсолютная религия...
   Последнее событие особенно познакомило меня с самим собою, решило для меня множество вопросов насчет моей субъективности и решило несколько вопросов о жизни, вопросов глубоких, религиозных. Да, до сих пор, я еще и сам себя не знал: могу ли жаловаться, что другие меня не знали. А меня никто из вас не знал, и ты не больше других, друг Василий. Все вы любили меня искренно, видели во мне много хорошего, даже гораздо более, нежели сколько во мне его было -- и в то же время не видели многого такого хорошего, что действительно во мне есть, что составляет мою сущность, и за что вы бессознательно любили и любите меня. Потом, вы же видите во мне много худого, которым действительно наделен в соразмерном количестве; но истинные раны моего духа едва ли кому-нибудь известны из вас. Три года был я дружен с Бакуниным, исписал к нему бездну почтовой бумаги, сходился, расходился с ним. И что ж --- знали ль мы друг друга? -- Нет, я первый говорю, что не знал и не знаю его: знание другого совершается в акте любви, и потому однажды навсегда отрекаюсь от всех суждений о его сущности, которая может быть бесконечно глубока, но тем не менее и совершенно чужда моей. Знал ли он меня? -- Письмо его к тебе2 лучше всего отвечает на этот вопрос. Чувственность и животность почитает он черною стороною моей жизни, главным моим пороком и причиною всех несообразностей и нелепости моей непосредственности. Правда ли это? -- Нет, это такая же ложь, как и та, если бы мне приписали сребролюбие, алчность и хищничество. Я решительно неспособен к страсти, и <в> поре страсти никогда не знал ее; я всегда стремился к чувству -- и вот здесь-то моя болячка, в этом слове стремился. A force de forger я делался forgeron {Игра слов: Привычка ковать делает кузнецом. Здесь в смысле: Привычка воображать делает фантазером (фр.). -- Ред.} -- и непосредственность моя искажалась от неестественного положения; но в таких случаях я был далек от чувственности -- самые сны мои были чисты, как чисты были мои стремления. И вот как понимает меня этот человек, этот мой закадычный друг трех лет! Неудивительно, мы сошлись с ним не по потребности, а разошлись без уважения друг к другу. Моя дружба к нему была -- стремление, натяжка, и я был бы очень рад уверить его, что если в ней было много дикости, зато не было нисколько ни чувственности, ни животности. Да, Васенька, тяжко виноват я перед двумя великими и святыми словами -- любовь и дружба: перед первою согрешил я в лице двух прекрасных, святых созданий3, но не чувственностью и не животностью, а тем, что объективный интерес силился превратить в субъективный; перед второю я согрешил в лице М. А. Бакунина, называя насильственную связь дружбою. Дики и нелепы были проявления того и другого греха, но -- повторяю -- не от чувственности и животности, а оттого, что жажда блаженства захотела удовлетворить себя чрез посредство бедной, конечной воли, мимо благодати.
   Есть еще человек -- но этого я глубоко уважаю, дорого ценю -- который также никогда меня не знал4. Клюшников знаком со мною с "Литературных мечтаний", хотя знал меня за год прежде них5. Мы с ним столкнулись не вотще: долго он был для меня авторитетом, а я (это узнал я от него в твоей маленькой комнатке) для него -- значит, так или сяк, но только мы вошли в жизнь один другого. Но между нами замешалась ложь, особенно с моей стороны: это опять был грех перед дружбою, хотя и гораздо меньший,-- объективную дружбу я силился превратить в субъективную. Проявления были дики и нелепы по необходимости,-- и я не удивляюсь, что Иван Петрович почитает меня чувственным и животным человеком и адресует ко мне такие послания, которых я, по зрелом соображении, вполне не могу принять на свой счет6.
   Теперь дело доходит до тебя. В твоем лице я не согрешил против дружбы, потому что сблизился с тобою по самой глубокой потребности, с первого разу полюбил тебя страстно. Больше любить я не могу и не умею. С твоей стороны я всегда видел к себе глубокую привязанность. Весна прошлого года, с помощию философии и одного великого философа7, развела было нас на время, но только для того, чтоб после теснее свести. Все последовавшее за тем еще более укрепляло наши отношения. Я был свидетелем и первым доверенным твоей новой жизни, и важнейшее ее событие так тесно связано со мною, что всякая малейшая подробность напомнит тебе меня невольно8. Ты, наконец, принял живое участие в моей борьбе с Бакуниным, и твое чувство стояло за меня. За месяц до отъезда в Харьков ты начал питать ко мне ужасную враждебность9. Торжественно признаюсь, что враждебность твоя имела глубокую и верную причину, и если бы проявления ее иногда не были чересчур животны (в собачьем смысле), то слишком тяжело было бы мне воспоминать о ней. Но все это прошедшее -- теперь о настоящем. В прошлый четверток ты сказал мне, что чувствуешь, как будто вновь нашел ты меня10. Да, эти слова были искренни -- мне самому было легко и отрадно с тобою, я сам как будто вновь нашел тебя для себя. С любовию судил ты меня -- и суд был легок: как целебный нож, отрезывал он от тела зараженные части. Но нынешний день, Васенька, поразил меня глубокою скорбию: я увидел ясно, что или старая враждебность твоя ко мне снова возвратилась, или родилась новая. Ты явно сторожишь за собою -- но ты еще плохой актер, когда тебе надо скрыть свою враждебность к кому-нибудь" Давеча, за столом, ты грубо, неделикатно, варварски оскорбил меня, что мне тем прискорбнее, во-первых, потому, что Аксаков был свидетелем этого, а во-вторых, что я теперь нахожусь в таком состоянии, которое требует пощады, снисхождения, участия, Деликатности, в котором безделица убивает и воскрешает меня. Я вспыхнул -- во мне все оцепенело; но когда ты, желая или замазать свой грубый поступок, или, может быть, и в самом деле восхитившись моими выходками, начал показывать свой восторг ко мне,-- то я чуть не зарыдал. Боже мой, к чему все это! Как будто я не стою и того, чтобы указать мне дверь, без комедий, прямо?.. Остальное твое обращение со мною было крайне внимательно и дружелюбно,-- но, признаюсь, в нем я еще более увидел что-то неприятное для себя, какую-то затаенную мысль с твоей стороны. Не понимаю, что это значит. Или ты меня не понимаешь (потому ли, что никогда не понимал, или с некоторого времени разучился понимать), или в самом деле в моей непосредственности есть <что>-нибудь непреодолимо отталкивающее. Во всяком случае -- к черту комедии -- надоели они мне! До сих пор я говорил: лучше хоть немножко чего-нибудь, чем совсем ничего; теперь я говорю: лучше совсем ничего, нежели немножко чего-нибудь. Да, я теперь ясно вижу, что я не понимал себя, не был к себе справедлив -- нет, что-нибудь никогда не удовлетворит требований моего духа. Нагибаясь до чего-нибудь, я сам всегда делался ничем. И потому, Васенька, всякие отношения хороши, кроме ложных. Если, почему бы то ни было, я уже далек от твоего сердца -- что ж делать -- пожалеем об этом оба -- и покоримся необходимости, которая смеется над нашею волею. Ты понимаешь меня? Что делать? -- я измучен, избит, изранен, в моем сердце нет места живого, душа разрывается, и глаза сухи -- только нынче, благодаря тебе, я выжал из них несколько слезинок, которые освежили мою душу, как кропинки дождя засохшую ниву... Не могу больше и дольше терпеть... Давай все за один прием, а по капелькам -- невыносимо. Ты дорог мне -- ты один можешь мне быть другом. Причина этого -- твоя чудесная, богатая душа, твое любящее сердце, твоя нормальность, действительность (чего нет во мне), твои лета, наши общие воспоминания. Когда ты был в Харькове, когда я поверял Константину свои г... ощущения, а тот, закрывая глаза, в восторге кричал -- какое амбре!11 -- я думал все о тебе, темное чувство говорило мне, что ты поступил бы со мною жестоко, но тем бы самым и спас меня. Когда вместе с Костею я нападал на тебя, отыскивая на тебе и пятна и крапинки,-- в глубине души моей я думал и чувствовал другое насчет тебя и, уверяя Костю в своей дружбе, против своей воли, слышал в себе слова: скоро ли то приедет Боткин? -- Нет, никто не заменит мне тебя, но если так надо -- я на все готов, кроме ложных отношений. Может быть, я поступаю в этом случае слишком прекраснодушно; может быть, мне надо б было затаить в себе мои чувства, мои подозрения и неприметно отдаляться от тебя... Может быть, но я не могу, я человек эксцентрический, я часто выходил из ужаснейшего состояния только тем, что выговаривал его другому. Крик облегчает боль. Вот и теперь, чем больше пишу это письмо,-- тем легче становится мне. Уж такая натура! Кроме того, я почел бы преступлением с своей стороны разойтись с тобою, не объяснившись, не употребивши всех средств к отвращению подобного случая.
   Васенька, прежде ты знал меня -- знал, потому что любил, и любил, потому что знал. Никогда не забуду я твоих слов обо мне, что "грустно было бы стоять тебе над моей могилою". Этими немногими словами, как поэтическим образом, характеризовал ты всю жизнь мою,-- и одних этих слов слишком достаточно для того, чтобы я вечно любил и помнил тебя. Да, грустно стоять на могиле человека, которому природа, как проклятие, дала слишком большие требования на жизнь, чтобы их могло удовлетворить что-нибудь легко получаемое, и который изо всех сил рвался к счастию -- и знал одно горе, одно страдание. Это история моей жизни. Ты же недавно сказал обо мне, что любишь меня в грусти, а не в радости, потому что (прибавил ты) радость моя всегда была ложная. Правда! исключая редких минут откровения таинства жизни,-- вся жизнь моя -- или глубокое страдание, поэтическая грусть, или глупая, дикая радость. Неужели же мой удел -- только страдание, и никогда не узнаю я радости?.. Может быть... согласен и на то, если нельзя взять лучшего решения,-- но во всяком случае -- прощайте, о, навсегда прощайте, претензии на счастие, заботы и хлопоты устроить его себе, прощайте, ходульки и все фокус-покусы фантазии!.. Грустно расстаться мне и с вами, потому что вы все же тешили меня хоть призраками счастия... Жалко, ничтожно было ваше счастие, но все же без вас я не знал бы никакого... Поклон вам -- больше мы не увидимся... Да, не буду уж делать я амбре из воли, чувств, из ощущеньиц... Еще раз, прощайте!.. Дух вечyой истины, молюсь и поклоняюсь тебе, и с трепетом, с слезами на глазах, отныне предаю тебе судьбу мою -- устрой ее по разумной воле своей,-- и если суждено мне на земле высшее блаженство -- от тебя приму я его или никогда не узнаю его!..
   В самом деле, может быть, мое последнее Werden {становление (нем.).-- Ред.} было так сильно и велико, что ты, Васенька, поневоле перестал понимать меня. В таком случае постараюсь, сколько это возможно, вновь познакомить меня с тобою. Для этого я должен высказать тебе кое-что о последней истории. Знаешь ли что -- каким-то откровением понял я для себя необходимость этой истории, и если б мне можно было снова пережить это время, чтобы избежать всех сделанных глупостей, я не согласился бы на это. Все было необходимо. Эта история -- мое спасение, искупление.
   Начну с того, что ты и не подозреваешь того, что вытерпел я эти дни и что терплю теперь. Это истинный ад. Во всю жизнь мою не страдал я тяжелее. Да, этот пост ужасен,-- каким-то праздником разрешится он? А у меня есть предчувствие, что праздник близко и что вся эта цепь страданий есть приготовление к нему -- очищение. Но прежде я должен сказать тебе о моих внутренних отношениях к Каткову12. Как из моих слов, так и из моего письма к нему13, ты не мог заключить, чтобы я считал себя слишком виноватым перед ним и слишком раскаивался перед ним. Действительно, перед ним я нисколько не виноват, а если виноват, то перед самим собою; но и перед самим собою меня совершенно оправдывает разум, и оправдывает свободно, без всяких натяжек. Но я глубоко понял слова Вердера -- разум оправдывает, а любовь все-таки производит сознание вины14. И в этом смысле глубоко чувствую я мои вины перед Катковым, и уже не раз мысленно лежал я, рыдая, у ног его и, как раб, вымаливал себе его прощение, не почитая себя достойным взглянуть на него... Я был перед ним пошл, низок, подл, гадок; темно чувствуя его превосходство над собою, я находил мою защиту от его могущества, неотразимо преследовавшего меня, в гнилых, онанистических построениях. Я сам не понимал почему, но он беспокоил меня, он был мне страшен, и я готов был спастись от его благородной непосредственности куда ни попало, хотя бы в нужник или под подол первой попавшейся бабы, чтобы оттуда подразнить его языком, зная, что он слишком свят и благороден, чтобы преследовать меня в таком гнусном убежище. Доволен ли ты, Василий? Может быть, я не в силах буду <сказать> всего этого в глаза Каткову -- я напишу к нему это. Во мне много гордости и самолюбия, но я умею и быть нецеремонным с собою, когда дело идет об оскорбленной истине.
   Три истории было со мною: конец первой был началом второй, или -- вернее -- начало второй было концом первой, начало третьей -- концом второй15. До сих пор не понимаю, что я чувствовал к гризетке; но -- право -- что-то чувствовал. Должно быть, что это была страсть, а не чувство, но в этой страсти -- я помню -- было много святого, тихого, грустного, трепетного, благоговейного. Моя натура во всем сказывается. Неуспех и дикость оной гистории произошли оттого, что когда я чувствовал страсть -- то хотел возбудить чувство, а когда находил в себе это чувство -- хотел возбудить страсть. Поэтому в моих отношениях к ней не было ровности и единства. К самым резким воспоминаниям этой истории принадлежат два факта -- первый: когда, увлеченная страстию, чувством, или чувственностию, она отдавалась мне вся,-- я, при всей моей чувственности и животности, так хорошо известных некоторым философам, нашел в себе довольно силы, чтобы не опрофанировать наслаждением того, что я почитал в себе святым чувством,-- и я вырвался из обаятельных объятий сирены и почти вытолкал ее от себя (в эту минуту я без ненависти вспоминаю об этом прекраснодушном поступке). Второй: когда я прощался с моей родственницею16, бывшею свидетельницею этой истории, я шутил, смеялся, паясничал -- и вдруг, упавши на стул, громко зарыдал... Это для меня служит еще убедительнейшим доказательством, что моя душа жаждет от женщины чего-то другого, нежели чувственность и животность.
   Я поехал в Прямухино. Эту историю всю знаешь ты хорошо. Я не любил, но заставил себя любить, в чем и успел. Сердце жаждало блаженства, а рассудок указал путь к его достижению -- изо всего этого вышел ужасный вздор. Препятствия раздражили чувство, без того ложное и напряженное. Мишень-кино участие подожгло -- остальное ты помнишь. На Кавказе я видел сон -- ты и это знаешь. Глубокое и таинственное значение имел этот сон: я ощутил таинство любви -- сон превзошел действительность -- мне должно б было понять, что это откровение, что наяву я даже не подозревал и возможности подобного ощущения... Но я ничего не понял...
   Осенью жажда любви превратилась во мне в какую-то томительную хроническую болезнь. Грудь была истерзана, глаза всегда влажны -- всегда готовы для рыданий. Я не помню подобного состояния в жизни моей. В это-то время я увидал ее17 и -- ничего не почувствовал, а надувать себя уже не имел сил после второй истории. Я стал мечтать о разумном браке, забывши, что -- как бы ни был он разумен, а для него нужны средства и средства. Ну, ты читал мое письмо18 -- с Дмитрием Щепкиным. В самом деле, проявлений было много, и мое прекраснодушие попало в западню, самим же себе устроенную. Я разделился: во мне было два убеждения, совершенно равносильные -- люблю и не люблю. Теперь бы я сказал что-нибудь одно, а оба вместе равны плюсу с минусом; но для того-то и должен я был так жестоко срезаться, чтобы так дельно рассуждать теперь. Надежды было мало -- это подстрекало. Наконец мне сказали несколько слов, на меня бросили несколько взглядов, которых я не смел еще решительно растолковать в свою пользу, но от которых я ощутил в душе бесконечное блаженство и провел божественный день. Васенька, будь человеком и суди человечески: меня всегда томила жажда любви, мне натолковали, что моя рожа так отвратительна, что нет...

(Окончание допишется и вам доставится.)

  

46. И. И. ПАНАЕВУ

18 февраля 1839. Москва

Москва. 1839, февраля 18 дня.

   Я так много виноват перед Вами, любезнейший Иван Иванович, что нельзя и оправдываться. Впрочем, в моем столе и еще теперь лежит письмо к Вам от ноября 10 прошедшего года, но -- увы! недоконченное1. Право, не до писем было. В письме к Вам мне хотелось бы означить определительно мое журнальное состояние, цо это было невозможнее, чем означить погоду. И теперь пишу к Вам коротко, но зато определенно. Вот в чем дело: я не могу издавать "Наблюдателя". Далеко бы завело меня объяснение причин, и потому вместо всех этих объяснений снова повторяю Вам -- я не могу издавать "Наблюдателя" и нахожу себя принужденным ныне отказаться от него2. Но между тем -- мне надо чем-нибудь жить, чтоб не умереть с голоду -- в Москве нечем мне жить -- в ней, кроме любви, дружбы, Добросовестности, нищеты и подобных тому непитательных блюд, ничего не готовится. Мне надо ехать в Питер, и чем скорей, тем лучше. Прибегаю к Вашему ко мне расположению, к Вашей ко мне дружбе -- похлопочите об устроении моей судьбы. Г-н Краевский завален теперь делом -- два журнала на руках3, -- думаю, что сотрудник, который в состоянии ежемесячно поставлять около десяти листов оригинального писанья или маранья -- будет ему не малою подмогою. Я бы желал взять на себя разбор всех книг чисто литературных и даже некоторых других,-- в таком случае в каждую книжку "Отечественных записок" я бы аккуратно поставлял от двух до пяти листов. Критика своим чередом -- смесь тоже. -- Коротко и ясно: почем с листа?4 Но главное вот в чем: без 2000 мне нельзя даже и пешком пройти заставу; около этой суммы на мне самого важного долгу, а сверх того, я хожу, как нищий, в рубище5. Кроме г. Краевского, поговорите и с другими, сами от себя или через кого-нибудь; я продаю себя всем и каждому, от Сенковского до (тьфу ты, гадость какая!) Булгарина,-- кто больше даст, не стесняя при том моего образа мыслей, выражения, словом, моей литературной совести, которая для меня так дорога, что во всем Петербурге нет и приблизительной суммы для ее купли. Если дело дойдет до того, что мне скажут: независимость и самобытность убеждений или голодная смерть -- у меня достанет силы скорее издохнуть, как собаке, нежели живому отдаться на позорное съедение псам... Что делать -- я так создан.
   Не замедлите ответом. Жду его с нетерпением.

Ваш В. Белинский.

   Кроме того, в "Отечественных записках" я готов взять на себя даже и черновую работу, корректуру и тому подобное, если только за все это будет платиться соразмерно трудам. Денег! денег! А работать я могу, если только мне дадут мою работу. Итак, скорей ответ. Главное, чтобы при Вашем письме получил (если кто пожелает взять меня в работники) подробные условия.
   Еще раз,-- не замедлите ответом и -- прощайте.
  

47. И. И. ПАНАЕВУ

22 февраля 1839. Москва

Москва. 1839, февраля 22 дня.

   Вот Вам и еще письмо, любезнейший Иван Иванович. Предмет его все тот же -- просьба о скорейшем решении моей участи. Я уверен, что Вы, с своей стороны, сделаете все, что можно, и прошу Вас только о скорейшем ответе. Дело для меня очень важное. Мне надо переехать в Петербург, хоть на год, хоть на два, только непременно надо: этого требуют и внешние и внутренние мои обстоятельства. Быть сотрудником журнала или даже и журналов и получать за свои труды достаточное вознаграждение, конечно, не бог знает какая важность и какая трудность; но дело в двух тысячах, без которых мне невозможно и думать о поездке -- вот в чем трудность, и вот что меня беспокоит1. Без этого обстоятельства, я давно бы уж сел в дилижанс и был в Питере. Вместе с получением этого письма Вы увидитесь с Н. В. Савельевым2, который, по своему ко мне расположению и дружбе, сам вызвался хлопотать о моем деле у Смирдина, Полевого, Греча, даже у Сенковского. Что делать, пришло такое время, что кто нп поп, тот и батька. Жалею только об одном, что не раньше хватился за ум.
   Трудно оставить мне Москву, где много милого любил3, где совершилось столько важных переворотов и процессов моего духа; оставить круг, подобного которому для меня уже не будет в жизни. Но судьба этого хочет -- должно повиноваться. Она иногда дает отсрочки, но на своем всегда поставит. Так было и со мною. Я долго отнекивался, а теперь вижу, что стену лбом не прошибешь, а только разве лоб расшибешь. Петербург представляется мне пустынею безлюдною. Каменский, Гребенка, Яку-6оепч, Тимофеев и пр. и пр. -- боже мой, что за люди!.. Если бы не Вы, я бы скорее умер, чем бы поехал в Питер. Надеюсь еще сойтись с г. Струговщиковым. Я не знаю его как человека, ничего не слышал о нем с этой стороны; но кто так, как он, умеет понимать Гете, тот тысячу раз человек, и где еще есть такие люди, там можно жить. Кстати: его элегии, пересланные ко мне через Вас,-- я обязан им такими минутами, каких не много бывает в жизни. В этих прекрасных гекзаметрах душа моя купалась, как в волнах океана жизни4. Жалкий г. Губер, двукратно жалкий -- и по своему переводу, или искажению "Фауста", и по пакостной своей философской статье, которая ужасно воняет гнилью и плесенью безмыслия и бессмыслия!5 Право, ограниченные люди хуже, то есть вреднее подлецов: ведь если бы не г. Струговщиков, то Губер еще на несколько лет зарезал бы на Руси Гете. Впрочем, черт с ними, с этими бездарными Губерами -- начхать им на голову, как говорит один из героев Гоголя6.
   Если я буду крепко участвовать в "Отечественных записках", то -- уговор лучше денег -- Полевой -- да не прикоснется к нему никто, кроме меня! Это моя собственность, собственность по праву. Я, и никто другой, должен спихнуть его с синтеза и анализа и со всего этого хламу пошлых, устарелых мненьиц и чувствованьиц, на которых он думает выезжать и которыми думает запугать новое поколение. Особенно, если выйдет окончание его "Аббаддонны" -- это мой пир -- как ворон на падалище, спущусь я на это нещечко литературного прекраснодушия и исклюю и истерзаю его. У меня уже готова в голове статья. Люблю и уважаю Полевого, высоко цепю заслуги его, почитаю его лицом историческим; но тем не менее постараюсь сказать и доказать, что он отстал от века, не понимает современности и сделался тем Каченовскпм, которого он застал при своем выступлении на литературное поприще. Ужасное несчастие пережить самого себя -- это все равно, что сойти с ума7.
   Если я перееду в Питер, то к тому году хочу издать альманах, и потому считаю за Вами повесть, а за г. Струговщиковым несколько переводов из Гете. Сам напишу огромное "Обозрение", которое -- я уверен в этом -- все прочтут. Будут стихи Красова, Кольцова, --Ѳ--, переводы из Шекспира, Гете, Гейне, Рюкерта -- Каткова, Аксакова.
   Кланяйтесь от меня г. Владиславлеву. Я получил от него подарок и письмо -- за то и за другое от души благодарю, но отвечать, по обстоятельствам, не мог. Извините меня перед ним8.
   Представьте себе -- какая досада: в Межевом институте ученик украл у меня тетрадь стихов Красова и переслал ее к Сеыковскому, а тот себе печатает да печатает. Нельзя ли об этом пустить слух в "Литературных прибавлениях" и даже перепечатать все эти стихотворения, а я немедленно выхлопочу от автора право на эту перепечатку9. Жду от Вас ответа. Не замедлите.

Ваш В. Белинский.

  

48. И. И. ПАНАЕВУ

25 февраля 1839. Москва

Москва. 1839 г., февраля 25.

   Я остаюсь в Москве, любезнейший Иван Иванович, и потому прошу Вас оставить хлопоты обо мне и извинить меня за ложную тревогу1. Различные затруднения до такой степени взбесили меня, что я твердо решился перебраться в Питер; но дело кое-как переделалось -- и я опять москвич. Пока не могу много писать к Вам: я еще болен от этих передряг. Пожмите от меня руку г. Струговщикову... Не умею благодарить его за присланные элегии Гете: несколько времени я обжирался ими: как в волнах океана жизни, купался я в этих гекзаметрах. Прошу у г. Струговщикова извинения в том, что я имел глупость две элегии поместить в 11 No за прошлый год, который только на днях явится, хотя уже является четвертый месяц. Перевод "Прометея" -- чудо! Прошу и умоляю г. Струговщикова не оставить меня и вперед своими трудами2.
   Равным образом прошу Вас засвидетельствовать мое уважение г. Владиславлеву. Очень благодарен ему за его милый подарок3. Не отвечал ему на письмо по двум причинам: не до того было, а сверх того, я и не знаю имени и отчества г. Владиславлева. Попросите его засвидетельствовать мое почтение M. M. Попову, моему бывшему учителю, который во время оно много сделал для меня, и живая память о котором никогда не изгладится из моего сердца.
   Представьте себе -- какое горе: у меня украдена учеником Межевого института, некиим М., тетрадь стихов Красова и попала в руки Сенковского, который и распоряжается ею, как своею собственностью. Нельзя ли об этом намекнуть в "Литературных прибавлениях"?4
   Не стыдно ли Краевскому воскурять фимиамы таким людям, каков Каменский, Гребенка и т. п.?5 Статья Губера о философии обличает в своем авторе ограниченнейшего человека, у которого в голове только посвистывает6. Какая прекрасная повесть "История двух калош" гр. Соллогуба. Чудо! прелесть! Сколько душевной теплоты, сколько простоты, везде мысль!7
   Бью Вам челом -- нижайше кланяюсь, любезнейший Иван Иванович: пока хоть чего-нибудь, а хорошего и отличного, когда будет у Вас досуг8. Право, если Вы для 4 No не дадите своей повести -- я рассорюсь с Вами.
   Кланяйтесь от меня Савельеву и скажите ему, чтобы он уже не хлопотал9. До будущего 1840 года я -- москвич, а там -- что бог даст. Прощайте.

Ваш В. Белинский.

  

49. К. С. АКСАКОВУ

Март -- апрель 1839. Москва

   О Константин вероломный, коварный друзей забыватель!
   Зевса молю: да Кроыион, могучий перунов метатель,
   Молний браздами тучное тело твое избичует!
   И владычицу Геру молю: да камнем тяжелым
   В жирную выю тебя поразит, как скотину Лрея,
   Коему столько подобен скотскою силою дурацкой,
   Тела слоновьей посадкой и разума скудною долей!
   Муж псообразный * и лживый, меня ты забвению предал.
   Светлопространный мой дом, что создал мне Гефест-небожитель,
   Сын Геры богини, хромоногий художник великий --
   Дом мой забыл ты, гордящийся силой телесною смертный!
   Что за причина забвенью сему -- поведай ты мне без медленья!
   Древнего старца Омира днесь я чту ** -- и, мне, благодарный,
   Оный божественный старец гекзаметр -- дар сребролукого Феба,
   Мне завещал -- и оным цыдулку к тебе написал я,
   Ждущий ответа, а паче тебя самого, о нескладный!
   Новостей много поведать тебе я имею...
   * По-русски -- сукин сын.
   ** Каламбур, то есть двоесмыслие -- читаю и почитаю.
  

50. H. В. СТАНКЕВИЧУ

19 апреля 1839, Москва

Москва. 1839 года, апреля 19 дня.

   Мой милый Станкевич, много и много виноват я перед тобою, больше, нежели кто-нибудь из твоих друзей и знакомых. Не много написал я к тебе писем, и в каждом из них обещал написать другое -- уж большое, а не писал и малого 1. Но не приписывай этого (боже сохрани!) моей к тебе холодности (черта ли хорошего было бы во мне, если бы я охолодел к тебе?), даже не приписывай и лености, хотя она тут немного и виновата. Дело в том, в каждом моем большом письме мне хочется познакомить тебя и с моим настоящим моментом и с обстоятельствами, бывшими его источником или следствиями; но я теперь мчусь на почтовых по дороге (пока все еще по проселочной) жизни, и настоящий мой момент едва ли продолжается месяц. Перейдя же в другое состояние духа, я уже не сержусь на прежнее (как это всегда бывало со мною прежде), потому что понимаю его необходимость и еще потому, что я становлюсь все менее и менее неистов. Процессы моего духа всегда осуществляются в жизни и отражаются в обстоятельствах, большею частию потрясающих и ужасных. Например, недавно (месяца два назад) со мною повторилась было твоя история, да так, что я хватился за голову, боясь -- уж не сошел ли я с ума, и подходил беспрестанно к зеркалу, чтобы посмотреть -- не поседели ли мои волосы. Слава богу, все кончилось хорошо, и я за глупую фантазию поплатился только месяцами двумя глупостей и пошлостей да неделями двумя-тремя адских мук2. Не думай, чтобы дело шло об известной тебе фантазии3 -- то уже дело конченое, и я успел наделать еще новых глупостей, которые продолжались меньшее время, но стоили дороже. В последнем письме моем я обещал тебе описать подробно всю мою ссору с Бакуниным4. Я было и думал приняться за него, но каково было мое изумление, когда, взявшись за перо, увидел, что ссоры не было, что я не знаю, за что я ссорился и за что сердился на этого человека. Все дело было в том, что у нас никогда не было дружбы, потому что природы наши враждебно противоположны. "Ты стремишься к высокому и я стремлюсь к высокому -- будем же друзьями" -- вот начало нашей дружбы. К этому еще присоединилось призрачное чувство, прекрасная, но бесплодная фантазия: ее брат непременно должен быть моим задушевным другом. Время есть поверка всех склонностей, всех чувств, всех связей -- действительность стала вытанцовываться5, а мы принялись грызться, а когда перегрызлись, то увидели, что совсем не из чего было грызться, и, как умные люди, теперь разошлись мирно, с уважением друг к другу. В Бакунине много дурных сторон: дружба простила бы его за них, но я не был его другом,
   и потому теперь считаю себя вправе говорить только о хороших его сторонах, которых он тоже очень не чужд. Из остальных друзей один, на которого я больше всех полагался, потому что более всех любил его, поступил со мною предательски, но так как он это сделал по слабости характера, то я и простил его в душе моей6. Клюшников из напряженного экстаза перешел опять в ужаснейшую хандру,-- и ему не до других. Из старых друзей только добрый, благородный, любящий Аксаков все так же хорош со мною, как и прежде. Он давно уже стал выходить из призрачного мира Гофмана и Шиллера, знакомиться с действительностию, и в числе многих причин особенно обязан этому здоровой и нормальной поэзии Гете. Из новых меня особенно интересует Кудрявцев, и я с ним все более и более схожусь. Это автор "Катеньки Пылаевой", который теперь уже автор нескольких превосходных повестей, обличающих в нем глубокую художественную натуру.
   Да, брат, наконец пришлось расчесться за всякую ложь -- и в любви и в дружбе. Диалектика жизни довела до сознания многих истин, казавшихся прежде неразрешимыми. Я теперь понимаю, что такое любовь и что такое дружба: то и другое есть воспринятие в себя одним существом другого существа вследствие необъяснимого, мистического сродства их натур. То и другое дается человеку богом,-- и если человек, наскучивши ждать, вздумает взять это сам, то жестоко срежется. Да, все это теперь я понимаю, и по тому самому обо всем этом у меня прошла охота рассуждать,-- и я повторяю мудрое изречение твоего благородного, доброго и глубокого Вердера: "Если человек задает себе вопрос -- значит, что он еще не созрел для ответа"7. Но, разочаровавшись в предметах любви и дружбы, ятем больше еще верю в любовь и дружбу, и еще тем в большем свете представляются мне эти два великие чувства. Я много страдал и много страдаю, но жить мне вообще лучше, чем прежде. Я ужасаюсь моей прошлой жизни, так хорошо тебе известной, сравнивая ее с нынешнею. Больше всего дает мне счастия и внутренней жизни расширение моей способности восприемлемости изящного. Пушкин предстал мне в новом свете, как один из мировых исполинов искусства, как Гомер, Шекспир и Гете. Тебе, знающему только его "Цыган", "Полтаву" и "Онегина", но не знающему его посмертных сочинений, может показаться мое мнение странным, экзальтированным8. "Илиада",переведенная Гнедичем, для меня есть второй источник такого наслаждения, от силы которого я иногда изнемогаю в каком<-то> сладостном мучении. О греках (разумеется, древних) не могу думать без слез на глазах. Мне доступна и сфера религии, но более родная мне сфера -- искусство,-- и хороший гипсовый снимок с Венеры Медицейской стоит в глазах моих больше того глупого счастия, которого я некогда искал в решении нравственных вопросов. Боже мой, какая это была ужасная жизнь! Нравственная точка зрения погубила было для меня весь цвет жизни, всю ее поэзию и прелесть.
   Что ты, как ты? Скоро ли увижу, обойму я тебя? То-то бы порассказал я тебе о твоем Виссарионе неистовом! То-то бы посмеялся ты! То-то бы послушал я тебя! О, если бы ты опять стал жить в Москве, и мы, разрозненные птенцы без матери, снова слетелись бы в родимое гнездо! Скоро ли -- скажи.
   Письмо это тебе доставит молодой человек, некто Ховрин, мать которого очень желает с тобою познакомиться. Это премилая и преумная женщина, в которой мне особенно нравится то, что у ней есть живое чувство изящного: она понимает Пушкина и Гоголя. Я познакомился с ней недели за полторы до ее отъезда за границу. Посылаю тебе с ними листки из "Наблюдателя", стихи и "Флейту", повесть Кудрявцева. Пожалуйста, познакомься с Марьею Дмитриевною Ховриною. Кланяйся Грановскому и Неверову. Прощай.

В. Б.

   Хотел тебе послать несколько стихотворений из "Наблюдателя", да как стал разбирать, так и решился выбрать из него всю "сущность и поступки"9 -- это вместо длинного письма.
  

51. М. А. БАКУНИНУ

15--23 мая? 1839. Москва

   Оставь, Мишель, этот смешной тон -- он не к лицу ни тебе, ни мне. Я знаю причину его и сознаюсь, что в этом случае я виноватее тебя, но это в последний раз. Все наши сплетни кончились -- уверяю тебя, и не хочу пояснять тебе последней1. Верь одному, что я без причины не могу2 злиться на человека и говорить о нем худо (делая это, я плачу злом, равным злу), а теперь я сознал вполне, что все эти причины ужасно как вздорны. Беру бога в свидетели моей искренности. Да, забудем прошедшее,-- и пусть оно останется для нас не больше, как уроком для настоящего и будущего. Наши с тобою отношения не должны так детски разорваться -- они должны продолжиться с той минуты, в которую мы с тобою обнялись и поцеловались в доме Веер, в твой последний приезд. Мы не друзья и даже не близкие приятели, но нам не за что ненавидеть друг друга и дичиться и смешно говорить Вы. В нашем прошедшем много хорошего,-- и теперь я не люблю твой образ мыслей (во многих отношениях), но не тебя. Если примирение Боткина с мною не было фразою или комедиею, то он пояснит тебе мои чувства, которые для него будут ясны из этой записки. Письма твои, относящиеся к последней полемической перебранке, я давно отдал Боткину -- прочих не отдам, потому что они мне напоминают примечательную эпоху в моей жизни и много хорошего в прошедшем: другого употребления я не намерен нз них делать. Вот все. Верь моей искренности и верь тому, что мне уже надоело прекраснодушное кружение в пустых кругах ложных отношений, ложной дружбы, ложной любви и ложной ненависти. Благословим прошедшее, оставим друг друга в покое и будем встречаться без ненависти и холодности. Теперь я чувствую себя совершенно готовым для этого. Записку твою возвращаю к тебе. Коли почтешь нужным написать другую, то пиши без Вы, а всего лучше скажи прямо в глаза, если что имеешь сказать мне. Готов встретить тебя с удовольствием везде -- у тебя, у себя, у Боткина.

В. Белинский.

   На обороте:
   Бакунину
  

52. А. А. КРАЕВСКОМУ

5 июля 1839. Москва

   Милостивый государь Андрей Александрович!
   Благодарю Вас за расположение, с которым Вы принимаете мое предложение трудиться для Ваших журналов. Теперь от Вас самих зависит назначить мне работу кроме той, на которую я сам вызвался. За мною статья о Менцеле и -- если Вам будет угодно -- <о> "Горе от ума"; нынешний день оканчиваю довольно обширное "похвальное слово" другу моему, Николаю Алексеевичу Полевому1. Не нужно ли Вам чего по части библиографии -- в таком случае распорядитесь, чтобы мне были доставлены книги -- вот и все. Что касается до платы за статьи, то не нужно никаких особенных условий, и я предоставляю этот пункт на Ваше решение, в полной уверенности, что Вы не поставите меня ниже других, но будете руководствоваться однажды принятыми Вами правилами по этому предмету. По приезде в Петербург я желал бы принять подеятельнее участие в "Литературных прибавлениях", чтобы способствовать их оживлению, а теперь готов делать, что можно делать, находясь в Москве2. Что касается до "Отечественных записок", то они могут желать участия всех порядочных литераторов, но не нуждаются ни в чьей помощи. Право, мне кажется, они были бы еще сильнее, если бы легкая-то кавалерия лучше им служила. Уж я бы похлопотал для легкой-то кавалерии, по приезде в Петербург! По крайней мере, я снабжал бы их преогромною библиографиею и преизобильною полемикою. Сверх того, я мог бы быть Вам полезным и со стороны черновой работы -- корректуры, прочтения рукописных статей и пр. Но все это в Петербурге, а пока давайте такой работы, какою можно заняться в Москве3.
   Примите мое искреннее уверение, что будете иметь во мне не работника, но самого усердного участника, душою и сердцем преданного Вашим журналам и не отделяющего от их интересов своих.

Готовый к услугам Вашим
Виссарион Белинский.

   Москва.
   1839, июля 5 дня.
  

53. А. А. КРАЕВСКОМУ

19 августа 1839, Москва

Москва. 1839. Августа 19 дня.

   Милостивый государь Андрей Александрович!
   Благодарю Вас за Ваше обязательное, милое письмо1, и спешу ответить на него. Не смейтесь над моим "спешу": я был очень болен и только недавно выздоровел. Меня постигла самая поносная болезнь, в которой была и кровь, и спазмы, или судороги, и слизь, и стоны, словом, самое богатое содержание для повести Каменского. Теперь я оправился; но болезнь задержала мои работы. Насчет статьи о Менцеле я с Вами совершенно согласен: критикой она быть не может, а должна идти в отделении наук -- я так сделаю2. Что касается до статьи о "Горе от ума" -- в голове она у меня вся готова, но вот беда -- нигде не могу найти книги3, равно как и Алексей Дмитриевич. Вы не можете себе представить, как мы бедны средствами. У вас в Питере есть дух общительности, и книгопродавец с литератором как-то связаны: у нас все развязано и все косо смотрит друг на друга. Хотел уже купить, но, благодаря быстрому обращению нашей книжной торговли, "Горя от ума", которое уже больше месяца как вышло в Петербурге, у нас еще нет; а я ходил и к Смирдину. Теперь я еду на дачу к Щепкиным, чтобы на свободе кончить о Менцеле, написать о "Горе от ума", разделаться с "Галатеею"4, написать для г. Владиславлева о "Каменном госте"5 (кстати, уведомьте меня о последнем сроке доставления этой статьи) и покончить другие не столь важные дела. К 15 сентября уверен, что покончу все это6.
   "Отечественные записки" и "Литературные прибавления") -- наше общее дело: отныне я их и душою и телом, их интересы -- мои интересы. По приезде в Питер докажу Вам это на деле. Приеду я с Панаевым (от которого недавно получил из Казани письмо7 -- обещается быть в Москву к концу сентября, пробудет в Москве еще с месяц, а там мы и к Вам)8.
   Статья Каткова прекрасна по содержанию и не совсем удовлетворительна по форме: он в пей похож на одного из тех богатырей, осиленных и заброшенных собственною сплою, о которых он говорит в своей статье9. Словом, его статье недостает прозрачности; много повторений и растянутостей; но содержание так богато, так сочно, мест поэтических так много, что статья все-таки прекрасна, несмотря на все недостатки. "Пан Халявский" для первого чтения потешен и забавен, но при втором чтении с него немного тошнит. Это не творчество, а штучная работа, сбор анекдотов, словом, возведение идеи малороссийской жизни до идеала, если под идеалом должно разуметь, вместе с французами, собрание воедино всех черт, рассеянных в природе и относящихся к одному предмету. Впрочем, для журнала "Халявский" -- клад: он найдет себе больше читателей и хвалителей, чем творческие произведения Гоголя10.
   Бога ради, Андрей Александрович, какими судьбами попала в "Отечественные записки" гнусная статья пошляка, педанта и школяра Давыдова?11 Помилуйте, если журнал -- поле, то он удобряется хорошим, а не навозом ослиным, как обыкновенные поля. Извините за откровенность, но во мне кровь заговорила. "Отечественные записки" журнал теперь единственный в России по внутреннему достоинству: зачем же пятнать его такими нечистотами?
   Что моя статья о Полевом?12 Боюсь, что не пропущена. Благодарю Вас за перепечатку моей статьи из "Наблюдателя": еще в первый раз меня будет читать большая публика13.
   Прошу Вас поклониться от меня Бакунину, с которым Вы верно уже познакомились14. Также и Межевичу мой поклон, хоть я и сердит на него за "Литературные прибавления"15.
   Прощайте, Андрей Александрович. Желаю Вам не охладевать в усердии к журналу и работать, как Вы всегда работаете, а для того да подаст Вам бог терпения и доброго здоровья.

Ваш В. Белинский.

  

54. П. И. ПАНАЕВУ

19 августа 1839. Москва

Москва. 1839. Августа 19 дня.

   Ну, Иван Иванович, насилу-то дождался я от Вас весточки;1 Ваше молчание заставило было меня живо беспокоиться насчет и Вашего переезда через Волгу, и Ваших новых отношений к делящимся (чего доброго -- думал я,-- пожалуй, зарежут). По сему резону Вы выходите не благодетельный помещик, как изволите величать себя, а разве злокачественный дворянин и разбойник, как резко выразился Иван Иванович о Иване Никифоровиче2. Вот Авдотья Яковлевна3 -- дело другое: она очень похожа на благодетельную помещицу: попробуйте отдать деревню в полное ее распоряжение -- и увидите, что чрез полгода, благодаря ее доброте и благодетельности, благодарные Ваши крестьяне -- сии брадатые Меналки, Даметы, а наипаче Титиры -- сделаются сами господами, а господа сделаются их крестьянами4.
   Записка Ваша ко мне отличается удивительною пустотою содержания. Однако ж спасибо Вам и за нее. Рад, что Вы обещаете приехать к концу сентября, но боюсь, чтобы Ваш приезд -- как это часто бывает в сем непрочном мире -- не отодвинулся до конца октября5. Знаю, что Вы рветесь оттуда всей душою, да боюсь, что дела задержат. Пожалуйста, почтеннейший, приезжайте скорее: право, я жду Вас с нетерпением. Признаюсь, почему-то и с Москвою мне уж поскорее хотелось бы разделаться.
   После Вашего отъезда со мной произошла бездна перемен и разных разностей. Во-первых, я был болен... Убедительное письмо Ваше к Николаю Филипповичу не произвело никакого эффекта, потому, вероятно, что нужда убедительнее красноречия6. Но мне досадно только, что он не давал никакого ответа. Около трех недель я и надеялся и отчаивался (самое гнусное состояние); наконец заболел и увидел необходимость не выходить из дому, но вдруг почему-то решился выйти в последний раз, повидаться с Боткиным. Иду -- вдруг едет навстречу Николай Филиппович. А, подумал я, вот зачем тянуло меня из дому! -- вскакивает с дрожек и начинает на тротуаре беседу. О том, о сем, между прочим и о Вас -- имею ли я от Вас известия, наконец -- к делу. Щепкин (М. С.) должен ему 115 р., так он предлагал мне поделикатнее попросить их у него себе. В моем положении и это было благодеянием божиим; а Николай Филиппович уверял, что у него нет ни копейки и что сам нуждается. Тотчас я увиделся на университетских экзаменах с Барсовым и попросил его передать Михаилу Семеновичу о сем. На другой день спокойно жду денег, но не тут-то было. К. Аксаков дал 10 р., а то бы лекарства не на что было взять, а еще нужны были пьявки и другие подобные мерзости, требующие денег. Я было и нос повесил, но вдруг является И. Е. Великопольский, осведомляется о здоровье и просит меня быть с ним без церемоний и сказать, нужны ли мне деньги. Я попросил 50 р., но он заставил меня взять 100. Вот так благодетельный помещик!7 На другой день, перед самым отъездом своим в деревню, опять навестил меня. От Щепкина я получил деньги, когда уже выздоровел.
   Я помирился с Боткиным и Катковым8. Между нами все опять по-прежнему, как будто ничего не было. Да, все по-прежнему, кроме прежних пошлостей. Сперва я сошелся с Боткиным и без всяких объяснений, прекраснодушных и экстатических выходок и порывов, но благоразумно, хладнокровно, хотя и тепло, а следовательно, и действительно. Теперь вижу ясно, что ссора была необходима, как бывает необходима гроза для очищения воздуха: эта ссора уничтожила бездну пошлого в наших отношениях. Причины ссоры, несколько Вам известные, были только предлогом, а истинные и внутренние причины только теперь обозначились и стали ясны. Боткин много был виноват передо мною, но и я в этом случае не уступлю ему. Надо быть беспристрастным и справедливым. Впрочем -- странно: я, который не находил удовлетворительного мщения Боткину, я теперь не могу себе ясно представить, за что я на него так неистовствовал. Вообще в нашей ссоре много семейного, только для нас понятного. Боткин -- чудесный человек -- теперь я могу это сказать, потому что говорю без пылу, в котором, если много пламени, за то много и дыму и чаду, но с теплотою и благоразумно. Катков имеет один недостаток -- он очень молод, а кроме этого, он один из лучших людей, каких только встречал я в жизни. Я рад без памяти, что наши дрязги кончились и что вы-таки увидите нас так, как хотели и думали увидеть нас, когда отправлялись из Питера в Москву9.
   К. Аксаков со мной как нельзя лучше. Его участие ко мне иногда трогает меня до слез. Невозможно быть расположеннее и деликатнее, как он со мною. Славный, чудный человек! Но молод так, что даже Катков годится ему в дедушки. В нем есть все -- и сила, и энергия, и глубокость духа, но в нем есть один недостаток, который меня глубоко огорчает. Это -- не прекраснодушие, которое пройдет с летами, но какой-то китайский элемент, который примешался к прекрасным элементам его духа. Коли он во что засядет, так, во-первых, засядет по уши, а во-вторых -- во сто лет не вытащите Вы его и за уши из того ощущеньица или того понятьица, которое от праздности забредет в его, впрочем, необыкновенно умную голову. Вот и теперь сидит он в глупой мысли, что Гете (далеко кулику до Петрова дня!) выше Шекспира. Но пока он сидел да посиживал в этой мысли, если только нелепость можно назвать мыслию, случилось происшествие, от которого на лице Аксакова совершилось страшное aplatissement {сплющивание (фр.). -- Ред.}, ибо это происшествие накормило его грязью, как говорят безмозглые персиане. Грязь эту разделили с ним Бакунин и Боткин.
   Еще давно, прошлого осенью, узнавши нечто из содержания 2 ч. "Фауста", я с свойственною мне откровенностию и громогласностию провозгласил, что оная 2 ч. не поэзия, а сухая, мертвая, гнилая символистика и аллегорика. Сперва на меня смотрели, как на богохульника, а потом, как на безумца, который врет, что ему взбредется в праздную голову. Новое поколение гегелистов основало журнал в pendant {соответствующий (фр.). -- Ред.} к берлинскому "Jahrbücher" {"Ежегодникам" (нем.). -- Ред.}, основанному Гегелем -- "Hallische Jahrbücher" {"Галльским ежегодникам" (нем.), -- Ред.}, и в этом журнале появилась статья некоего гегелиста Фишера о Гете, в которой он доказывает, что 2 ч. "Фауста" мертвая, пошлая символистика, а не поэзия, но что 1 ч. -- великое произведение, хотя и в ней есть непонятные, а потому и непоэтические места, ибо (это же самое говорил и я) поэзия доступна непосредственному эстетическому чувству, и отнюдь не требуется для уразумения художественных произведений посвящения в таинства философии, и что все непонятное в ней принадлежит к области символизма и аллегории. Фишер разбирает все разборы "Фауста" и нещадно издевается над ними; достается от него и первому поколению гегелистов, которые, говорит, ослепленные ярким светом Гегелевой философии, пустились сгоряча все подводить под нее и во 2 ч. "Фауста" особенно мнили видеть полное осуществление системы Гегеля в сферу искусства 10. Больше всех срезался Марбах, который в своей действительно прекрасной популярной книге напорол о 2 ч. "Фауста" такой дичи, что Боткин, прекрасно переведший из нее большой отрывок, ничего не понял, и когда хотел поместить этот отрывок в "Наблюдателе", то принужден был вычеркнуть большую часть того, что сказано там о 2 ч. "Фауста", которую Марбах называет "Книгою с семью печатями" для непосвященных 11. Каково срезались ребята-то? И каков я молодец! Не правда ли, что необыкновенно умный человек... А?.. Как вы думаете?.. (спросите и Авдотью Яковлевну, как она о сем разумеет -- я думаю, дивится моей скромности).
   В этом же "Hallische Jahrbücher" есть статья о Данте, в которой доказывается, что сей муж совсем не поэт, а его "Divina comedia" {"Божественная комедия" (ит.).-- Ред.} -- просто символистика 12. Я то же и давно думал и говорил, ну, и после этого Вы еще не станете на колени перед моим эстетическим гением?..
   Вот каким длинным письмом заплатил я за Вашу записку. Получил я письмо на Ваше имя и прилагаю его при сем. Также прилагаю и письмо Андрея Александровича ко мне -- оно очень интересно 13. Пожалуйста, пишите ко мне.
   Константину (Аксакову) еще не отдавал Вашего письма, не видался с ним. А как он будет рад ему -- как дитя! Да, славное дитя Константин; жаль только, что движения в нем маловато. Я и теперь почти каждый день рассчитываюсь с каким-нибудь своим прежним убеждением и постукиваю его, а прежде так у меня -- что ни день, то новое убеждение. Вот уж не в моей натуре засесть в какое-нибудь узенькое определеньице и блаженствовать в нем. Кстати, после статей о 2-й ч. "Фауста" и Данте, я стал еще упрямее, и теперь мне пусть лучше и не говорят о драмах Шиллера; я давно уже узнал, что они слабоваты. Пушкин меня с ума сводит. Какой великий гений, какая поэтическая натура! Да, он не мог по своей натуре написать ничего вроде 2-й ч. "Фауста". Я обещал Владиславлеву в альманах статью о "Каменном госте" 14 в форме письма к другу. Хочется попытаться на нечто похожее на философскую критику à la Рётшер 15. У меня теперь три бога искусства, от которых я почти каждый день неистовствую и свирепствую: Гомер, Шекспир и Пушкин...
   Поблагодарите от меня Авдотью Яковлевну за память обо мне и ударьте ей за меня низко челом.
   Прощайте. В "Литературных прибавлениях" перепечатана моя статья о Полевом, а новая еще не напечатана 16.

Ваш В. Белинский.

  

55. А. А. КРАЕВСКОМУ

24 августа 1839. Москва

Москва. 1839. Августа 24 дня.

   Милостивый государь Андрей Александрович.
   Посылаю Вам тетрадь рецензий и прошу Вас обратить внимание на первую рецензию о речах университетских: я писал ее с задором1. Прошу Вас, напечатайте в "Литературных прибавлениях" литературное известие, что в Москве составилось общество для издания "Библиотеки романов", не имеющей ничего общего с Глазуновскою. Сперва будут переведены (с английского) Вальтер Скотт и Купер, от первого романа до последнего, все -- и переведенные, и не переведенные; Гофман весь (с немецкого), словом, все, что найдется истинно художественного у англичан и немцев и истинно хорошего у французов2. Главные переводчики (это известие не для печати, а для Вас) -- Катков и Кетчер. У последнего уже готовы два романа Купера, а первый принимается за "Степи". Печатать берется на свой счет один богатый человек (г. Высотский3). Если предприятие будет неудачно, переводчики рискуют ничего не получить за большой и тяжкий труд: согласитесь, что только в Москве возможно такое бескорыстие. Пожалуйста, возвестите о нем погромче и попышнее, чтобы расшевелить внимание публики и накричать, натвердить ей, что это предприятие (как оно и в самом деле) великое, полезное и пр. и пр.
   Теперь перелистываю 8 No "Отечественных записок". Повести Корфа боюсь, а прочту4. Стихотворение Лермонтова "Три пальмы" чудесно, божественно. Боже мой! Какой роскошный талант! Право, в нем таится что-то великое. Перевод Аксакова из "Фауста" на этот раз прекрасен5. Песни народные интересные6. Современая библиографическая хроника вся, от первой до последней страницы, жива и интересна. Ученые и по части искусств статьи, смесь -- все это возбуждает живейшее любопытство одним уже оглавлением. Славный No! Славный Ваш журнал, дай ему бог здоровья! 8 No "Отечественных записок" и 6 No "Сына отечества" -- боже мой, какая чудовищная разница!
   С удовольствием пересмотрел мои статейки в "Литературных прибавлениях" и "Отечественных записках". Небольшие изменения, сделанные Вами в них, очень хороши, и я вполне доволен ими7. Вообще я все больше и больше убеждаюсь, что мы с Вами поладим, как нельзя лучше.
   Что Вы раздумали к нам в белокаменную? А мы было Вас ждали, ждали, ждали8. Бог с Вами!
   Скажите Межевичу спасибо за его письмецо ко мне -- буду отвечать ему, как только удосужусь9.
   Заключаю мое послание просьбою к Вам, которая, может быть, покажется Вам странною. Доставитель моей тетради и этого письма -- наборщик из типографии Степанова, прибывший к Вам в Питер искать счастия, которого для художников, как и для литераторов, в Москве нет. Вы коротко знакомы с Гутенберговою типографией)10, почему и решаюсь утруждать Вас моею покорнейшею просьбою -- помочь сему юноше определиться в оную, на выгодных для него условиях, для чего, я думаю, достаточно одной Вашей рекомендации, одного слова, и чем Вы меня премного обяжете. Л я ручаюсь Вам за него, как за человека, отлично знающего свое дело, усердного, прилежного, и притом прекраснейшего поведения. Я от души желаю ему счастия: он добрый малый, а сверх того, он окрестил меня в печать, набирая мои "Литературные мечтания", да и конкретно-прекраснодушные статьи он же набирал. Прошу о нем и Межевича, да возьмет он его под свое покровительство. Сделайте милость -- похлопочите.
   Трепещу за участь моей статьи о Полевом11. Я писал ее долго и с задором, одна переписка замучила меня: досадно будет, если не пропустят или слишком исказят. Уведомьте меня (или попросите сделать это Межевича) тотчас о ее судьбе.
   Прощайте.

Ваш В. Белинский.

   "Горя от ума" все еще нет в Москве. Бога ради, пришлите мне его, чрез А. Д. Галахова, в счет платы за статьи -- я уже решился купить его12.
  

56. Н. В. СТАНКЕВИЧУ

29 сентября -- 8 октября 1839. Москва

Москва. 1839, сентября 29 дня.

   Наконец-то я собрался писать к тебе, мой милый, мой любезный Николай! Приезд Грановского и письмо твое наполнили меня тобою -- с неделю я был не что иное, как воплощенная мысль о тебе1. Я воображал тебя во всевозможных положениях -- и как ты слушаешь лекции и читаешь "Логику" или "Феноменологию" Гегеля, и как ты пьешь шампанское и глотаешь устерсы, и как, в рубашке и подштанниках (о вид, угодный небесам!), при созерцающей тебя Берте, принимаешь позы то Аполлона Бельведерского, то Венеры Медичейской. Последнее твое положение решительно восхитительнее всех прочих -- я смеялся до слез, но в моем смехе было умиление: передо мною носился букет твоей непосредственности, и ты предстал мне во всей своей целости, и я вспомнил тебя всего, от первой минуты, когда увидел тебя впервые, до сего часу. Ах, Николай, Николай, когда я увижу тебя, мне это представляется чем-то невозможным, фантастическим. Не сердись на меня, что редко и мало пишу к тебе. Я сам было осердился на себя за это, и даже испугался, подумав, как редко я бываю занят тобою, мне показалось, что я перестал любить тебя, а убедиться в этом для меня все равно, что убедиться в том, что я не человек, а скотина. Но я скоро вышел из своего прекраснодушного опасения: я понял, что у всякого человека своя жизнь и свои личные интересы, а я, сверх того, во все это время находился в ужасных внутренних переделках, в мучительных процессах выхода из детства в мужество, со всеми переругался, был истерзан, исколесован так, что на душе моей не осталось ни одной целой струны, ни одного здорового места. И лишь только я начал выходить из этого экзамена жизни и выходить (говорю без самолюбия) немножко с честию для себя, как вдруг -- Грановский и твое письмо: тут я вполне убедился, что мне нечего опасаться за мою любовь к тебе. Вот тебе, прежде всего, самый обстоятельный и подробный ответ на твое послание.
   Способ, каким ты рекомендуешь мне Грановского, заставил меня смеяться до слез: аромат твоей милой, непостижимо-чудной непосредственности так и веял вокруг меня. Портрет Грановского верен, как нельзя больше: ты великий живописец! Но опасение, что мы не сойдемся, которое невольно высказывается в твоих словах, оказалось совершенно ложным: мы сошлись, как нельзя лучше и ближе, и без всяких прекраснодушных восторгов и натяжек, а совершенно свободно. Грановский есть первый и единственный человек, которого я полюбил от всей души, несмотря на то, что сферы нашей действительности, наши убеждения (самые кровные)--диаметрально противоположны, так что -- белое для него -- черно для меня, и наоборот. Ух, каким он идиотом воротился! Стоило зачем ездить на три года в Берлин, да еще на казенный кошт: поглупеть до такой степени можно б было и в Москве, на собственном иждивении! (Какова острота -- Грановский инда зашипел и выставил вперед ногу -- что, действительно, очень не хорошо, как ты сам это справедливо замечаешь в письме своем.) А полюбил я его вот за что: во-первых, за его милую, младенчески-простодушную, девственную непосредственность, за теплоту души, которая электрически сообщается другой душе; во-вторых, за то, что он любит тебя до обожания и, как ни глуп, но глубоко понимает и верно ценит тебя. После этого, что бы я был за скотина, если бы до смерти не полюбил его! Да, это один из тех людей, с которыми мне всегда и тепло и светло и которые никогда не могут прийти ко мне не вовремя, но всегда -- дорогие гости. Но, боже мой! можно ли быть противоположнее в своих убеждениях, как мы и он! Что за суждения об искусстве, что за вкус -- верх идиотства! Уланд выше Гейне, Шиллер... но погоди -- за Шиллера я задам ему вытаску вместе с тобою, а пока расправлюсь с ним с одним2. На Руси явилось новое могучее дарование -- Лермонтов; вот одно из его стихотворении:
  
   Три пальмы
   (Восточное сказание)
  
   В песчаных степях аравийской земли
   Три гордые пальмы высоко росли.
   Родник между ними из почвы бесплодной,
   Журча, пробивался волною холодной,
   Хранимый, под сенью зеленых листов,
   От знойных лучей и летучих песков.
  
   И многие годы неслышно прошли;
   Но странник усталый из чуждой земли
   Пылающей грудью ко влаге студеной
   Еще не склонялся под кущей зеленой,
   И стали уж сохнуть от знойных лучей
   Роскошные листья и звучный ручей.
  
   И стали три пальмы на бога роптать:
   "На то ль мы родились, чтоб здесь увядать?
   Без пользы в пустыне росли и цвели мы,
   Колеблемы вихрем и зноем палимы,
   Ничей благосклонный не радуя взор?..
   Не прав твой, о небо, святой приговор!.."
  
   И только замолкли -- в дали голубой
   Столбом уж крутился песок золотой,
   Звонков раздавались нестройные звуки,
   Пестрели коврами покрытые вьюки,
   И шел, колыхаясь, как в море челнок,
   Верблюд за верблюдом, взрывая песок.
  
   Мотаясь, висели меж твердых горбов
   Узорные полы походных шатров;
   Их смуглые ручки порой подымали,
   И черные очи оттуда сверкали...
   И, стан худощавый к луке наклоня,
   Араб горячил вороного коня.
  
   И конь на дыбы подымался порой,
   И прыгал, как барс, пораженный стрелой;
   И белой одежды красивые складки
   По плечам фариса вились в беспорядке;
   И, с криком и свистом несясь по песку,
   Бросал и ловил он копье на скаку.
  
   Вот к пальмам подходит, шумя, караван;
   В тени их веселый раскинулся стан.
   Кувшины, звуча, налилися водою,
   И, гордо кивая махровой главою,
   Приветствуют пальмы нежданных гостей,
   И щедро поит их студеный ручей.
  
   Но только что сумрак на землю упал,
   По корням упругим топор застучал.--
   И пали без жизни питомцы столетие!
   Одежду их сорвали малые дети,
   Изрублены были тела их потом,
   И медленно жгли их до утра огнем.
  
   Когда же на запад умчался туман.
   Урочный свой путь продолжал караван;
   И следом песчаным на почве бесплодной
   Виднелся лишь пепел седой и холодный;
   И солнце остатки сухие дожгло,
   А ветром их в степи потом разнесло.
  
   И ныне все дико и пусто кругом --
   Не шепчутся листья с гремучим ключом.
   Напрасно пророка о тени он просит:
   Его лишь песок раскаленный заносит,
   Да коршун хохлатый, с генной нелюдим,
   Добычу терзает и щиплет над ним.
  
   Какая образность! -- так все и видишь перед собою, а увидев раз, никогда уж не забудешь! Дивная картина -- так и блестит всею яркостию восточных красок! Какая живописность, музыкальность, сила и крепость в каждом стихе, отдельно взятом!3 Идя к Грановскому, нарочно захватываю новый No "Отечественных записок", чтобы поделиться с ним наслаждением -- и что же -- он предупредил меня: "Какой чудак Лермонтов -- стихи гладкие, а в стихах черт знает что -- вот хоть его "Три пальмы" -- что за дичь!" -- Что на это было отвечать? Спорить?--но я уже потерял охоту спорить, когда нет точек соприкосновения с человеком. Я не спорил, но, как майор Ковалев частному приставу, сказал Грановскому, расставив руки: "Признаюсь, после таких с Вашей стороны поступков, я ничего не нахожу"4 -- и вышел вон. А между тем этот человек со слезами восторга на глазах слушал "О царе Иване Васильевиче, молодом опричнике и удалом купце Калашникове"5. Не значит ли это того, что у него для искусства есть только непосредственное чувство, не развившееся и не возвысившееся до вкуса! А как он понимает Пушкина -- да здравствует идиотизм! Куда Пушкину до Шиллера! А по-нашему, так Шиллеру до Пушкина -- далеко кулику до Петрова дня. Какая полная художественная натура! Небось, он не впал бы в аллегорию, не написал бы галиматьи аллегорико-символической, известной под именем 2-й части "Фауста", и не был способен писать рефлектированных романов вроде "Вертера" или "Вильгельма Мейстера". Куда ему! Его натура художественная была так полна, что в произведениях искусства казнила беспощадно его же рефлексию: в лице Алеко, который враждует против условий общества, а между тем хочет их же наложить на бедных детей дикой вольности, и вносит к ним убийство и мщение, торжественно обличенный потом глубоким старцем цыганом (ты для себя лишь хочешь воли),-- Пушкин бессознательно бичевал самого себя, свой образ мыслей и, как поэт, чрез это художественное объектирование, освободился от него навсегда. Какое мировое создание! А "Моцарт и Сальери", "Полтава", "Борис Годунов", "Скупой рыцарь" и наконец -- перл всемирно-человеческой литературы-- "Каменный гость"! Нет, приятели, убирайтесь к черту с вашими немцами -- тут пахнет Шекспиром нового мира!.. А между тем, не забудь, что он умер с небольшим каких-нибудь 35 лет, в самой поре своего созревшего гения: что бы он еще сделал?..6
   Теперь о "Наблюдателе". Ты прав, сказавши, что стихотворное отделение в нем -- хорошо, но чтобы оно было лучше не по количеству превосходных пьес, а по качеству -- ты ешь грязь. Аксаковские переводы из Гете ("Бог и баядера", "Утренние жалобы", "Перемена", "Лежу я в потоке на камнях", "Тишина на море") -- больше, нежели хороши -- превосходны; но из Шиллера -- дрянь, кроме одного -- "Вечер", художественного в оригинале и художественно переведенного. Переводы Каткова из Гейне -- еще выше: из "Ромео и Юлии" ты знаешь не лучшие места; драму эту он перевел всю, и перевел превосходно, но все еще недоволен своим переводом7. Песни Кольцова -- чудеса творят, братцы, чудо-богатыри! Клюшникова пьесы прекрасны, особенно "Я не люблю тебя" -- до сих пор ты судил по-человечески; но отсель начинаются плоды твоего пребывания в Берлине, в котором хотя ты живешь и на собственном иждивении, но достиг (очень успешно) тех же результатов, как и Грановский. Я вас обоих поздравляю и низко вам кланяюсь. Как? -- бенедиктовское, риторическое, не только лишенное целости, которую дает пьесе идея, но даже и внешней связи здравого смысла, стихотворение Клюшникова к Петру -- превосходно8, а "Флейта", это дивно-художественное произведение, в котором вполне исчерпана вся его идея и воспроизведена в таких чудных, грациозных формах9,-- так -- ни то, ни се?.. Признаюсь -- после таких идиотских с вашей стороны поступков, я ничего не нахожу! Нет, брат Николай, видно, ты читал "Флейту" вместе с Бертою, потчуя ее пилюлями, и потому не заметил, что это одно из тех художественно-конкретных созданий, которые легки только на взгляд, но не даются тому, кто их перелистывает, а не читает. Вещица действительно легонькая, но ведь и "Цыганы" Пушкина легки, а "Россияда" Хераскова -- тяжела. Ведь есть же люди, которые о "Цыганах" отзываются еще с уважением, а в мелких стихотворениях Пушкина видят не больше, как легонькие стишки. Но потому-то они и тяжелы для уразумения, что слишком легки. Простота содержания при художественной форме -- камень преткновения для многих, ы потому-то для Грановского Уланд выше Гейне, а для наших московских Грановских10 -- Жуковский выше Пушкина. Нет, брат Николай, ты на сей раз срезался, наелся грязи. Что ты врешь о людях с поэтическим чувством без творческого дара, у которых всегда остается что-нибудь из сказанного ими, которые не могут отдать всей идеи во внешность и в личности которых близкий человек находит то, что в них осталось недосказанного? Это правда, но только это совсем невпопад применил ты к Кудрявцеву. Я знаю таких людей с поэтическою душою, но без творческого дара, но от их сочинений я не могу приходить в восторг. Мне ужасно смешны отношения Вердера к Девриенту, которыми ты хотел вывести меня из заблуждения. Актер может мне сказать, как он понимает роль, но мне от этого легче не будет, потому что дело актера не сказать, а показать, и для выражения одной и той же идеи вдохновение дает ему неисчислимо разные способы и формы. Вообще, твое указание на Вердера показало только, что его созерцание драматического искусства не слишком-то широко. Потом, ты ошибаешься насчет моих отношений к Кудрявцеву. Этот человек вообще очень неразговорчив, и ни о чем не говорит с такою неохотою, краткостию и так отрывисто, как о своих сочинениях, потому что очень мало дает им цены, и уже после, когда общие отзывы убедили его, что он не ошибся, он сказал однажды: "Да, "Флейта" вытанцовалась". Он не открывал мне своих тайн, и если я открыл ему некоторые, то больше потому, что меня восхищал его художественно-объективный интерес, с каким он слушал мои рассказы, как будто чтение повести. Мы сошлись с ним хорошо только на искусстве: что ему кажется художественным, то и мне, и наоборот -- разногласие между нами поэтому невозможно, если исключить его собственные произведения, как я уже говорил. Надобно тебе сказать, что у этого человека чудная непосредственность, а в отношении к болтливости, он -- живая противоположность мне. Наш разговор состоит всегда из потока моих речей, изредка перерываемых его короткими фразами. Для <меня> высочайшее наслаждение прочесть ему новую песню Кольцова, новый перевод Каткова, новое стихотворение Клюшникова; прочтя, я не спрашиваю его -- "каково?", но молча взгляну на него, он улыбнется, и мне вполне понятно это юпитеровское осклабление. Если ему что не нравится, он молчит, не улыбаясь, и, что хочешь делай, спорить не станет, а только раз скажет, что или "он не понимает", или "ему не нравится". Вообще, он совершенно не способен к внешнему выражению восторга, и его наслаждения можно прочесть только на просиявшем лице и довольной улыбке; но когда я читал с ним "Илиаду", он закрывал руками лицо и стонал, если только этим словом можно выразить то, что я хочу сказать. Никогда не забуду я той минуты, когда я прочел с ним "Бородинскую годовщину" Пушкина, или той, когда я (сам в первый раз) прочел вот эти стихи:
  
   (Из Ксенофана Колофонского)
  
   Чистый лоснится пол; стеклянные чаши блистают;
   Все уж увенчаны гости; иной обоняет, зажмурясь,
   Ладана сладостный дым; другой открывает амфору,
   Запах веселый вина разливая далече; сосуды
   Светлой, студеной воды, золотистые хлебы, янтарный
   Мед и сыр молодой -- все готово; весь убран цветами
   Жертвенник. Хоры поют. Но в начале трапезы, о други,
   Должно творить возлпянья, вещать благовещие речи,
   Должно бессмертных молить, да сподобят нас чистой душою
   Правду блюсти: ведь оно ж и легче. Теперь мы приступим;
   Каждый в меру свою напивайся. Беда не велика
   В ночь, возвращаясь домой, на раба опираться; но слава
   Гостю, который за чашей беседует мудро и тихо!
  
   Чтобы окончательно характеризовать тебе Кудрявцева, а вместе показать и мою теперешнюю точку зрения на искусство, скажу тебе, что для него было предметом бесконечно глубокого наслаждения, эстетического блаженства вот это стихотворение Пушкина:
  
   В крови горит огонь желанья,
   Душа тобой уязвлена,
   Лобзай меня: твои лобзанья
   Мне слаще мирра и вина.
   Склонись ко мне главою нежной,
   И да почию, безмятежный,
   Пока дохнет веселый день,
   И двигнется ночная тень.
  
   Последний стих, по-нашему, дает художественный колорит всей пьеске и принадлежит к немногому числу таких стихов, которые, по-видимому, ничего не заключая в себе,-- заключают в себе целые миры. Шекспира и все прочее для меня наслаждение читать со всяким; но Гомера и Пушкина -- высочайшее наслаждение читать с Кудрявцевым. Пластическая красота древних, особливо Гомера, с его простодушными, упоительными до опьянения эпитетами, в высшей степени родственна художническому духу Кудрявцева. Из Пушкина с ним особенно приятно читать мелкие стихотворения и "Каменного гостя", а из мелких -- чуждые завлекающей прелести содержания, но обаяющие художественною формою. Да, люблю, глубоко люблю этого человека, за его художественную натуру, за его в высшей степени художественный такт, который в нем доходит даже до крайности, так что самое обаятельное могущество содержания, возвышающегося до поэтического патоса, но чуждое или недостаточное по художественной форме, почти не трогает его. Впрочем, собственно дружеских отношений между нами нет, потому что дружеские отношения развиваются исторически, а он чужд всем событиям моей жизни, с которыми так неразрывно переплетен ты, Боткин (теперь Катков), а по тебе Грановский. Следовательно, дополнить своего создания собою он мне никак не может. И если его "Флейта)) -- художественное произведение, в высшем и глубочайшем значении этого слова, для всех нас, то я и все мы дошли до этого собственным умом. А ежели она для меня выше всех рефлектированных драм Шиллера, то на это у меня свои причины, о которых смотри ниже.
  

Октября 2.

   "Наконец, в твоих статьях, о Висяша, прежние достоинства и недостатки: в прежних ты резонируешь перед публикою, как у себя с друзьями за трубкою, и при всяком теоретическом положении приводишь длинные примеры и выписки, хочешь в нескольких словах Гоголя привести образцы творчества... это только странно; но..." Хоть это говоришь и ты, но не могу согласиться с тобою -- вот по какой причине: во-первых, между моим резонерством с публикою было несколько и такого, что выходило из полноты натуры и возвещало ей (публике) такие истины, которые для нее были очень новы, потому что она слышала их в первый раз и от первого человека. Что за дело, если эти истины читала она в куче вранья и резонерства? Что за дело, <если> эти истины говорил ей выгнанный из университета за леность студент, с трубкою во рту, неумытый,-- они для нее остались все-таки истинами, задушевно, горячо и понятно для нее высказанными? Неужели она <захочет> променять на такого чудака какого-нибудь идиота Шевырева за то только, что, <тот> без трубки во рту, которая так оскорбляет твое уважение к приличиям, в белых перчатках и с графином засахаренной воды, порол ей приличную дичь и кормил ее гнилью и пылью своего скопечества? Э, брат Николай! мне очень грустно, что резонерство и трубка (вероятно облака дыма -- я тогда затягивался насмерть) закрыли от тебя частичку истины, которой присутствия в моих писаниях ты, по крайней мере тогда, не отрицал. Не думай, Николай, чтобы я не видел смешных сторон моего телескопского ратования11, по я никак не могу понять, чтобы они могли заслонять его истинную, его действительную сторону. Истина как золото: для одного зернышка возятся с пудом песку. Мне сладко думать, что я, лишенный не только наукообразного, но и всякого образования, сказал первый несколько истин, тогда как премудрый университетский синедрион порол дичь. Истина не презирает никаких путей и пробирается всякими. Что же касается до смешной стороны, то не только в "Телескопе", я давно уже вижу ее и в "Наблюдателе". Я довольно непосилен и не долго сижу на одном месте, и потому я давно уже дальше "Наблюдателя". Смешная и детская сторона его совсем не в нападках на Шиллера, а в этом обилии философских терминов (очень поверхностно понятых), которые и в самой Германии, в популярных сочинениях, употребляются с большою экономиею. Мы забыли, что русская публика не немецкая, и, нападая на прекраснодушие, сами служили самым забавным примером его. Статья Бакунина погубила "Наблюдатель" не тем, что бы она была слишком дурна, а тем, что увлекла нас (особенно меня -- за что я и зол на нее), дала дурное направление журналу и на первых порах оттолкнула от него публику и погубила его безвозвратно в ее мнении 12. Что же до достоинства этой статьи, которая тебе показалась лучшею в журнале, так же как стихотворение Клюпшпкова к Петру превосходным,-- я опять не согласен с тобою: о содержании не спорю, но форма весьма неблагообразна, и ее непосредственное впечатление очень невыгодно и для философии и для личности автора. Человек хотел говорить о таком важном предмете, как философия Гегеля, в значении сознания разумной действительности, а не произвольного и фантазерского построения своей действительности -- и начал говорить размашисто, хвастливо и нагло, как в кругу своих друзей, с трубкою во рту и в халате -- не выкупив этих достолюбезностей ни популярностию, ни представительною образностию изложения. Вместо представлений -- в статье одни понятия, вместо живого изложения -- одна сухая и крикливая отвлеченность. Вот почему эта статья возбудила в публике не холодность, а ненависть и презрение, как будто бы она была личным оскорблением каждому читателю. В моих нападках на Шиллера видно если не ожесточение, то несколько дикая радость, что я могу законно колотить его. Тут вмешались личности -- Шиллер тогда был мой личный враг, и мне стоило труда обуздывать мою к нему ненависть и держаться в пределах возможного для меня приличия. За что эта ненависть? -- За субъективно-нравственную точку зрения, за страшную идею долга, за абстрактный героизм, за прекраснодушную войну с действительностию -- за все за это, от чего страдал я во имя его. Ты скажешь, что не вина Шиллера, если я ложно, конечно и односторонне понял великого гения, и взял от него только его темные стороны, не постигши разумных: так, да и не моя вина, что я не мог понять его лучше. Его "Разбойники" и "Коварство и любовь", вкупе с "Фиеско"13 -- этим произведением немецкого Гюго, наложили на меня дикую вражду с общественным порядком, во имя абстрактного идеала общества, оторванного от географических и исторических условий развития, построенного на воздухе. Его "Дон-Карлос" -- эта бледная фантасмагория образов без лиц и риторических олицетворений, эта апотеоза абстрактной любви к человечеству без всякого содержания -- бросила меня в абстрактный героизм, вне которого я все презирал, все ненавидел (и если б ты знал, как дико и болезненно!) и в котором я очень хорошо, несмотря на свой неестественный и напряженный восторг, сознавал себя -- нулем. Его "Орлеанская девственница" -- эта драма с двумя элементами, резко отделившимися один от другого, как отделяется вода от масла, налитые в один сосуд,-- с элементом мистическим и католическим (а я теперь поохолодел к первому и всегда дико ненавидел второй, с чем и умру) -- и потом с элементом плохой и бледной драмы (где является Анна д'Арк -- там мистицизм и католицизм и -- признаюсь -- могучая романтическая поэзия; где являются другие лица -- там скука, бледность И мелочность, вследствие бессилия Шиллера возвыситься до объективной обрисовки характеров и драматического действия) -- "Орлеанская дева" ринула меня в тот же абстрактный героизм, в то же пустое, безличное, субстанциальное, без всякого индивидуального определения -- Общее. Его Текла -- это десятое, улучшенное и исправленное издание шиллеровской женщины -- дало мне идеал женщины, вне которого для меня не было женщины (теперь для меня твоя Берта в 100 000 раз выше, потому что живое, действительное лицо, а не абстрактная идея). До чего довел меня Шиллер! Помнишь ли, Николай, как для всех нас было решено, что подло и бесчестно завести связь con amore {по любви (ит.). -- Ред.} с девушкою, ибо-де, если оная девица невинна, то лишить ее невинности -- злодейство, а если не невинна, то может родить (новое злодейство!), может надоесть, и надо будет ее бросить (еще злодейство!); а как человеку нельзя жить без жинки14 и все порядочные люди -- падки до скоромного,-- то мы логически дошли до примирения и выхода -- в<...> и со всеми их меркурияльными последствиями. Видишь, куда завел нас идеальный Шиллер! И куда сам он заходил, запутываясь своими противоречиями! Влюбившись в девушку и женившись на ней, он скоро охладел к ней, дурно с нею обращался и написал свои "Die Ideale" {"Идеалы" (нем.).-- Ред.}, где распрощался со всеми призраками жизни -- поэзиею, знанием, славою, любовию, и остался только с дружбою и трудом. В "Résignation" {"Покорность судьбе" (фр.). -- Ред.} он принес в жертву общему все частное -- и вышел в пустоту, потому что его общее было Молохом, пожирающим собственных чад своих, а не вечною любовию, которая открывает себя во всем, в чем только есть жизнь. В своем "Der Kampf" {"Сражение" (нем.).-- Ред.} он прощается с гнетущею его добродетелью, посылает ее к черту и в диком исступлении говорит -- "Хочу грешить! " Что это за жизнь, где рефлексия отравляет всякую блаженную минуту, вышедшую из полноты жизни, где общее велит смотреть, как на грех, на всякое человеческое наслаждение, где религия является католицизмом средних веков, стоицизм катоновский -- искуплением! Я теперь понимаю фразу Гейне, что христианская религия отдает все духу и что надо ее аболировать, чтобы, тело вступило в свои права;15 помню, эта фраза привела тебя в бешенство против Гейне, а чудак был прав с своей точки зрения, потому что христианская религия представлялась ему в абстрактной форме средних веков. Вот почему я возненавидел Шиллера: чаша переполнилась -- дух рвался на свободу из душной тесноты. Приезжаю в Москву с Кавказа, приезжает Бакунин -- мы живем вместе16. Летом просмотрел он философию религии и права Гегеля. Новый мир нам открылся. Сила есть право, и право есть сила,-- нет, не моту описать тебе, с каким чувством услышал эти слова -- это было освобождение. Я понял идею падения царств, законность завоевателей, я понял, что нет дикой материальной силы, кет владычества штыка и меча, нет произвола, нет случайности,-- и кончилась моя тяжкая опека над родом человеческим, и значение моего отечества предстало мне в новом виде. Я раскланялся с французами. Перед этим еще Катков передал мне, как умел, а я принял в себя, как мог, несколько результатов "Эстетики"17. -- Боже мой! Какой новый, светлый, бесконечный мир! Я вспомнил тогда твое недовольство собою, твои хлопоты о побиении фантазии, твою тоску о нормальности. Слово "действительность" сделалось для меня равнозначительно слову "бог". И ты напрасно советуешь мне чаще смотреть на синее небо -- образ бесконечного, чтобы не впасть в кухонную действительность: друг, блажен, кто может видеть в образе неба символ бесконечного, но ведь небо часто застилается серыми тучами, и потому тот блаженнее, кто и кухню умеет просветлить мыслию бесконечного. Бесконечное должно быть в душе, а когда оно в душе -- человеку и в кухне хорошо. Есть люди, которые говорят, что в Шеллинге больше генияльности и величия, чем в Гегеле18, в католицизме, чем в лютеранизме, в мистицизме, чем в рациональности (разумности), в битвах Гомера, с их колесницами19, щитами, копьями и стрелами, чем в Бородинской битве, с ее куцыми мундирами и прозаическими штыками и пулями -- отчего это? Оттого, что в простом труднее разгадать бесконечную действительность, чем в поражающей внешнею грандиозностию форме, оттого, что в небе легче увидеть образ бесконечного, чем в кухне... Но буду продолжать тебе мою внутреннюю историю. Бакунин первый (тогда же) провозгласил, что истина только в объективности и что в поэзии -- субъективность есть отрицание поэзии, что бесконечного должно искать в каждой точке, что в искусстве оно открывается через форму, а не чрез содержание, потому что само содержание высказывается через форму, а где наоборот -- там нет искусства. Я освирепел, опьянел от этих идей -- и неистовые проклятия посыпались на благородного адвоката человечества у людей -- Шиллера. Учитель мой возмутился духом, увидев слишком скорые и слишком обильные и сочные плоды своего учения, хотел меня остановить, но поздно, я уже сорвался с цепи и побежал благим матом. Известно, что Шиллер советовал Гете поставить в углу герцога Альбу, когда его сын говорил с Эгмонтом, дабы оный злодей или умилился и покаялся, или востерзался от своего неистовства -- верх прекраснодушия, образец драматического бессилия!20 Мишель хотел от меня скрыть этот факт и, по обыкновению, сам же проболтал мне его -- я взревел от радости. В это же время начались гонения на прекраснодушие во имя действительности. В это же время пошли толки о Гете -- и что со мною стало, когда я прочел "Утренние жалобы", а потом --
  
   Лежу я в потоке на камнях... как рад я!
   Идущей волне простираю объятья и пр.21.
  
   Новый мир! новая жизнь! Долой ярмо долга, к дьяволу гнилой морализм и идеальное резонерство! Человек может жить -- все его, всякий момент жизни велик, истинен и свят! Тут подоспели для меня переводы милого Гейне, и скоро мы прочли "Ромео и Юлию", чтобы узнать, что такое женщина... Бедный Шиллер!.. Тут началась моя война с Мишелем, война насмерть, продолжавшаяся с лишком год и кончившаяся совершенно месяца с три назад. Дело было вот в чем: мы очень плохо поняли "действительность", а думали, что очень хорошо ее поняли. В самом деле, мы рассуждали о ней для начала очень недурно, даже изрядненько, и пописывали, но ужасно недействительно осуществляли ее в действительности. Мишель -- это абстрактный герой. Он владеет могуществом мысли, сильною диалектикою, в душе его есть глубокость, созерцание его широко, у него есть жажда движения, он ищет бурь и борьбы -- это мое теперешнее, совершенно свободное и беспристрастное о нем мнение. Но я же думаю о нем, что, когда у него дело доходит до осуществления своих идей, он -- совершенный абстракт, потому что лишен всякого такта действительности -- и что ни шаг сделает, то споткнется. Желая эманципировать сестер своих от непосредственного повиновения родительской власти, простирающегося до пожертвования своим счастием, он довел их до крайности, потому что точкою отправления его трудов по сей части было больше жажда какой-нибудь деятельности, желание рисоваться героем, чем любовь к ним и их счастие. Поэтому он делал то же, да не так: где можно было тихо, там с треском, а где просто, там с блеском, и очень часто у него выходило много шуму из пустяков, а между тем результаты этого шума были, к несчастию, очень не пустяшны. Не говоря уже о поколебленном до основания семейственном счастии и гармонии, он привел своих прозелиток в какое-то напряженное и несвойственное их святым женственным непосредственностям состояние геройства и беттинства;22 он повлек их по всем моментам, или, лучше сказать, мытарствам развития своего духа, забыв, что они женщины и что им это совсем не нужно. На покойницу23 он всегда смотрел с некоторою ироническою улыбкою, потому что ее простота и действительность были слишком не под силу его разумению -- и разъединил ее с ними. Я все это сметил, сообразил прошедшее с настоящим, да и давай его тузить. Надобно тебе сказать, что весною 1838 года он опрокинулся на меня за то, что я издаю журнал, а не занимаюсь объективным наполнением; я его не послушался -- он стал меня ругать заочно, подкапываться под мою сущность, чтобы объявить ее конечною, наконец не стал скрывать от меня своего презрения. Сначала мне было досадно и больно, а потом я пришел в какое-то экстатическое состояние, в каком и написал к тебе письмо, где врал о каком-то своем небе, на что ты отвечал мне -- керата таурис24. Письмо это заставило его признать меня святым человеком -- на письме. В это время он жил у Боткина и своею непосредственностию и абстрактностию успел довести его до враждебности к себе. Тут он уехал в Прямухино, и между нами завязалась первая полемическая переписка -- мы с Боткиным сражались с ним остервененно, он защищался недобросовестно, Боткин стал утихать, а я все больше и больше ярился. Вдруг приезжает в Москву его мать с Татьяной и Александрой. Боже мои! тут целая прекраснодушная история с действительно тяжелыми страданиями и кровавыми слезами с моей стороны. Мы миримся с Мишелем. Он зовет нас в Прямухино. Вдруг весть, что Любовь -- опасна, что у него одна надежда на Петра Клюшникова, который в то время служил в Тульской губ., в г. Веневе -- я еду туда, Боткин, через несколько дней, в Прямухино, куда и я приехал. Что тут было -- это длинная история, от которой я пощажу тебя. Мишель смотрел торжественно. Мы окончательно экстатически примирились, и я уехал другом его, но вскоре затеял новую войну, которую, признаюсь, вел слишком бесчеловечно. Разумеется, верх был на моей стороне, потому что на моей стороне была правда, но также на моей стороне были и крайности, без которых я не умею обходиться. Мишель пришел в ужас от моих нападок и в первый раз испугался за себя. Снова мир, снова война -- опять мир, опять война; наконец решили, что наши натуры враждебны друг другу и что нам надо разойтись. Весною было опять примирение и опять война, но в которой я уже играл жалкую роль, в чем и сознался перед ним. Теперь мои отношения к нему ясны и определенны: я его уважаю, я к нему расположен, общие воспоминания делают необходимым приятельство между нами; что же до задушевности и дружбы -- неужели вне дружбы между людьми не может быть никаких отношений? Не обширные, но действительные отношения лучше самых нежных и горячих, но призрачных. Мы оттого так часто и ссорились с ним, что не понимали этой истины. Итак, когда моя с ним брань кончилась, я ощутил в себе бесконечную пустоту, тем более, что и вопрос о прекраснодушном чувстве, которое я питал к его сестре, был окончательно решен для меня с известной стороны. Предмета для призрачной деятельности не стало -- и внутренние силы пожирали сами себя. Представь себе только то, что я каждую неделю посылал к Мишелю по тетрадище -- и вдруг не с кем грызться до остерверения. Журнал шел плохо -- и это была не моя (редактора), а издателя (Степанова) вина -- я стал к нему охладевать. Устремить свою деятельность в мир знания,-- но я не был для этого способен по внешним обстоятельствам, которые с своей стороны гнели меня жестоко, и не был готов для этого, потому что нужно было сперва разыграть еще несколько драм, чтобы оправдались слова Вердера: "Когда человек делает себе вопрос, значит -- он не созрел для ответа"25. Я впал в какое-то состояние, больше похожее на отчаяние, чем на апатию. Меня преследовала мысль, что природа заклеймила лицо мое проклятием безобразия и что потому меня не может полюбить ни одна женщина, так для меня вне любви женщины нет жизни, нет счастия, нет смысла в жизни. Внутри меня был ад, потому что внутри меня было пусто -- ни одного объективного интереса -- одни субъективные фантазии. Мои отношения к Боткину стали портиться. Целый день, с 10 часов утра до 6 вечера, сидит он в своем амбаре и вращается с отвращением в совершенно чуждой ему сфере. Это одна из тех натур, которые созданы, чтобы жить внутри себя, а между тем судьба велит ему большую часть его времени жить вне себя. Поэтому, естественно, он дорожит своими вечерами, чтобы побыть наедине с своим горем, с своею радостию или поделать что-нибудь, ибо он человек образованный и любит почитать и пописать что-нибудь -- когда прозою, когда стишками, как выкинется26. И вдруг к нему, измученному днем и только что начинающему отдыхать в тиши вечера за тихою работою, входит человек и по какому-то абстрактному праву дружбы начинает в 1001-й раз говорить, что ему нет счастия в мире, что закон бытия несправедлив и жесток, или толковать о своем прекраснодушном чувстве и тому подобное. Естественно, это должно было становиться Боткину тяжело и несносно. К этому еще присоединилось то, что я жил почти на его счет: я привык брать, он привык давать, так что в наших отношениях осуществилось сен-симонистское общество. Конечно, он давал по доброй воле и охотно, но невозможно, чтобы беспрестанные лишения себя вследствие абстрактных понятий о дружбе временами не тяготили его сильно. Ко всему этому присоединилось и его собственное горе, его собственные страдания, которые -- так как они были действительны -- требовали его постоянного пребывания в самом себе. Сверх того, разумеется, он очень не чужд и своих темных сторон. И вот возникает у него против меня сильная враждебность -- он часто оскорбляет меня очень чувствительно и без видимых поводов с моей стороны; заметивши это, хочет поправиться и из одной крайности переходит в другую. Тут я сочинил себе новую гисторию. Ты сам поймешь, что такой любящей и идеальной (несмотря на свою quasi-действительность) душе, как моя, невозможно не иметь предмета обожания,-- о, Николай, понимаешь? (Эти слова надо прочесть несколько в нос.) Барышня нашлась27. Я стараюсь возбудить в себе чувство к ней, а между тем рефлектирую днем и ночью о разумном браке и семейственном счастии. A force de forger on devient forgeron {Игра слов: Привычка ковать делает кузнецом. Здесь в смысле: Привычка воображать делает фантазером (фр.). -- Ред.} -- во мне начало рождаться какое-то тяжелое чувство, пробудились ревность, тоска, пошли соображения, толкования слов, взглядов, жестов. Боткину пришлось пить горькую чашу во имя дружбы. Барышня любила другого28, а этот другой любил ее, но вел себя так действительно, что она думала, что он ее не любит, и, заключая по моим дикостям, что я ее обожаю, решилась полюбить меня, в той мысли, что если я женюсь на ней, то со мною, как с человеком благородным и любящим ее, она может быть счастлива, сколько можно быть счастливою в браке без любви. Драматическое положение! Все это еще куда бы ни шло, но вот горе -- барышня, из уважения ко мне, стала возбуждать в себе чувство ко мне и, по тон же мудрой французской пословице, успевала на несколько минут надувать и себя и меня, так что в ее взглядах на меня я видел нечто такое, от чего мне казалось, что внутри меня совершилось наконец свободно великое таинство. Но когда она почти ясно выговорила мне, что любит меня, завеса спала с глаз моих, и я узнал, что такое ад и что такое истинное страдание, страдание без грусти, без всякой влажности, но с одним сухим, жгучим отчаянием. Я был в хороших отношениях с ее братом29 -- человеком необыкновенно глубоким, энергическим и, несмотря на свою молодость, удивительно чуждым эксцентрического прекраснодушия -- я решился ему открыть дело; он принял это, как умный и благородный человек, выспросил сестру, и она сказала ему, что ей невыразимо приятно, когда она видит меня, но, как скоро я ухожу, она тщетно напрягается удерживать меня в своей мысли. Ну, слава богу -- спасен; однако я выслушал это с ужасною досадою. При свидании (которого невозможно было избежать) я заметил, что мною грустно оскорблены и что в отношении ко мне прибегают к искусственной гордости, худо выдерживаемой. Черт знает как, но опять вышла история, и дело дошло даже до переписки30. Тут снова повязка с глаз упала -- и я снова в аду, еще ужаснейшем, чем прежде. Вдруг получаю от Боткина записку, где он уведомляет меня, что мой неистовый соперник, понявши все, вчера валялся в судорогах по дивану и что была сцена ужасная, которая измучила его, что, глядя на него, он плакал. Это была любовь юношеская, романтическая и экстатическая, но, как момент, действительная. Боткин принял в юноше возможное участие, которое усиливала его враждебность ко мне и чрез которое она еще более усилилась. Еще и перед этим он в отношении ко мне доходил до крайности, то унижал и язвил меня желчно и ядовито, отнимал у меня всякую высшую действительность, то со слезами говорил о своей ко мне любви и моих высоких качествах. Развязка моей трогательной гистории с барышнею воспоследовала очень неприятно для меня. Конечно, я ничего не сделал подлого -- ты сам знаешь, что я человек необыкновенно благородный и до всего унижусь, только не до подлости, но я был изрядным пошлячком -- надо сказать правду. Барышня наша -- девушка страстная, и потому, что я не мог быть беспрестанно вместе с нею и приходить, когда она прикажет,-- я был свидетелем обмороков -- боже! спаси и помилуй от подобных зрелищ всякого православного христианина. Ты сам знаешь, что мы не греки и не римляне, но мы также и не италиянцы и не испанцы. Представь себе положение человека, который боится отойти на шаг от девушки, чтобы она не усумнилась в его пламенной любви и не сомлела (не упала в обморок), и который не догадывается о том, что у оной подобные выходки не более, как минутные напряженные порывы, и что, не отходя от нее, он тяготит и компрометирует ее, а сам или рефлектирует на свое чувство, или заботится скрыть свою зевоту и, почитая необходимым занимать любезным разговором милую воровку своего покоя31, врет пошлости, которых в то же <время> ему самому стыдно и гадко: адское положение! Таковая моя молодецкая поведенцня возбудила в сердив брата ее болезненную ко мне ненависть и презрение, а свирепому моему сопернику открыла глаза на ее ко мне отношения, вследствие чего оный злополучный любовник и начал свирепствовать. Тогда болезненная ненависть Боткина ко мне дошла до крайних своих пределов. Юношу (это Катков) он выпроводил в Прямухино, чтобы утишить его свирепство, а сам позвал брата барышни, чтобы узнать достовернее, точно ли она отдала мне навеки свое страстное сердце, ибо юноша, несмотря на очевидность, никак не умел поверить, чтобы она его не любила. Брат объяснился с сестрою и допытался истины; тогда Боткин, против своей воли увлекаемый своею враждебностию против меня, позволил себе в разговоре с братом так плюнуть во святая святых души моей и так отринуть во мне мое, неотъемлемое от меня, что брат из истца сделался моим адвокатом. Я ничего этого не знал, объяснился с барышнею и после, приехавши к Боткину, горько плакал о заблуждениях своего праздного сердца и весьма если не пустой, то опустелой головы, на лбу которой было крупно и четко написано: "Свободен от постоя". Нет, никогда не забыть мне этого ужасного времени в моей жизни: лишенный всякого истинного содержания, я был полон хотя призраками -- и вдруг -- совершенная пустота! Осталось бы, воспользовавшись уроком, засесть за дело, но я еще не был к этому готов: гистория еще далеко не кончилась. Притом же, разве я семинарист какой-нибудь, чтобы учиться; я даже не швабский немец -- я русский дворянин (неслужащий, следовательно, недоросль -- в 30 лет). Катков возвратился, я запискою ему в ноги, он этого не понял и покаяние перед истиною принял за унижение перед ним (я и в отношении к себе так же увлекаюсь крайностями, как и в отношении к другим, и быо себя так же беспощадно, как и других) -- и не отвечал; я другую, в которой гордо намекнул, что не перед ним, а перед истиною смиряюсь, тогда он ответил патетической запиской, которой, разумеется, не осуществил, потому что не мог победить своей ко мне враждебности, хотя его отношения с барышнею и установились, как должно. Понимаю теперь, как все это детски, но тогда -- нет, во мне слишком много силы, если эти духовные истязания не раздавили меня. С Боткиным у меня, по-видимому, установились прежние отношения, но что-то все было не так, не ловко. Дело было в великом посту, в это всегда грустно-поэтическое для меня время; нестерпимые муки оскорбленного самолюбия и сознания прошлой пошлости своей поведенции стали превращаться в какую-то глубокую, болезненную, но и сладостную грусть -- я походил на медленно выздоравливающего от тяжкой болезни. Тут приехал Мишель с Татьяной; с ним мы вели себя холодно, но прилично, с Татьяной Александровной тотчас как-то установился у меня дружественный тон (не забудь, что они читали мои письма к Мишелю, где я неистово и с свойственною только одному мне откровенностию и умеренностию нападал на них). Это было мне истинною отрадою. С братом барышни мои отношения пришли в прежний вид, как будто между нами ничего не было. Я говорю ему раз о Боткине с любовию и экстазом; он пересказывает мне бывший у него с Боткиным обо мне разговор -- я обомлел. Конечно, самая дурная сторона поступка Боткина была та, что он чужого человека хотел поставить судьею семейной ссоры, и тот юноша имел полное право взглянуть на его поступок, как чужой человек, то есть признать его бесчестным, тем более, что он, по своим летам, находится еще в рыцарском периоде понятий о чести. Я был раздавлен и чувствовал в груди физическую боль; повел себя с Боткиным холодно и грустно-прилично. До сих пор он был передо мною виноват, я вел себя в отношении к нему благородно, потому что тяжело страдал, но не позволял себе ни малейшей выходки против него. Так я долго еще крепился; но накануне отъезда Мишеля, благодаря святому влиянию на меня сестры его, я пришел в умиление, у нас произошло объяснение, объятия, поцелуи,-- и я не мог удержаться, чтобы мимоходом не бросить несколько язвительных выражений о характере Боткина. Теперь я должен воротиться несколько назад и вывести на сцену новые действующие лица (по-французски персонажи) этой трагикомедии с водевильными куплетами. Первый из них -- Аксаков. Ты его знаешь; он, коли хочешь, много переменился, но, впрочем, все тот же. В нем есть и сила, и глубокость, и энергия, он человек даровитый, теплый, в высшей степени благородный, но, благодаря своему китайскому элементу, лишающему его движения вперед путем отрицаний, он все еще обретается в мире призраков и фантазий и даже и не понюхал до сих пор действительности32. Давно уже решился он расстаться с своею невинностию, но сколько ни представлялось случаев и в Германии и в России, его идеальное прекраснодушие, на зло его воле, решимости и страшной охоте, не дает ему столкнуться с действнтельностию хотя в ..... (из уважения к приличию заменяю слово точками). В Германии он отыскивал следов Шиллера, и в восторге, что пил кофе из той самой чашки, из которой пил творец Теплы. Боткин был с ним очень хорош, но внутренних отношений у него с ним не было, а Аксаков приязнь принял за дружбу, то есть за право отнимать у Боткина вечера, толкуя о том, что Пушкин и Гоголь -- великие поэты, а Каролина Карловна Павлова (жена Николая Филипповича, урожденная Яниш) превосходно переводит Пушкина на немецкий язык. Это восстановило Боткина на Аксакова, и Боткин в спорах с ним часто выказывал досаду, похожую на злость, и имел неосторожность
   выказывать при нем свою враждебность ко мне. Аксаков был поверенным моего обожания барышни, принимал в нем живейшее участие и целые вечера проводил со мною в болтовне об этих пошлостях, так что мне самому от этого становилось гадко самого себя. После объяснения с братом Аксаков начал говорить со мной о Боткине и новыми фактами о его предубеждениях против меня и выходках еще более раздул огонь моего остервенения против него. Надо тебе сказать, что, разошедшись с Бакуниным, он ужасно возгордился тем, что освободился от всех авторитетов и сознал свою самостоятельность, и его радость очень похожа на радость школьника, который, освободившись от ферулы, может безнаказанно высовывать язык своему бывшему наставнику. Он начал доказывать, что Боткин человек без характера, без способности самостоятельного и самодеятельного убеждения, что в нем все чужое. Мне того и нужно было, и скоро в наших глазах на Боткине не осталось ни одной нитки своей и ничего, кроме срамной наготы. Сделавши определение, Аксаков умрет и не расстанется с ним, боясь упасть в собственных глазах: он и теперь того же мнения о Боткине; оставляю его сидеть там, заметив, что во все продолжение ссоры он играл одну и ту же роль. Теперь о другом персонаже -- это И. П. Клюшников, so genannte {так называемый (нем.). -- Ред.} феос33. Этот человек -- олицетворенная двойственность глубокой и богатой натуры и самой пошлой рефлексии. Сверх того, он всегда был чужд объективного мира и человеческих субъективных интересов, поэтому ни один из нас не поверял ему своих тайн. И как открыть ему свои задушевные обстоятельства, когда он, бывало, или опрофанирует их ледяно-ядовитою насмешкою, или создаст из них свою фантазию, которая на то, что ты открыл ему, столько же похожа, как хлопчатая бумага на вареную репу? Летом 1837 года, когда я был на Кавказе, он впал в ужасную психическую болезнь, так что был близок к сумасшествию; осень всю рефлектировал и путался в противоречиях своих, даже не рассудочных, но каких-то произвольных и случайных до бессмыслия положений, между которыми проискривали и, светлые идеи, странно перемешанные со вздорами. Весною прошлого года он пришел в религиозный экстаз -- стал здоров, светел, остер до невозможности, начал писать прекрасные стихи. Летом остроты кончились, экстаз возрос до чудовищности: он не мог ни о чем говорить, как о высоком и прекрасном, и все с религиозно-мистической точки зрения, и не мог говорить без трепета и слез исступления на глазах. Беттина и Марья Афанасьевна не годились даже в тени ему. Написавши стихотворение, он разъезжал с ним и читал его всем своим знакомым, и если они слушали его без восторга, то сердился. Я сказал ему, что его стихотворение к Петру не то, что пакость, а только не художественное произведение -- вышла история, с объяснениями, экстазами; результат ее был тот, что он почел себя глубоко оскорбленным мною, и с тех пор начал питать ко мне враждебность. Он написал еще "Поэта" и думал определить его вполне -- я и этого стихотворения не признал художественным по отсутствию тоталитета, хотя и признал превосходными частности: Иван Петрович готов был воскресить мертвых, чтобы судить на меня. Наконец он стал очень откровенно поговаривать, что он выше Пушкина (sic!..), ибо-де Пушкин поэт распадения, а он (Клюшников!..) поэт примирения. Я молчал, но делал страшные гримасы, которых он не мог не заметить. Не скрою и того, что я иногда не брал в соображение его экстаза и оскорблял его грубою моею непосредственностию. Напечатав несколько его стихотворений, я недосмотрел небольших типографских опечаток и даже наделал небольшие ошибки; боже великий! крик, вопль -- можно было подумать, что я сожег Москву, наругался над святынею. Кончилось тем, что отказался давать в "Наблюдатель" стихотворения. Катков был лично мною оскорблен с известной стороны, и вообще он имел право негодовать на меня со многих сторон, потому что он держал себя в отношении ко мне благороднейшим образом, а я в отношении к нему дичил. Итак, все на меня восстало. В то время, как у меня была первая гистория с барышнею, Иван Петрович вдруг начал ко мне часто ходить и стараться обратить меня на путь истинный. "Смотри,-- говорил он,-- все оскорблены тобою, все в негодовании на тебя -- первый Боткин; согласись, что он выше, глубже тебя -- ведь ты человек конечный, чувственный, с грубо-животною непосредственностию, ты не понимаешь ни религии, ни любви" и пр. и пр. Хоть я был и убит моими обстоятельствами, но эта милая наивность не оскорбила меня: я смеялся над нею от души, как над достолюбезностию. Вдруг Иван Петрович, со слезами исступления на глазах, отдает мне огромное письмо34, прося, чтобы я, прочтя его, вникнул в себя беспристрастно. Сцена была патетическая -- я сам был тронут до слез -- сумасшествие заразительно. Читаю письмо -- и что же? Это была длинная обвинительная проповедь против меня, написанная в религиозно-сатирическом духе, в ней объяснялись причины общего против меня негодования, исчислены были мои вины и преступления, из которых ни одного истинного -- ты знаешь сам, как умеет Иван Петрович попадать в цель. Мало этого, он взвел на меня такие вины, гнусные по своей сущности и никогда не бывалые. Вот образчик одной: еще в 1837 году я взялся править корректуру "Деяний Петра Великого" Голикова, издаваемых Кс. Полевым, по 50 р. за том, и он дал мне 500 р. вперед; корректура мне смертельно надоела -- я же стал к тому издавать "Наблюдатель",-- я предложил моему родственнику Иванову взять на себя эту корректуру с тем, чтобы он даром выправил три или четыре тома, а за последующие томов восемь брал деньги; любя меня, будучи одолжен мною и видя в будущем от этой работы выгоду себе, он охотно взялся, но однажды, в минуту досады, сказал при Клюшннкове, что эта работа иногда бывает ему тяжка. И вот Иван Петрович пишет в своем послании, что я надул бедного человека и родственника своего, навязав ему работу, за которую деньги, взятые мною вперед, давно все снесены в <...> к Марье Ивановне. Из этого ты можешь заключить, каким слогом было написано все послание. В самом деле, оно состояло из язвительнейших сарказмов, самоосклабления, мистицизма, текстов из евангелия и стихов Клюшникова; в числе преступлений было поставлено и то, что я не понял конкретной идеи ни одного стихотворения Клюшникова, а что он разумел под конкретною идеею -- этого никто тогда же не разумел. Я тогда ратовал против нравственной точки зрения в искусстве и истории в пользу объективного понимания -- Иван Петрович сказал, что я проповедую безнравственность и азиятский материализм; я говорил, что в поэзии составляет все художественный образ -- он сказал, что это азиятский взгляд на искусство, потому что на Востоке одни символы. Наконец он ясно выговорил, что только один он понимал тебя так же, как и ты только его ценил, а <на> нас всех смотрел с некоторою ироническою улыбкою, как на добрых пошляков, особенно на меня, что ты ему все открывал, от нас таился и пр. В заключение повторил, что он совершенно примирился с богом, живет духом в духе, что для него нет ничего тайного ни на земле, ни на небе, в подтверждение чего приводил свои стишки; наконец просил, чтобы я понял его поступок и не оскорбился резкостию тона. Я отвечал ему, что люблю резкий тон, что, говоря с другими энергически, должен любить, когда и со мною так же говорят; что не признаю ни одного из его обвинений, кроме мелочей о грубости моей дикой непосредственности, но что сознаюсь в справедливости общего на меня восстания. Тогда Иван Петрович принял со мною тон спасителя, и -- признаюсь --- я немножко поддался ему, потому что это было в эпоху ужаснейшего испытания, когда я очевидно увидел свою пустоту, призрачность и пошлость. Боткин в это время был в Харькове, откуда прислал ко мне письмо, полное дружбы и доверенности35. И что же? недели через две после религиозно-сатирического послания ко мне Иван Петрович однажды лег спать в экстазе, а проснулся трезвым и с страшною головною болью от хмеля. Страдания его были ужасны; вместе с экстазом, продолжавшимся с лишком полгода, от него отлетела и поэзия, а он начал проклинать то и другое. Прежде всего его поразило письмо ко мне -- и он ужаснулся его. Экстаз свой стал он называть помешательством, чисто нервною болезнию; стихотворения свои -- уж черт знает <чем>, не упуская, впрочем, случая прочитывать их тем, кому бранил их. Приходит к Боткину и просит его, ради дружбы и всего святого, чтобы тот позволил ему ходить к себе и на время перелома отяготился им. Суди сам, каково было нянчиться с человеком, уже не распавшимся, а расклеившимся, и который искал выхода вне себя. Он резонерствует -- надо с ним спорить; ты разгорячаешься, доказывая ему истину, а он перебивает тебя вопросом, сколько раз ты ходишь на двор или почем ты брал сукно на штаны; ты начинаешь говорить в этом тоне, а он снова делает вопрос, над решением которого ты уже десять раз надрывал грудь. Так прошел весь великий пост -- тяжкое для меня время. Надобно тебе сказать, что в это время у меня был еще источник страдания. Я питал к барышне чувство глубокого религиозного уважения, которое уже по одному тому было ложно, что носило характер экстаза. Я мучился прекраснодушным желанием что-нибудь да значить для нее и установить с нею дружественные отношения. Страстная, она была беспокойно ревнива, и когда юноша долго не являлся, то мучилась мыслию, что он любит другую (именно Татьяну Бакунину, которая в то время была в Москве с Мишелем). Она высказала мне свои опасения -- я старался силою мысли дать лучшее направление ее дико-страстному чувству, нападал на его характер, как недостойный ее высокой души и пр. -- и рад до смерти был, что наконец с нею в дружбе и могу быть полезен для ее внутреннего развития. Брат узнал о новом подвиге моей прекрасной души, понял его неуместность, дал сестрице нагоняя; барышня подумала, что я рассказал ее брату мой разговор с нею, надула губки и стала держать себя в отношении ко мне гордо и холодно, а я взбесился и сам не говорил с нею ни слова. Новое детское несчастие, но сила, с какою я его чувствовал, была, к несчастию, слишком мужеская! Я не мог видеть беспокойства и тревоги, с какими она поджидала своего юношу, как, почувствовав его приход, она выбегала из комнаты, чтобы скрыть свое волнение, как потом они говорили друг с другом с лицами, сияющими блаженством. Мне казалось, что моя истерзанная грудь не выдержит этой пытки; но то была не ревность и не зависть -- я очень хорошо сознавал, что если бы она и любила меня, мне от этого не легче бы было, я обоим желал им счастия, обоих любил их -- и все-таки тяжко страдал и между тем упивался моим страданием, как пьяница в запое, потому что в нем много было человеческого. И потому какая-то сила непреодолимая влекла меня в этот дом, чтобы насладиться страданием. Так шло время. Душа моя была в раздраженном состоянии -- восприемлемость впечатлений доходила до высочайшей степени,-- и я знал минуты безграничного блаженства, читая с Кудрявцевым "Илиаду" и Пушкина. Прошел праздник; барышня уехала на время из Москвы с своим семейством, Катков уехал на время в Петербург. Еще в посту я вздумал бросить "Наблюдатель", который давал мне слишком мало выгод, брал все мое время и был причиною ужаснейших огорчений. Во-первых, владелец его, Степанов, хотел угодить и нашим и вашим, то есть получать прибыль от журнала и не лишить свою типографию других работ, дававших ему верную выгоду,-- и погубил то и другое. Поэтому журнал тянулся медленно, отставал книжками, и я был редактором двух журналов (за 1838 год я выдал только 10 NoNo). Участие приятелей моих прекратилось -- я остался один; цензура теснила. Во 2 No запретили статью Варнгагена о Пушкине и еще одну оригинальную статью; 2-м No кончилось участие Каткова, перешедшего в "Отечественные записки". Я совершенно оправдывал поступок Каткова, потому что бедному человеку не для чего тратить труды и время без всякого вознаграждения для себя и, сверх того, видеть свои труды искаженными не цензурою, а пристрастием и невежеством цензора, и, написавши статью в генваре, увидеть ее в печати в мае; но Каткову следовало бы сделать это по-человечески, объяснившись со мною и изъявивши свое сожаление, что необходимость заставляет его оставить меня, но он сделал это как будто предательски, что было новою рапою на мое и без того страшно пстерзанное сердце. Это решительно ожесточило меня против Каткова. Но когда я сказал Степанову, что отказываюсь от журнала -- он пришел просто в отчаяние, говоря, что он остается подлецом перед публикою и что он для журнала заложил дом и вошел в долги. Короче, они с Андросовым дали мне тысячу рублей, чтобы я остался -- я имел глупость согласиться, тогда как Панаев приготовил мне в Петербурге 2000, чтобы я мог расплатиться в Москве с долгами36. С Боткиным хотя и холодно, но все еще поддерживались мои отношения, и он искренно обрадовался, что я развязался с бесплодным предприятием и с Москвою, в которой мне решительно нечего было делать, и очень огорчился, узнавши, что я порыцарствовал и из великодушия снова закабалил себя на иксионовскую работу37. Вообще, я вел себя с Боткиным холодно, но благородно. Тут приехал Панаев, которого не буду тебе ни описывать, ни хвалить, как абстрактное для тебя лицо, а скажу только, что это один из тех людей, которых, узнавши раз, не захочешь никогда расстаться и которые глубокость души умеют соединить с нормальностию и тактом действительности. Мы сошлись с ним, и это было немалым утешением в моем болезненном состоянии. Но между тем я бессознательно глубоко чувствовал мою связь с Боткиным; его хулы на меня брату барышни казались мне предательством, и мысль, что он забыл об этом предательстве или считает его слишком неважным, чтобы сохранить со мною дружественные отношения, не признавшись и не покаявшись в нем,-- терзала меня до того, что я стонал, думая об этом наедине с собою. Наконец я решился объясниться, и почел для этого нужною пошлую форму обвинительного письма в религиозно-сатирическом роде à la Иван Петрович. В нем я излил всю свою желчь, и как у меня против Боткина было столько же фактов (и истинных и мнимых), сколько и у него против меня, то письмо вышло оскорбительно в высшей степени33. О его разговоре с братом барышни я только намекал, как о предательстве. Он мне скоро отвечал, и его письмо было исполнено противоречии: то он говорил, что ни в чем не виноват передо мною, то говорил, что жестоко оскорбил меня, и я вправе клевать на него и топтать его в грязь. Этому противоречию была глубокая причина: чувствуя свою враждебность ко мне, он спрашивал себя о ее причине -- и не находил никакой причины. Но я принял это, как доказательство слабости и ничтояшости его характера, и еще больше возъярился. Тут Иван Петрович начал новую роль. Он ходил к Боткину, чтобы наблюдать за ним, и мне известно было каждое слово Боткина, каждый его жест, которые мы с Иваном Петровичем подводили под одну точку зрения. Однажды мне Боткин сказал, что у него с Иваном Петровичем нет никаких внутренних отношений и что, вероятно, Иван Петрович полюбил его за то, что он хвалил его стихи. Так как Иван Петрович в продолжение целых месяцев снабжал меня фактами прошедшей враждебности ко мне Боткина, то и я его одолжил этим фактом. Сверх того, Иван Петрович вину своего экстаза свалил на Боткина, говоря, что он своими похвалами его стихов питал в нем самообольщение. Короче: Иван Петрович бессознательно сплетничал и служил мне, как личный враг Боткина. Он пошел еще дальше меня: я лишил Боткина силы характера и самодеятельности духовного движения; он открыл в нем еще низкую зависть ко всякому достоинству, ко всякому превосходству, забывши, что Боткин носился с его стихами, как он сам, и не знал пределов их достоинства. Впрочем, мы оба путались в противоречиях, потому что, как ни натягивались, но факты в пользу Боткина были не менее действительны, как и против него. Ответ Боткина на письмо мое взбесил меня -- и я дошел до того, что начал намеками, впрочем, очень ясными, ругать Боткина Бееровым. Наталья пересказала Ефремову, сей -- Боткину. Встретясь с Ефремовым на бульваре, я открыто начал ему изливать мою желчь против Боткина и рассказал ему о разговоре его с братом барышни. На другой день получаю от Ефремова записку39, в которой он просит у меня позволения объясниться с Боткиным, говоря, что ему тяжело думать, как о подлеце, о человеке, которого он любит. Хотя я и взял с Ефремова честное слово в молчании, но это была бессознательная штука с моей стороны: хоть я и уверял себя, что от всей души презираю Боткина, но внутри меня жила страстно-мучительная жажда сближения с ним, что могло, по моему мнению, произойти только чрез полное объяснение. Итак, я позволил Ефремову. В это время опять приехал Мишель, которого я ругал Бееровым еще с большим ожесточением, как человека, который всех нас испортил своею абстрактной философией (что было не совсем неправда) и в особенности развратил Боткина. Вдруг я получаю записку от Мишеля, в которой он говорит мне Вы и просит, чтобы возвратил ему все его письма, так как он не знает, какое я сделаю из них употребление40. Эта записка поразила меня хуже грому: я расстался с Мишелем примиренный, он ничего не сделал мне худого, а я ругал его, как школьник. Я, вместо ответа, искренно извинился перед ним, просил у него прощения и примирения. Надобно тебе сказать еще, что я показал Ивану Петровичу письмо, полученное мною от Боткина из Харькова и содержавшее в себе святые тайны, которым я ни в каком случае не имел права изменять41. Иван Петрович, и без того знавший кое-что об этом, сделал из этого свойственное его характеру употребление. Его нравственная болезнь в это время дошла до своего крайнего предела. Ему казалось, что все мы призраки, что в нас от природы нет ничего действительного, что мы безвозвратно погубили себя стремлением к небывалому миру идеалов вместо того, чтобы жить, как все, и пр. и пр. Едва познакомившись с Панаевым, он уже стал его выспрашивать -- не было <ли> с ним такого-то и этакого-то состояния, чтобы чрез это объяснить себе свое и выйти из него. "Зачем,-- говорил он ему,-- мы отрешились от простой веры отцов наших -- не держим постов по середам и пятницам" и пр. Впоследствии он пошел дальше: стал ездить по монастырям, советоваться с попами, монахами о том, что такое хула на духа, в которой он обвинял себя, думая, что ему нет прощения ни здесь, ни там. К одному только Каткову он питал еще некоторое уважение и со слезами умолял его не сбиться с пути, как все мы; узнавши, еще во время экстаза своего, о его истории, доказывал ему, что его чувство -- ложь, потому что он питал ко мне ненависть, не совместную с ним. Я забыл сказать тебе, что в письме к Боткину я облевал моею желчью и Каткова, и, желая набросить на их очень простые и нисколько не натянутые отношения черную тень, я сказал, что прежде на Боткине ездил Бакунин, а теперь ездит Катков. Естественно, что Катков еще более остервенился против меня и отплатил мне тою же монетою, то есть стал высказывать обо мне такое мнение, которому сам не верил и которое было так явно вздорно, что я, хотя и сказал: "Признаюсь, после таких с Вашей стороны поступков, я ничего не нахожу" 42, но уже не рассердился. По приезде его из Питера мы встретились в том доме, где каждый по-своему отличились43,-- дико взглянули друг на друга, и с тех пор стали оборачиваться друг к другу ж... Впрочем, у меня к нему уже не было не только враждебности, но и неудовольствия -- я любил его, готов был сделать умилительную сцену; после оказалось, что и он тоже. А между тем мы встречались у Панаева, не говоря друг с другом ни слова и не узнавая в лицо, что мне было крайне огорчительно, потому что я уже был все-таки выше этих смешных и детских комедий и чрез Ивана Петровича не раз намекал, что не худо б было из уважения к приличию оставаться хоть в формах прежних отношений. Обращаюсь к нашей слезной комедии. В таком-то состоянии Иван Петрович приходит к Мишелю, который жил у Боткина, и начинает ему объяснять свой взгляд и на Боткина и на него (Мишеля), вследствие которого оба они -- были пошляки и скоты, и -- что всего достолюбезнее -- Иван Петрович был убежден, что они должны были согласиться с ним и не имели права оскорбиться его откровенностию. Мало этого: он сказал Мишелю о письме Боткина ко мне из Харькова, о котором Мишелю больше нежели кому-нибудь не следовало говорить. Боткин узнал и, разумеется, взбесился. Иван Петрович приезжает ко мне ночью, рассказывает и спрашивает -- что он сделал худого. Я ему ответил, что он совершенно прав, высказавши о Боткине свой образ мнения, если он почитал нужным его высказать, но что он не имел никакого права касаться до его личных тайн. На другой день он отправился обедать к Боткину и очень удивился, когда тот сказал ему: "Не могу понять, Иван Петрович, как ты после вчерашнего мог приехать ко мне". Да,-- что Иван Петрович человек глубокий, что в нем много святого -- нет спору; но другом он никому не может <быть>: своею бабьею болтовнёю или своею оскорбляющею человеческое чувство объективностию он легко может разрушить даже семейное счастие, и не будет никакой возможности убедить его, что он сделал гнусное дело. Мой поступок против Боткина был гнусен, но он выходил из личного оскорбления, из жажды мщения и желания оправдать себя; его же -- из неспособности понять никаких субъективных таинств души человеческой. Во время этой-то каши я получаю от Боткина записку, где оп вежливо, через Вы, просит меня возвратить его письма44. Я оцепенел: мысль, что мы навсегда разошлись, в первый раз поразила меня -- сперва я вспыхнул, а потом почувствовал на лице холодный пот. Все прошлое воскресло -- и Боткин во всей целости своей предстал передо мною. Не теряя минуты, я пишу к нему письмо, где, высчитывая его против меня несправедливости, приписываю их тому, что мы вошли в ложные отношения, что наша дружба была -- невытанцовавшаяся попытка; но что нам можно и должно остаться в отношениях хороших знакомых, добрых приятелей45. Он отвечал мне, что это письмо раскрыло ему глаза и что он со мною согласен. Приезжает Мишель -- объяснения с ним кончились как нельзя лучше -- я даже впал в крайность, из которой -- слава богу! -- после вышел без объяснений, ссор и прекраснодушных примирений. Но вражда моя против Боткина не кончилась -- приятелем или хорошим знакомым ему быть я не мог -- против этого мучительно восставала вся полнота моей натуры. Мне казалось, что письмо мое к нему было искренно, но я оскорбился, против своей воли и сознания, его согласием с ним. Я позволил себе несколько выходок против него Мишелю, который, однако, остановил меня, сказавши притом, что Боткин просит меня до времени не ходить к нему, потому что ему нужно отдохнуть от этих потрясений, войти в себя. Это снова взбесило меня, но я уже решился вести себя умненько и не говорил о нем ничего худого. Более всего меня мучили отношения к Боткину и Каткову: все знали, что мы друзья неразрывные, а между тем с первым я виделся только раз у Панаева, и от других узнал потом, что он уехал в Прямухино, со вторым встречался, как со врагом, что было тем несноснее, что я к этому второму не питал никакой неприязни и хорошо понимал все мальчишество подобных комедий. Однажды я ходил с Панаевым смотреть Москву, и он вдруг предложил мне зайти к Боткину -- что мне было сказать -- я сказал правду. Когда Боткин возвратился из Прямухина, я послал к нему за книгою, и вместе с книгою получил от него записку, в которой он уверял меня, что он уверен, что мы не разошлись, и уверен в этом по себе, что он очень любит меня, а как я тогда снова отказался от "Наблюдателя" и сбирался в Питер, то просил уведомить, чтобы проститься со мною или зайти к нему46. Эта записка снова возбудила во мне ярость, причина которой заключалась в том, что я хотел от Боткина всего или ничего. Он приглашал меня проститься, но не изъявлял желания видеть меня у себя или быть у меня. Иван Петрович снова явился толкователем, и бедному Боткину снова порядочно досталось в сем двухголосном мудром синедрионе. Конечно, оно немного прекраснодушно было поступлено со стороны Боткина, но основа его поступка была искренна и свята. Но вот мы уже приближаемся к концу длинной истории. Панаев уехал в Казань, откуда, воротившись в Москву и поживши в ней несколько времени, должен был возвратиться в Питер и взять меня с собою. Я остался один; мне было тяжело, потому что с Аксаковым я уже все переговорил и больше не о чем было говорить. Помню, как однажды он сказал мне с грустию: ты сошелся с Бакуниным -- сойдешься и с Боткиным. Я отвечал ему, что скорее реки двинутся вспять и был от всей души убежден в искренности моего ответа. Между тем, выходя из ворот и видя закрытые окна квартиры Панаева, я инстинктивно направлял шаги к Маросейке, думая, что надо увидеться с Боткиным, и потом вдруг останавливался, изрыгая хулы и против него и против себя. В это время приехало в Москву все семейство Бакуниных, кроме Мишеля, который уехал в Питер, чтобы хлопотать о разводе Дьяковых. (Едва ли он успеет в этом: все его надежды основаны на фантазиях, а отец как бы против воли дал свое согласие.) Бакунины приехали для определения трех юношей в университет, куда они уже и поступили, а семейство пробыло в Москве едва ли не около двух месяцев. Я начал отдыхать душою, потому что увидел с их стороны самую родственную, самую дружественную ласку, и увидел себя наконец в истинных отношениях к ним. Раз сижу у Ржевского в кабинете -- входит Боткин и без всяких вычур начинает со мною дружески разговаривать о прочитанной им недавно драме Шекспира "Ричард II". Несмотря на все мое желание держать камень за пазухой и быть как можно холоднее, я с досадою замечал, что увлекся разговором до одушевления и никак не мог удержаться от спокойно-дружественного тона. Мы пошли ходить, Боткин заговорил о ссоре с таким спокойствием, как будто бы дело шло о чьей-то чужой ссоре -- я невольно впал в тот же тон, и Боткин заключил, что мы, наконец, так поносили друг друга, что сквернее друг о друге говорить уже не можем, следовательно, новой ссоры опасаться нечего,-- и оба начали смеяться. Вражда пожрала самое себя -- и кончилась; все гадкое и детское в прежних отношениях всплыло наверх. Оно-то и было причиною вражды, а то, что казалось причиною, было только придиркою, потому что надо же было объяснять ее чем-нибудь, когда истинной причины понять не могли. Мы помирились с прошедшим и благословили его, потому что и теперь каждый день видим новые доказательства его разумной необходимости. Форма была гадка, но идея делает нам честь, как доказательство, что наши отношения основаны на одной истине и что только в истине мы можем любить друг друга, а как скоро вмешается ложь-- следует взрыв, как отрицание ее. Идея драмы видна только по окончании пятого акта, и объективный взгляд есть ступень для ее уразумения. Мы сошлись с Боткиным без сурьезных объяснений, которые могли бы повести к новым неудовольствиям или охлаждению, простили друг друга без всяких патетических и прекраснодушных объяснений, без всякого экстаза, в основании которого всегда лежит зерно будущего разрыва. Мало того: все сделалось как бы само собою, без нашей воли, без нашего сознания: процесс совершился динамически. Боткин уехал в Нижний -- через месяц приехал назад. Я был в дурных внешних обстоятельствах -- племянника я давно уже сбыл с рук его брату, который, наконец, взял и моего брата, а я занимал большую квартиру, держал кухарку и мальчика, попусту тратился, входил все глубже и глубже в тину долгов; мне надо было нанять какую-нибудь комнатку и жить скромно до отъезда в Питер, но для этого надо было расплатиться с долгами, а у меня не было ни копейки. Боткин помог, предложил у себя компату, где я и пишу это длинное послание. Живем мы тихо, и хотя в лавочку не должны ни копейки и, по причине осени, носим суконные штаны, но к нам идет, по мелодии стихов своих, вот эта песенка:
  
   Тихо жили они,
   В лавочку были должны,
   И ходили в штанах
   Трикотонных и тонких47.
  
   Теперь о прочих персонажах драмы. Долго с Катковым вели мы себя прилично, хотя и были расположены друг к другу как нельзя лучше; наконец и с ним переговорили о старине. Любовь его была -- религиозный экстаз; барышня наша оказалась существом, в объективном смысле прекрасным, страстное и, под характером страсти, глубокое, но совсем не нашего мира, к мы оба увидели, что были дураки, грязоеды. Он это узнал первый -- сперва осердился на себя, ругал свое чувство на чем свет стоит, теперь смеется. Ах, брат, что это за человек! Ты знал его каким-то эмбрионом. Он сердится на свое чувство и всю сию гисторию, но это перевернуло его, пробило его грубую массу лучами света, и теперь это прекрасный юноша (хотел сострить, да не вытанцовалось). Он еще дитя, но его детство обещает скорое и могучее мужество. Какая даровитость, какая глубокость, сколько огня душевного, какая неистощимая, плодотворная и мужественная деятельность! Во всем, что ни пишет он, видно такое присутствие мысли, его первые опыты гораздо мужественнее моих теперешних. Насчет силы и энергии мы не уступим (особенно по части красноречия), но мысль, но глубокость -- подлец, сукин сын -- обиждательство терпим совсем понапрасну48. В этом отношении его статьи для русского журнала потому именно даже не хороши, что уж слишком хорошо -- им место в "Jahrbücher" {"Ежегодник" (нем.).-- Ред.}. И вместе с тем, сколько задушевности в этом юноше, какая прекрасная непосредственность! Когда ему говорят, что он еще дитя, он не сердится на это, как Аксаков, но улыбается и отшучивается, как человек, который понимает сущность и поступки49.
   С Аксаковым мои отношения хороши. Я вижусь с ним с удовольствием и, когда увижу его, то люблю, а когда не вижу, то чувствую к нему род какой-то враждебности. Чудный, прекрасный человек, богатая и сильная натура, но я не знаю, когда он выйдет из китайской стены своих ощущеньиц и чувств, своей детскости, в которых с таким упорством и с такою неподвижностию так мандарински пребывает. Чудак! он мечтает о себе, как о человеке возмужалом!
   Иван Петрович вышел, назад тому с месяц, из своей нравственной болезни, которую он называет хандрою и которая продолжалась едва ли не с лишком семь месяцев; теперь он страждет физически, и Дядьковский посылает его на Кавказ. Мы все этому очень рады, желаем ему всего хорошего; живо чувствуем его глубокость, его прекрасные человеческие стороны, с удовольствием с ним видимся, но видимся редко, потому что не чувствуем внутреннего стремления видеться даже и редко, словом, чужой вмешался он в семейную ссору и чужим остался, когда она кончилась. Он в этом не виноват, но и мы правы: чувство не в воле человека, и я не могу сказать -- он стоит всей моей любви, следовательно, я должен его любить; но я могу сказать -- он стоит всей моей любви, а я ему чужд, следовательно, так должно быть. Простая философия! Многих глупостей избежал бы каждый из нас, если бы раньше узнал ее, но видно, что одному (как, например, тебе) дается, как непосредственность, как природный такт, то другие должны приобретать путем резни, страдании и глупостей. Скажем же спасибо своей натуре, что она хоть поздно, но пробуждается. Боже мой, если б я так долго был в таких отношениях с Грановским, как с Иваном Петровичем, л а я сросся бы с ним всеми корнями души моей!
   Глупа вся эта история, но велики для меня ее результаты -- я вырос и возмужал ею, навсегда отрешился от многих темных сторон своей личности, срезал с себя много мозолей, которые наросли на мне, благодаря моей пустой и праздной жизни. Во-первых, я понял теперь, что дружеские отношения не только не отрицают деликатности, как лишней для себя вещи, но более, нежели какие-нибудь другие, требуют ее; что они должны быть совершенно свободны в своем развитии и своих проявлениях, что им меркою должна быть действительность, а не построения. Вследствие этого, я вправе скрыть от друга всякую тайну, если не почитаю ее нужным открыть ему, я не имею права сердиться за охлаждение его ко мне дружбы, ни на себя, если нет никакой видимой и предосудительной для той или другой стороны причины. Хорош он ко мне -- спасибо, хорош я к нему -- очень рад; не клеятся наши отношения -- значит, они вышли не из субстанцияльного зерна, а извне, и, значит, их не нужно. Нет ничего гнуснее и мальчишественнее, как этих определений степени моей любви к тому или другому, и наоборот -- дружеские отношения должны быть непосредственным явлением, должны чувствоваться, а не сознаваться. Слова и определения собственного чувства, в минуту его присутствия, профанируют его. Всякое чувство свято и требует уважения к себе; как милая шалость, как грациозная шутка девушки, оно не терпит угрюмого надсмотрщика; как цветок, оно не терпит прикосновения грубых рук и вянет от него. Когда две души понимают себя в мысли или прекрасном образе, или чувствуют свое родство чрез какое бы то ни было обстоятельство,-- внезапно встретившиеся взоры их скажут больше всяких слов, и их молчание будет священно. Всякое чувство должно быть свободно, иначе оно обращается в долг. Я полон драмою Шекспира, а ко мне приходит человек, погруженный в эгоистическое созерцание своих скорбей, и во имя дружбы требует, чтобы я вышел из мира общего в мир пошлых частностей,-- по какому праву? Не справедливее ли будет ему уважить редкую минуту блаженства и подождать, чтобы я сам догадался о его горе и принял в нем участие или совсем затаить его? О боже мой! сколько эгоизма в наших жалобах на несчастие -- и как мало заслуживают участия те, щедрые и обильные на них, которые носятся с ними, как курица с яйцом, и как благороден тот, кто все свое личное молча заключает в себе, как домашнее обстоятельство, которое никого не может интересовать, и какого святого, глубокого участия достоин он, когда о его горе догадываются из его непосредственности, а не из слов, когда его усматривает внимательный глаз дружбы, как ни глубоко схоронено оно! Какое право имеет человек навязывать мне свое горе, когда у меня много своего и когда я молчу о своем-то? Что за идиотская мысль -- требовать того, что только свободно дается? Во мне не принимают участия -- и правы, так же как правы, если оказывают его. Только мелочной эгоизм ставит себя центром всего и думает, что только ему знакомы страдания. Я иду к другу отнять у него время -- но чувствую ли я, что вознагражу его за эту потерю, принеся ему полную интересов душу, богатый содержанием разговор?50 -- Теперь другое обстоятельство: какое имею я право не уважать субъективных убеждений моего друга и навязывать ему насильно свои, хотя бы и истинные? Разве для убеждения достаточны одни доказательства, и разве до истины всякий не доходит своим путем, своим развитием? Какое я имею право ругаться над заблуждением, даже над падением друга? Конечно, по святому праву дружбы, я должен заметить ему его уклонение от прямого пути, но для этого нужна деликатность, манера, такт, но для этого нужна одна любовь, сострадание, участие, а не гордость собою, не холодная верность долгу, словом, нужны тихие, нежные убеждения, мольбы и слезы, а не анафемы, не проповеди. Перестали понимать друг друга -- разойдитесь, господа; вам прискорбно, вы страдаете от потери друга -- вам же лучше: ваша скорбь свята, а необходимости все-таки должно покориться и бить в стену лбом и смешно и больно. Вот где скрывались истинные причины нашей ссоры: каждый по-своему, один больше, другой меньше, но все не понимали этих простых истин, именно потому, что они просты. Спасибо вражде: она открыла нам глаза, мы простили друг друга и благословили ее. Я теперь не стану просить у Боткина помощи в затруднительном обстоятельстве; если он видит его, может и хочет помочь -- он сам поможет, не может -- чем же мне огорчаться на него; не хочет -- он опять прав, и я не имею права требовать, чтобы он для меня становился на ходули и приносил мне жертву не любви, а долга, или, лучше сказать, самолюбия и эгоизма, или пошлых, прекраснодушных понятий о дружбе. И в самом деле, если он не только не может, но просто не хочет -- деликатно ли с моей стороны подвергнуть его неприятности отказа!51 Деликатность и свобода -- вот основания истинных дружеских отношений. Может быть, тебе это покажется смешно, но для меня (да и для всех nous autre {нас прочих (фр.). -- Ред.}) решилась великая задача.
   Потом я узнал, что любовь, братец ты мой, вещица очень заманчивая,-- это, впрочем, я и всегда знал, к несчастию, слишком хорошо; но я не знал, <что> в любви действительное есть возможность чувства, лежащая во святая святых духа нашего, это сродство двух душ -- тайна сия велика есть, но что осуществление возможности любить, встреча с родною душою есть чистейшая случайность, и что от этой случайности блаженство не только не ниже, но еще выше, потому что, в противном случае, это была бы мертвящая душу невольническая неизбежность. Кто не хочет дожидаться свершения таинства, потому ли, что не желает ожиданием большого счастия лишиться какого-нибудь, но верного, или потому, что не верит в таинство и хочет жениться на девушке, которой не любит в идеальном и мистическом значении этого слова, но которая ему нравится, тот пусть спросит себя, позволяют ли ему сделать этот важный шаг его внешние обстоятельства и может ли он совершить его из полноты натуры, без рефлексии: ответ благоприятен -- женись; нет -- откажись от незаконного счастия, которое должно сделаться несчастием и отравить жизнь. Таким точно образом, встретил -- бери, хватай, не упускай, истощи все силы, всю энергию для достижения блаженства; барышня еще не показывается -- не трать жизни в пустых жалобах, идеальных ожиданиях при луне и сальных свечах. Нашел -- твое; не нашел -- и не ищи. Вообще, я только теперь -- странное дело! и ведь, кажись, малый очень не глупый -- понял, что только тот достоин блаженства, кто довольно силен духом, чтобы отказаться от него (résignation) {отречение (фр.). -- Ред.}, когда его нет или когда это велит не детский экстаз, не идеальная выспренность, не резонерство, но разумность. Я все это и прежде еще и думал и даже говорил, но не верил этому, а поверил только тогда, когда наделал тьму глупостей, от которых сердце то судорожно сжималось, то хотело разорваться, и текли слезы и бешенства, и отчаяния, и оскорбленного самолюбия, и черт знает еще чего. Что делать -- у всякого свой путь к истине и свое развитие. Выход в мысли хорош, но я лучше люблю, когда человек уже не делает себе вопроса, потому что созрел для ответа на него. В самом деле, у меня совершенно пропала охота болтать о любви, допытываться ее значения и путаться в своих построениях. Я не могу презирать человека, который только и делает, что хнычет о том, что он не знал любви, что его не любила ни одна женщина и т. п. -- не могу презирать, потому что бог смирил мою гордость в этом отношении кровавым унижением; но я уже и не могу принять в таком человеке слишком сильного участия. Если бы я заметил, что он слаб и дальше чувствительных элегий идти не в состоянии -- я бы стал молчать; но если бы заметил в нем мощь и силу -- то насмешка, сарказм, ругательство,-- словом, все средства позволил бы себе, чтобы вытащить его из этого болота на свежий воздух. Да, Николай, это великий, великий для меня шаг. Весною 1836 года началась моя история с гризеткою 52 и развязка ее заставила меня горько рыдать, как ребенка; летом началась другая история, развязка которой воспоследовала летом 1838 года -- и я опять горько рыдал; последняя история не стоила мне ни одной слезы, но, боже мой, сколько мук, подавляющих страданий, наконец, отчаяния, ужаса и унижения в собственных глазах! Три года беспрерывных терзаний и несколько дней не действительного счастия, а экстаза. Сколько сил потрачено в пустой борьбе! Да -- гадкое дело большею частию лежать на кровати и думать об испанских делах53. По крайней мере, теперь я не только освободился -- отрезался от подобных глупостей. Конечно, и теперь -- хорошие виды или
  
   ...легкий шум пленительных движений
   И музыка чарующих речей54 --
  
   да -- не могу не вспыхнуть, не задрожать сладким и тревожным трепетом -- но -- вот тебе честное слово -- это на мпнуту, пока еще на глазах туман, а в голове посвистывает -- на одну минуту, а там закричим про себя "святители", да и за книгу или хоть за карты, только уже не дурачиться.
   Недели через две после отправления этого письма еду в Питер на житье. Зачем?
  
   Горе мыкать, жизнью тешиться,
   С злою долей переведаться55.
  
   Без фраз -- я узнал теперь, что не годится порядочному человеку отдавать свою жизнь и свое счастие на волю случайностей, что для того и другого надо побороться, поработать. Если бы я приобрел невозмущаемую ни в горести, ни в радости ровность духа, совершенное забвение самого себя, как частное, и -- чего больше всего мне недостает -- доброжелательство, участие и ласку не к одним слишком близким мне людям, но и ко всякому человеческому явлению -- я бы это назвал своим царством небесным, а все остальное охотно отдал бы на волю божпю. Знаешь ли, Николай, я много изменился даже и во внешности: стучанье по столу кулаком -- уж анахронизм в твоем передразнивании меня -- шутка ли! -- а внутри меня все переродилось: умерились дикие порывы; нападая на дурную или ложную, по моему мнению, сторону предмета, я уже умею не потерять из виду хорошей и истинной; чувство мое уже не огненно, но тепло, и тем глубже, чем тише; я уже не боюсь разочарования и охлаждения, не боюсь истощения духовных сил (о физических нечего и говорить -- частию порастрясены, частию подгнили, а частию плохи от природы столько же, как и от свободных искусств -- ну, да черт с ними, что с возу упало, то пропало), но знаю, что только теперь наступила пора их полного развития и что еще долго они будут идти возрастая, и хоть я не могу похвалиться кудрями, но часто твержу про себя эти чудные стихи Кольцова --
  
   По летам и кудрям
   Не старик еще я:
   Много дум в голове,
   Много в сердце огня!56
  
   Да, я в тысячу раз счастливее прежнего, глубже и сильнее чувствую блаженство жизни, как жизни, достоинство человека, доступнее впечатлениям искусства, словом -- любящее, но все это неровно. Ты знаешь мое образование, знаешь, сколько потрачено времени, знаешь, что работа для меня -- вдохновение, порыв или железная нужда, а не фундамент жизни, не источник сил. Да, я не приучил ума своего к дисциплине системы, не подвергал его гимнастике учения, и не приучил себя к работе, как к чему-то постоянному и систематическому. Я люблю искусство выше всего, и много мировых интересов живет в душе моей, но все это дилетантизм и добрая натура. Мишель весною 38 года даже оскорбил меня излишним усердием притащить меня за волосы к объективному наполнению, но я слышал слова, видел внешнюю логическую очевидность, видел также, что мой наставник походил на дорожный столб -- и только теперь, все благодаря оной же гистории, увидел, что мне или надо примириться с жизнию кое на чем, или приняться за себя и развить оставленный в совершенном небрежении элемент воли. Тебе смешон покажется тон, эта важность, с какою я рассуждаю о том, что 2X2 = 4. Видишь ли, в чем дело: я уже много раз давал себе обещание исправиться, приняться за дело, с полною уверенностию, что только стоит захотеть, а теперь увидел, что нет -- с виду и легко, а как подойдешь поближе -- нет, послать за Иваном Александровичем57. И потому мне страшно самому себе выговорить мои намерения, не только другому. Чтобы привести их в исполнение, мне надо оторваться от своего родного круга, мне -- робкой, запертой в самой себе натуре -- перенестись в сферу чуждую, враждебную -- страшно подумать, а время близко! Это последний опыт -- не удастся, все надежды к черту. Москва погубила меня, в ней нечем жить и нечего делать, и нельзя делать, а расстаться с нею -- тяжелый опыт.
   Фу, черт возьми! устал -- мочи нет -- уходила проклятая гистория, а между тем и половины не рассказал. Если встретишься с Ефремовым и если это тебя интересует -- он пополнит. Канва дана мною, а он разукрасит ее прекрасными узорами.
  

Октября 8.

   Обращаюсь к Шиллеру, от которого отвлекла меня гистория. Я сказал тебе, что когда я принялся за "Наблюдатель", я был помешан на идее объективности, как необходимого условия в творчестве, и идее искусства, понимаемого не в романтическом смысле со стороны содержания, а в первобытном и чистом значении классической формы. Разумеется, я неистово бросился в новую открывшуюся мне сферу мысли и на Шиллере вымещал досаду на свою прошедшую слепоту. Но я вымещал ее <конец письма не сохранился>
  

57. В. П. БОТКИНУ

22 ноября 1839. Петербург

Петербург. 1839, ноября 22 дня.

   Виноват, друг Василий! Ты писал ко мне, спрашивал, беспокоился1 -- одно мое слово -- и ты был бы спокоен... Что делать! Я нахожусь в какой-то апатии, в которой, впрочем, есть все, кроме участия ко всему тому, что не я. Я и чувствую, и мыслю, порою даже и страдаю; но ни до тебя и ни до кого из вас мне дела нет, как будто вы все не существуете и никогда не существовали. Или, видно, настало время расчета с самим собою, или черт знает что -- но вот вам факт: понимайте и толкуйте его, как хотите. Бог да благословит вас, а я не виноват2.
   Питер город знатный, Нева -- река пребольшущая, а петербургские литераторы -- прекраснейшие люди после чиновников и господ офицеров. Мне очень, очень весело: о чем ни заговоришь -- столько сочувствия. Одним словом: Петербург молодой, молодой человек, но говорит совсем так, как старик3. Да ну, к черту -- лучше о деле.
   Я увиделся с Мишелем на третий день приезда. С первых слов я увидел, что комедий ломать с ним не для чего, потому что он очень поумнел и очеловечился в последнее время и сам заговорил о твоем деле4 таким языком, каким мы говорили. Правда, тут есть пункт, в котором мы с тобою ближе друг к другу и в котором он едва ли когда сойдется с нами, но этот пункт не относится к вопросу о твоем счастии, и мне кажется, что он не совсем не прав в нем так же, как и мы не совсем не правы, следовательно, обе стороны и правы и не правы. Вообще Питер -- славное исправительное место и очень исправил Мишеля. Я думал увидеться с Мишелем, как с хорошим знакомым, но расстался с ним, как с другом и братом души моей. Это, Васенька, человек в полном значении этого слова. В нем сущность свята, но процессы ее развития и определений дики и нелепы; но за это винить его -- по крайней мере не мне. Но лучше расскажу все, как было. На другой день Мишель был у меня и смертельно надоел и опротивел мне, так что я радовался мысли, что он скоро уедет. Врет, шутит, машет неуклюжими руками -- и все невпопад. Тут был и Панаев. Решились идти к нему наверх;5 они оба пошли, а я замешкался. Прихожу наверх -- Мишель бросает мне твое письмо и говорит при Панаеве о твоем деле, как будто бы мы были вдвоем -- прочтя письмо, он тотчас дал и ему его прочесть, с предисловною фразою: "Боткин любит мою сестру". Потом начались выходки против батюшки и матушки, изъявления радости о войне и пр. -- ты сам дополнишь. Приятно увидеть чувство в лице и непосредственности человека -- и в Мишеле точно было чувство; но приятно видеть чувство, которое сдерживается волею и прорывается избытком собственной силы,-- вот этого-то и не было. За сим пошла болтовня, шутки некстати, достолюбезности невытанцовывающиеся и т. п. Когда, наконец, Мишель ушел -- с меня словно камень свалился. Все тот же, подумал я, а Панаев сказал: "Теперь я понимаю, почему Бакунин, будучи прекрасным человеком, имеет столько ожесточенных врагов". Я с горя лег спать и проспал часов до одиннадцати утра. Мишель приглашал меня обедать к Заикину и вообще обнаруживал большое желание сблизить меня с ним, чем самым и возбудил во мне страшное нежелание этого сближения; к тому же я решился было избегать всяких знакомств и жить схимником. Но делать было нечего -- прихожу, пообедали, подпили, начали беседовать -- и Мишель явился мне с самой лицевой передней стороны. Сколько задушевности, теплоты, благородства, человечестности! Самые манеры его изменились -- не было уже нелепых шуток и натяжных достолюбезностей, трубка уже не падала из рук его. Он спорил со мною, но так кротко, с такою любовию и уважением ко мне, хотя меня какой-то бес словно подталкивал наполовину говорить против себя. Одним словом, я провел московский вечер и ушел с новым, удивившим самого меня чувством к Мишелю. Потом он был у меня -- прочел мне свою статью: статья сочная, крепкая, чуждая всякого нахальства, размахиванья длинными руками, простая и целомудренная в своей энергической крепости!6 Пошли потом толки. Я довольно резко (моим слогом) высказал ему свое мнение об участии, которое принимала в твоей истории Татьяна Александровна, и даже о самой ней. Он ее во многом обвинил, но во многом и оправдывал, и показал мне резко, но и кротко, что он о ней думает совершенно иначе. Это уже был не тот Мишель, который некогда на замечание, что в письме Татьяны Александровны есть одна фраза, отвечал мне с царственно-геройским и наглым видом: моя сестра не может писать фраз; но это был брат, который нежно и глубоко любит и уважает сестру и в то <же> время уважает в <других> права дружбы и свободы мыслить. Потом, в другой раз, он показал мне, что героизм его самому ему теперь смешон и пошл; что он боролся с отцом по праву, но худо делал, что фанфаронил этою борьбою и даже отчасти привил это фанфаронство и к сестрам своим,-- и во всем этом он сознавался не как прежде с хвастовством или равнодушием, но с внутренним страданием. Это меня глубоко тронуло и совершенно помирило с ним. И могло ли быть иначе? Если сознание вины вошло в плоть и кровь человека, возродило его духом -- его прощает сам бог, а человеку надо отречься от своей человечестности, чтобы не простить его. Я тем более не мог этого не сделать, что сам не меньше Мишеля нуждаюсь в прощении -- и его первого, и тех, кто меня хорошо знает, и тех, которые едва знают меня. Однажды, при его брате7, я высказал ему кое-что о его болтовне и претензии на достолюбезность -- после он сказал мне, что сначала ему ужасно было досадно на меня, а потом он согласился, что так. Не знаю, покажешь ли ты ему это письмо, но я желал бы этого, только сделай это кстати, в хорошую минуту Мишеля. Надо избегать крайностей: для нас прошла пора требований отчета в поведении и образе мыслей друг у друга, и это хорошо; но не будем же лишать дружбы ее прав. Кто мне скажет правду обо мне, если не друг, а слышать о себе правду от другого -- необходимо. Помнишь ли, ты дал мне урок насчет моих народных патриотических острот и милых достолюбезностей насчет Лангера? Ведь мне казалось, что я в самом деле очень любезен, и если бы ты не подставил мне зеркала -- я до сих пор находился бы в этой уверенности. Друзья мои -- будем бояться крайностей, как зла: оставим каждого жить, как он хочет, не будем читать друг другу поучений, посылать буллы, требовать отчета, но не побоимся же и замечать друг другу то, чего каждый в себе не хочет или не может замечать, только будем это делать с уважением к личности, деликатно, с любовию. Вразуми же, Боткин, Мишеля, что природа создала его быть теплым и важным и только под этим условием светлым, а когда он не таков -- то молчаливым и важным, но никогда достолюбезным в смысле Станкевича. Заставь его почувствовать иногда важность, иногда пользу, а иногда и святость молчания и возмутительность выговаривания того, что понимается само собою и профанируется выговариванием. Во всяком человеке -- два рода недостатков -- природные и налипные; нападать на первые и бесполезно, и бесчеловечно, и грешно; нападать на наросты -- и можно и должно, потому что от них можно и должно освобождаться.
   Мы обвиняли Мишеля в недостатке задушевности, в неспособности принять участие в личности другого,-- и мы были правы, но правы внешним образом. Я больше всех кричал против Мишеля в этом отношении за то, что он не принимал участия в моих сердечных похождениях; но ты сам знаешь, до какой степени были достойны они участия, ты сам знаешь, что действительно в них было только мучительное стремление, мучительная жажда любви и сочувствия, а проявления были призрачны и пошлы. Мишель сам обвинял себя, что не принял истинного участия в истории Каткова8, но ты сам знаешь действительность этой истории, в которой истинное было опять в источнике, а не в осуществлении. Кто не полезен себе, тот не полезен и другим: над Мишелем больше, чем над кем-нибудь, сбылась истина этих слов. В нем так много дикостей, угловатостей и нелепостей, он сам очень хорошо их видит и борется с ними; процессы его духа совершаются так трудно, как процесс деторождения для женщины; сверх того, у него так мало такту и всего того, что дается счастливою непосредственностию и полнотою натуры, он все должен приобрести борьбою и успехами в мысли,-- что ему, право, пока совсем не до других, а только до себя. Я теперь собственным опытом узнал возможность такого состояния. Мне теперь ни до кого нет дела, я никого не люблю, ни в ком не принимаю участия,-- потому что для меня настало такое время, когда я увидел ясно, что или мне надо стать тем, чем я должен быть, или отказаться от претензии на всякую жизнь, на всякое счастие. Для меня один выход -- ты знаешь какой; для меня нет выхода в Jenseits {потустороннем (нем.). -- Ред.}, в мистицизме и во всем том, что составляет выход для полубогатых натур и полупавших душ. Я теперь еще больше понимаю, отчего на святой Руси так много пьяниц и почему у нас спиваются с кругу все умные, по общественному мнению, люди; ко я не могу и спиться, хотя и каждый день раза по два пью водку и тяну то красное, то рейнвейн. Мне остается одно: или сделаться действительным, или до тех пор, пока жизнь не погаснет в теле, петь вот эту песенку
  
   Я увял и увял
   Навсегда, навсегда,
   И блаженства не знал
   Никогда, никогда!
   Всем постылый, чужой,
   Никогда не любя,
   В мире странствую я,
   Как вампир гробовой.
   Мне противно смотреть
   На блаженство других,
   И в мучениях злых
   Не сгораючи тлеть9.
  
   Обращаюсь к Мишелю. Вот причина, почему мы отрицали в нем задушевность и теплоту. И в самом деле, то и другое не всегда присутствует в нем, потому что возня его с самим собою, как и следует, захватывает большую часть его времени. Но когда он бывает ровен с самим собою,-- это человек насквозь теплый, насквозь светлый, в высшей степени задушевный, любящий, готовый принять в другом все участие, какого только можно желать. А что он умеет любить глубоко и горячо, этому лучшее доказательство -- я: кто больше меня ругал и оскорблял его, к кому больше меня бывал он несправедливее -- и что же? -- где бы он ни явился, с кем бы ни познакомился, там и тот уже знает Белинского. Заикин и все прочие сто раз уж говорили мне -- как он любит Вас! И изо всего видно, что он любит меня, часто вопреки себе, именно за то, за что нападал на меня, что составляет нашу противоположность. Погладь его за это по курчавой голове -- право, он очень не глуп, как я начинаю уверяться. А сколько глубины, сколько инстинкта истины, какое сильное движение духа в этом шуте! Я немного побыл с пим в Питере, но много узнал от него нового, много уяснились мне и собственные мои идеи. Это один человек, с которым побыть вместе значит для меня -- сделать большой шаг вперед в мысли -- дьявольская способность передавать! Да, я вновь познакомился с Мишелем и от души, как друга и брата, обнимаю его на новую жизнь и новые отношения.
   Ну, да довольно о нем -- не все говорить о пустяках, надо и дела не забывать. Брат Мишеля, Николай,-- славный малый: глубокая и здоровая натура и прекрасная непосредственность. В душе его пыл и разгул буйной молодости, но вместе с этим соединяется и какая-то кротость, напоминающая покойницу Любовь. После отъезда Мишеля я еще только раз виделся с ним -- обедал у Запкина, много говорил с ним и поближе рассмотрел его -- славный человек! Заикин -- чудеснейший человек -- совершенно внутренний, религиозный, субъективный, но ужасно мало развитой. Во всяком случае, я предвижу с ним скорое и тесное сближение. Я видаюсь с ним 4 раза в неделю -- мы учимся по-немецкому у немца -- гм!.. Заикин сперва очень было не взлюбил нашего урода, но потом, когда узнал его невинность, то крепко привязался к нему и теперь тоскует по нем. Вот человек, который <понял> Мишеля, как должно: рассмотрел и его дико-нелепую сторону, да не просмотрел и его истинной стороны. Художник Сте-хв-анов -- прекрасный человек и доставитель сего послания, прошу принять его по-человечески и по-московски. Каткова об этом не прошу: он моложе и здоровше нас, у него всегда больше отзыва на всякое доброе явление жизни -- его надо просить только о том, чтобы не слишком пылал.
   Несмотря на мое решение избегать всяких знакомств, я завел их бездну. Разумеется, прежде всего я познакомился с Краевским. Чрезвычайно добрый, теплый и умный человек! В нем есть даже и чувство изящного, но оно не развито,-- и потому живую, энергическую статейку о Цурикове писал он, о Булгарине тож (No 11 "Отечественных записок"), но и о повестях Н. Ф. Павлова писал все он же, все Краевсский же 10. Плетнев добрый и простой человек, но он теперь на покое у жизни11. Князь Одоевский принял и обласкал меня, как нельзя лучше. Он очень добрый и простой человек, но повытерся светом и жизнью и потому бесцветен, как изношенный платок. Теперь его больше всего интересует мистицизм и магнетизм12. Очень также хорошо отзывался он и о моем "Пятидесятилетнем дядюшке". У Панаева есть закадычный друг, Языков -- это, брат, московский человек, и я выключаю его из числа знакомых. Брат его, полковник и человек уже не молодой -- тоже московская душа:13 трудно и в молодом человеке встретить столько интереса к истине, столько задушевности и жизни. Да, и в Питере есть люди, но это все москвичи, хотя бы они и в глаза не видали белокаменной. Собственно Питеру принадлежит все половинчатое, полуцветное, серенькое, как его небо, истершееся и гладкое, как его прекрасные тротуары. В Питере только поймешь, что религия есть основа всего и что без нее человек -- ничто, ибо Питер имеет необыкновенное свойство оскорбить в человеке все святое и заставить в нем выйти наружу все сокровенное. Только в Питере человек может узнать себя -- человек он, получеловек или скотина: если будет страдать в нем -- человек; если Питер полюбится ему -- будет или богат, или действительным статским советником. Сам город красив, но основан на плоскости и потому Москва -- красавица перед ним. В театре я был два раза (то есть в Александрийском) и в третий страх не хочется идти, а в первый пришел в восторг и написал преглупую статью, которую прочтете в 21 No "Литературных прибавлений" 14. Вообще, характер театра, как и самого Питера, плоскость. В Москве театр горист, угловат и неровен: Мочалов, Щепкин, Репина, Живокини, Самарин, Потанчиков, Степанов, Орлов (Осип)15, даже Никифоров, Шуйский, даже Орлова -- это все или горы или холмы, между которыми лежат плоские долины Козловских и прочих, а в Питере все ровно, все в гармонии, все плоско. Впрочем, Мартынов -- пстппный талант. Асенкова возмутительно-отвратительна: Орлова гений перед нею. Видел Тальонову -- хорошо, превосходно, но что-то нет охоты еще видеть. Публика -- господа офицеры и чиновники -- зверинец из орангутангов и мартышек -- позор и оскорбление человечества и общества. <...> Славный город Питер! Софья Астафьевна -- mauvais genre; {дурной тон (фр.). -- Ред.} но собою очень интересна -- с усами и бородою-- словно ведьма из "Макбета".
   У Краевского я встретился с Срезневским -- необычайно острый муж: очень хорошо рассуждает о Гоголе и Основьяненке,-- говорит, что что есть в одном, того недостает другому, что Гоголь берет формою, а Основьяненко изобретением, по что "Ревизор" -- отвратительный фарс, "Старосветские помещики" -- превосходное, гениальное создание, а "Тарас Бульба" -- дрянь и прочее в этом роде. "Признаюсь Вам откровенно, когда другие восхищались Вашими статьями, я говорил, что Белинский -- ничего, но когда прочел Вашу драму, то увидел, что нет -- это огромный талант". Я его спросил, что выше -- "Макбет" или моя драма16,-- и он холодно ответил, что не понимает "Макбета", то есть что ничего не видит в нем хорошего. Вот это понял меня -- не то, что вы --дураки. Вот бы кого в Питер-то, именно в университет, тоже основанный на плоскости. Впрочем, там есть молодой профессор Куторга, товарищ Редкина, гегелианец и умный человек, хотя в искусстве и еще больше идиот, чем Грановский. (Зри его статью в 10 No "Отечественных записок", "Исторические воспоминания путешественника".) Срезневский презирает Кульчицкого и весь этот кружок и тебя, понеже ты в этом кружке вращался в Харькове. Экая скотина! Прощаясь, расцеловался со мною, и вообще он убежден, что мы поняли друг друга.
   Кланяйся всем нашим, Каткову, которому стыдно не писать ко мне, если он писывал к Савельеву (вот скотина-то, Краевскнй уж хочет от него и двери на запор -- и я бегаю от него, (как) от чумы и говорю ему грубости). Скажи Каткову, что, по неотступным просьбам Краевского, я уступил ему "Гренадеров" для 1 No "Отечественных записок" 17, и чтобы он скорее высылал их. Кудрявцеву мое слезное и кровное лобызание -- без него мне не хочется читать ни "Илиады", ни Пушкина; жду от него повести; 18 уведомь меня, взял ли он мой стол, да скажи ему, чтобы написал ко мне хоть строчку да прислал свой адрес, по которому надо выслать к нему "Отечественные записки" и "Литературные прибавления" 19. Милому Грановскому -- братский поклон. Скажи, чтобы скорее присылал статью, да и Редкина подталкивал20, да чтобы писал ко мне. Кланяйся Ивану Петровичу и уведомь меня -- как и что он. Петру Петровичу -- поклон до земли и лобызание. Передай поклон Щепкину, коли кого увидишь из них, а я жду письма от Дмитрия и буду отвечать. Пашеньку Бакунина поцелуи в лоб и погладь по головке. Бееру скажи, что я его люблю от души за то, что он добрый малый, чуждый всяких претензий, и еще кое за что, чего не скажу, чтобы он не загордился. Лангеру -- кстати: Одоевский, проиграв его пушкинскую пьесу21, остался недоволен однообразием мелодии, а "Примирением" остался очень доволен -- "Заутрени" мы еще не показывали ему. Кого забыл, тем сам поклонись.
   Насчет денег, брат,-- нет: сидим с Панаевым без гроша, но он скоро получит -- и тогда не беспокойся, а пока потерпи. Он тебе кланяется и будет скоро писать. Питер на него, после Москвы, начинает наводить уныние, да объективная терпимость его к людям очень колеблется, и бездейственная жизнь тяготит -- это все хорошо -- из него будет прок. Булгарин, встретясь с ним на Невском, на другой день после выхода 11 No "Отечественных записок" (сказал): "Почтеннейший, почтеннейший -- бульдога-то это вы привезли меня травить?" 22
   Скажи Грановскому, что чем больше живу и думаю, тем больше, кровнее люблю Русь, но начинаю сознавать, что это с ее субстанциальной стороны, но ее определение, ее действительность настоящая начинают приводить меня в отчаяние -- грязно, мерзко, возмутительно, нечеловечески,-- я понимаю Фроловых...
   Твой перевод "Ряса монаха" 23 я читал и перечитывал, упивался сам и упоевал других -- теперь он в руках у кн. Одоевского. Гоголя видел два раза24, во второй обедал с ним у Одоевского. Хандрит, да есть от чего, и все с ироническою улыбкою спрашивает меня, как мне понравился Петербург. Невский проспект -- чудо, так что перенес бы его да Неву, да несколько человек в Москву.
   Бога ради, о моих отзывах о Питере и его литераторах -- никому ни гу-гу, особенно об Одоевском. Каково я отделал Загоскина? Статейки о Зотове, "Повесе", "Илиаде" -- тоже мои -- очень хорошие статейки25.
   Прощай. Желаю тебе всего, чего ты желаешь. Хорош наш старец-то26 -- нечего сказать. Хоть бы со мною -- принимал меня в Москве, как нельзя лучше, а в письме к Мишелю ругнул. Ну, да бог с ним -- со всем этим народом, только бы дело-то хорошо кончилось.

Твой В. Белинский.

58. В. П. БОТКИНУ

16 декабря 1839--10 февраля 1840. Петербург.

   СПб. 1839, декабря 16 дня. Спасибо, друг Василий, за письмо твое от 30-го ноября:1 оно доставило мне много сладостных ощущений и возбудило во мне желание писать к тебе, но, по множеству работы, не мог я до сих пор собраться. Не можешь представить, как удивило меня известие о нашем юноше: нечего сказать -- "странно себя аттестует". Это мне не нравится, и субъективного участия я не могу в этом принять; скажу более, это набрасывает в моих глазах какой-то неприятный свет на тоталитет юноши. Если бы это была сильная и дикая натура, лишенная всякого духовного развития, не умеющая различить <...>; но юноша далек в сфере идей; но, видно, и в самом деле, можно думать одно и жить другим, видно, абстрактность есть условие юного возраста, и наука книги еще не полна без науки жизни. Но все бы это ничего; одно гнусно и возмутительно <...> И какая цель? -- Одна минута чувственного упоения, потому что другой не станет сил победить отвращение. А между тем, муж, благородный человек, доверчивый не по слабости, а по благородству души. О абстракты! О седовласый мистик! Как они глупы! Нет, хоть мы и не путем идеальничали, хоть и ошибались иногда, но в такой женщине неспособны были найти что-нибудь, кроме <...> резонерства. И что ж? -- один из наших... Нет, на эту минуту, он не наш,-- не Маросейка, а Арбат его сторона2. И со всем тем, Боткин, я завидую ему -- да я завидую, мучительно завидую этой дурацкой способности предаться вполне, без рефлексии, хотя бы и пошлому чувству. Отчего же я никогда не мог предаться весь и вполне никакому чувству, хотя последняя из моих глупостей была разумнее и человечнее теперешней юноши. Я знаю, что пораженный благородством и нравственности) моего слога, Мишель выронит из длинных рук трубку, рассыпет на пол табак и, нелепо махая и загребая ими, заревет: "Это оттого, что у Белинского глубокая натура, которая может удовлетвориться только истинным чувством и любить только раз в жизни!" -- Если он это сделает, Боткин, наплюй ему, пожалуйста, в рожу и скажи, что он -- дурак; оно будет и эффектно, и справедливо, и истинно. Нет, это вздор: в каждом моменте человека есть современные этому моменту потребности и полное их удовлетворение.
  
   Блажен, кто смолоду был молод!
   Блажен, кто вовремя созрел!3
  
   Я понимаю необходимость, разумность, а следовательно, и достоинство рефлексии как момента самого разума, как движителя жизни, не дающего человеку убаюкаться на какой-нибудь низенькой ступеньке жизни; но дело в том, что есть две рефлексии -- нормальная и болезненная. Первая есть условие глубокой натуры; вторая -- результат аналитического развития. Что такое аналитическое развитие? Резонерство, которое есть несвоевременное мышление о том, чего еще нет и не было в созерцании. Это резонерство есть гниль сердечная, в которой заводится червяк, отравляющий всякое полное наслаждение жизнию, а этот червяк -- болезненная рефлексия. Вот такая участь ждет брата Мишеля Алешу, который резонерствует "с ученым видом знатока" 4 о любви, о браке, о Шиллере, о Гете, которых не понимает, которых надо сперва перечувствовать, чтобы потом понять мыслию.
   Да, если в этом ребенке есть глубокость души, его ждет моя участь -- печальнейшая и горестнейшая из всех участей. Счастие существует только для здоровых натур, а не для таких огаженных и оскверненных, каковы моя и К. Аксакова, например. Я недавно догадался, что есть два рода идеальности -- здоровая и резонерская, и теперь понимаю ожесточение против идеальности. Что делать? Кругом себя я видел все резонерскую идеальность и сам пребывал в ней. Только три здоровые натуры встретил я в жизни своей, не поняв ни одной. Чем особенно восхищался я в Станкевиче? Тем, что он ненавидел в себе. Ты знаешь, как хорошо умел я оценить покойную Любовь Александровну в то время, как узнал ее. Что касается до тебя, я тебя всех лучше понял и оценил; но, связавшись с нами, то есть со мною и Мишелем, и ты заболел было. Болезненная рефлексия закрывает глаза на действительность и создает свою -- небывалую и абстрактную. Раз -- по ошибке или невзначай -- судьба послала было мне минуту жизни и радости: прекрасная девушка, возбудившая во мне что-то похожее на страсть, млела в моих объятиях и звала в свои роскошные объятия, полные неги, трепетного упоения; во мне кипела кровь, и изнывала душа в сладостной тоске, а я в это время рефлектировал и хлопотал о том, чтобы поступить сообразно с выдуманною мною и небывалою действительностию, а главное -- не отступить от хорошо обдуманного и начертанного плана высшей жизни, которого масштабом была духовная онания...5 На кого же жаловаться? Уж конечно не на жизнь. Непременно напишу огромную статью об онании, или резонерской идеальности, которая из жизни делает тяжелый сон, из радостей призраки. Известный нам полковник6 больше, в тысячу раз больше человек, чем я: он живет с своею Анною Ларионовною, чем бог послал; эта жизнь вполне удовлетворяет его (пока или безусловно -- это вопрос, которого я не берусь решать), и он наслаждается ею вполне, без рефлексии и без претензий. Он живет, а я не жил и не живу; он что-то, а я меньше, чем ничто <...>
   Боткин, Боткин! не сердись и не презирай, но пойми... Под этими похабностями скрывается нечто похожее на судорожное сжатие сердца, на глубоко болезненное стеснение груди, в которых простая глубокая потребность любви и сочувствия. Нет, никогда не страдал я так глубоко -- сил недостает. Внутри меня что-то глубоко оскорблено. Я уже не мучусь апатиею, но страдаю целые дни какою-то тяжелою болезнию. Ну, да что об этом говорить! Ты и без слов поймешь меня -- ведь не даром же так глубоко и братски, с такою бесконечною силою люблю я тебя.
   Кто говорит, что надо стремиться к общему, надо страдать и трудиться и бороться, чтобы почитать себя в праве на личное блаженство,-- того я буду слушать, перед тем я обвиню себя в тяжких грехах, в совершенном недостоинстве; но кто бы стал доказывать мне, что жить должно только в общем, презирая личное и субъективное -- я сказал бы тому, что он поросенок, которого мне, старому борову, слушать неприлично и смешно, а для показания действительности и прочности подобной философии указал бы ему на юношу, который теперь "так странно себя аттестует".
   Всякая односторонность уже не бесит, а глубоко оскорбляет меня. Один кричит о высоком, прекрасном и идеальном; другой с ироническою усмешкою человека, постигшего мудрость мудрости, говорит о паровых машинах и конфорте; один уважает общее и презирает личное; другой не верит общему и лакомится только частным: все это ограниченности и односторонности. Мир древний жил в истории и искусстве и пускал в трагедию только царей, героев и богов: а новый мир начался словами: приидите ко мне все страждущие и обремененные, и тот, кто сказал их, возлежал с мытарями и грешниками, бога назвал отцом людей, а людей братьями друг другу. Оттого в новую трагедию вошли и плебеи и шуты, ибо героем её стал человек, как субъективная личность. Смешно и досадно: любовь Ромео и Юлии есть общее, а потребность любви или любовь читателя есть частное и призрачное. Жизнь в книгах, а в жизни ничто! Вот тут Грановский улыбнется и скажет, что я поумнел; а я ему скажу на это, что он дурак: не хочу немецкой жизни в книге, но французской, которая бы параллельна была немецким книгам, или совсем никакой, и в особенности -- сохрани боже -- французской. Все эти аллегории и "придворные экивоки" клонятся к тому, что права личного человека так же священны, как и мирового гражданина, и что кто на вопль и судорожное сжатие личности смотрит свысока, как на отпадение от общего, тот или мальчик, или эгоист, или дурак,-- а мне тот и другой и третий равно несносны. Говорить о себе да о себе или все о моих да своих страданиях, забывши, что и другой также думает о себе и также богат страданиями,-- не хорошо и не умно; но тяжело и давить в себе все и не иметь никого, кто бы дружески откликнулся на наши стоны и, сжавши нам руку, сказал бы -- я это понимаю, друг, и жалею о тебе. Ах, мой добрый Василий, так тяжело, как еще никогда не бывало! Моя одинокость в мире терзает меня: никогда так мучительно не жаждала душа груди, которая ответила бы вздохом на ее вздох, которая с любовию приняла бы на себя усталую от горя голову, с сердцем которой мое хоть минуту побилось бы в такт, движимое одним родственным чувством и -- пожалуй, хоть бы и умереть в такой минуте... Великое благо в сей жизни дружба, и особенно великое для меня, потому что оно одно, которое я вполне вкусил; но -- знаешь ли что? мужская грудь и холодна и жестка, а пожатие грубой мужской руки, хотя бы и дружеской, дает только жизнь, а не смерть, ту сладкую и блаженную смерть, о которой говорит Гете в своем божественном "Прометее". А мне хотелось бы хоть <на> мгновение умереть от избытка жизни, а после этого, пожалуй, хоть и умереть в буквальном смысле. И что же? каждый новый день говорит мне: это не для тебя -- пиши статьи и толкуй о литературе, да еще о русской литературе... Это выше сил -- глубоко оскорбленная натура ожесточается -- внутри что-то ревет зверем -- и хочет оргий, оргий и оргий, самых буйных, самых бесчинных, самых гнусных.
   Ведь нигде на наш вопль нету отзыва!..7 Грудь физически здорова -- против обыкновения, я даже не кашляю; но она вся истерзана -- в ней нет места живого. Да, земля вспахана и обработана -- каковы-то плоды будут?.. Да, плоды, может быть и вкусные, и сочные, и ароматные: прекрасная статья, которая усладит досуг автора и займет праздность читателя, а этот читатель скажет -- сколько души, сколько любви в этом человеке! Лестная награда! Может быть, и прекрасная читательница мне скажет то же, да еще со вздохом прибавит: какое счастие любить такого человека; а поставь перед нею этого человека рядом с каким-нибудь молодцом-офицером и заставь, под условием смертной казни, непременно выбрать одного из двух, она скажет: не хочу ни того, ни другого, но если уж нельзя иначе, то вот этого--и подаст руку г-ну офицеру, а меня попросит написать еще что-нибудь с душою... пойдешь же <...> к Эмилии, к Шарлотте, Амалии... но вот беда -- денег нету, штаны того и гляди спадут, а новых и не предвидится скоро. Другие хоть ужинать могут, а я отказываюсь от хорошего ужина, чтобы от него дня три не страдать животом. Умереть ужасно не хочется -- жизнь никогда так не манила, а жить страшно. Иметь отца и мать для того, чтобы смерть их считать моим освобождением, следовательно, не утратою, а скорее приобретением, хотя и горестным; иметь брата и сестру, чтобы не понимать, почему и для чего они мне брат и сестра, и еще брата, чтоб быть привязанным к нему каким-то чувством сострадания -- все это не слишком утешительно. Жизнь богато наделила меня дружбою. В Москве у меня было родство; но теперь нет и вас со мною, а приеду -- уж много будет непонятного для обеих сторон. Я скажу -- чудесный человек Языков, прекрасный человек Панаев -- и ты о последнем скажешь: да, я помню -- прекрасный человек, о первом -- расскажи-ка, что это за человек,-- а что я тебе расскажу? -- тоже и ты мне. Разлука вещь ужасная для дружбы: только любовь вечна, только в любви свидание совершенно уничтожает интервал разлуки, потому что каждый из друзей принадлежит себе, потом многим другим, кроме друга, но любящиеся принадлежат только друг другу и больше никому. Ну, да будет уже петь элегии-то заунывным голосом.
   Питер принял меня хорошо и ласково, но мне от этого только грустнее. А впрочем, душа моя Тряпичкин8, я жуирую, отпускаю в "Отечественных записках" и "Литературных прибавлениях" bon mots {остроты (фр.). -- Ред.}, и в хорошеньких актрис влюбляюсь, только <не> в российских, ибо это -- mauvais genre {Дурной тон (фр.). -- Ред.}, a во французских. Объясняться с ними не хочу: жду, чтоб сами догадались, а не то -- как раз окритикую в своей литературе... Гм! У князя Одоевского по субботам встречаюсь с посланниками, и у нас уже составился вист впятером: я, немецкий, французский, итальянский и турецкий посланники9. Впрочем, видел я одного -- шведского, графа Пальментиерна: презамечательный старик, выучился по-русски, любит со всеми говорить по-нашенскому-то, добр и прост, как какой-нибудь русский немец, учитель немецкого языка. Видел И. А. Крылова и, признаюсь, с умилением посмотрел на этого милого и достолюбезного старца.
  
   30 декабря. Вот, друг Василий, какой промежуток в моем письме -- почти половина месяца! А в эту половину много во мне изменилось, хотя и все то же осталось, что и было -- мучительное и безотрадное страдание. Не хочу и перечесть написанного -- стыдно будет. Боже мой! Скоро ли настанет время, когда я перестану стыдиться написанного или сказанного мною, перестану переходить от одной детскости к другой, от одного мальчишества к другому? Скоро ли мое слово будет мыслию, а не фразою, скоро ли ощущения, производимые иа меня объективным миром, будут формироваться во мне мыслями, а не случайными порывами. Право, стыдно писать -- ведь завтра же покажется глупо.
   Поведенция юноши произвела во мне неприятное впечатление только на минуту, и не сама собою, а сущностию мира и аксессуаров, в которых он пребывает. С одним я виделся в Питере -- умный, добрый, прекрасный человек, но если б бог привел больше не видеться -- хорошо бы10. Обыкновенная терпимость разума только в отношении к низшей действительности, а не к высшей призрачности. Клыкова можно уважать и любить до известной степени, ибо он есть то, что он есть; но избави бог от резонеров, живущих будто бы для искусства и мысли. Очень хороший тоже человек и И. В. С-ъ11, когда тешит: как хочешь, а своего рода действительность если не достопочтенная, то по крайней мере достолюбезная; но когда он пускается в, или, лучше сказать, напускается на Бетховена, Шекспира, Гете и вмешивается в споры людей, которые частенько и врут о том, что говорят, но которые всегда говорят о том, что живет в них и составляет насущный хлеб их жизни -- он мой личный враг тогда. Ты правду говоришь, что кружок, к которому так странно приклеился наш юноша,-- не твой; и не мой, ей-богу, не мой, брат. Знакомься -- нетто, раз, другой в месяц сойтись с ними (и то в толпе) не мешает -- люди честные, благородные, но не разумные и даже но рассудочные. Я уважаю людей с сильным рассудком -- это народ дельный, полезный, без претензий, словом -- действительный. Вот хоть бы Владимир Константинович: я первый, которого он и лучше и достойнее, хотя я и без самолюбия могу сказать, что моя натура поглубже и пошире. Будь каждый из этих людей -- математик, статистик, агроном -- каждый из них был бы лучше и меня и тебя. Но они глубоко оскорбляют дух, о котором хлопочут и которому они не родня ни спереди ни сзади. Я теперь в таком состоянии, что оскорбление духа грубым непониманием при поползновении резонерствовать о нем -- приводит меня в остервенение. Герцен был восторжен и упоен Каратыгиным в роли Гамлета 12. Эх, заняться бы статистикой-то -- славная наука! Знаешь ли что: в ком сильный рассудок, тот не может быть призраком и попасть в чуждую себе сферу. Право, мы оскорбляем рассудок, приписывая его резонерам.
   Да, возмутила меня новая дружеская сфера нашего юноши. Но теперь я и с этим примирился. Не должно судить человека снаружи, как говорит Мишель (поцелуй его -- он умник). Я помню, как вы все нападали на меня с прошлой осени до весны и как невпопад вы нападали. Я был виноват, может быть, даже и много виноват, но не перед кем из вас (даже перед юношею), а перед собою. А между тем я понимаю, что должен был казаться вам виноватым даже перед вашими сапогами. Процессы духа иногда бывают некрасивы, хотя их результаты и всегда прекрасны. Как бы ни была...
  

10 февраля

   Эта чепуха посылается к тебе без конца, который не мог вытаицоваться, потому что начало слишком глупо. Пожалуйста, Боткин, пиши ко мне, если можешь. Буду ждать твоего письма со всем страхом и трепетом ожидания. Словно гора с плеч спала, когда нынче кончил это бесконечное послание. Что твоя статья о Риме 13 -- отсылай скорее -- крайне нужна. Еще нет ли чего? Писать нечего -- а белой бумаги жаль. Ну, да так уж и быть, прощай. Здесь все тебе низко кланяются -- Панаев, Запкин, Ы. Бакунин и даже Языков, заочно в тебя влюбленный.
  

59. К. С. АКСАКОВУ

10 января 1840. Петербург.

   СПб. 1840, генваря 10. Любезный Константин, Панаев сию минуту прочел мне твое письмо к нему. Прошу тебя дружески извинить меня за мое к тебе письмо, грязное и не эстетическое, которое так глубоко оскорбило твое чувство1. Поверь мне, что я не имел никакого намерения оскорблять тебя, а признаюсь в грехе -- хотел только шутя намекнуть тебе на некоторые истины. Вижу, что поступил неловко. Я забыл, что не ко всем можно являться в халате, а к одним во фраке, другим в сертуке, смотря по отношениям. Вижу -- и мне это горько -- что главная ошибка моего письма -- в адресе. Еще раз прости меня, и будь уверен, что вперед личность моя будет являться к тебе для тебя, а не Для себя и тебя вместе. В самом деле, странно требовать, чтобы состояние нашего духа равно интересовало всех, особенно, когда мы уверены, что некоторых оно интересует всегда и во всяком виде. Еще раз -- прости!
   Благодарю тебя, любезный Константин, за твое внимание и ласки моему брату: я смотрю на них, как на благодеяние для него и право на вечную мою благодарность2. Если он тебе бывает иногда в тягость -- не церемонься с ним, а главное, говори ему всегда правду без прикрас, и, как мальчику, а не взрослому, удерживай от резонерства и самолюбия, к которым он удивительно как наклонен. Будь уверен, милый Константин, что, несмотря на все, я люблю тебя. Не знаю, до какой степени простирается моя любовь к тебе, но знаю, что все, что я услышу о тебе такого, чего бы не желал о тебе слышать -- искренно огорчит меня, а все, что желал бы слышать о тебе -- искренно порадует меня. Я уверен, что, долго не видавшись, при свидании, каждый из нас удивится, что обрадовался другому больше, чем думал... Крепко, крепко жму твою руку, мой добрый и благородный Константин, и не прошу тебя о любви и дружбе, будучи в них так уверен, что не поверил бы самому тебе, если бы ты вздумал меня разуверять <в н>их. Если тебе покажется так -- не верь себе, а я давно уже не верю себе в подобные минуты. Для меня враждебность стала любовью, и только равнодушие к человеку есть необманчнвый признак, что я его не люблю. А к тебе я очень неравнодушен, потому что часто остервеняюсь против тебя. Что делать! -- Я люблю по-своему.
   Уведомь меня подробнее о впечатлении, которое произвела моя статья об "Очерках" Ф. Н. Глинки3. Твое известие о неблагоприятности этого впечатления обеспокоило меня, как опасение за успех подписки на журнал, во всех других отношениях порадовало. Лишь бы не смотрели равнодушно, а бранить -- с богом: это доказательство действительности идеи и некоторым образом моего служения ей. Сперва посердятся, а там и помирятся: это всегда так бывает. Как моя статья кажется тебе? Бога ради -- правду без оговорок. Приехавши в Питер, я увидел, что еще не умею писать -- надо переучиваться, и я переучиваюсь. Никогда не сознавал я так ясно поверхности и недостатков своих писании, как теперь. Пребывание в Питере для меня тяжело -- никогда я не страдал так, никогда жизнь не была мне таким мучением, но оно для меня необходимо. Я бы желал и тебе пожить в этой отрицательно-полезной сфере. Какова Боткина статья о музыке?4 Когда я прочел ее, мне стало грустно за свои статьи. Панаев от нее без ума, читал ее другим раз пять и выучил наизусть. 1 No "Отечественных записок" интересен. Стихотворения все знакомые тебе, кроме Лермонтова. Каков его "Терек"? Дьявольский талант! Присылай нам своего, только с условием sine qua non {без рассуждений (лат.). -- Ред.} -- отдавай переписывать. Я привез с собою в Питер твою статью о Шиллере и отдал Краевскому5. Так как для "Литературной газеты" она велика и серьезна, под отделы "Отечественных записок" не подходит, то Краевский и хотел ее поместить в "Смеси" 1 No и отослал в типографию, но получил обратно с уведомлением, что ни один наборщик не в состоянии разобрать в ней ни единой буквы. В 1 No "Отечественных записок" моих две статьи -- о "Горе от ума" и о Менцеле (эта поизуродована цензурою, а в начале ее NB первая оплеуха Сенковскому, 2-я Надеждину, а третья Гречу, который на своих публичных чтениях тешил публику фразами из моей статьи, как образчиками галиматьи) 6. Рецензии почти все мои, и одна из них, о "Критических очерках" Полевого, почти в 1 1/2 листа7. Если пропустят, то уверен, что последняя не только понравится тебе, но и приведет тебя в восторг. Bora самого ради, уведомь меня тотчас же, какое произведет впечатление статья о "Горе от ума" на Гоголя. Я что-то и почему-то не ожидаю хорошего,-- но во всяком случае не церемонься: надо все знать8.
   Радуюсь твоей новой классификации -- Гомер, Шекспир и Гоголь, но и дивлюсь ей. Куда же девался Гете? О, юноша! пылка душа твоя, и я люблю ее прекраснодушную пылкость! Вот мы и сошлись с тобою; только у меня на месте Гоголя стоит Пушкин, который всего поглотил меня и которого чем более узнаю, тем более не надеюсь узнать. Это Россия и единственный русский национальный поэт, полный представитель жизни своего народа. Да, велик Гоголь, поэт мировой: это для меня ясно, как 2X2=4; но... Пушкин... Впрочем, надо еще подождать. Эти вещи трудны для выговаривания. Впрочем, личное знакомство с поэтом лучше знакомит с его творениями или, по крайней мере, усугубляет наслаждение превозносить его.
   Интересно мне знать, что ты скажешь о Ломоносове. Уж верно не то, что говорят и что не стоит быть говоримым. По крайней мере со стороны его влияния на словесность я крепко усумнился. Говорят, что он в литературе -- Петр, а мне кажется, что даже и не Меншиков9.
   Видел Крылова10 и, признаюсь, с умилением смотрел на этого старца-младенца, о котором можно сказать: "сей остальной из стаи славной"11. Видел Жуковского в тот вечер, как на него все напали за намерение продать Гоголя Смирдину12. Жуковский -- это воплощенное прекраснодушие. В делах жизни он даже и не юноша, а меньше, чем ребенок. Во внутренней жизни он юноша, и я глубоко уважаю его юношество.
   Портрет кн. Одоевского во "Сто литераторов" -- еще под сомнением. По крайней мере, он отрекся при мне от согласия. Чуть ли это не штучка подлеца Полевого. Успокой Николая Филипповича13, которому, кстати, и поклонись от меня. Да, пожалуйста, дай ему знать, что в "Литературных прибавлениях" писал о его повестях не я, а Межевич. Я таких пошлостей не писывал. Уж если бы лукавый дернул сподличать, то все не так глупо14.
   Мой искренний поклон Сергею Тимофеевичу. Верь, Константин, что я уважаю твоего отца искренно, хотя он, как мне кажется, и предубежден против меня15. Что нужды! Я рад, что мои предубеждения против него кончились. Наши лета и понятия разнят и рознят нас, но я тем не менее уважаю его за верное чувство поэзии и за добрый и благородный характер. Да, в Петербурге таких людей не много. Поклонись от меня Гоголю и скажи ему, что я так люблю его, и как поэта и как человека, что те немногие минуты, в которые я встречался с ним в Питере, были для меня отрадою и отдыхом. В самом деле, мне даже не хотелось и говорить с ним, но его присутствие давало полноту моей душе, и в ту субботу, как я не увидел его у Одоевского, мне было душно среди этих лиц и пустынно среди множества.
   М. С. Щепкину, подлецу Митьке, храбрым капитанам, Платонику и Старику, словом всему запорожскому семейству, правь челобитье великое и не жалей лба16. Если бы ты был сильнее Митьки, я бы попросил тебя прибить его за то, что не пишет ко мне. Кланяйся всем, кто помнит меня. Жму твою руку и обнимаю тебя.

Твой неистовый Виссарион.

   Панаев * из рук вон: глуп -- мочи нет. Да ты сам это знаешь. Книга о ноздренном вдыхании у князя есть своя -- и потому не хлопочи17. Отвечай мне поскорее -- буду с нетерпением ждать ответа, да пиши поразборчивее. Лажечников очень доволен твоим знакомством: он очень тебя поправил18.
  
   * <И. И. Панаев:>
   Не простится Виссариону Белинскому ни в том свете, ни в будущем,-- ибо сказано в священном писании, что хула на духа не прощается. Жаль мне его, то есть Белинского... Совершенно сделался внешним, практическим человеком, пустейшим. Кто бы мог подумать это?
   <В. Г. Белинский:>
   (Ей-богу, врет, скотина, по глупости.)
   <И. И. Панаев:>
   Вот что значит мелкая натура и ограниченность...
   <В. Г. Белинский:>
   (Это зависть,-- ей-богу, он глуп.)
   <И. И. Панаев:>
   Целую Вас 1000 раз и буду писать к Вам и Сергею Тимофеевичу на днях. Поблагодарите его за статью.
   "Отечественные записки" вышлются Вам, да ради же бога пришлите "Песнь радости".
  

60. В. П. БОТКИНУ

3--10 февраля 1840. Петербург

   СПб. 1840, февраля 3. Не только давно сбираюсь и сбирался я писать к тебе, мой милый и бесценный Боткин, но уже давно писал и пишу, как покажет это куча вздору, приложенного к сему посланию, и выставленные на ней числа1. Причина моего молчания -- состояние моего духа, страждущее, рефлектирующее, резонерствующее. Да, я не знаю светлых минут, самое страдание посещает меня в редкие, очень редкие минуты. В душе моей сухость, досада, злость, желчь, апатия, бешенство и пр. и пр. Вера в жизнь, в духа, в действительность отложена на неопределенный срок -- до лучшего времени, а пока в ней -- безверие и отчаяние. Не могу завидовать блаженству пошляков -- ненавижу и презираю его всеми силами моей дико-страстной натуры, но, право, часто жалею, зачем я не рожден одним из этих господ: по крайней мере знал бы хоть какое-нибудь довольство и удовлетворение. А теперь не знаю никакого и потерял надежду узнать когда-нибудь. В душе моей отчаяние и ожесточение. Тяжело мне было во время нашей ссоры, когда, заснувши в кругу друзей, я проснулся один, оставленный и презренный кровными2, да, ужасно было это состояние, но оно -- рай, блаженство в сравнении с теперешним. Тогда я еще знал грусть и слезы, был полон надежды на жизнь; теперь... И между тем мое мучение нисколько не однообразно: каждая минута дает мне новое, и потому я не могу кончить к тебе ни одного письма: начав вчера, нынче вижу, что не то. Петербург был для меня страшною скалою, о которую больно стукнулось мое прекраснодушие. Это было необходимо, и лишь бы после стало лучше, я буду благословлять судьбу, загнавшую меня на эти гнусные финские болота. Но пока это невыносимо, выше всякой меры терпения. Знаешь ли что, друг! Мы не так прекраснодушны, как и теперь еще думаем о себе: нас губил китаизм, а не прекраснодушие. Мы весь божий свет видели в своем кружке. Появилось стихотворение, повесть -- восхитили тебя, меня, Каткова и прочих чудаков, а мы и говорим, что публика поняла это сочинение. Чтоб узнать, что такое русская читающая публика, надо пожить в Питере. Представь себе, что двое литераторов приняли мою ругательную, наглую статью о романе Каменского за преувеличенную похвалу и наглую лесть Каменскому и упрекали за то Краевского3. Вот вам и публика! Что же сказать о моих дельных статьях? Для кого они пишутся? Что же сказать о моем нелепейшем и натянутом вступлении в разбор брошюрок о Бородинской битве, которым все восхитились?4 Дорого дал бы я, что<бы> истребить его. Китаизм хуже прекраснодушия. Клюшников когда-то сказал, что дельная статья должна научить незнающего и удовлетворить знающего. Учить я вас никогда не мог, но сам многим вам обязан, но иногда удовлетворял вас: теперь и этого не ждите. Со 2 No "Отечественных записок",
   то есть с статьи о Марлинском5, пишу не для вас и не для себя, а для публики. Собственное удовлетворение и ваш восторг отныне -- доказательство, что статья неудачна. Тебе жестоко не понравилась моя статья о Лажечникове в "Наблюдателе";6 вот такие-то статьи и буду писать. Их будут читать, и они будут полезны; а я чувствую, что совсем не автор для не многих7. Вообще, если бы я побывал у вас, вам показалось бы, что нюхнул петербургского душку и захватил его холодку, но вы ошиблись бы: я только поумнел, хотя от этого стал не счастливее, а несчастнее. Самая убивающая истина лучше радостной лжи: я глубоко сознаю, что не способен быть счастливым через ложь, какую бы ни было, и лучше хочу, чтобы сердце мое разорвалось в куски от истины, нежели блаженствовало ложью. Жаль, что я прежде не знал этого: многих глупостей, о которых тяжело вспомнить, не сделал бы я.
   Боткин, я расстался с тобой ледовито-холодно, и в Питере ты долго был для меня абстрактным понятием и холодным воспоминанием. Много ты сделал для меня -- я это видел; но до всего этого мне не было никакого дела, как будто и не относилось ко мне. Для меня было все равно -- ехать и не ехать, умереть и жить, похоронить тебя или видеть живым. Мне кажется, что я и не помирился с тобой, что оскорбление только было парализировано во мне, но не умерло. Дружба мне представлялась чувством холодным -- обменом тщеславия, результатом привычки, пустоты, праздности и эгоизма. Мало того: дружба сделалась мне ненавистна, и я не мог затаить от себя чувства удовольствия, что ни тебя и никого из наших не увижу. Да, мой Василий, есть раны глубокие, после которых долго остаются шрамы. Но вот 15 декабря я обедал с Панаевым и Языковым у Заикина, и так как я только что получил 12 No "Отечественных записок", то и захватил его с собою. После обеда Панаев прочел вслух твою статью8 -- и все во мне воскресло, и я вновь принял тебя в себя, и как будто кора спала с меня, мне стало и легко и больно, как выздоравливающему. Панаев читал с неистовым восторгом (дня в два после он перечитал ее человекам десяти и знает наизусть), а Заикин, слушая, плакал. В самом деле, какая глубокость мысли и как поэтически и определенно выразилась она! Вот как надо писать! Мне было и больно и стыдно за мои бедные статьи -- сии инфузории, никогда не возвышающиеся до выразительного определения. Но черт с ними; дело в том, что с той минуты и до сей не было дня, чтобы душа моя не чувствовала тебя в себе и что ни просится из нее вовне -- все просится к тебе. Может быть, тут много значит и мой эгоизм, но как бы то ни было, только я ясно сознаю, никого я так не любил, как тебя, и ни к кому ближе не хочется мне быть. Уж сколько раз сбирался я писать к тебе, но неопределенность моего положения, множество работы и душевный ад. при апатии и лености, мешали. Ах, Боткин, Боткин, полетел бы к тебе хоть на минуту, поговорил бы хоть часок -- легче было бы жить в Питере после того. Бога ради, что твои дела? Ни слуху, ни духу. О старике9 не хочу говорить ни слова. Решение Александры Александровны благородно, и я за него только больше уважаю ее, но еще стал бы больше уважать, если бы оно переменилось на другое, новое10. Что смотреть на комедии этих людей, не стоящих ни любви, ни доверия, ни уважения, ни сострадания, ни даже -- презрения. Это меня убьет -- пустая фраза из мещанской мелодрамы: живущи, их черт не убьет. И Панаева мать грозилась умереть, однако ж живет и верно переживет и сына и невестку11. Виделся я с Герценом: хороший человек, но в Питере ему не так будет скучно, как мне. Кланяйся ему12. Ты познакомился с С. -- Кланяйся ему да выпроси у него мои глупые письма, если он не сделал из них приличного употребления, боясь жесткости бумаги13. Кланяйся им всем. Да что ты, шут куриный, прислал мне недоконченную поэму и стихи на Нелепого14 (коего облобызай с подобающим чувством -- в Питере таких чудаков нет); ты знаешь, какой я охотник до таких штук. Высылай мне статью о Риме15 -- очень нужна, да нет ли чего для "Отечественных записок"? Кланяйся милому Грановскому. Нельзя ли и ему утешить меня дружеским посланием строк в двадцать? А что ж его статья для "Отечественных записок"? Стыдно ему не принять участия хотя и в глупом, но благом деле! А что Редкина посул? Хорошенько за бока шепелявого профессора: он обещал, а Краевский низко бьет челом16. Нет ли чего от Станкевича и о Станкевиче? Перестал ли дичить Катков? Умоляй его делать для "Отечественных записок", да и делать не для немногих. Вот навязал же черт страстишку. Будь я богаче Ротшильда -- не перестану писать не только больших критик, даже рецензий. Как мне ни тяжело, но работаю даже и без рефлексии -- худо ли, хорошо ли -- но перо трещит, чернил не успеваю подливать, бумаги исходит гибель. Видно, уж так бог уродил, и потому вышел урод -- физический и моральный. Статья моя о Менцеле искажена цензурою, особенно место о различии нравственности и морали -- недостает почти страницы, и смысл выпущен весь17. Ах, други, други, вы в Москве, а я черт знает где. Если б и приехал я в Москву, то убежал бы только от Петербурга, а не от себя. Один, один! Ни утла в мире, ни сердца родного -- страшно. Если умереть легко, значит ни с чем не расстаться, расставаясь с жизнию -- нигде так не легко умереть, как в Питере. Ах, если бы деньги -- уехал бы за границу, чтобы поскучать и там для разнообразия. Кстати о деньгах: мне перед тобою крайне совестно, но это вина обстоятельств и Питера). Вероятно, я скоро получу от Краевского мои 2000 за прошлый год -- тогда с тобою с первым расквитаюсь.
   И в Питере есть люди, но они слывут дураками, и мне кажутся колонистами. Истинное мое утешение -- Языков. Дивная натура, каких мало не только в Питере, но и в божьем мире. По развитию он решительный нуль передо мною, но перед его натурою я уничтожаюсь меньше, чем до нуля. Впрочем, о нем нельзя писать -- и в разговоре немного скажешь -- надо его видеть. Чудак единственный, один из тех людей, которые и в глупостях велики, сами того не зная. Без него мне хоть умирать -- и только с ним я знаю иногда божественные минуты. Я для него был истинным откровением, как толчок к пробуждению; он для меня -- непосредственное откровение. Почему-то ужасно любит тебя и мечтает о знакомстве с тобою, как бог знает о чем. А когда прочел твою статью,-- бредит тобою. У него душа музыкальная, слух дьявольски верный -- споет тебе, что угодно, только бы раз услышать; а между тем для музыки сделал он меньше, чем я для немецкого языка. П<анаев> прекраснодушничает -- Москва была для него откровением. В его душе много сил, натура богата элементами, но пока он черт знает что -- инфузорий. Плохо было наше развитие и воспитание, но его во 100 раз хуже. Заикин -- вот человек, который оказался таким, каким его и подозревать нельзя: глубокая натура, душа музыкальная, нежная, способность страдать бесконечная, скромность донельзя. Жаль, что я не узнал его прежде, жаль, что и ты не знал его. Кстати: я живу у него. Чудак зовет меня в Берлин, предлагая все, что для этого нужно: сверх души и сердца, необходимое обеспечение на время пребывания. Но мне нельзя и думать об этом.
   Брат Мишеля18 чудный малый. Вот такого прекраснодушия нельзя не любить: в нем все -- и до женственности милая непосредственность, и огненная душа, кипящая избытком мужеских сил, и деятельное стремление к истине, и скромность, отсутствие всяких претензий. Разумеется, что наши лета и положения не могут допустить дружбы и даже близкой приязни -- я уж взрослый, хотя и искаженный человек, он дитя, хотя и обещающее дивное мужество, но мне с ним приятно проводить время, и он никогда не бывает мне в тягость. Я говорю с ним о Прямухине и о всем принадлежащем к нему: в душе возникают образы, прошедшее оживает -- и душе и больно и сладостно. Боткин, что они, как они, они, вечно живые и незабвенные для меня?19 -- Что Варвара Александровна? Нет, черт возьми, и мне жизнь дала кое-что: кто знал их, тот не напрасно жил.
   Кстати. Мысли мои об Unsterblickeit {бессмертии (нем.). -- Ред.} снова перевернулись: Петербург имеет необыкновенное свойство обращать к христ<иянств>у. Мишель -- погладь его по курчавой голове -- много тут участвовал. Нет, объективный мир -- страшен, и мы с тобою скоренько порешили важный вопрос. Но об этом зри письмо к Каткову, которое сей странно аттестующий себя юноша получит вскоре после сего послания к тебе, равно как Кудрявцев и Клюшников20, о каковой радости и извести. Письмо мое покажи Кудрявцеву. Страстно люблю сего поэтического юношу, и мою любовь он делит с Кольцовым, хотя та и другая не похожи друг на друга. Ей-богу, мочи нет, как люблю обоих. К последнему тоже скоро пишу. Богатырь, да и только -- каков его "Хуторок"?21 А каковы Лермон<това22... Далее часть текста отрезана>
  

Февраля 9.

   Вот тебе, Боткин, и интервал -- с 3 числа скачок на 9. Это очень верно характеризует мою жизнь и состояние моего духа (впрочем, теперь во мне духа нет ни на грош). По крайней мере, ты и из этих скачков увидишь, что я не писал к тебе не по равнодушию к тебе и беседовал с тобою чаще, нежели ты предполагал. Итак, о Лермонтове. Каков его "Терек"? Черт знает -- страшно сказать, а мне кажется, что в этом юноше готовится третий русский поэт23 и что Пушкин умер не без наследника. Во 2 No "Отечественных записок" ты прочтешь его "Колыбельную песню казачки" -- чудо! А это:
  
   В минуту жизни трудную,
   Теснится ль в сердце грусть,
   Одну молитву чудную
   Твержу я наизусть.
   Есть сила благодатная
   В созвучьи слов живых,
   И дышит непонятная
   Святая прелесть в них.
   С души как бремя скатится,
   Сомненье далеко --
   И верится, и плачется,
   И так легко, легко!
  
   Как безумный, твердил я и дни и ночи эту чудную молитву,-- но теперь я твержу, как безумный, другую молитву:
  
   И скучно, и грустно!.. И некому руку подать
             В минуту душевной невзгоды!..
   Желанья!.. Что пользы напрасно и вечно желать?
             А годы проходят -- все лучшие годы!
  
   Любить... Но кого же?.. На время не стоит труда,
             А вечно любить невозможно.
   В себя ли заглянешь? -- там прошлого нет и следа:
             И радость, и мука, и все там ничтожно...
  
   Что страсти? -- Ведь рано иль поздно их сладкий недуг
             Исчезнет при слове рассудка;
   И жизнь, как посмотришь с холодным вниманьем вокруг,--
             Такая пустая и глупая шутка...
  
   Эту молитву твержу я теперь потому, что она есть полное выражение моего моментального состояния. Поверишь ли, друг Василий,-- все желания уснули, ничто не манит, не интересует, даже чувственность молчит и ничего не просит. А дня через два надо приниматься за статью о детских книжках, где я буду говорить о любви, о благодати, о блаженстве жизни, как полноте ее ощущения, словом, обо всем, чего и тени и призрака нет теперь в пустой душе моей24. Полнота, полнота! Чудное и великое слово! Блаженство Ее в абсолюте, а в полноте, как отсутствие рефлексии при живом ощущении в себе того участка абсолютной жизни, какой дан тому или другому человеку. Что моя абсолютность: я отдал бы ее, еще с придачею последнего сертука, за полноту, с какою иной офицер спешит на бал, где много барышень, и скачет штандарт. Скучно, друг Тряпичкин,-- ей-богу, хоть бы умереть25.

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   Вчера я провел приятно вечер с Н. Бакуниным -- вот, брат, человек-то -- ай, ай! Какое глубокое, бесконечно глубокое чувство -- нет, не простое чувство, а вкус изящного! Я читал ему и то, и другое -- наконец "Илиаду" -- каждое слово, каждый стих отражается у него на лице. Мало на свете людей с таким глубоким чувством изящного -- он создан для искусства, а между тем страстно любит и математику, всем интересуется и всем занимается -- вот полная-то натура! Я с ним очень хорошо сошелся, и он всегда у меня -- гость вовремя. Я не налюбуюсь его прекраснодушием -- оно в тысячу раз выше нашего <...> болезненного и мальчишеского прекраснодушия и даже нашей жалкой действительности -- в нем сила, могущество, жизнь, деятельность, оно полно, целостно, в нем слово и дело -- одно и то же, оно не кричит и не говорит о себе, не вытаскивает из себя ощущеньиц, чтобы, лежа, большею частию, на кровати и думая об испанских делах, рассматривать его и копаться в этой дряни. Да, брат, мы так искажены и исказнены, что страшно подумать. Ты всех меньше -- я всех больше, у тебя оправдание в семейных обстоятельствах, в зависимости от аршинного взгляда на воспитание и жизнь, от амбара -- у меня ни в чем или черт знает в чем. Мишель еще счастлив пока -- у него пресчастливая способность по воле своей давать цвет и смысл действительности, он забрал себе в голову, что его спасение не деятельность, не мир с действительностью, а Берлин, и скачет туда уже лет пять по воздушной почте26, ни разу не подумавши в это время о приобретении средств службою или уроками. Точь-в-точь, как я, с тою только разни* цею, что я давно уже перестал ожидать перемены в судьбе от чуда, а в действительности вижу -- гибель свою:
  
   Не расцвел и отцвел
   В утре пасмурных дней...
   . . . . . . . . . . . .
   Я увял, и увял
   Навсегда, навсегда,
   И блаженства не знал
   Никогда, никогда27.
  
   Да, он настал -- грозный расчет с действительностию -- завеса с глаз спадает, леность сделалась второю натурою, апатия -- нормальным состоянием, а восторг, проникновение истиною -- болезненным состоянием. Внешние обстоятельства ужасны, и мысль о них жалит душу, а поправить их нет возможности: чуда не свершается, а обыкновенным образом -- надо сперва переродиться. Что ж в будущем? Одно: слезы и грусть о потерянном рае. и то минутами, и всегдашнее сознание своего падения насмерть, на вечность. Жизнь -- ловушка, а мы -- мыши, иным удается сорвать приманку и выйти из западни, но большая часть гибнет в ней, а приманку разве понюхает. Говорят -- и мы с тобою эта порешили перед моим отъездом в Питер,-- что она -- einmal {во-первых (нем.). -- Ред.}, глупая комедия -- черт возьми. Будем же пить и веселиться, ее л а можем, нынешний день наш -- ведь нигде на наш вопль нету отзыва!28 Живет одно общее, а мы -- китайские тени, волны океана -- океан один, а волн много было, много есть и много будет, и кому дело до той или другой? Да, жизнь --игра в банк -- сорвал -- твое, сорвали -- бросайся в реку, если боишься быть нищим. В жизни одно мгновение -- пропустил его -- и поезжай в Берлин по воздуху или живи в Питере да глотай кровавые слезы, или просто зевай протяжно и с чувством. С Н. Бакуниным ничего этого не будет -- другая натура, чем у нас, и со мной к братом он сошелся, когда уже мы не опасны для него, а только полезны, как гибельный пример. Наше общее прекраснодушие, и в особенности Клюшникова и Аксакова, произвели во мне бешенство, болезненную ненависть против прекраснодушия, по пример Н. Бакунина мирит меня с прекраснодушием, как с великим моментом души, без которого жизнь -- офицерство или чиновничество. А между тем Н. Бакунин любит свое офицерство, любит военную службу и хочет навсегда остаться в ней. Разумеется, я это одобряю и поддерживаю его в благородном решении. Горе человеку, если он ограничивается быть только человеком, не присовокупляя к этому абстрактному и громкому званию звания ни купца, ни помещика, ни офицера, ни чиновника, пп артиста, ни учителя. Общество покарает его. Эту кару я уже чувствую на себе. Если можно будет приткнуться к какому-нибудь официальному журналу, непременно сделаю это. Оно даст и имя в обществе, без которого человек -- призрак, и обеспечит на случай болезни и на другие случаи. Ах, Боткин, всею сплою любви, которой так много дала тебе твоя благодатная природа, действуй на Каткова: он лучше всех нас, но в нем много нашего, то есть лени и мечтательности, рефлексии и фразерства. Да не погибнет он, подобно мне и другим, от недостатка деятельности, от развычки от работы, которая есть альфа и омега человеческой мудрости, камень спасения и условие действительности. Кто не может быть без дела, для кого день есть задача -- сделать то-то и столько-то,-- только тот имеет право сказать, что как ни мерзка жизнь, но и в ней есть много прекрасного: в наших те устах -- это фраза.
   Что Мишель? Что его воздушный Берлин? Я слышал, что он (не Берлин, а Мишель), наконец, разделался с своею глупою невинностью, с которою носился, как курица с яйцом. Я этому несказанно обрадовался. Это первый шаг его в действительность, и это, верно, придаст ему мягкости и человечестности, отняв сухость и жесткость. Сущность и поступки -- великое дело! На дне их <...>, на дне их -- мудрость. Автор "Ундины"29 -- девственник, и потому в делах жизни он глуп, как сивый мерин, и в лице его есть оттенок идиотства, похожий на Ал. Карташевского. Плетнев (человек, который живет, чтоб шутить и острить, и шутит и острит, чтоб жить)30 говорил ему при мне о Софье Астафьевне, но он ничего не понял. Когда же при Жуковском острят насчет <...> -- он это любит и идиотски ухмыляется.

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   Скажи Мишелю, что Краевский уж не раз спрашивал о его статье -- что ж она?31 Что он ее не шлет, и кончил ли он прочие, без которых она не имеет целости? Выручили ль вы от Мочалова "Ричарда II"? Торопи Кронеберга выправить V акт. Если только цензура пропустит, "Ричард II" непременно будет напечатан или в "Отечественных записках", или в "Пантеоне", и переводчик получит следующее ему. Нет ли у него еще чего шекспировского32 -- в Питере все можно сбыть и пустить в ход. Питерская цензура очень добра, но и глупа -- из рук вон. В статье о Менцеле место о нравственности и морали лишено смысла. Стихи Лермонтова и Красова не пропущены в "Отечественных записках", а в "Литературной газете", у которой другие цензора, пропущены33. В 2 No "Отечественных записок" стихи Клюшникова "Знаете ль ее?" напечатаны под названием "Поэзия", ибо без этого условия цензура их не пропускала, а как они были уже набраны, то и нельзя было их выкинуть, ибо для Краевского минута замедления для журнала -- гибель.

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   Я видел "Роберта"34. Постановка -- чудо, смешно и вспомнить о московском "Роберте". Петров (Бертрам) великий актер, он сыграл передо мной роль свою, как гениальный актер. Но голоса у него для нее не хватает -- это уж и я тотчас понял. Если б ему голос дурака Лаврова, я не пропустил бы "Роберта" ни разу. Сам Роберт (Леонов) скверный певец и гнусный актер -- тоже и Изабелла (Соловьева). Обо всем этом я было написал в. 4 письме к вам35, да Волконский (министр и цензор рецензий о театре) зачеркнул. Видел "Стрелка" на немецком театре36. Славно! Певцы вместе и актеры. Стрелка выполняет Ферзинг, Каспара -- Брейтинг. Когда последний только готовился петь, мне становилось страшно -- какая могучесть и энергия! Заикин прежде был против Бреитинга, но теперь без ума от пего. Я его познакомил с "Стрелком" -- и он с ума было сошел. Агату выполняла Кунт -- хорошая певица, но гнусная актриса, с манерами и штуками во всей отвратительности своей кухонной и колбаснической национальности. Постановка умная. Черт очень хорош -- он в красном плаще, без всяких московских штук, прост и хорош. Хоры недостаточны, по малочисленности хористов. Вообще я немножко подвинулся к музыке, в "Роберте" не дремал, по от многого был в удовольствии, сам не зная почему. Тут много виноват Заикин -- эта музыкальная душа. Бывают минуты, когда душа моя жаждет звуков. Дорого бы я дал, чтобы послушать в твоей комнате "Leiermann";37 мне кажется, я зарыдал бы, если бы, проходя по улице, услышал под окном его чудные, грациозные звуки, которые глубоко запали в мою душу. Когда Одоевский при мне заиграл Лангерову "С богом в дальнюю дорогу" -- во мне душа заболела тоскою и радостью, услышав знакомые и милые звуки38. Пожми руку доброму Лапгеру. Я часто вспоминаю об нем. Хотя между нами и мало общего, но я все-таки считаю его в числе людей, за встречу с которыми на жизненном пути должен благодарить бога. Расцелуй его мальчиков, да кстати уж и девочку. Купи им гостинца и скажи, что это Белинский прислал им из Петербурга. Что Кирюша? Что его поездка в Питер? Вообще, что и как он?

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   Тальони видел раз -- в "Хитане", и больше видеть нет ни охоты, ни сил39. Да, хорошо, лучше Санковской; много грации, но, выходя из театра, ничего не вынесешь. Только Петербург может сходить с ума от подобной невидали.

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   Милому Грановскому поклон и поклонение. Это человек с волею, и наш брат должен ему кланяться. Захотел и сделал и теперь знает, что и кто он, для чего живет и для чего нужен. Его не испугала зависимость от казны, которая пугает только слабовольных мечтателей. Каким бы образом ни достигнуть цели, лишь бы достигнуть, и кто рожден для науки, тот найдет средства. Вот и Н. Бакунин будет в Берлине на казенный счет -- и прекрасно. А уж поеду с тобою, Боткин, только не в Берлин (на кой мне его черт! пропадай он), а в Италию -- там чудное небо, чудная земля, великие создания древнего языческого искусства, чудные женщины и прекрасный виноград -- туда, туда!

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   Ах, Боткин, Боткин! с какою бы радостию побыл я хоть минутку в милой Москве, послушал бы царственного гула ее колоколов, взглянул бы на святой Кремль и на бодрых московских людей с бородками. В Питере и простой народ не лучше чухой, офицеров и чиновников. Извозчики идиоты, погоняют лошадей кнутьями, те бросаются в сторону -- ни ловкости, ни удальства -- рожи гнусные. А если б часок посидеть в твоей комнате -- святители! Но увы! Мне долго не видать Москвы, ради долгов -- каково встретиться с одним Андросовым -- скоро ли я буду в состоянии возвратить ему его тысячу40.

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   Кланяйся всем, кто помнит меня. Поклонись Петру Кононовичу и Анне Ивановне и поблагодари их за ласку и радушие ко мне. В Питере, брат, этого не встретишь и научишься ценить. Равным образом засвидетельствуй мое глубочайшее почтение à mademoiselle Marie Botkinne и поцелуй у нее -- ручку, а о большем, по свойственной мне деликатности и стыдливости, просить не дерзаю, но предоставляю исполнить твоей догадливости. Какая милая девочка -- я часто вспоминаю о ней. Кстати: я, брат, влюблен в -- Ревекку Вальтера Скотта, которой изображение смотрит на меня с моей стены41, кроткое, святое, девственное, прекрасное, как сама красота и красота романтическая. Боже мой, что если бы увидеть в натуре такое божественное лицо -- ай, ай, святители. Непременно куплю и пришлю тебе. Не шутя, не могу смотреть на нее без грусти, любви и почти без слез. Но это все вздоры, я уж больше не мечтаю -- потребность жизни, не находя себе исхода и удовлетворения, пожрала сама себя -- и я пуст, как распитая бутылка, и в утешение себе повторяю:
  
   Любить? но кого же? на время не стоит труда,
             А вечно любить невозможно42.
  
   Да, хорош виноград, да зелен...43

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   Посылаю тебе письмо это, не перечитавши. Особенно стыдно и подумать о перечтении старого, а в нем наговоренного резонерства о Каткове. Дай бог, чтобы это было последним резонерством на чужой счет. Все, что выходит из жизни, всему тому я способнее завидовать, нежели осуждать. Глупости Каткова выходят из его богатой, кипящей силами натуры. Он будет человек -- это так же верно, как и то, что я уже не буду человеком. У Панаева родилась дочь, и я при сем случае сказал с тоскою следующую остроту: вот и Панаев уже отец, а я все еще святой дух.

Твой горемыщный Виссарион.

   10 февраля
   Завтра письмо пойдет к тебе.
   Бога ради, пиши ко мне поскорее и побольше, ты этим дашь мне несколько блаженных минут.
  

61. В. П. БОТКИНУ

18--20 февраля 1840. Петербург

СПб. 1840, февр. 18 дня.

   Вдали, чуть слышный для вниманья,
   День озабоченный шумит,
   Сквозь смутный гул и восклицанья
   Тяжелый молоток стучит.
   Там человек так постоянно
   С суровой борется судьбой,--
   И вдруг с небес к нему нежданно
   Слетает счастие порой1.
   Так нежданно, мой добрый и милый Василий, слетела и ко мне минута счастия вместе с письмом твоим!2 О, тысячу раз благодарю тебя за него: оно несколько вывело меня из мучительнейшей животной апатии, из душевной апоплексии, оно даже несколько пробудило во мне грусть и страдание, и сухие и высохшие глаза вновь познакомило с слезами, источник которых давно уже был окаменей ожесточением. Ах, милый и подлый Василии -- ты знаешь меня, хорошо знаешь, и умеешь играть на расстроенной балалайке прекрасной души моей. Фантазия и фантазии -- подлые, они опять проснулись, чтобы сладкою отравою своею мучить искаженную, болезненную натуру... А все ты, чтоб тебе во сне приснился черт или Булгарин! Еще раз благодарю тебя, мой милый и мой мерзкий Боткин! Твое письмо, полное тобою, благоухающее букетом твоей чудной натуры, всей составленной из любви, цветов и звуков, всколыхало толстую кору льда на тинистом и мутном болоте души моей -- льдина прорвалась в некоторых местах, и скрытые под нею волны радостно зашумели навстречу живительным лучам весеннего солнца. Какова аллегория! -- уж и видно, что г. "сочинитель" риторике учился. Не шутя, Боткин, я ужасно сердит на тебя за твое письмо и желал бы с тобою увидеться, чтобы больно прибить тебя за него, однако ж с условием, что ты меня не побоишься и впредь таких подлых писем писать не откажешься. Выписываю лучшее место из твоего послания (я заучил его наизусть -- черт знает, откуда и намять взялась), а в скобках делаю приличные остроумные замечания. "Ну, дражайший и чудовищный (оно не совсем вежливо и не совсем совместно с моим достоинством, а приятно и усладительно) Виссарион (отчего же отчество пропущено -- если б я был чиновником и наслаждался удовольствием видеть тонкое обращение с собою начальника отделения -- то осердился бы насмерть и рассорился с тобою), был я в Харькове (хорошо! продолжайте -- нам приятно), видел Кронеберговых3 (ай! ай ничего! ничего! молчание, молчание!4) -- а что? ты краснеешь? (в точности исполнено) или потерял ты наконец и способность краснеть при имени Софьи (врешь, подлец, не расточил, а приумножил, и смело краснею от всех женских имен, какие только можно найти в московских и киевских святцах, в месяцослове, то есть в календаре, и во всех возможных "оракулах", то есть гадательных книгах), как во время оно (в этом отношении для меня нет времени: дураком родился, дураком и умру) -- другие образы сменили в воображении твоем добродушную, умненькую девушку (вот, брат, и не угадал: за неимением новых, я верен старым, даже и не виданным мною). А она? (святители!) Видишь ли (еще спрашивает подлец -- ну как не видеть: на что другое, а на глупости я очень зряч), хорошее сердце женское (слог не хорош) лучше сердца мужчины, оно долее хранит в себе память о людях (ей-богу, еще покраснел). Хотя Софья (какое прекрасное имя -- оно возбуждает во мне особенное стремление к любомудрию) и никогда не видела тебя (впрочем, это очень выгодно для нее и для меня: благодаря этому обстоятельству, она не перестанет читать моих статей и временем думать об авторе, а я вновь не пройду сквозь уже неоднократно пройденные мытарства оскорбленного самолюбия), но она тебя хорошо знает (то есть с моей лучшей стороны и притом заочно), любит расспрашивать о тебе (Боткин, о подлая предательская душа! Где же честь, где же совесть!). Ей-богу, Боткин, последние волосы повстреплю из твоей лысины (кстати о лысине -- возрадуйся: Панаев скоро будет тебе братом),я уже не говорю о том, как она любит читать статьи твои (ну уж, брат, тут и не знаю, что сказать тебе: просто подлец, да и только!). Вообще имя твое в Харькове, право, лучше известно, нежели в Москве, а все через добрую Софью и Кульчицкого (спасибо и ему, но ей... молчание, молчание!), и "Наблюдатель" считает Софья просто своим Журналом, журналом своих близких людей, и не может без грусти вспомнить, что больше уж нет "Наблюдателя". (Боткин, Боткин, ей, замолчи, а то ей-богу, прибью; ну, сам посуди, к чему такая болтливость -- мы с тобою люди солидные.) Видишь (да вижу, вижу, хоть, право, лучше бы не видеть) , тебе не даром хотелось ехать в Харьков (о черт возьми! еще нужно повторять, как будто оно и без того там не стоит так!), и я уверен, время, которое бы там провел (о если бы! крыльев, Боткин, крыльев!), было бы одним из приятнейших и вместе us простейших в твоей жизни (верю, подлец, верю! Но зато, к сколько бы резни-то, резни!).
   От Кульчицкого письма не получал5, и ты напрасно упрашиваешь меня отвечать ему: да что я за лошадь такая, чтобы не отвечать человеку, живущему у Харькови?.. Ты, я думаю, знаешь меня -- когда я прочь от глупостей! Напротив, я бегу к ним, напрашиваюсь на них. Что же мне делать, если только одни они еще и дают мне чувствовать, что в жизни не одни гадости, но есть, и даже для меня могло б быть, кое-что и хорошего. Решено! С Кульчицким у меня начинается отчаянная переписка. Разве это не наслаждение -- сидеть в кругу людей, даже и не знающих о существовании Софьи Кронеберг, и краснеть до ушей, как школьнику, при имени какой-нибудь Софьи, а тем наипаче при имени покойного профессора Кронеберга. Вот тебе мое честное слово, Боткин, что через три месяца у Кульчицкого столько будет моих писем, что надолго будет обеспечен дровами. Я готов первый писать к нему. Пришли поскорее его адрес.
   Боткин, что ты со мной сделал -- я просто в экстазе -- все кружится в глазах моих, внутри тревога, и такая приятная! Дитя, дитя, бедное счастием дитя, которое радуется не тому, что у него много игрушек, а тому, что узнало, что есть на свете вещи, которых называют игрушками. Преглупое сравнение -- не вытанцовалось.
   Не утерпел и прочел твое письмо Заикину -- он был удивлен и посмотрел на меня с некоторым родом уважения, что мое имя известно такой девушке, и начал с восторгом описывать ее мне. Да отвяжитесь, господа, что вы ко мне пристали! Я и без того одурел... Боткин, а Боткин -- нельзя ли -- знаешь -- еще несколько строчек -- то есть о чем именно расспрашивали и как, и прочее -- понимаешь -- мне больше сущность и поступки, а я ничего... А? -- пожалуйста. Да смотри, никому не показывай моего письма,-- слышишь ли?
   Тебе не понравилась моя статья в XII No "Отечественных записок" -- я это знал. В самом деле, не вытанцовалась6. А странное дело, писал с таким увлечением, с такою полнотою, что и сказать нельзя -- напишу страницу, да и прочту Панаеву и Языкову. В разбить-то они больно восхищались, а как потом прочли в целом, так не понравилась. Я сам думал о ней, как о лучшей моей статье, а как напечаталась, так не мог и перечесть. Как нарочно, это случилось тотчас после прочтения твоей статьи. Признаюсь в грехе -- я было крепко приуныл. Хотелось мне в ней, главное, намекнуть пояснее на субстанциальное значение идеи общества, но, как я писал к сроку и к спеху, сочиняя и пиша в одно и то же время, и как хотел непременно сказать и о том и о другом,-- то и не вытанцовалось. Теперь я ту же бы песенку, да не так бы спел. Что она тебе не понравилась -- это так и должно быть: ты понимаешь дело и смотришь на него не снизу вверх; но досадно, что и люд-то божий ей недоволен. Зарылись, свиньи, как будто у нас хороших статей -- ешь не хочу; а где они, в каких журналах? Для них и эта должна быть объеденьем. Очень рад, что тебе понравилась статья о Менцеле7. В самом деле, в ней есть целость, и если бы осел Фрейганг не наделал в ней выпусков и не лишил ее смысла на странице 53 и 54 (заметь это),-- она была бы очень и очень недурна. Во многих местах Фрейганг зачеркнул "всеобъемлющий Гете", говоря, что этот эпитет божий, а не человеческий. Вот тут и пиши. С твоим мнением о статье о "Горе от ума" я совершенно согласен: много хорошего в ней, но в целом -- урод. Из нее можно сделать три хорошие статьи, но как одна -- она уродлива. Что ж ты не сказал мне ни слова о моей статейке об "Очерках" Полевого? Ею я больше всех доволен; право, знатная штука. Поверишь ли, Боткин, что Полевой сделался гнуснее Булгарина. Это человек, готовый на все гнусное и мерзкое, ядовитая гадина, для раздавления которой я обрекаю себя, как на служение истине. Стрелы мои доходят до него, и он бесится. Во 2 No "Отечественных записок" я его опять отделал. В "Литературной газете" тоже не даю ему покоя8. Если увидишься с ним в Москве, наплюй ему в рожу и скажи ему, что он подлец и пакостный писака. Питер в восторге от его драматического навозу, и только "Ужасного незнакомца" ошикал9. Статья о Марлинском10 тебе не понравится, но именно такие-то статьи я и буду отныне писать, потому что только такие статьи и доступны и полезны для нашей публики. Но статья о детских книжках -- надеюсь -- будет так недурна, что понравится и тебе: и ты смело можешь сказать, что ты виноват в ней11. В самом деле, если она будет хороша, то потому, что твое письмо воззвало меня от смерти к жизни и что, пиша статью, я перечитывал его, особенно одно место... Смейся, Боткин, оно в самом деле смешно...

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Февр. 19.

   Вчера получил письмо Кульчицкого -- милое письмецо, я от души хохотал. Непременно буду отвечать. Адреса не нужно: я к тебе буду пересылать, а ты будешь приписывать свои этакие разные остроумные примечания. Что касается до твоей записки12 и напоминовения о деньгах,-- то не беспокойся более: вместе с письмом к тебе я отправил письмо к родственнику моему Иванову13, со вложением письма Краевского к Ширяеву, по которому он, Иванов, имеет получить от него, Ширяева, 1300 р. асс., из которых отдаст тебе 700, Вологжанинову 300, П. В. Нащокину 200. Совестно, брат, мне перед тобою, да делать-то нечего. Впрочем, всему виною не я, а безалаберный Панаев. Да скажи Мишелю, что ты получил от меня все свои деньги (700) и что поэтому Панаев уже не обязан отдавать Заикину 100 р., которые Мишель должен Заикину, который теперь крайне нуждается в деньгах.

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   О "Ричарде" Кронеберга я писал к тебе (огромное письмо на имя Грановского -- уведомь поскорее, получил ли ты его):14 он будет напечатан или в "Отечественных записках" или в "Пантеоне". А что тебе не хочется его видеть в журнале, а особою книгою, это, душа моя Тряпичкин, даже и не прекраснодушие, а нечто еще сквернейшее, именно -- москводушие. Ведь ты, верно, для того желаешь видеть "Ричарда" в печати, чтобы его читали и прочли? Знаешь ли ты, что "Макбета", переведенного известным литератором -- Вронченко, разошлось ровно ПЯТЬ экземпляров15. Потчевать нашу российскую публику Шекспиром -- о милое, о наивное москводушие! Да это всё равно, что в салоне, танцуя галопад, говорить с своей дамою о религии; все равно, что в кабаке с пьяными мужиками рассуждать о гегелевской философии! Я того и гляжу, что премудрый синедрион, состоящий из московских душ, вздумает перевести всего Шекспира16 и великолепно издать его для удовольствия российской публики. Смотрите же, господа, печатайте больше -- экземпляров 100 000: российская публика просветится, а вы настроите себе каменных домов и накупите деревень. В Питер бы вас, дураков,-- там бы вы поумнели, там бы вы узнали, что такое российская действительность и российская публика. В журнале она прочтет и Шекспира: за журнал она платит деньги, и за свои деньги читает все сплошь. Русский человек, заплатив за журнал денежки, поступает с ним как с <...>, чтоб деньги не пропадали. Так и в трактирах действует он. Не назови моего сравнения тривьяльным: говоря об эстетическом вкусе и литературной образованности российской публики, нельзя быть тривьяльным, и каких похабств ни наговори о ней,-- ее имя все останется самым похабным словом. Кого она поддерживает, кого любит? Или людей по плечу себе, или плутов и мошенников, которые ее надувают. Чем больше всего взял "Телеграф"?-- Либеральным душком. Чем взял Сенковский? -- Основною мыслию своей деятельности, что учиться не надо и что на все в мире надо смотреть шутя. Русский человек любит жить на шаромыгу. Но главная страсть его -- ко всему запрещенному цензурой. Если бы, например, после суда над Надеждиным17 "Телескоп" продолжался -- у него было бы верных 3000 подписчиков. Пушкин однажды сказал, что вместе с прекращением его запрещенных стихов прекратилась и его слава18. И между тем все наши либералы ужасные подлецы: они не умеют быть подданными, они холопы: за углом любят побранить правительство, а в лицо подличают, не по нужде, а по собственной охоте. Так холоп за глаза только и делает, что ругает барина, а при нем не смеет взглянуть смело. Потом, кого любит наша публика? Греча, Булгарина -- да, они, особенно первый, в Питере, даже при жизни Пушкина, были важнее его и доселе сохраняют свой авторитет. О публичных лекциях Греча и теперь говорят, как о чуде, с восторгом и благоговением. Вот наша публика: давайте же, о невинные московские души, скорее давайте ей Шекспира -- она жаждет его. Нет, переведите-ко лучше всего В. Гюго с братнею, да всего Поль де Кока, да и издайте великолепно с романами Булгарина и Греча, с повестями Брамбеуса и драмами Полевого: тут успех несомнителен; а бедного Шекспира печатайте в журналах -- только в них и прочтут его. Сенковский на эти вещи -- гений, он не даром первый начал печатать в журнале романы и драмы. Он не ошибся в расчете. У кого есть хоть капля ума в голове, тот должен в этом подражать ему.
   Вообще у тебя, Боткин, есть какая-то прекраснодушная враждебность и ни на чем не основанное презрение к литературе и журналу. Если добродушный юноша мучил тебя литературным враньем19, из этого еще не следует, чтобы литература была вздор. Никто так пошло не врет о религии и своим поведением и непосредственностию не оскорбляет ее, как русские попы,-- и однако ж из этого не следует, чтобы религия была вздор. Литература имеет великое значение: это гувернантка общества. Журналистика в наше время все: и Пушкин, и Гете, и сам Гегель были журналисты. Журнал стоит кафедры. За что ж на них сердиться? Разве за Греча и Булгарина? Но это так же нелепо, как сердиться на поэзию и презирать ее за Сумарокова или Бенедиктова.

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   Я очень рад за Кирюшу, что он так хорошо познакомился с Гоголем20. Тем не менее, его надежды на Брюллова едва ли сбыточны. Вы ждете Брюллова на днях в Москву, а он и не думает ехать и, говорят, пьет мертвую. Это обыкновенное явление в Питере, не как в Москве. Кукольник пьяница, Глинка пьяница, Брюллов тоже. После развода с женою он, говорят, ничего не делает и только пьет.

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   О подписи имен под статьями я с тобою совершенно согласен; но не только настаивать, и говорить бесполезно об этом21, Краевский человек теплый, благородный и умный, но он, в некоторых своих убеждениях, упрям, как черт, а характер у него -- железный. Кстати: он низко бьет тебе челом и просит чего-нибудь. Не поленись, Василий. Если такие люди, как ты, не будут ничего делать, так нечего и жаловаться на гнусное состояние нашей литературы. Ну-ко, об Риме-то...22 Ты не получил 1 No "Отечественных записок", на которые подписался, а Краевский выслал тебе даровой экземпляр: неужели ты и того не получил? Уведомь -- вышлем оба.

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   Ты пишешь, что не знаешь звезд моего полушария и что у меня уж верно есть звезда, к которой я порываюсь... Может быть, ты намекаешь на... я помню -- как-то говорил тебе перед отъездом в Питер; но, увы! --
  
   Не сбылись, мой друг, фантазии
   Глупой праздности моей...23
  
   Сначала, было, лукавый подбивал; но, во-первых, я не сделал ни малейшего движения, которое могло бы обратить внимание и показаться хоть несколько странным; во-вторых, я скоро сказал себе "полно" и теперь имею полное право почитать себя raisonnable {благоразумным (фр.). -- Ред.}. Видишь ли, я хорошо воспользовался кровавыми уроками... Но несмотря на то, по болезненности ли и искаженности моей натуры, или по неистовой потребности хоть какой-нибудь любви (для меня лучше чего-нибудь нежели ничего), но только я не лишился надежды когда-нибудь настроить глупостей. Уж, видно, таким родился. Впрочем, об этом ты получишь от меня особое письмо, в котором не будет ничего, чего бы ты уже не слышал от меня, но общность и результат которого будет для тебя грустен, если ты любишь меня24. Это письмо будет ответом на твои слова: "С некоторого времени во мне утвердилась крепкая вера, что ты непременно найдешь себе сочувствующее существо". Ах, Боткин, Боткин, за эту веру я бы сто раз умер за тебя -- в ней живое свидетельство, что ты глубоко любишь меня; но, друг мой, вера -- верою, а действительность -- действительностию; а у меня на этот счет совсем другая вера...

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   Ты говоришь, что я мало развил в себе Entsagung {отречение (нем.).-- Ред.}. Может быть, его и совсем нет во мне. Так как я понимаю его в других и высоко ценю, то недостаток его в себе и считаю ограниченностию, в которой, однако ж, не стыжусь признаться. Кажется, что для меня настает время таких простых признаний. По крайней мере, теперь они для меня очень не трудны. Я этому рад. Вообще я уже много посбавил себе цены в собственном мнении и надеюсь, что скоро сознаю себя тем, что я есть -- без пошлого смирения и пошлой гордости. А может быть, во мне и кроется возможность этого таинственного Entsagung; но как это мне узнать? Вообрази себе мужика, который всю жизнь свою не едал ничего, кроме хлеба, пополам с песком и мякиною, и, пришед в большой город, увидел горы и калачей, и кондитерских изделий, и плодов,-- можно сказать, что у него нет самообладания и человеческой воздержности, если он на эти вещи будет смотреть глазами тигра, с пеною у рта, а захвативши что-нибудь, начнет пожирать с зверскою жадностию, а когда у него станут отнимать, он в бешенстве разобьет себе череп? Как же от него требовать Entsagung? У всякого есть своя история, мой добрый Василий... Ты меня знаешь, и потому не удивишься, что я был в экстазе целый день от мысли, что прекрасное женское существо, где-то далеко живущее, никогда мною не виданное и меня не видавшее, читает излияния моей души, заинтересовывается через них писавшим и расспрашивает о нем... Но, увы! экстаз уже прошел, в душе грусть, в груди страдание, тяжелое и глубокое страдание; но спасибо тебе и за него -- оно все же лучше животной апатии.

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   Статью Кронеберга о "Ричарде" присылай. Когда "Ричард" напечатается, и ее можно будет после него напечатать23. Комедию Шекспира мне очень интересно прочесть, а может и ее тиснем23. (Разумеется, не даром для переводчика.)

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   Круг, в котором я живу -- Панаев, Языков, Заикин. Люди, которые любят меня искренно, которых и я люблю искренно; но дружба -- вещь великая, и историческое развитие -- ее непременное условие. Да, много у меня людей, и людей чудесных, из которых многие далеко лучше меня; но ты один у меня на свете, одна связь с жизнию, без тебя я хуже, чем сирота -- труп между живыми. Умри ты,-- я махну рукою, и доживу свой век без вопросов, без ожиданий и интересов. Разве... но о том нечего и говорить. Кроме же того, тебя мне никто не заменит. Я чувствую это в каждой капле моей крови.

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   Грановский -- человек чудесный. Я понимаю и ценю его вполне. Мало можно встретить таких любящих, задушевных, святых и чистых натур. Я понимаю, что там он ближе всех к тебе. Катков для нас слишком молод, и потому, будучи нашим, он не наш.

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   Февр. 20. Боткин, положи себе за правило никому не читать моих писем и даже никому не говорить о их получении, пока прежде сам не прочтешь. Может бьпь, ты так и делаешь, но на всякий случай мне все-таки хотелось предупредить тебя.
   Твое известие, что Мишель живет уж не у тебя, нисколько меня не удивило: за два дня до получения твоего письма я говорил Заикину, что уж, верно, вы разъезжаетесь, если не разъехались. Ты приглашаешь меня порадоваться, что разумность берет верх и что ты прямо высказал Мишелю, что и пр.27 Признаюсь тебе, что для меня тут мало причин к радости. Я знаю, что Мишель с тобою согласился, может быть, даже лучше и глубже тебя развил головою высказанное тобою из души, обещался действовать сообразно с этим; но поверь, что, как бы он ни действовал, результаты будут все те же. Он все тот же и умрет все тем же, чем был в 37 и 38 годах. Зачем он поехал в Питер? Ни за чем. С чем? -- ни с чем. Приглашая к себе, Муравьевы сделали кислую мину, которую Николай28 тотчас заметил. Надоел ему Муравьев,-- он к 12 часам ночи приезжает в Демутов трактир и посылает к Муравьеву за чемоданом. Разумеется, тот сказал, что это можно будет сделать лучше завтра, чем в полночь -- и лег на постель, с которой его подняли. Переехав к Демуту, Мишель не имел ни копейки денег и ни надежды получить их откуда-нибудь. А между тем это один из самых дорогих трактиров. Нынче познакомившись с Заикиным, завтра просит у него денег, берет их и раз и два и т. д. Что же он делает с этими деньгами? Пьет рейнвейн, в котором отказывает себе Заикин, человек, получающий 15 000 годового дохода. Об извозчиках нечего и говорить: пока Мишель был в Питере, они были в страшном разгоне. В спорах он беспрестанно оскорблял Заикина, так что тот уже и не скрывал от него своей к нему ненависти. К Заикину ходил музыкант Болле, который превосходно знает генерал-бас и контрапункт, но плохой компонист -- бывало, начнет играть что-нибудь свое, а Мишель кричит ему: "Стукотня, стукотня!" Разумеется, теперь этот человек, имеющий огромный круг знакомства, не упускает случая хорошо поговорить о Мишеле. В театр он ходил беспрестанно, а Заикин беспрестанно брал для него билеты. Этот человек так кроток, что против наглости стоять не может и позволит себя ограбить; но он все понимал и только качал головою и пожимал плечами. Живя у Раевского, Мишель издевался над его благоговением к Вронскому -- этому я сам был свидетелем. Заикин говорит, что он увлек и брата и что, когда он уехал, Николая снова нельзя узнать. Однажды, в излиянии самоосклабляющейся откровенности, Мишель сказал Заикину: "Я в Москве был авторитетом". Да, Боткин, все тот же он. Мне до этого нет дела. Я знаю и ценю его истинную сторону, я радушно встретился с ним в Питере, приятно проводил с ним время. Личной враждебности против него у меня теперь нет, как тебе известно; но этот человек мутит мою душу, когда я подумаю о том, чем создала их природа, что они29 были, и что теперь суть, благодаря ему. Дивные, роскошные откровения женственного мира, что они теперь, Боткин? Страшно выговорить -- искаженные натуры, вышедшие из своей непосредственности, потонувшие в рефлексии. Довольно тебе одного факта: в Питере он, не заикаясь, и даже не за тайну открыл мне, что она хотела бы выйти за тебя с условием, чтобы не быть с тобою в брачных отношениях. Меня морозом по коже подрало. Вот до чего дошло: где же полнота женственной натуры, где же вера любви, которая впереди ничего страшного и гадкого не допускает. Такая девушка копается в таких смрадных рефлексиях! Все чувства обратились у них в понятия, и все понятия в чувства, и трудно отличить, что у них чувство и что понятие. А все он, непризванный воспитатель женщин. С его дикою непосредственностию, с его грубою натурою, с его абстрактностию действовать на женщин, налагать на них магнетический и фанатический авторитет! Да после этого я гожусь им в гувернантки. Когда он начал на них действовать, он сам был уверен, что у него нет эстетического чувства, что искусство чуждо ему: это ли воспитатель женщин! Да, Боткин, он мутит мою душу, во мне сильная враждебность к нему. Я их так хорошо понимаю, так дорого ценю, так глубоко люблю; они вошли в меня, живут во мне, их судьба неразрывно связана с моею. Поверишь ли, я захочу поговорить об них с Николаем десять минут, и вечер незаметно проходит -- на душе и грустно и радостно кинувшее воскресает, на глазах слезы,-- и я рассказываю ему все, до малейшей подробности, даже все свои глупости. И что же, Боткин? -- совершенно понимая великость, бесконечность твоего блаженства,-- я ему нисколько не завидую, мне грустно и страшно за тебя. Часто я отгоняю мысль о тебе, в этом отношении. Кто всему этому причиною? -- он. Конечно, он это все делал без умысла, и все его намерения чисты и прекрасны; но что мне за дело -- разбойник ли зарежет меня из денег, или раскольник для спасения души моей, следовательно, из любви ко мне -- результат один и тот же: я зарезан. Это несчастный человек: он рожден на горе себе и другим.
  
   И мимо всех условий света
   Стремится до утраты сил,
   Как беззаконная комета
   В кругу расчисленных светил30.
  
   Он никогда не выходил и не выйдет из своей непосредственности, он не может отделаться от себя и видеть себя объективно. Наделавши в Питере столько глупостей, он столько наговорил мне о себе хорошего и нового, то есть о своих изменениях к лучшему, что я и рот разинул. Уж после узнал я о всех его проделках, которые таковы, что люди, не знающие его так хорошо, как ты и я, имеют полное право смотреть на него, как на шарлатана и chevalier d'industrie {мошенника (фр.). -- Ред.}. Я еще тебе не все рассказал. Изо всех людей, в кругу которых он вертелся, только Заикин понял его, но и тот говорит, что он лучше издалека, чем вблизи, и что у него нет особенного желания где-нибудь встретиться с ним. Мишель при нем не раз заговаривал, что ему негде жить,-- и Заикин говорит, что у него не поворачивался язык пригласить его к себе и что его ужасала одна мысль жить вместе с таким человеком. Признаюсь тебе, Боткин, его Берлин мне кажется претензиею: он стремится туда не к философии, а от самого себя. Любовь к науке, как и всякая любовь, должна осуществиться в действительности и требует отречения и жертв. А что он сделал? Он мог бы в эти пять лет приобрести деньги уроками, мог бы выдержать экзамен на кандидата и магистра и отправиться, как Грановский, на казенный кошт. Нет, он обманывает себя: кто ничего не сделал для науки в России, тот ничего не сделает и в Берлине; кто в Питере, не имея денег, чужие деньги тратил на рейнвейн, тот и в Берлине не откажет себе ни в чем. Но он слишком много накричал о себе, и ему трудно воротиться, тяжело отступить. Твердить о наукообразном изучении великой науки наук -- и перелистать несколько немецких книжек -- большая разница31.
   Да, бедный мой Боткин, я слишком хорошо понимаю всю горестность твоего положения. Николай Бакунин также хорошо понимает ее, и это его просто мучит. Он знает, что такое женщина, И смотрит на вещи просто. Ты не наговорился бы с ним. Еще ребенок, но обо многом ты стал бы говорить с ним, как со мною. Ты ужился бы с ним не только в комнате, но и в клетке. Ах, как он понимает все, какой у него чудесный инстинкт истины. Я ему рассказал все, даже дал прочесть письма мои к Мишелю, которые он мне возвратил (то есть всю перепалку после возвращения из Прямухина в 1838 г., когда мы были там вместе). Бога ради, чтоб это письмо не попалось Мишелю. Ему бесполезно знать его: оно его оскорбит, а пользы не сделает: он неисправим.

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   В 1 No "Отечественных записок" статья Неверова о германской литературе очень хороша, но <во> 2-м он натряс черт знает чего. Суждение Маргграффа о Беттине -- превосходно, я совершенно с ним согласен32.

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   Здоровье мое зимою было так и сяк, но теперь одышка мучит и вообще плох. Отказался начисто от трубки, водки и даже вина, которого употребляю за столом не больше рюмки. И в пище стал гораздо умереннее. Что-то скажет весна! Прощай,
  

62. Д. П. ИВАНОВУ

21 февраля 1840. Петербург

   СПб. 1840, февраля 21 дня. Еще задолго до получения твоего письма ко мне от 1-го января1 я писал к тебе, любезный Дмитрий, и в этом письме на коленях просил у тебя прощения за мое молчание2. Но ты переменил квартиру, не уведомив меня об этом, как это делают все порядочные люди, и потому мое письмо не дошло до тебя. Не можешь себе вообразить, как это огорчило меня. У меня мало времени, да и кроме того, я все это время нахожусь в таком тяжелом состоянии духа, что для меня писать письма -- истинное мучение. А теперь я должен повторять то, о чем уже писал к тебе. Ужасно досадно -- так бы и съел тебя.
   Вот тебе поручение. С приложенным здесь письмом Краевского к Ширяеву явись к сему последнему и получи от него 1300 рубл. асс., из которых 700 отдай Боткину, 300 -- Вологжанинову, 200 -- Павлу Воиновичу Нащокину, а из остальных ста рублей, 50 -- Дарье Титовне, а 50 употреби на уплату мелких долгов, которые я перевел на тебя. От Вологжанинова возьми расписку в получении, которую и перешли ко мне. Да у него же возьми старую мою расписку и изорви ее. Скажи ему, что мне очень совестно, что я так долго не мог с ним разделаться, но что виною этому не я, а обстоятельства. Я ему очень благодарен, и если он считает на мне что-нибудь за просрочку, то пусть скажет тебе, а я вышлю через тебя. О жительстве Нащокина узнай через Щепкиных и деньги (200 р.) сам отнеси. Скажи ему, что прошу у него извинения за просрочку и что, как скоро узнаю от тебя о получении им денег, то буду тотчас же писать к нему. Да скажи ему, что я жду от него сочинений графини Сарры Толстой3. Нельзя ли тебе их переслать? Нащокин добрый и прекрасный человек, он примет тебя ласково. Деньги от Ширяева принимай осторожнее -- перечти и дай расписку в получении.
   В прошлом письме моем, которое теперь приходится повторить, благодаря твоей аккуратности, я писал, во-первых, о том, чтобы ты как-нибудь постарался переслать мне крестик, который я, сняв с себя в бане, отдал Ване, а он, по своему ротозейству, забыл мне его отдать. Этот крестик мне дорог, и если он пропал, мне будет очень грустно: я получил его от Н. Я. Петровой, которая дала мне его с таким искренним желанием мне добра и счастья, какого можно ожидать только от людей родных и близких. Бога ради, похлопочи переслать его по почте. Потом я писал о письме Алеши ко мне, в котором он делает разные изкузации, приступая к своей просьбе, которую мне легко было выполнить и без этих околичностей4. Он много для меня делал -- и я этого никогда не забуду; я знаю, что он искренно меня любит и готов мне на всякую услугу, которая в его силе и возможности: попроси его (если он сам не хочет) и на меня смотреть, как на своего родственника и доброго приятеля, который всегда почтет за удовольствие для себя доказать это делом. А если он будет смотреть на меня иначе, то я напишу к Агаше, как он в Питере щекотал пятки спавшей девчонки, дочери хозяина, которая приняла его за домового. Выведу наружу все его шашни и проделки. А впрочем поцелуй его за меня в переносицу и погладь по головке. Что Никанор, а главное, -- что его учение, подвигается ли вперед? Ведь уж и экзамен на дворе, и важнейшее время уже прошло. Надеюсь, что он много сделал. Равным образом, надеюсь, что ты им доволен и что он смотрит на тебя, как на человека, которому он обязан тем, чему нет цены, за что нельзя заплатить и золотом -- любовью к себе. Надеюсь, что он столько же любит, сколько и уважает тебя, следует твоим советам и не забывает, что ты в друзья ему не годишься, но что ты его руководитель и покровитель. Признательность есть первый признак благородной души и чистого сердца, -- и потому сохрани меня боже узнать, что его душа не благородна и сердце не чисто. Прогну его сходить к Петровым, отнести им мой усердный поклон и родственное приветствие и сказать им, что петербургский воздух мне не по душе, что в Питере мне тяжело и скучно и что душа моя тоскует по Москве. Прошу его не забывать моих советов насчет посещений -- держаться середины, не чуждаться ласки, но и избегать быть в тягость. Чтоб он непременно уведомил меня о своих занятиях и успехах. Он пишет ко мне, что обносился. Что делать -- теперь никак не могу помочь, а к Пасхе непременно пришлю ему два сюртука, трое панталон и другой дряни, также и деньжонок.
   О себе тебе ничего не скажу, кроме того, что Питер мне ненавистен и жить мне в нем тяжело и мучительно. Впрочем, и кроме него, много причин для моих страданий. Недостает воли, лень, беспорядочный образ жизни, разные огорчения, и внутренние и внешние, -- все это делает мне жизнь не слишком-то веселою. Люди в Питере не те, что в Москве, образованность лаковая, внешняя, а внутреннего одно -- корысть, мелкодушие и невежество. Впрочем, везде не без добрых людей, и в Питере есть хорошие люди, которых я называю московскими колонистами, хотя иные из них и в глаза не видали Москвы. Живу я теперь с москвичом Павлом Федоровичем Заикиным, прекраснейшим человеком. В Краевском я нашел человека в высшей степени честного и благородного, и мои с ним отношения самые приятельские. В его семействе я скоро стал своим человеком. Внешние мои обстоятельства пока еще ни то ни се, и больше худы, чем хороши, но все во сто раз лучше, чем когда я жил в Москве. Улучшение их зависит от участи "Отечественных записок", которая обозначится не прежде мая месяца. Если увидишь К. А. Полевого, скажи ему от меня поклон и уверь его, что я его глубоко уважаю, как человека умного, честного и благородного, что я дорожу его уважением, с удовольствием вспоминаю о времени, которое проводил у него в доме, люблю все его семейство; никогда не забуду его милых детей. Также я всегда буду помнить, что был обязан многим его ко мне расположению. Оставил я его вот почему: он слишком любит своего брата, которого я от всей моей души и ненавижу и презираю, как подлеца, негодяя и мерзавца, наперсника Греча, друга Булгарина, издателя глупого и подлого журнала и пр. и пр.: посуди же сам, каково мне было бывать у Ксенофонта Алексеевича, как мне было смотреть на него, когда бы зашел разговор о его брате?5 Степанов подлец в полной форме. Скажу тебе за тайну, которой никому не открывай: он должен Боткину 2000 р. и начисто отказался заплатить, потому что, надеясь на его мнимую честность, мы не взяли с него векселя. Он обманывал и меня и Андросова: ему хотелось издавать пакостный журналишко, который бы ничего ему не стоил, а давал бы работу его типографии; а меня хотел сделать, как дурачка, своим орудием в этом честном деле. По его милости "Наблюдатель" отставал не днями, а месяцами и трехмесячиями. Свинья, сукин сын -- он не стоит, чтобы и бумагу сквернить его именем.
   Очень рад, что Федосья Степановна поступила так, как должно было ожидать от ее доброго и любящего материнского сердца. О старике твоем не хочу говорить6. Бог с ним. Кланяюсь низко твоей хозяйке, целую ее белые ручки и -- с твоего позволения -- сахарные уста. Уведомь меня, довольна ли Леонора Яковлевна Никанором. Это меня очень беспокоит. От ответа на этот вопрос зависит решение задачи -- есть ли у меня брат, или нет его? Внучке своей я свидетельствую мое нижайшее почтение и советую ей поменьше и потише кричать и вообще вести себя, как следует благовоспитанной девице. В противном же случае я ей не дедушка, а она мне не внучка -- так-таки и скажи ей. А на всякий случай поцелуй ее за меня хорошенько и попроси и Леонору Яковлевну то же сделать.
   Поздравляю тебя с хорошею квартирою. Это, брат, важное, даже первое дело во внешней жизни. Постарайся устроить свои делишки, сверстать расход с приходом, если можно, последний повысить перед первым и разделаться с долгами. Да что это у тебя за мещанская манера справлять именины? Право, ты делаешься настоящим филистером. Напрасно ты отказываешься от вечеров Ксенофонта Алексеевича. Тебе не мешает приглядываться к этому миру, благо есть случай. Главное дело в том, чтобы на этих вечерах вести себя ловчее: говорить, а не рассуждать, быть смелее и сочетать вежливость с простотою, развязностию и смелостию.
   Странно поразило меня известие о покраже твоих 50 р. Растолкуй, как это сделалось и что значит? Да бога ради, что Никанор насчет -- помнишь чего? Обрати на это все свое внимание. Если можно, нельзя ли, чтоб кухарка или нянька -- что ли... Без этого он погиб, и это одно средство для спасения его. Смотри за ним в оба, и выдерживай характер. Мне хотелось бы, чтобы, имея к тебе полную доверенность и расположение, он и побаивался тебя; чтобы ты был его совестью. Прошу тебя, ради самого бога, ничего не скрывать от меня, касающегося его отношений к тебе, и вообще относящегося до него.
   Прощай, мой добрый и милый Дмитрий, крепко, крепко жму твою руку. Бога ради, не старайся определять наших отношений и, не рассуждая, верь, что я тебя люблю, искренно люблю. Было время, когда мы с тобою не сходились, и ты обвинял меня в незаслуженной холодности. Тогда и я был понелепее; а в тебе было много претензий на то и на другое. Но когда ты отказался от всяких претензий и стал добрым и простым человеком, словом, стал самим собою, -- мои отношения с тобою тотчас переменились к лучшему. Да, будь самим собою -- и ты будешь умным, честным, благородным и простым человеком, с теплою душою и благою деятельностию. А это много значит. Я люблю многих, но со всяким из этих многих у меня особенные отношения. Так и с тобою. Будь уверен, что в моем сердце всегда будет уголок, в который ты всегда можешь войти, не стучась и не спрашиваясь, как в свою комнату. Что мне за дело, что ты не ученый, не поэт, не литератор, -- ты человек, а это -- поверь мне -- стоит того и часто бывает еще лучше. Тебе нечего стыдиться себя: ты полезен и себе и обществу, а это, повторяю, много значит. Я же в твоей ко мне любви никогда не сомневался и умею ценить ее и дорожить ею.
   Что твоя служба? Пиши мне обо всем, не бойся наскучить мне подробностями: я ленив писать, но читать люблю, и ничем меня нельзя так разодолжить, как большим письмом. Кланяйся всем, кто меня помнит. Доброму Павлу Дмитриевичу Савельеву поклон. Алеше с семейством такожде, да поздравь его от меня с пряжкою. Доброй Дарье Титовне пять поклонов; скажи ей, что я никогда ее не забуду. О деньгах пусть не беспокоится: это самый священный мой долг. Что Ваня, как ведет себя? Уведомь тотчас же о получении денег от Ширяева и о всей этой комиссии. Письма и посылки адресуй ко мне так: В С.-Петербург, в контору редакции "Отечественных записок", на Невском проспекте, против Гостиного двора, в доме Лукина, No 47, для передачи В. Г. Белинскому.
   Непременно адресуй в контору редакции "Отечественных записок": это пзбавит меня от необходимости ходить в почтамт.
  

63. В. П. БОТКИНУ

Около 22 февраля 1840. Петербург

   <...> Чудак Станкевич -- сердится за Шиллера. Не понимаю, как можно сердиться за убеждения. Я люблю Шекспира, право, не меньше, чем он Шиллера, но если бы ты не понимал его, как я не понимаю Шиллера,-- за что ж сердиться? Спорить можно -- и горячо, но сердиться... верно это берлинодушие?..1 Что же вы с Грановским не переслали ко мне его письма? Ах вы, шуты. Мои письма, коли хочешь, пошли к нему. Немножко стыдно мне за то письмо, что пошло к нему перед моим отъездом из Москвы: ужасно... душно и детства в нем -- бездна2. Право, у меня даже нет охоты и спорить с Станкевичем о Шиллере, не только сердиться. Дело ясно: кто-нибудь из нас не понимает дела; понять же его зависит от средств духовных и времени, следовательно, сердиться смешно. Уважаю Шиллера за его дух, но драмы его, в художественном отношении, для меня -- хоть бы их и не было. Вру я, режусь, не понимаю: положим, так, но моя ли то вина? Говорю, как вижу, а вижу, как говорю.

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   Желал бы что-нибудь знать о Гоголе, да К. Аксаков не отвечает на мои письма -- видно, сердится на меня -- что ж делать3. Вполне понимаю страдания Гоголя и сочувствую им. Понимаю и его Sehnsucht {Страстное желание (нем.). -- Ред.} к Италии. Родная действительность ужасна. Будь у меня средства, я надолго бы раскланялся с нею. Это мой идеал счастия теперь. Кажется, что бы лучше, как, имея деревню и семейство, уйти в сферу природы и семейного блаженства, но и там найдет тебя предводитель, исправник, земский суд, русский поп, окончивший курс богословия, пьяный лакей, которого непременно надо бить по роже, чтоб он тебя не бил по роже. А там еще черт дернет подписаться на журналы -- будешь видеть, как ерничает Сепковский и как <...> Полевой" Страшная и гадкая действительность!
   Что ж ни слова не написал мне о стихах Лермонтова -- "Дары Терека" и "На смерть Одоевского,)? А какова его "Колыбельная песенка"? Я от нее без ума. Клюшникова "Собирателям моих элегий" -- хорошая вещь; но "Знаете ль ее?" -- бог знает что, тотчас видно, что он тут в чужой сфере4.
   Прилагаю письмо Ы. Бакунина к тебе5. Вот, брат, юноша-то! Девственность, кротость, любовность, задушевность, скромность покойной сестры, и при этом мужественный дух, сильный и гордый, жаждущий жизни для жизни, кипящий деятельностию, а не фантазиями и не хорошими намерениями в будущем. Он все понимает -- инстинкт действительности в нем дивный. Магнетические и фантастические отношения его поразили прошлого года, безусловная фанатическая вера в Мишеля тоже. Скажи Мишелю, что его письмо к тебе есть следствие твоих строк "муж или брат"6. Я боюсь, чтобы он не понял дела по-своему и построил из него своей действительности. Брат его любит и понимает его хорошие стороны; но в магнетизме, фанатизме и фантазме почитает святым долгом делать ему всевозможную оппозицию. Он понимает вещи просто, и его глубоко огорчает в сестрах то, что ты, в письме своем, называешь в них "странными, фантастическими, фанатическими, отвлеченными, дикими и рабскими понятиями об отношениях к братьям". Он совершенно согласен с тобою и в том, что голова у Мишеля чудесная, что он все истинно понимает, но что она у него часто идет врозь с чувствами. На Николая ты можешь положиться; успеет ли он что сделать -- это вопрос; но что он будет делать и что он понимает вещи не по-книжному, а как надо, то есть просто,-- это не вопрос, а факт.
   Прощай, мой милый. Твой Б.
  

64. В. П. БОТКИНУ

24 февраля -- 1 марта 1840. Петербург

   СПб. 1840, февраля 24. Вчера -- о день приснопамятный! -- вчера получил я твое письмо1.
   День был прекрасен, и солнце сняло над Невским проспектом (хотел было тряхнуть гекзаметрами -- да не вытанцовывается, и потому снова обращаюсь к прозе). Я, Панаев, Языков и Краевский условились в пятницу идти есть блины к Палкину (вчетвером скушали на восьмнадцатъ рублей), а местом сходки назначили контору редакции "Отечественных записок". Там Панаев отдал мне твое письмо -- я начал читать -- то хочется плакать -- а при всех стыдно, то смеяться -- глупо; кое-как пробежал,-- и безоблачное небо, ясная погода отразились в душе моей. Ел за пятерых, но не от обжорства, а от того, что был в каком-то помешанном состоянии и почти не помнил, что делал, помня только, что от чего-то мне хорошо, так хорошо. Сегодня поутру перечел с чувством, с толком, с расстановкою2, схватился за перо, но что-то не пишется: вероятно, оттого, что небо чисто, солнце сияет. Такая погода всегда приводит меня в состояние какого-то созерцательно-бессознательного, чуждого всякой рефлексии и всякой деятельности (активности) блаженства. На душе много, а с души ничто нейдет. Ну да к черту красноречие: мы и без него знаем и понимаем друг друга. Да, Боткин, только теперь я имею и знаю, что я имею: спасибо Питеру, без него я не знал бы этого. Разлука -- великий акт жизни -- она пробный камень всех душевных связей. Много отнимая, она гораздо больше дает, она делает действительностию, очевидностию возможность, предчувствие, надежду. О, Боткин, Боткин -- но нет, не нужно слов, хотя они и просятся и готовы, вместе с моими слезами, хлынуть обильным огненным потоком. Довольно! Большего от дружбы невозможно требовать: она мне все дала, все, чего так давно алкала жадная сочувствия душа моя и чем так давно наслаивалась она, сама того не зная! Да, спасибо Питеру,-- он на многое открыл мне глаза. Только в нем догадался я, чем ты для меня жертвовал, какие жертвы приносил ты мне. Живя в Москве -- признаюсь -- я не умел их ценить. О, когда настанет то время, когда у вас будет находить себе теплый уголок мое растерзанное пыткою жизни сердце3, когда буду я к вам являться, чтоб
  
   день другой роскошно отдохнуть,
   Вздохнуть о пристани и вновь пуститься в путь!..4
  
   О, как люблю я ее, и за нее и за тебя! Вчера прихожу домой -- на столе моем лежат знакомые милые почерки (Николай оставил мне только что полученные от них письма) -- беру и в одном письме читаю вот эти строки: "Хорошо ли тебе в Петербурге, часто ли видишься с Белинским? Скажи ему, что я часто, часто вспоминаю время, которое провела с ним в Москве -- те вечера, в доме Ржевского -- я долго, всегда буду помнить -- я с ним в первый раз без боязни -- от души говорила -- и он был такой добрый -- поклонись ему. Твоя Александра". Боткин, кажется, слово "без боязни" должно б было глубоко оскорбить меня, напомнив мне мои страдальческие глупости; но оскорбления не было, а снова ангел жизни прошумел над моей головою своими лазоревыми крыльями, словно серебряные колокольчики прозвенели в душе моей. О чистое, святое, ангелоподобное существо, да если тебе хотя одну минуту было со мною хоть не тяжело, если не приятно -- и тогда я счастлив, блажен, и моя бесконечная любовь к тебе вполне вознаграждена. Боткин, скажи: можно ль любить больше? И моя любовь истинна: она дает мне счастие. Да, только счастие есть мерка и поверка любви. И так-то я всех их люблю. Я об них или совсем не думаю, или, если думаю, -- это какой-то экстаз, в котором все блаженство и все страдание любви. Моя страстная, дикая натура не умеет иначе любить. И потому с моей любовью так близко граничит и моя ненависть. Скажу тебя прямо, коротко и ясно: я ненавижу Мишеля не для него и за него, а за них, за его к ним отношение, за искажение их божественных натур. Я уважаю его, удивляюсь ему, но не как солнцу, все оживляющему, все согревающему, все освещающему, а как великолепному северному сиянию. Бывают даже минуты, когда и его индивидуальность бывает для меня если не мила, то достолюбезна; но лишь вспомню о них -- и я болен ненавистию, о которой не знаю, можно ли кому дать понятие. Да, это нечто выше враждебности: это ненависть. Что мне делать с этим? Я не могу победить в себе этого чувства. Я сознаю ясно, что личных отношений никаких нет: ни мое самолюбие, ни мой эгоизм нисколько не оскорблены этим человеком, скорее даже польщены; но тем не менее чувствую, что не встречал еще натуры, более враждебной моей. Я ни при ком не скажу о нем дурного слова, даже всегда заступлюсь за него -- чувствую, что нечаянная встреча с ним всегда будет мне приятна, чувствую, что, видя его в беде, помог бы ему со всею охотою, нисколько не вникая в причину беды; но этим все и оканчивается; а за этим начинается враждебность. Надувши самого себя, он славно надул и меня в Питере: я сдуру поверил, что для этого человека есть возможность примирения с действительностию. Он так радушно во всем соглашался со мною насчет своих отношений к ним и ее к тебе, и твоих к ней; а приехав в Москву, написал к ней письмо, дышащее враждебностию к тебе, советовал ей вникнуть в свое чувство и пр.5. Что это такое? Любит ли он тебя хоть сколько-нибудь? Подумал ли он тут о тебе хоть минуту? Понимает ли он твое чувство, верит ли ему, ценит ли его? Нет, Боткин, кто кого любит, тот того и понимает. У меня всегда была уверенность, что она тебя любит, потому что всегда была вера в твое чувство. Но когда я узнал это, как факт, -- то твое чувство сделалось для меня ручательством действительности ее чувства, а ее -- твоего. Ты пишешь, что он любит одно общее6. О, пропадай это ненавистное общее, этот молох, пожирающий жизнь, эта гремушка эгоизма, самоосклабляющегося в нем! Лучше самая пошлая жизнь, чем такое общее, чтоб черт его побрал! Пусть лучше дан будет моему разумению маленький уголок живой действительности, чем это пустое, лишенное всякого содержания, всякой действительности, сухое и эгоистическое. Ты пишешь, что у меня такая же способность отвлечения, как у Мишеля: так да не так, я резонер и рефлектировщик, правда -- но зато, как скоро представали перед меня дивные явления действительности, в искусстве и жизни, я посылал к черту свою рефлексию и никогда не менял человека на книгу. Понимаю, Боткин, глубоко понимаю твое выражение о Sophie Kroneberg: простодушная, умненькая девушка; теперь я и на тебя смотрю, как на простодушного и умного юношу, и желаю, чтобы и ты смотрел на меня так же,-- и дай бог, чтобы мы оба были достойны таких эпитетов. К черту героизм и ходули. Я уверен, что и великие люди казались себе совсем не великими, -- так нам ли смотреть на себя свысока, прикидываться героями и искать для своих знакомств и дружбы только героев. Для меня поэт и герой выше человека, но объективно, а когда он захочет со мною сблизиться, я попрошу его сбросить с себя поэзию и героизм и прежде всего быть просто человеком. Святое и великое титло! Для Мишеля оно ничего. Он, как говоришь ты, себе на уме. Это прекрасно сказано. Мне что-то крепко кажется, что этот человек, кроме себя, еще никого не любил. Он любит, например, сестер, но для них или для себя? -- вот вопрос, на который ответа должно искать в его письме к сестре, во время твоей харьковской поездки. Он ей ни слова не сказал, что если она обманывается в своем чувстве, то погубит этим и себя и тебя, и потому бы вникнула; но он сказал, что ты отнимаешь ее у братьев. Мне кажется, главнейшая причина тут та, что она его не будет уже слушать, как оракула, как бога. Ты, Боткин, радуешься его письму, потому что оно произвело прекрасный для тебя результат -- уничтожило твои сомнения; но в отношении к нему оно очень не радостно: этот человек смотрит на тебя все теми же глазами, как смотрел во время твоего первого посещения Прямухина. Ты дилетант в его внутреннем сознании, которое обнаруживает себя делом, часто вопреки слову. Твоя глубокая, гармоническая, музыкальная субстанция закрыта от него: у него нет органа в душе, чтоб почувствовать ее. Хотя он и на меня смотрит с высоты своего геройственного величия, но захоти я ломать с ним комедь, -- я всегда стану в его понятии выше тебя. Это тем легче мне сделать, что он побаивается меня, ибо я ему пришелся солоненек. Бедный мой Василий, ты силишься надуть самого себя, но меня не надуешь: я за 700 верст все вижу так ясно, как за два шага. Я понимаю всю тяжесть твоих с ним отношений: отказать ему в уважении ты не можешь, любить его не можешь, играть с ним комедии не можешь, и, будучи врагом тебе (по его отношению к твоему чувству), он все-таки остается и останется ее братом. Это своего рода трагическая коллизия. О, я знаю этого человека: я берусь написать его биографию со дня его рождения до сей минуты и от сей минуты до смерти, хотя бы он прожил еще 100 лет, -- и он сам принужден будет подписать под нею "с подлинным верно". И надо ему отдать честь: он хорошо чувствует свои отношения ко мне: немногие и, по-видимому, незначащие слова мои об нем в письме к тебе вырвались из тайника души моей под влиянием сильной ненависти7. Он не обманулся. И как смешно и пошло он мстит мне в письме к брату Николаю -- комедия да и только! То нападает на меня, то похваливает -- и то и другое делает очень неловко, так что письмо на Николая произвело действие совершенно противное тому, которого он ожидал. Забавнее всего выходка его против моей статьи о "Горе от ума". Видишь, в чем дело: Пашенька, дескать, читает ее и местами подсмеивается надо мною и что это именно те места, где я говорю о своей несчастной действительности. Ты знаешь Павла: я не раз видел, как он, читая Шиллера и Гете, подсмеивался над ними, а вместе и над собою; так, верно, он подсмеивался и надо мною, а Мишель принял это за то, что моя статья смешна даже для детей. И если бы Павел подсмеивался над нею не шутя: что тут за радость для Мишеля? Может ли мальчик смеяться пад тем, чего не в состоянии понять иначе, как абстрактно? Ведь он же подсмеивался над моею статьею о детских книжках в "Наблюдателе", именно над моею мыслию, что в детях ие должно развивать рефлексию, но, напротив, поддерживать полноту и непосредственность их понимания природы и жизни?8 Скажу тебе откровенно, что это взбесило меня, потому что это низко и пошло. Человек не может напасть на меня прямо, так смеется над покроем моего сертука. Ты сказал мне, что моя статья в 12 No "Отечественных записок" так скучна, что у тебя не было сил и дочесть ее9,-- и я с тобою согласился, и это против тебя не возбудило во мне ни тени неудовольствия, потому что сказано и справедливо и прямо. Далее нападает на меня за Алешу, который-де так хорош, что он (Мишель) восхищается им (должно быть хорош!). Что ж -- я не сужу о человеке по мальчику, но что он оскорблял и меня и тебя, разыгрывая роль взрослого и необыкновенно умного человека,-- это правда. Мою несправедливость против Алеши он опять приписывает моей несчастной действительности. Где же, о Мишенька! счастливая-то действительность: уж не в счастливой ли статье, которою началась 1 книжка "Наблюдателя"? 10 Или уж не в похождениях ли Мишеля? Потом он радуется за Николая, что я полюбил его, но все это так неловко, так пошло и глупо. Я знаю, что он взбешен против меня моим сомнением в действительности его стремления к знанию и его поездки в Берлин. Он прав -- есть за что сердиться: когда я наклепал на себя чувство к Александре Александровне,-- для меня не было жесточайшей обиды со стороны Мишеля и твоей, как сомнения в действительности моего чувства. Если это и не совсем несомненно, 10 очень вероятно. И как поверить? Что он сделал для науки? -- nichts {ничего (нем.). -- Ред.} -- нуль -- перелистывал книжки, кричал о них, шумел о философии и о себе, о себе и о философии. Кто ж виноват, что теперь в его призвание к философии (кроме, может быть, одного тебя) никто не верит. А поездка в Берлин: да разве по воздуху ездят и воздухом питаются? 2000 -- да ему мало 20 000, хоть в Берлине рейнвейн и дешев. Этот человек не в силах отказать себе в медовом прянике. Он пропадет там. Что он будет делать? Учить немцев русскому языку, которого сам не знает? Нет, я знаю, на что и на кого он надеется -- на Станкевича и на Заикина. Открою тебе за великую тайну, что к Заикину пишет его брат, что Мишель был у него, говорил о стесненности своего семейства, о своей необходимости ехать в Берлин, а в заключение -- попросил денег. Тот добряк (благородная и любящая душа!) растаял и о сем с умилением пишет к брату; но этот в бешенстве разорвал письмо в клочки и разругал брата. Он только то и твердит: мне не жаль денег, никому не откажу -- только не Бакунину. Поверишь ли, Боткин, Мишель умел так глубоко оскорбить эту кроткую, любящую, мелодическую душу, что она больна к нему ненавистию. Этот человек все позволит с собою делать, все снесет, а кого полюбит, сам предложит последнюю рубашку,-- но Мишель умел и этого человека так восстановить против себя. Теперь суди же, каковы его отношения к Заикину и как основательны надежды на этого человека. А между тем, повторяю, этот человек пригласил меня жить к себе и приглашает ехать с собою за границу на свой счет: кажется, он не скуп? Мишель вечно кричал о воле, видя в себе гения воли, а во мне идеал слабости воли,-- но где же у него воля? Ее нет в нем ни тени, ни призрака. Мне приятно (или по крайней мере легко) ничего не делать, -- и я ничего не делаю: неужели это воля? Ему было приятно авторитетствовать, воевать с родителями и фанфаронить этою войною -- он это и делал, -- неужели это воля? Я человек без воли: это правда; но когда за 2 недели до выхода "Отечественных записок" Краевский говорит мне -- что ж статья и статейки, а у меня в душе и апатия, и отчаяние, и черт знает что, -- и я говорю -- будут готовы, а сам не принимаюсь, а между тем No журнала не задержал и все обещанные статьи напечатаны, -- это похоже на волю. Ты по вечерам (украдкою и урывками от амбара и друзей) выучился по-немецки -- и это похоже на волю. Боткин, скажи же мне хоть один факт, где бы видна была его воля?
   Бога ради, чтобы мои письма оставались для него тайною. Сохрани тебя бог объявить ему их -- наша переписка в таком случае если не кончится, то надолго прервется. Зачем мне бесплодно оскорблять этого человека? Уж не опять ли переписываться с ним -- нет, уж на это я не намерен больше тратить ни времени, ни желчи моей, а мне и без него тяжело жить на свете. К тому же и то правда: какое имею я право учить его и говорить ему правду? По крайней мере я не позволю делать этого со мною. Да, Боткин, не люблю я этой блуждающей кометы; и твои письма еще более взбунтовали против него всю мою натуру. Не буду больше об нем говорить. Еще раз: все сказанное об нем -- тайна для него.

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   Твое новое известие о Каткове поразило меня11. Ведь ты же писал мне, что он уже образумился? Я получил от него два письма, в которых видны грусть и страдание. Эта история начинает возмущать меня: в ней нет никакой поэзии -- одна грязь, животность и, наконец, подлость. Знаешь ли что: не брякнуть ли мне к нему, не прямо, а намеками, но понятно? Отвечай; без твоего совета ничего не сделаю. Добрый, благородный Катков! О, если бы он чаще был в грустном состоянии духа!

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   Февр. 27. Письмо к Мишелю отвлекло меня от письма к тебе,2. Ты пишешь, что его письмо ко мне вытекло из благородного источника,-- может быть, только большая часть его навела на меня апатическую скуку, а конец, написанный милым и шутливым тоном, пренеприятно подействовал на меня -- точь-в-точь, как ласки или гримасы... не доканчиваю. Странный этот человек! Как, при всем своем уме, он не может понять самых простых вещей, как например: что логикой ничего доказать нельзя, что повторять одно и то же скучно, что диссертации хороши в книгах и отвратительны в письмах, что сухое резонерство возмущает душу и пр. и пр. -- все в таком же роде. Еще: как не может он понять, что ему совсем не к лицу шутливый и милый тон, что его фразы из Гоголя мутят душу и пр. и пр. -- опять все в таком же <роде>

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   Марта 1. Видно, этому письму не суждено кончиться порядком. Дел у меня бездна: надо написать листа полтора рецензий и критическую статью: 3 No "Отечественных записок" должен выйти 15, теперь 1, а еще ни одной строки не написано, а Языков грозится уехать завтра13. В голове хаос -- в сердце тоже. Обращаюсь к Мишелю. Сейчас получил от Николая письмо14 и не знаю, что с ним делать. Мишель снова увидит во мне ожесточенного врага и конспиратора, -- они15 -- тоже. Но скажи, бога ради: виноват ли я, что сошелся с Николаем как нельзя лучше, от души полюбил его? Кажется, тут нет ни вины, ни конспирации против Мишеля? Потом, виноват ли я, что, говоря с ним о его сестрах, я не мог играть комедии и высказал все, как вижу, понимаю и чувствую? Виноват ли я, что иначе ни видеть, ни понимать, ни чувствовать не могу? Далее: виноват ли я, что все, высказанное мною Николаю, показалось ему подтверждением его собственных чувств, мыслей и впечатлений, произведенных на него и сестрами и Мишелем? Виноват ли я, что твои письма ко мне возмутили снова мою душу против Мишеля и так глубоко огорчили благородную юную душу, не испорченную никакими предубеждениями? Если бы я с Николаем не сошелся, я ничего и не сказал бы ему, потому что я не ищу себе прозелитов (но бегаю от людей) и еще менее ищу заговорщиков против Мишеля. Николай меня полюбил. Все, что я ни говорю ему, гармонирует с его чувством, и он мне потому и верит. Но он совсем не мальчик и чужими глазами смотреть не способен. Лучшее зтому доказательство то, что лишь только Мишель уехал из Питера, как все его влияние тотчас же спало с Николая, хотя в то время он ко мне и не ходил, жил большею частию на заводах (сблизился он со мною не больше, как с месяц назад). Например, Мишель старался в нем произвести любовь и уважение к философии, а Николай (с месяц назад -- с этой-то минуты особенно и полюбил я его) вдруг развоевался против философии, говоря, что жить значит кутить. Что с ним будешь делать? Я улыбался, но утолить его командирского сердца не хотел. Абстрактность Мишеля слишком поразила его, чтобы он понял всю дурную сторону его влияния на сестер. Да наконец -- конец концов! -- разве я не имею права иметь друзей, а с ними быть вполне откровенным? Я почел за святой долг откровенно рассказать ему не только много о Мишеле, но и о себе и о тебе: он свеж, здоров, нормален -- надо же его предохранить нашим опытом от многого, от чего некому было предохранить нас. Когда я ему говорил -- он почти со слезами обнимал меня и благодарил. Мишель показывался ему только спереди, в апотеозе, а я, начиная с себя, повернул всех вас задками к нему. Неблагообразно -- что делать -- сами виноваты. У меня с Мишелем борьба, но теперь это уже не борьба личностей, а борьба идеи: он прав -- истина возьмет свое; не прав -- терпи. Да и чему терпеть? -- не ему, а его самолюбию; но по его же теории, истина выше не только самолюбия, но и всего человека. Вот что, мой Василий: так как ты тут играешь важную роль, то я и боюсь, чтобы от этого не потерпели твои отношения к Мишелю, а от них не потерпело бы твое счастие. Поэтому прочти письма (и Николаево и мое) сперва сам, а потом, найдешь возможным -- отдай их Мишелю, найдешь нужным не давать ему знать о них -- удержи у себя, но во всяком случае тотчас же дай знать о своем решении.

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   Пиши ко мне, Боткин, пиши все и обо всем. Может быть, иное будет и не понято мною, но верь мне, мой Василий, все, малейшая подробность, будет принята к сердцу, перечувствована им, доставит мне минуту счастия. Да, больше, больше о себе и о ней -- тебе грешно думать, чтобы ты мог наскучить мне подробностями о своей конечной личности: я, брат, общим занят, не во гнев будь сказано Михаилу Александровичу, но занят им по-своему. Что мне твоя философия -- давай мне свою лысину. Впрочем, о чем бы ты ни писал -- для меня все это мило, прекрасно, умно, глубоко, одушевлено, согрето. Я не знаю музыки, Гебель для меня не существует, но когда я читаю о них в твоем письме, мне кажется, я сам музыкант, что мне вот только стоит присесть, чтобы навалять квинтету. Ах, Боткин, каждое письмо твое -- светлый праздник для меня, день счастия и даже полноты, поколику она для меня возможна. А о Пушкине ты врешь, хотя, по своему обыкновению, и мило врешь. Шекспир не знал новейшей германской рефлексии, но миросозерцание его от того не пострадало, не сузилось, равно как и обилие нравственных идей. У Пушкина то и другое бесконечно, только труднее в то и другое проникнуть, чем у немцев. Вспомни, что ты сам так глубоко и верно подметил в "Онегине"-- какое бесконечное миросозерцание, какой великий нравственный урок -- ив чем же -- в нашей частной жизни, среди помещиков! А там еще "Цыганы", "Борис Годунов", "Русалка" (обрати на нее внимание), "Скупой рыцарь", "Каменный гость". В последнее время мне открылся "Бахч<и>сарай<ский фонтан>": мне кажется, я в состоянии написать об этой крошечной пьеске целую книгу -- великое, мировое создание! Присовокупи ко всему этому, что Пушкин умер во цвете лет, в поре возмужалости своего гения, умер, когда великий мирообъемлющий Пушкин уже кончился и начинался в нем великий мирообъемлющий Шекспир. Да, мир увидел бы в нем нового Шекспира. Несмотря на недостаток рефлексии, он сам понимал это. Владиславлев выпросил у опеки для своего альманаха стихотворение Пушкина. Ты знаешь Державина "Я памятник себе воздвиг чудесный, вечный": это одно из самых могучих проявлений его богатырской силы. Пушкин написал то же: Я, говорит он в светлую минуту самосознания, я воздвиг себе памятник, который выше Наполеонова столба --
  
   Народная тропа к нему не зарастет!
  
   Меня будет знать и узкоглазый калмык, и ленивый финн, и черкес; и пока на земле останется имя хотя одного поэта,-- мое не умрет16. О, как действуют на меня подобные самосознания в таких простых, целостных людях, как Пушкин! Нет, Боткин, надо радоваться, что ядовитое дыхание рефлексии (ядовитое для поэзии) не коснулось Пушкина и тем не отняло у человечества великого художника. Я понимаю цену, значение и необходимость рефлектированной поэзии -- я сам без ума от символического "Прометея" Гете; но, во-первых, я настаиваю на том, что когда говорится об истинной (непосредственной) поэзии,-- о рефлектированной можно и помолчать; а во-вторых,-- я вижу нравственную идею только в нерукотворных, явленных образах, которые одни есть абсолютная действительность, а не те, где хитрила человеческая мудрость. Воля твоя, а после "Вертера" и "Вильгельма Мейстера" -- твое удивление к "Wahlverwandschaften" {"Избирательное сродство" (нем.). -- Ред.} мне очень подозрительно17. Я уверен, что это то же, что а Вильгельм М<ейстер>": вино пополам с водою. Такие произведения, много давая в частях, целым своим только усиливают болезненность духа и рефлексию, а не выводят из них в полноту созерцания. А что Егор Федорович восхищается рефлектированностию поэзии Шиллера18 -- брешет собачий сын:19 в его лице здесь философия самоосклабляется в поэзии. Шиллер заплатил рефлексиею дань духу времени -- и это достоинство, а не недостаток. Прекрасно! Но ведь и Вольтер конечною рассудочностию и ядовитым кощунством не только заплатил дань духу времени, но и вполне его выразил: однако ж из этого еще не следует, чтобы он был равен или выше Гомера, Шекспира, Пушкина. Еще раз -- счастие наше, что натура Пушкина не поддалась рефлексии: оттого он и великий поэт. Ты не поверишь, как я рад, видя, что у Лермонтова столько же сродства с рефлексиею, сколько у меня с полнотою жизни, с трудом, с музыкою, а у Сеиковского с религиозностью: есть надежда, что будет поэт! А его детство обещает дивное мужество. Каковы его "1 генваря" и "Казачья колыбельная песенка"? Пиши мне, пиши о каждом стихотворении Лермонтова -- иначе я не хочу с тобою знаться. Как, мой добрый и лысый Василий,-- "На смерть Одоевского" тебе больше нравится, чем "Терек"? Сие мнение, о Боткин! -- если бы ты его напечатал,-- я бы печатно отрекся даже от того, что когда-либо где встречал тебя. Неужели на святой Руси только одному мне суждено было добраться (с грехом пополам) до тайны поэзии и носиться с нею среди вас, подобно Кассандре с ее зловещею тайною, осуждавшею ее на отчуждение и одиночество среди ликующего народа в светлом Илионе!20 Нет,-- Кудрявцеву, верно, "Терек" лучше нравится, чем "На смерть Одоевского" -- ведь не даром же я так люблю его, что вот сейчас бы расцеловал бы его до смерти. Спроси его и тотчас же уведомь или заставь его при себе же написать несколько слов об этом -- буду ждать этого с таким нетерпением, как будто и бог знает чего.

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   Торопи Кронеберга выправить 5 акт "Ричарда" и прислать к нам переписанный поразборчивее: лишь бы цензура пропустила, а уж будет напечатан, и 400 р. получит переводчик21. Красову и всем кланяйся. К Клюшникову, Каткову и Кудрявцеву никак не соберусь написать, а уж напишу, ей-богу, напишу. А пока не умилосердятся ли они ко мне бедному и горемычному прислать по писульке? Эх, хорошо бы! Да, Боткин, сто раз сбирался написать, и все забываю: образ свой, образ шли скорее. Садись, сажай Кирюшу -- и шли. Да нельзя ли уж и Кудрявцева, Каткова (сего для лучшего эффекта с отпечатком на физиономии грешков его) и спокойно-тихую физиономию профессора истории, странного плода Демиурга небесного -- одним словом, милого Грановского. Пожалуйста, похлопочи. Какая для меня будет отрада смотреть на эти знакомые образы людей, братец, людей22.

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   Да, кстати: что с тобою, о лысый, деется? Ты без меня потерял всякое чутье к поэзии. Новогреческие песни я заметил -- они превосходны, и перевод хорош23. Но, ради аллаха, с чего ты взял, что переводы Аксакова положительно хороши, а не положительно дурны? Неужели это Гете? -- чем же он выше Семена Егоровича Раича? А Венцелевского стихотворения -- я не понимаю: должно быть, рефлектированное 24. Струговщикова перевод тоже не из лучших его переводов25. И вообще, стихотворная часть в "Одесском альманахе" -- плоховата. Стихи Лермонтова недостойны его имени, они едва ли и войдут в издание его сочинений (которое выйдет к празднику), и я их ругну26. Впрочем, они случайно и попали в печать, чтоб отвязаться от альманачников.
  
                       Сон
  
   Когда ложится тень прозрачными клубами
   На нивы спелые, покрытые скирдами,
   На синие леса, на влажный злак лугов,
   Когда над озером белеет столп паров,
   И, в редком тростнике медлительно качаясь,
   Сном чутким лебедь спит, на влаге отражаясь, --
   Иду я под родной соломенный свой кров,
   Раскинутый в тени акаций и дубов,
   И там с улыбкою в устах своих приветных,
   В венке из ярких звезд и маков темноцветных
   И с грудью белою под черной кисеей,
   Богиня мирная, являясь предо мной,
   Сияньем палевым главу мне обливает
   И очи тихою рукою закрывает,
   И, кудри подобрав, главой склонясь ко мне,
   Лобзает мне уста и очи в тишине27.
  
   Вот лучшее стихотворение в "Одесском альманахе", стихотворение, достойное имени Пушкина, и, кроме меня да Панаева (у этого человека бесконечно глубокое чувство изящного, и если бы его религиозное чувство было таково же, о нем, как о Языкове, можно б было сказать: ессе homo! {вот человек! (лат.) -- Ред.}), никем не замеченное. Прочти его Кудрявцеву.

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   Что, друг? ты уж говоришь, что лучше пиетизм, чем пантеистические построения о бессмертии? Я сам то же думаю. Для меня евангелие -- абсолютная истина, а бессмертие индивидуального духа есть основной его камень. Временем тепло верится --
  
   С души как бремя скатится,
   Сомненье далеко,
   И верится, и плачется,
   И так легко, легко28.
  
   Да, надо читать чаще евангелие -- только от него и можно ожидать полного утешения. Но об этом или все, или ничего.

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   Ах, Боткин, мой лысый Боткин! Сколько блаженных минут доставили мне твои, полные любви, полные тобою письма! Смешны и глупы прекраснодушные излияния, но не могу удержаться, чтобы не сказать тебе, что твоя дружба -- для меня незаслуженный дар неба -- я не стою ни ее, ни тебя. Знаешь ли, какая между нами разница? В тебе много желчи, злости, есть и другие, может быть, грешки, но гораздо больше всего этого любви и свободы духа. Во мне много любви, но гораздо больше самолюбия, эгоизма, ограниченности и разных пакостей, а о свободе духа я умею только фантазировать, но никогда не наслаждался ею. Чтобы мне прийти в дом, я должен сказать лакею: "скажи, мол, барину, что-де пришел вот такой-то, он, мол, пишет статьи, которые хвалил вот тот-то и этот-то"; а ты, Боткин, ты всюду можешь войти без докладу -- и ты весь, от лысины и до пяток, от обаятельной женственной улыбки до широких разметов твоей гармонической души -- лучшая твоя рекомендация. Кто меня не поймет,-- еще может остаться человеком, даже лучшим, чем я; кто тебя не поймет, тот или дитя, или скотина. Но вот посылаю к тебе сына моего единородного {Вот тебе доказательство, что и от скверного дерева родится иногда прекрасный плод.}, М. А. Языкова: этот человек ближе и родственнее к тебе, чем я; он весь -- гармония, музыка, любовь, вера, чувства, безжелчен, как голубь, добр, как агнец, и развратен <...>, как козел. Впрочем, он не подходит под общую мерку -- он и в разврате свят и чист. А уж нечего сказать -- настоящий петух <...>. Заставь его петь: что это за любовный, за полный души голос! Я не могу слышать его без восхищения и умиления. Да смотри -- не слишком уж сливайся с ним -- я приревную и вызову его на дуэль. Ах, как я ему завидую -- он едет в Москву -- к тебе, к вам. Для него это будет новым миром. Сведи его со всеми нашими -- с Грановским, с Кудрявцевым, с Катковым, Клюшниковым и пр. С Лангером он сойдется -- у него душа дьявольски музыкальная. Он заочно влюблен в тебя. Я дал ему прочесть твое письмо -- прочел -- подходит ко мне с просветленным лицом (а какое у него лицо -- сам посмотри!), с слезами на глазах и голосом, который можно выразить разве музыкою, и то на арфе, говорит: "Какой же это человек -- ты прав, говоря, что большего и нечего и невозможно требовать!" Я обоим советую вам быть проще друг с другом, а то вы будете друг друга бояться, он уже и теперь трусит предстать пред твои светлые очи.

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   Ах, Боткин, Боткин, спасибо тебе, друг, спасибо! Полетел бы я до тебе, да крылец не маю, чахну, сохну, все горую, всяк час умираю29. Пожил бы с тобою недельку-другую -- вот и запас на полгода жизни. Но больше не захотел бы с тобою жить: знаю, что скоро стал бы тяготить тебя. Это сказано не в упрек тебе. Я знаю себя, эх, знаю, черт возьми! Может быть, когда-нибудь я и сделаюсь пошире и свободнее (только уж верно не от писем Мишеля) -- и тогда готов всю жизнь прожить в твоей маленькой комнатке -- мир ей и благословение!

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   С чего ты вздумал подписываться на "Отечественные записки": тебе давно высылаются они от Краевского -- сходи в лавку Кс. Полевого и возьми. А что тебе твоя статья (хорош переход) не нравится -- ты дурак, страждущий рефлексиею москводушия. Полно, глубоко, все высказано ясно, определенно -- дурак ты, лысый! Этаких статей еще не бывало30. А что тебе не хочется приняться за "Рим"31 -- опять москводушная рефлексия.

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   Заикин (П. Ф.) тебе всякий раз низко кланяется, да я забываю прописывать. Чудная, богатая натура, человек глубоко религиозный и гармонический. Борзо учится по-немецкому и успевает, рассучий сын, как ни стараюсь я ему мешать и разные пакости чинить. От Берлина ожидает воскресения для новой и лучшей жизни. Ну, да обо всем этом и обо многом другом порасскажет тебе Языков. Рука устала -- не могу писать, а день потерян, о статьях нет и помину,-- да черт с ними -- зато с тобою вдоволь набеседовался. Получил ли ты мое письмо в ответ на первое твое (где ты пишешь о Sophie Кронеберг)?32 Жди скоро нового послания. К Кульчицкому буду писать, только Ее теперь -- дела пропасть33,

Твой неистовый Виссарион.

  

65. М. А. БАКУНИНУ

26 февраля 1840. Петербург

   СПб. 1840, 26 февраля. Письмо твое1, любезный Мишель, произвело на меня именно такое действие, которое ты предсказал в письме Заикину. Оно еще на несколько лет отдалило меня от знания (если предположить -- хоть для шутки,-- что знание когда-нибудь должно быть моим уделом), усилив во мне мою ненависть к знанию, как сушильне жизни. От души пожалел о так много потерянном времени и потерянном труде. Я прочел в твоем письме то же самое, что привык читать в твоих письмах с 1836 года и что и тогда так мало убеждало меня, а теперь еще менее способно убедить. Вообще, теперешнее время чрезвычайно трудно для убеждения -- всякий хочет жить своим умом и требует любви, сочувствия и сострадания, а не советов. Сколько переписал к тебе я писем: за истину моей последней и самой отчаянной полемической переписки с тобою я и теперь стою, как за то, что 2x2 = 4, а не 5, и эти письма были писаны моею кровью -- свежею и горячею кровью,-- а между тем ты сам знаешь, до какой степени убедили они тебя2. Мне и теперь жаль потерянного времени, потерянной желчи, потерянной крови и потерянной души: из всех них только желчь еще не совсем была потеряна, потому что ты осердился -- бедный результат! С тех пор я отказался от права учить других -- особенно на письмах,-- и очень жалею, что несколько неосторожных выражений в письме к Боткину3, враждебно сорвавшихся с пера моего, зацепили твое самолюбие и заставили тебя так бесплодно потерять несколько часов на твое длинное и сухое письмо. Оно на несколько дней повергло бы меня в жесточайшую апатию и усилило бы дряблость и болезненность моего искаженного и исказненного духа, если бы я до сих пар не был полон письмами Боткина, живыми, любовными, елейными и -- что всего для меня бесценнее -- чуждыми ненавистной мне философии, говоря поэтическим языком, и резонерства, выражаясь смиренною прозою.
   Да, Мишель, пора нам убедиться в том, что мы плохо понимаем друг друга и что пора нам оставить друг друга в покое. Слияние невозможно для нас, действовать один на другого мы уже не можем ни положительно, ни отрицательно. Я уважаю тебя: говорю тебе это искренно, но я не люблю тебя, ибо мне ненавистен образ твоих мыслей и еще ненавистнее его осуществление. Это странное признание имеет целию не оскорбление тебя: прими его, как знак моего уважения к тебе: во всяком случае, ты человек благородный, я не могу играть с тобою комедии и хочу, чтоб ты не обманывался насчет твоих ко мне отношений. Я всегда и везде встречу тебя с удовольствием, и мимолетная встреча с тобою всегда будет мне отрадна; мне будет о чем от души поговорить с тобою: у нас так много общих воспоминаний и общих предметов любви. Увидя тебя в беде, я не отдам тебе последней рубашки, как ты мне, но охотно (не по долгу, а по влечению сердца) поделюсь с тобою возможным, не спрашивая тебя о причине беды и даже зная, что она -- именно то, что с особенного яростию ненавижу я в тебе. Но здесь и конец. Я знаю в тебе много хорошего и подозреваю теперь, что еще многого не знаю такого, чего ты не можешь выговорить, и что заставляют от меня твои дурные стороны. Поэтому ты прав, говоря, что я тебя не знаю, но и я буду совершенно прав, сказавши тебе, что и ты не знаешь меня. Да, ты не знаешь меня, ни моих требований, ни моих истинных ран, ни моих истинных радостей. Ты знаешь во мне человека А, В, С, D и т. д.; но ты не знаешь человека Виссариона,-- и Виссарион никогда не примет от тебя ни совета, ни утешения, и никогда не даст тебе ни того, ни другого. Так говорит моя несчастная действительность: надо покориться ей. Представляю тебе несколько доказательств того, что ты жестоко заблуждаешься, думая, что хоть сколько-нибудь знаешь и понимаешь меня.
   С чего ты взял, что до отъезда в Прямухино я бредил (далее -- часть текста утеряна) служить, но не для статского советника, не для денег, а для того, чтобы на вопрос ундера на заставе не ответить ему: homo sum! {я -- человек! (лат.) -- Ред.}, a сказать, что я чиновник 14 или 12 класса и служу там-то. Не худо при этом иметь и маленькое обеспечение, которое не допустило бы меня умереть, как собаке, во время болезни. Стыдно, Мишель, прибегать ко лжи для поддержания своей истины. Или истина-то не совсем истинна?.. А что я сказал, что время для службы ушло -- и то правда, ибо, благодаря идеальности, я уже не способен ни к какому делу, ни <к> каким объективным обязанностям. А ты еще спрашиваешь, выучился ли я по-немецки. Выучился!..
   С чего ты взял, что я рожден для знания? Кто для чего рожден, то того и достигает. Наука не для меня. Я дилетант. У меня есть нечто общего, родного с немцами и даже с их рефлектированною поэзиею; но греческий и английский языки (если б их можно было как-нибудь, не учась, узнать) дали бы мне кое-что посущественнее немецкого: я бы читал Гомера и Шекспира.
   С чего ты взял, что моя действительность -- пошлая, повседневная, грязная и до того несчастная, что над нею даже мальчики подсмеиваются?4 Правда, моя действительность -- не твоя, но из этого еще не следует, чтоб она была такая, какою ты ее описываешь. Раны моего сердца, истекающего живою, горячею кровью, свидетельствуют, что ты лжесвидетельствуешь на ближнего. Ты хоть бы спросил у Боткина: он сказал бы тебе, до какой степени я примирился с повседневною действительностию. Если восставать на претензии, на ходули, на наклепанную на себя любовь и другие наклепанные чувства, на благородную привычку жить на чужой счет, бросать бисер перед свиньями и толками о философии возбуждать во всех ненависть и отвращение к философии; если нападать на выход женщин из непосредственности женственной в мужскую рефлексию, нападать на неестественные, магнетические и сомнамбулические связи и отношения, нападать на возвещение о благих, но никогда не выполняемых намерениях (как, например, об изучении немецкого языка), словом, если нападать на леность и бездействие, утешающие себя звонкими фразами духовных моментов, высшей цели, высшего назначения, на дряблость, болезненность, гнилую рефлексию, и пр., и пр., если нападать на все это,-- значит нападать на идеальность,-- я нападаю на нее и предпочитаю ей самую ограниченную действительность и полезность б обществе. Чацкие всегда будут смешны для меня, и я буду делать их смешными для многих, не заботясь, что мой приятель примет эти нападки за личность и оскорбится ими. Что такое Чацкий? Человек, который мечтает о высшей любви, а любит <...>, который всех ругает за бездействие, а сам ничего не делает, который сердится на действительность, которая в его глазах скверна тем, что русские XIX века бреют бороды и ходят во фраках, что они не подражают китайцам в незнании иноземщины, который говорит о прекрасном и высоком со скотами и пр. и пр. Как же на таких шутов не нападать? Они первые враги всякой разумности, всякой истины. Но скоты всегда останутся для меня скотами, и у меня с ними никогда общего ничего не будет. Если они без претензий, я стараюсь быть к ним по возможности терпимым; если они с претензиями (как, например, семинарист-Хлестаков, дурак, осел и скот Благосердов или Добронравов, о котором ты, в письме к Заикину, отзываешься чуть-чуть как не о человеке), они возмущают меня. Вы оба, ты и Боткин, не поняли моей зависти к скотам: я завидую не офицеру, который идет на бал к барышням, но офицеру, который без рефлексии, в полноте глупой натуры своей спешит на бал, где проведет вечер в самозабвении,-- и я завидую, почему у меня нет способности не на бал ехать, а хоть стихотворение Пушкина прочесть без рефлексии, с самозабвением. Ты говоришь, что я ищу в оргиях выхода. Тут две неправды: в оргиях я ищу не выхода, а минутного самозабвения, ищу отрешения не от страдания, а от отчаяния, от сухой, мертвящей апатии. Потом -- я не способен возвыситься даже и до оргии -- судьба и в этом отказала мне. Разве это оргия желать <...> и преблагоразумно рассуждать о том, как предательски обманчива чувственность: сулит много, а дает -- ничего? Против прекраснодушия я уж не воюю. Питер и твои брат Николай заставили меня помириться с ним и полюбить его. Я увидел ясно, что я ниже прекраснодушия и не имею права нападать на то, до чего возвыситься никогда не был в состоянии. Прекраснодушие -- великое, святое состояние духа и в 1000 раз выше моей г... действительности. Я вижу, что, нападая на Шиллера за его прекраснодушие, я смешивал с Шиллером себя, тебя и Аксакова, с которыми у великого германского духа ничего общего не было и нет. И И. П. Клюшников прекраснодушен был,-- однако он, так же, как и мы, не Шиллер: прекраснодушие и призрачность не одно и то же. Однажды твой брат сказал мне, что он зарезал бы свою любовницу, если и она изменила ему. Я ему ответил, что если б мне изменила страстно и глубоко любимая мною жена,-- я и ту бы не только не зарезал, но не оскорбил бы ее ни одним грубым словом, а кротко сказал бы ей, чтобы она выбирала между долгом и любовью и что в первом случае я обещаю ей мое уважение, дружбу и сострадание, а во втором -- мы должны расстаться, чтобы уж не встречаться в сей жизни. Если бы, продолжал я, она избрала последнее, я сам помог бы ей соединиться с тем, кого ока любит, и отдал бы ей не только ее, но и свое. Он выпялил глаза и вскричал: как же так? А так (отвечал я), что она не виновата в чувстве, которым повелевать никто не в состоянии; она была бы виновата, если б таила от меня это чувство и была бы в преступной связи; но если б сказала мне о чувстве -- поступила бы comme il faut {как должно (фр.). -- Ред.}. Такой образ мыслей показался Николаю результатом отсутствия глубокого пламенного чувства. Я начат ему толковать, что глубокое чувство спокойно, просветлено, теплится, а не пылает, греет, а не жжет и пр. Результатом этого разговора были его слова: абстрактно я понимаю вас и согласен с вами, но люблю больше горячее, жгучее чувство,-- и надобно было видеть, как мило-юношески признался он в этом! Увы! я не имел духа к таким признаниям и бесстыдно наклепывал на себя глубокие чувства и высокие мысли, которые абстрактно понимал, и бесстыдно отрицался, как от сатаны, от чувств и мыслей, менее глубоких и высоких, но вполне доступных и милых мне в то время. Не правда ли, что мое прекраснодушие было самолюбиво, ходульно, полно претензии, а прекраснодушие Николая здорово, крепко, НОРМАЛЬНО (ненавистное для тебя слово!). Боже мой, какая глубокая, широкая, могучая натура у твоего брата! И сколько здоровости, нормальности, деятельности! Сколько, вместе с тем, задушевности, мягкости, скромности, стыдливости, целомудренности! Какая милая, женственная непосредственность! Это мужчина-лев, гордый, пламенный, могучий, и в то же время, это родной брат твоей покойной сестры. О, какое глубокое, какое бесконечно глубокое в нем чувство изящного! Я первый открыл в нем этот глубокий, светлый самородный родник абсолютной жизни, я развиваю его -- и любуюсь, наслаждаюсь моим делом, я, Мишель, человек, примирившийся с пошлою, повседневною действительностию. Теперь он у меня почти каждый день -- не идет -- шлю за ним. Он мне необходимее всех в Питере. Может быть, я буду и жить с ним. Я знаю, что я полезен ему, но едва ли он мне не полезнее еще. Мне, то есть моей дряблости, растленности и болезненности, необходимо присутствие такой юной, свежей, простой, нормальней и могучей натуры. Я беспрестанно читаю ему то Гомера, то Шекспира, то Пушкина -- и каждый стих отпечатлевается у него на лице. Это меня подстрекает,-- и потому для меня наслаждение читать ему, и я всегда читаю ему с необыкновенным одушевлением. Ему понравился парадокс Боткина, будто бы недостаток образования и рефлексии, сохранив полноту и природную целомудренность гення Пушкина, сжал его миросозерцание и лишил обилия нравственных идей. Я ему сказал, что это, дескать, вздор и чепуха. Миросозерцание Пушкина трепещет в каждом стихе, в каждом стихе слышно рыдание мирового страдания, а обилие нравственных идей у него бесконечно, да не всякому все это дается и труднее открывается, потому что в мир пушкинской поэзии нельзя входить с готовыми идейками, как в мир рефлектированной поэзии, и что когда Боткин будет поздоровее духом, то увидит это сам. Не только Шиллер, сам Гете доступнее и толпе и абстрактным головам, которые всегда найдут в них много доступного себе; но Пушкин доступен только глубокому чувству конкретной действительности. И потому петербургские чиновники и офицеры еще понимают, почему Шиллер и Гете велики, но Шекспира называют великим только из приличия, боясь прослыть невеждами, а в Пушкине ровно ничего великого не видят. Для меня в этом факте глубокая мысль. Чтобы мою проповедь сделать действительною, я схватил "Онегина" и прочел дуэль Ленского, начало 7 и конец 8 главы. Никогда я так не читал: меня посетило откровение, и слезы почти мешали мне читать. Слушатель понимал чтеца, и оба они понимали Пушкина. Я обратил его внимание на эту бесконечную грусть, как основной элемент поэзии Пушкина, на этот гармонический вопль мирового страдания, поднятого на себя русским Атлантом; потом я обратил его внимание на эти переливы и быстрые переходы ощущений, на эти беспрестанные и торжественные выходы из грусти в широкие разметы души могучей, здоровой и нормальной, а от них снова переходы в неумолкающее гармоническое рыдание мирового страдания. Но лишь толкну Николая на мысль, как он уже бежит вперед, угадывает, узнает ее во всяком стихе, развивает его так полно и непосредственно, так вдохновенно и чуждо всякой рефлексии, что, право, я ему тут сделал столько же, сколько и он мне. Вот, Мишель, прекраснодушие, перед которым я благоговею, вот идеальность, которая есть залог будущей богатой и роскошной действительности! Он понимает действительность, которою окружен, знает цену господам офицерам, но он не смешивает с ними идеи военной службы, любит ее всею душою. Он понимает, что гнусная действительность вне его, а не в нем, и что не она его огадит, а он ее облагородит, в границах круга своей деятельности и своего влияния. Что может быть гнуснее нашей литературы и журналистики, герои которой -- Сенковские, Гречи, Полевые, Булгарины, Раичи и подобные им герои: так неужели, например, я должен поэтому отказаться от литературной деятельности5 и сложа руки сидеть в идеальной воине с нею? Нет, пока рука держит перо, пока в душе еще не остыли ни благородное негодование, ни горячая любовь к истине и благу,-- не прятаться, а идти навстречу этой гнусной действительности буду я. У твоего брата удивительно верный инстинкт и такт действительности: его понятия о ней возвышенны, благородны, пламенны, но и просты и нормальны. Например, он бесконечно глубоко любит своих сестер, для него отрада говорить о них,-- и я проводил с ним целые вечера в разговорах о них, и мы не видели, как летело время... Но он никогда не определяет ни меры, ни идеи их достоинства, не рассыпается в похвалах, но скажет только: они такие добрые, такие милые девочки,-- и на лице его изобразится умиление, а глаза засветятся тихою слезою... Он любит их не для себя, а для них, и Боткин, отнимающий у него сестру, для него так же мил, как и сама сестра. Он не требует от сестер больше того, сколько позволяют требовать вечные и простые законы действительности,-- и если б он увидел от них больше, то есть что-нибудь фантастическое и фанатическое, это глубоко огорчило бы его и заставило бы страдать. Если бы он увидел, что его сестра, любя его, гораздо больше любит своего мужа,-- он за это еще больше б полюбил ее, и это сделало бы его счастливее; если же бы он заметил, что его сестра как бы колеблется между мужем и братом,-- это заставило бы его тяжело страдать. И потому его глубоко огорчили, в письме Боткина, слова, что ты писал к Александре Александровне письмо, полное враждебности к Боткину, и советовал ей вникнуть в свое чувство, ибо-де Боткин отнимет ее от братьев и пр.6. Его радует то, что тебя огорчает, а меня, Мишель, радует эта диаметральная противоположность его чувства с твоим. Да, он не в состоянии понять этой идеальности, самолюбивой, эгоистической, холодной, враждующей с вечными законами истинной идеальности, которой действительность есть осуществление. Он тебя любит -- это знаю, но от этого он вдвойне страдает. Твои противоречия приводят его в недоумение. Живя с ним, ты толковал ему о действительности, а расставшись, пишешь к нему против действительности. Ты возразишь, что восстаешь против моей действительности; но он знает, что я называю действительностию, так хорошо знает, что уж не поверит тебе. Я не выдаю ему себя за действительного человека, нет: я не скрываю, как ты, от него своих дурных сторон, я говорю ему не о моей действительности, но о той, которой я желал бы для себя. Да, он лучше знает меня, чем ты, и если любить -- значит понимать,-- о, он любит меня так, как ты никогда не любил меня. Он знает, что я не хочу быть статским советником и нажиться службою или взятками. Не раз случалось, что я останавливал его удивление ко мне, тотчас обнажая ему задняя славы моея, и очень невыгодно для себя сравнивал себя с ним: надо видеть эту мину какого-то изумления, в которое его это приводило. Чем более узнаю я его, тем более люблю и тем более уверяюсь, что порешь дикий и бессмысленный вздор, говоря, что простота, нормальность и полнота натуры свойственны только скотам и пошлякам. Не худо бы и нам с тобой, Мишель, походить на этих скотов и пошляков: право, мы были бы лучше. Меня, Мишель, не умаслишь похвалами моей глубокой субстанции и прочих в здоров, меня не уверишь, что я страдаю от того, что теперь все человечество страдает: что общего между мною и человечеством? Я не сын века, а сукин сын. Я понимаю страдания какого-нибудь Страуса, которого всякое мгновение было жизнию в общем (не в абстрактном и мертвом, а в конкретном) и было жизнию деятельною: это человек великий, генияльный, моей ли роже тянуться до него -- высоко, не достанешь. Я страдаю от гнусного воспитания, от того, что резонерствовал в то время, когда только чувствуют, был безбожником и кощуном, не бывши еще религиозным, толковал о любви, когда еще <...>, сочинял, не умея писать по линейкам, мечтал и фантазировал, когда другие учили вокабулы; не был приучен к труду, как к святой объективной обязанности, к порядку, как единственному условию не бесплодного труда, а сделавшись сам себе господин, не приучал себя ни к тому, ни к другому, не развил в себе элемента воли. Ко всему этому присоединилась несправедливость судьбы, глубоко оскорбившая во мне самые священные права индивидуального человека; к довершению всего, рефлексия отравляет даже и те немногие минуты святого самозабвения в живой и полной любви, блаженства и страдания Allgemeinheit {всеобщности (нем.).-- Ред.}, которые еще посещают меня при наслаждении искусством, при чтении евангелия и в полете фантазии. В людях я вижу или друзей, или враждебные моей субъективности внешние явления,-- и робок с ними, сжимаюсь, боюсь их, даже тех, которых нечего бояться, даже тех, которые жмутся и боятся меня. Да, мне ничего не остается, кроме участия хоть одного человека, который выслушает любовно и елейно мои конечные и частные страдания и ответит на них ласковым словом, без диссертаций и рецептов для выхода. Логикой немного возьмешь, Мишель. Я это давно уже знаю по бесплодным усилиям растолковать тебе, что 2X2 = 4.
   И ты приглашаешь меня помириться с таким состоянием и смотреть с презрением на всех здоровых и нормальных духом? И ты это называешь идеальностию? Нет, Мишель, человек не машина -- рычаг его движения в нем, а не вне: пусть себе всякий идет своим путем -- кто спасается -- спасайся, кто погибает -- не мешай ему погибать. Может быть, и я еще проснусь и воскресну для жизни; да, может быть, только уже верно не вследствие логически написанного письма.
   Твоя идеальность выключила всю материальную сторону жизни: ты ни минутой не хочешь пожертвовать для денег. Моя действительность этого не допускает: она велит мне читать пакостные книжонки досужей бездарности, писать об них, для пользы и удовольствия почтеннейшей расейской публики, отчеты, а при этом чтении и писании не до знания и не до немецкого языка. А там еще геморрой -- голова болит, поясницу ломит, тошнит, руки и йоги трясутся. Ты знаешь два языка, основания которых узнал в детстве, ты моложе меня, у тебя железное здоровье -- перед тобою широкая дорога, в душе у тебя, как говорит Боткин, много полету -- иди и лети к своей цели; но только помни, что -- достигнешь, я первый с жаром буду тебе аплодировать, срежешься -- громко засвищу.
   Ты упрекаешь меня в нападках на наш кружок, говоря, что прежде он был лучше и что теперь его уже нет. Я рад этому. Всякое теперь есть осуществившееся прежде. Мы не друзья теперь, говоришь ты с грустью, а только приятели: но были ли мы и тогда друзьями? Основа нашей связи была духовная родственность -- правда; но не вмешивалось ли сюда и обмена безделья, лени, похвал, то есть взаимнохваления и т. п.? По крайней мере я очень хорошо помню, что с тобою мы разъехались с того самого времени, как начали стряхивать с себя твой гнетущий авторитет и осмелились, в свою очередь, и говорить тебе правду и учить тебя. Тебе не понравилась эта метода взаимного обучения -- ты всегда хотел быть прав и никогда виноват, ты как на дерзость смотрел на то, что прежде делал с нами. Кто ж виноват, Мишель? Но я -- от души рад, что нет уже этого кружка, в котором много было прекрасного, но мало прочного; в котором несколько человек взаимно делали счастие друг друга и взаимно мучили друг друга. Наконец дети взросли, поумнели, жизнь их начала учить уму-разуму. Вот и я с Боткиным переругался,-- и теперь благодарю судьбу за эту жестокую ссору. До нее я на Боткина смотрел, как на абстрактное совершенство, но она показала мне, что и он человек и в нем много дурного. Я на это рассердился, как будто владел монополией иметь много дурного. Я ощутил к Боткину жесточайшую ненависть, какой ни к кому не питал, к какой даже и не подозревал себя быть способным, хотя и давно знал себя, как зверя. Мы наделали друг другу пакостей -- это была дань духу нашего кружка; пакостнейшая из этих пакостей была та, что в тайны семейной ссоры мы посвятили чужих людей. Но что ж? Все это послужило только к тому, чтобы доказать нам, что мы не просто приятели, а нечто побольше, и что связь наша только более скрепилась от того, от чего все связи разрываются. Я уехал в Питер. Внутренние страдания мои обратились в какое-то сухое ожесточение: для меня никто не существовал, ибо я и сам для себя был мертв7. Наконец Боткин снова воскрес для меня. Полтора месяца писал я к нему, полтора месяца душа моя рвалась к нему и всякая сколько-нибудь теплая минута неразрывно связывалась с тоскливою думою о нем. Я ощущал его в себе, мне казалось, что каждая капля крови моей полна им. И что же? посылаю к нему письмо; а дня через два получаю от него:8 мы сошлись в потребности говорить друг с другом, сошлись, не сговариваясь. В каждой строке его, в каждом слове я видел, чувствовал, что такое для меня этот человек и что я для него. Получаю от него ответ на письмо мое -- начинаю читать -- нет, у меня нет слов, чтобы выразить это впечатление. Я был и взволнован, и восторжен, и умилен, и вместе с тем -- поражен и изумлен: я никогда не мог предполагать в человеке столько любви и такой любви,-- и что Яч? Эта любовь ко мне. Я тотчас же сказал Языкову, что после этого стоит жить и страдать, и что большего требовать от дружбы невозможно. Действительность победила фантазию. Да, Мишель, скажи -- ты ведь читал это письмо -- что же это такое, если не дружба, если не святое и великое таинство дружбы? Чего же еще желать, чего требовать? Тут передо мною воскресли все жертвы этого человека для меня, все, что он для меня делал и что я так мало ценил. Скажи же мне, есть ли мне причина жалеть о прежнем кружке, где я столько имел, не зная, что столько имею? А теперь я знаю, что не одинок я в мире, что есть у меня с жизнию живая, кровная связь -- есть пламенное, высокое и благородное сердце, где я всегда безвыходный гость, куда я всегда смело могу постучаться, чтобы получить утешение в страдании, сложить тяжелое бремя мук жизни и снова полюбить жизнь. Если в этом частном явлении есть общее,-- то я благоговею пред этим общим и поклоняюсь ему. Апостол Иоанн сказал: "Кто говорит: я люблю бога, а брата своего ненавижу,-- тот лжец: ибо не любящий брата своего, которого видит, как может любить бога, которого не видит?"9 Я чувствую, что могу любить невидимого бога только в видимых явлениях. К этому, у меня есть убеждение, что я не могу не увидеть бога ни в одном явлении, где только он является. Вся жизнь моя есть оправдание этого убеждения: я увидел Станкевича и полюбил бога, увидел твоих сестер и полюбил бога; я люблю его и в любви Боткина к твоей сестре и жалею, что ты еще так неясно видишь его в этом явлении.
   Но довольно. Письмо мое, сверх ожидания, вышло гораздо длиннее, чем предполагал я, начав его. Не сердись, Мишель, за жесткий тон: ты сам вызвал меня, забыв прошедшие опыты. Кто же виноват, что ты так мало меня знаешь, хотя и давно со мною знаком. Повторяю тебе, если бы я и рожден был для знания, если бы мне и суждено было выучиться по-немецки,-- то писем, подобных твоему, достаточно, чтобы отвратить меня от того и другого. Так уж я создан -- такая моя натура: рассуждение никогда и ничего мне не доказывает. Я же от тебя давно уж это слышал. Все твои письма -- одно и то же, и это "одно и то же" превратилось у тебя в общие места. Это производит пренеприятное впечатление. Брат твои говорил мне, что он всегда с жадностию хватался за твои письма, но прочтя, ничего не понимал и вместо радости ощущал какое-то неудовольствие. Жизнь -- враг книги. Книга хороша в книге. Притом же, тащить за собою -- система самая ложная. Иди своей дорогою, оставляя других идти своею. Мне кажется, главнейшая ошибка всей твоей жизни, ошибка, которая делает тебя так тяжелым для других,-- есть та, что ты нисколько не призван действовать на других своею индивидуальностию, а между тем считаешь себя призванным именно на это. Тебе не терпится, что другой думает и делает не по-твоему. Ты начинаешь читать "Ричарда II" с тем, чтобы раскрыть святая святых этого великого создания другим; но читать ты не умеешь -- поэзия мрет в устах твоих -- "Ричарда" не понимают -- ты бесишься и оскорбляешь человека так, что он никогда этого уже не забывает. Поверь мне, что такая идеальность хуже всякой действительности: она профанирует, губит самое себя в глазах других. Что я перед тобою в мысли? -- ничто, а если и есть что-нибудь, то благодаря тебе же. И что же? Я говорю -- меня слушают, понимают, мне верят, и я во многих успел возбудить уважение к философии, которой не понимаю,-- и слышавшие тебя с какою-то радостию уверяют меня, что лучше тебя это понимаю.
   Прощай, Мишель. Еще раз, не сердись. Желаю тебе уехать в Берлин, желаю от всего сердца, чтобы ты сумел овладеть собою и прожить на 2000 р. в год, чтобы ты вполне достиг своей цели. Но только тогда и поверю действительности твоего стремления. Что делать? С тех пор, как я увидал свою нищету, ничтожество, дряблость, бессилие,-- я уж не верю словам, а верю только делам, фактам. Только слово, осуществляющееся в жизни,-- для меня живое и истинное слово. Сбудется то, к чему ты стремишься, будущее сделается настоящим,-- может быть, тогда твой пример будет для меня полезен, а пока...
   В ожидании -- жму твою руку.

Белинский.

  

66. В. П. БОТКИНУ

14--15 марта 1840. Петербург

   СПб. 1840, марта 14. Мне, видно, уж назначено судьбою не переставать делать глупости, любезный мой Василий! Говорю о моем прекраснодушном и москводушном послании к Мишелю1, которое ты уж верно получил от Языкова. Стыдно и досадно вспомнить, что я, вместо коротенькой записочки с некоторою ироническою улыбкою, вздумал, в целой тетрадище, диспутовать с ним о том, что 2X2 = 4, и показывать ему гнойные раны моей души, на которые он, с высоты своего величия, философски наплюет. Еще слава богу, что промедление в отъезде Языкова дало мне возможность и время спохватиться в глупости и сказать тебе, чтобы ты ни под каким видом не показывал Мишелю моего глупого письма. Не дурачество ли, в самом деле? -- Я толкую Мишелю, что логикой не заставишь человека измениться,-- а сам хочу изменить его -- бранью. Нет! кто чем родился, тот тем и умрет, и если человек не по моей натуре, прочь от него, да и дело с концом, вместо того, чтобы тратить попусту бумагу и время. Не отрицаю в Мишеле действительной стороны, даже чего-то великого, но, со всем тем, он в моих глазах сухой человек, олицетворенный дьявольский эгоизм,-- и пора мне перестать о нем и говорить и думать! Много я наделал в жизнь свою глупостей, о которых и больно и стыдно вспомнить, но -- знаешь ли что? -- для меня они и благороднее, и чище, и святее, и разумнее всех дел Мишеля, потому что источник их -- сердечность, которой у него столько же, сколько у меня спекулятивности. Его отношения к тебе возмутительны и отвратительны. Бедный Николай глубоко страждет от них и говорит, что он отца ни в чем не винит, прощает ему даже все его хитрости и кривды и что его отец вправе всеми силами противоборствовать всякому делу, в котором имеет участие Мишель и дух его. Понимаешь ли, Боткин! Вероятно, ты не имел глупости отдать Мишелю письма Николая. План действий переменяется и -- что меня особенно радует -- совсем не по моему совету. Меня не было дома, и Николай без меня прочел твои письма и ко мне и к нему и решил, что и как надо делать. План этот очень прост: цель его -- счастие ваше2, а средство -- прямота в действиях и характер действий -- непосредственность личного влияния. Он не будет спорить ни с Мишелем, ни с сестрами, но будет просто (без поганой философии) и прямо говорить, что это он понимает так, а это -- этак, а почему? -- по простому чувству и простому здравому смыслу, но что всякий может думать и делать по-своему. Вот и все! Если отец будет ему говорить о поступках и философской поведенции Мишеля, он не будет с ним спорить, но прямо скажет, как он на это смотрит, а где тяжело будет сказать, там красноречиво промолчит. Отец скажет ему, что он не может отдать дочери за купца -- он ответит ему, что он совершенно прав, что его права, как отца, священны и неоспоримы и что ему самому было бы приятнее, если бы ты был дворянин, а не купец; но что со всем этим он от всей души желает, чтобы брак состоялся и что он тебя любит, как родного брата, не видавши, за то только, что ты любишь его сестру, и что его сестра любит тебя; и что он, если поедет в Москву, остановится прямо у тебя, как у друга и брата. Другими словами: отец прав, делая по-своему, но и он прав, делая по-своему же. Само собою разумеется, что он будет делать уклонения от этого плана по указанию обстоятельств. Положись на него: в нем глубокое чувство действительности и чрезвычайно верный такт. Если его уволят не на две недели, а на 28 дней, он приедет к тебе. Для этого хочет отказать себе во всем, чтоб сберечь деньжонки, но я ему сказал, что это уж твое дело. Он и руками и ногами -- весь вспыхнул, но я ему все-таки сказал, что это вздор и что из ложного стыда глупо жертвовать, может быть, участью двух человек, и что не он попросит у тебя денег, а ты предложишь их ему. А хорошо, как бы он приехал к тебе! Не говоря уже о том, что ты познакомился бы с братом своим, он мог бы, может быть, сказать тебе много такого, чего не выговоришь в письме. Ах, Василий, как грубо все они не поняли и не оценили этого человека, который выше всех их! Когда он входил к ним -- они прерывали разговор и вообще смотрели на него, как еще на несозревшего или, может быть, недостойного и неспособного к полному посвящению в их магнетические таинства. О Мишенька! горе тебе, если хоть на минуту откроются твои глаза -- ты не захочешь жить!
   Нынче (15 марта) получил твое письмо3. Эпитет милого, прилагаемый к Языкову, очень меня обрадовал. Я боялся, что исключительная сосредоточенность в личном интересе не допустит тебя узнать этого человека. Но теперь я уверен, что ты уже оцепил его, а он, Боткин, дорого стоит -- это алмаз самородок! Что ты мне поешь о том, что не надо отдавать моего письма Мишелю? Верно, Языков отличился: я просил и заклинал его 100 раз, чтобы он тотчас же сказал тебе, чтобы ты ни под каким видом не показывал моего письма Мишелю. По моей натуре я создан делать глупости и, сделавши, тотчас сознавать их. Равным образом превеликую сделал бы ты глупость, за которую стоило бы вырвать из твоей лысины последние волоса -- сие, как пишешь ты к Панаеву, суетное украшение и излишнюю тяжесть -- если бы отдал Мишелю и Николаево письмо, в чем совершенно согласен со мною и сам красноречивый автор оного. Нет, с Мишенькой надо делаться иначе: ведь с эгоизмом опаснее вести борьбу, чем с прекраснодушием.
   Тяжело пали на мое сердце две твои строки по поводу "Ричарда II". Отвяжись! -- пишешь ты. Ах, Боткин! Боткин! не будем говорить друг другу этого слова, но будем входить в интересы друг друга и участием облегчать взаимные страдания. Выходка моя была не против тебя и кружка нашего -- вы были тут только предлогом; она была против расейской публики4. Знаю, Боткин, что тебе до нее нет дела -- для тебя самое слово "литература" огажено и пошло. Но я -- мой другой удел: расейская публика высосала из меня всю свежую кровь, сосет теперь остатки, но я уже не чувствую -- притерпелся. Не у всех такие счастливые и благодатные натуры, как, например, у тебя и Языкова: ваша жизнь внутри вас -- мир объективный для вас, предмет созерцания и наслаждения; если вы берете в руки журнал, хороша статья -- прочтете, глупа -- посмеетесь или бросите, не дочитав. Но для меня объективный мир -- страшный мир; я зацепил его только маленький уголок, но вросся в него всеми корнями души моей, и потому внутреннее счастие для меня невозможно. Если бы я получил воспитание, учился и поехал учиться в Берлин, я был бы поклонником Ганса: теперь для меня это ясно. Котерия5 -- сфера моей жизни, а общее для меня только в искусстве. Каково же, Боткин, сосредоточить всю жизнь свою, все свои страдания в двух-трех вопросах и услышать на них "отвяжись"? Зачем же вопль человека должен умирать в пустыне никем не услышанный? Или и в самом деле -- ведь нигде на наш вопль нету отзыва?6 Тяжело, ей-богу, тяжело! Хотел, скрепя сердце и сжавши зубы, промолчать, но прекраснодушие преодолело -- и я хочу все высказать тебе. Для этого я должен познакомить тебя с домашними тайнами "Отечественных записок". Письмо это пойдет к тебе не по почте, и ты никому его не покажешь. Слушай же и пойми, если не для себя, когда это чуждо тебя, то для меня, или хоть притворись, что понял и принял к сердцу. Прошлого года "Отечественные записки" имели около 1200 подписчиков, нынешний -- 1375; за прошлый год на них долгу с лишком 50 000, за нынешний будет около 40000, итак, к декабрю будет на них 90 000 долгу да в придачу плохая надежда на 2250 подписчиков. Между тем, сделано все, что можно, даже больше, что можно было сделать: почти без денег основан был журнал, Краевский трудился и трудится до кровавого поту, аранжировано у него все необыкновенно хорошо, наконец, порядочные люди пристали к нему, дали ему направление, характер и единство (которые есть только в одной похабной "Библиотеке для чтения"), мысль, жизнь, одушевление (которых нет ни в одном журнале); повестей и стихов таких тоже нигде нет, отделения разнообразны,-- чего бы еще? А между тем, хоть тресни. И добро бы Сенковский мешал -- нет, Греч с Булгариным -- хвала и честь расейской публике <...> это подлое баранье стадо! Живя в Москве, я даже стыдился много и говорить о Грече, считая его призраком; но в Питере он авторитет больше Сенковского. Лекции свои он начал читать, чтобы уронить "Отечественные записки" -- он говорит это публично7. Вот тебе и действительность! Придется давать уроки! Но если бы и не это, если бы у меня и были деньги, мне все не легче: я теперь понимаю саркастическую желчность, с какою Гофман нападал на идиотов и филистеров, я связан с расейскою публикою страшными узами, как с постылою женою -- хоть и <...>, а развестись нельзя. Пойми это, Боткин! О, я теперь лучше бы сошелся с Грановским, лучше бы понял и оценил эту чистую, благородную душу, эту здоровую и нормальную натуру, для которой слово и дело -- одно и то же. Да, по-прежнему брезгаю французами, как <...>, но идея общества обхватила меня крепче,-- и пока в душе останется хоть искорка, а в руках держится перо, -- я действую. Мочи нет, куда ни взглянешь -- душа возмущается, чувства оскорбляются. Что мне за дело до кружка -- во всякой стене, хотя бы и не китайской, плохое убежище. Вот уже наш кружок и рассыпался и еще больше рассыплется, а куда прилепить голову, где сочувствие, где понимание, где человечность? Нет, к черту все высшие стремления и цели! Мы живем в страшное время, судьба налагает на нас схиму, мы должны страдать, чтобы нашим внукам было легче жить. Делай всякий не что хочет и что бы должно, а что можно. Черта ли дожидаться маршальского жезла -- хватай ружье, нет его -- берись за лопату да счищай с расейской публики <...>. Умру на журнале и в гроб велю положить под голову книжку "Отечественных записок". Я литератор -- говорю это с болезненным и вместе радостным и гордым убеждением. Литературе расейской моя жизнь и моя кровь. Теперь стараюсь поглупеть, чтобы расейская публика лучше понимала меня: благодаря одуряющему влиянию финских болот и гнусной плоскости, на которой основан Питер, надеюсь вполне успеть в этом. (Я боюсь в Николая Александровича влюбиться -- право, природа хотела им изъявить свое раскаяние за произведение Мишеля. Ах, как полюбишь ты его, какого человека узнаешь ты в нем!)
   Насчет Краевского ты ошибаешься. Не то дурно, что он наврал о <...> повестях Павлова, а то дурно, что он взялся писать о том, о чем не следовало бы ему писать8. Это человек дела, а не мысли. Я его люблю и уважаю, как все, кто его знает лично. Ему большую делает честь, что он бросил блестящую карьеру, которая открылась ему чрез археологическую экспедицию, и бескорыстно предался журналу. Ему 30 лет, а волосы у него зело с проседью, вследствие тяжкого и постоянного труда до кровавого поту и героической борьбы с страшною действительностию. Мне нравится в нем и то, что теперь только порядочные люди имеют на него влияние, а вся дрянь отстает. Он уже начинает посмеиваться над повестями Павлова, и, когда Панаев сказал ему, что ты называешь их <...>, он захохотал. На письмо Павлова о вредности моего влияния на журнал9 он отвечал коротко и ясно: за дружеские советы благодарю, а намеков не понимаю. Это, брат, человек с характером железным, ему стоит раз напасть на дорожку, а там уж его железным воротом не сдвинешь. Лишь бы "Отечественные записки" пошли, а то следующие три повести Павлова, если он их <...>, буду разбирать я, да и по-своему. Я Краевскому не даю советов, а он мне ни слова не говорит ни о достоинстве моих статей и об истинности моих идей, ни о своем ко мне уважении (он не любит говорить), но в "Отечественных записках" я у себя дома. Этому много причиною родство и единство моих убеждений и писаний с Катковыми и твоими: у Краевского есть чутье. Кроме того, когда он в своей тарелке, он человек с дарованием и энергиею: прочти его катки Цурикову, Булгарину, Гречу10. Тебя такие вещи мало интересуют, но для меня они важнее и дороже всех немецких книг, -- и тяжело мне было бы, если бы ты этого не понял.
   Кстати: с чего ты взял отказываться от экземпляра "Отечественных записок" и "Литературной газеты" Краевского? Человек тебе кланяется, а ты плюешь ему в рожу да еще поручаешь эту комиссию Панаеву. Воля твоя, а это та сторона нашего кружка, которая мне так не нравится. Ты дал две статьи и не взял за них денег: уже из одной вежливости Краевскнй мог послать тебе свои журналы. Но кроме этого, он уважает тебя за твои статьи, от которых в восторге, уважает тебя за то, что тебя уважаю я и Катков. Зачем же грубостию платить за внимание и плевать на протянутую для пожатия руку? Что за несчастие, что у тебя 2 экземпляра "Отечественных записок"? Один будет у тебя, другой наверху, у твоей сестры и брата. Если же не так, ну сожги, брось в нужник, если большего не стоит.
   Беспокоит меня ответ Кульчицкому -- приличие требует его, а странность отношений этих делает трудным11. Два дня я был, как сумасшедший, но на третий я забыл, как будто этого не было. Постоянна и неизменно пребываема для меня только гнусная действительность, а прекрасные мечты минутны и пропадают без следа. Однако ж напишу как-нибудь, хоть, право, не знаю, как и о чем писать: поневоле придется написать вздору о том, что Харьков мне давно не чужд по покойному Кронебергу и мистическому уважению ко всему его семейству.
   (Пожалуйста, пиши ко мне вот по этому адресу слово в слово. Его благородию В. Г. Белинскому в СПб., в контору редакции "Отечественных записок", на Невском пр., в доме Лукина, No 47; а то письма распечатывает Краевский и бесится за это на меня.)
   Ты сердишься, что я тебя хвалю. В самом деле, глупо. Но что ж делать, если это невольно вырвалось из души и было для меня так отрадно? Не бойся, чтобы я видел в тебе одно хорошее: я знаю тебя вдоль и поперек и за бранью дело у меня не станет. Покуда будет с тебя и этого.
   Познакомился ли Языков с Бакуниными? Николай Александрович дал ему письма к отцу и к сестрам. Это меня дьявольски интересует. Бога ради, уведомь. В 3 No "Отечественных записок" славная повесть Соллогуба: чудесный беллетрический талант 12. Это поглубже всех Бальзаков и Гюгов, хотя сущность его таланта и родственна с ними. Лермонтов под арестом за дуэль с сыном Баранта. Государь сказал, что если бы Лермонтов подрался с русским, он знал бы, что с ним сделать, но когда с французом, то три четверти вины слагается. Дрались на саблях. Лермонтов слегка ранен и в восторге от этого случая, как маленького движения в однообразной жизни. Читает Гофмана, переводит Зейдлица и не унывает13. Если, говорит, переведут в армию, буду проситься на Кавказ. Душа его жаждет впечатлений и жизни.
   (Что Паша Бакунин от тебя отшатнулся -- это меня нисколько не удивило: у меня удивительно верное чутье... Николай -- другое дело: он больше брат своим сестрам, чем братьям. Чудный малый!)
   Скажи Кетчеру, что он не шлет "Цахеса"?14 Да пусть переведет "Мейстера Фло"15,-- все напечатается, и за все он получит деньги. Он много обещал, а ничего не делает. А что Грановский с своей статьей, что Редкий -- сукины дети -- только обещаются. Катков очень достолюбезен с своими обещаниями. Зарежет он Краевского, если к 1 числу не пришлет статьи о Сарре Толстой16. Я уж устал -- одних критических статей навалял 10 листов дьявольской печати, кроме рецензий. Скажи Каткову, чтобы он попросил Галахова повидаться с Вельтманом, который дал для альманаха Владиславлеву статейку "Лихоманка"; Владиславлев ее не берет, так Краевский просит для "Литературной газеты"17. Катков прислал к Краевскому стихи Сатина -- <...> -- воняет!18 О, как слепа дружба! Краевский их бросил, а я и не видал. Видишь ли, как "Отечественные записки" начинают чуждаться всего <...>! Прощай, некогда писать, а по почте этого письма не хочется посылать. Гоголь доволен моею статьею о "Ревизоре" -- говорит -- многое подмечено верно19. Это меня обрадовало. Все сбираюсь писать к Кудрявцеву и Каткову, да апатия мешает. Краевский в восторге от рецензий Кудрявцева20. В самом деле, прекрасны. Советуй ему продолжать, оно и скучновато, а Еедь уроки еще скучнее.

Твой В. Б.

   Нельзя ли переслать ко мне письмо Станкевича21, да похлопочи поскорее о своей, Каткова и Кудрявцева физиономии22. Кирюше поклон, эх, как бы ему в Питер!
  

67. В. П. БОТКИНУ

19 марта 1840. Петербург

   СПб. 1840, марта 19, утро, 12 часов. Сейчас, милый мой Василий, хожу по комнате и думаю о тебе -- вдруг отворяется дверь и входит Кирюша1. Представь себе мою радость! Читаю твое письмо -- сердце мое облилось кровью и исполнилось негодования и ненависти к подлецу, именем которого не хочу сквернить моего письма. Бедный мой друг, о если бы ты знал, как пало мне на сердце твое горе, как понимаю я тебя и сочувствую тебе в эту минуту2. Если можно тут помочь слезами -- возьми мои горячие слезы. Сейчас пойду к Николаю Александровичу -- Боткин, не все еще погибло -- верь сердцу Николая -- в нем столько же энергии, сколько и любви. На весах ее души, ее сердца, ее любви -- он много будет значить -- может быть, он перетянет,-- не только уравновесит. Если бы в эту минуту я увидел дьявола -- чувствую, нет, это не фраза! -- чувствую, что готов был бы стреляться спим. Он убьет ее -- отказавшись от тебя, она умрет, ибо ничто, кроме призраков, не вознаградит ее за жертву; тогда как, отказавшись от них, она бы воскресла, ибо увидела бы тотчас, что за отречение от призраков вступила бы в мир блаженной действительности. О гнусный, подлый эгоист, фразер, дьявол в философских перьях! Меня теперь радует, что я написал к нему такое письмецо, от которого его покоробит3. Дай ему денег -- обещай еще больше, благоговей пред его глубокою натурою и великим духом -- за такую выгодную плату он сторгуется. Боткин, крепись, будь мужчиною в великий час великой борьбы -- будь достоин победы! Не теряй духа, ты не без друзей -- у меня для тебя есть открытое любящее сердце и слезы, а <у> Николая Александровича при этом -- и средства и влияние, чтобы действовать. На шестой неделе он отправляется домой -- и я уверен, что эта поездка решит твое дело в твою пользу.
   Тысячу спасибо тебе за Степановскую расписку -- еще одной горой меньше на душе моей, и ворота в Москву отворены4. Боткин, если тебе будет тяжело невыносимо и нужна будет душа, которая на время отреклась бы от всех своих интересов и жила бы только тобою и для тебя,-- одно слово, и я с тобою, несмотря ни на какие препятствия. Прощай. Сейчас прочел Гофмаиова "Мастера Мартина"5 -- великий поэт! Шиллер, Гете и Гофман: сии три едино суть -- глубокий, внутренний и многосторонний германский дух! Теперь, Боткин, пиши ко мне чаще -- каждый день: это нужно и для тебя -- чтоб Николаю Александровичу все было известно. Прощай, мой бедный Василий -- до нового письма.

Твой В. Б.

  

68. М. А. БАКУНИНУ

14--18 апреля 1840. Петербург

   Любезный Мишель, вид твоего письма1 произвел во мне такое впечатление, как будто бы у меня по телу поползли мокрицы; долго я боролся между долгом прочесть его и желанием разорвать, не прочтя. Мысль о полемике, о прекраснодушных и москводушных проделках, за которые мало драть за уши и пороть розгами,-- эта мысль была для меня кислее уксусу, вонючее... (забыл по-латыни) чертова <...>, горше и отвратительнее самой гнусной микстуры. Но когда я прочел твое письмо, то вельми возрадовался. Спасибо тебе за него, сто раз спасибо тебе. Ты поступил на этот раз по-человечески, преодолев чувства досады и враждебности, которые должно было возбудить в тебе мое письмо2. В твоем письме нет ненавистной для меня философии (то есть резонерства), но зато есть человечность, и от него веет духом. Знаешь ли ты, что только оно, это письмо, еще в первый раз, убедило меня, что твое стремление в Берлин не пустая мечта праздного самолюбия, а действительная потребность. Прежде я не мог без чувства отвращения слышать от тебя о Берлине (в который ты, правду сказать, сбирался по воздушной почте), но теперь я принимаю это дело к сердцу,-- и верь мне, если б я имел средства, то делом доказал бы мое участие. Ты подавил в себе ложный стыд, заглушил голос одураченного самолюбия и обратился к прямому и единственно истинному и действительному средству для поездки в Берлин -- к отцу3. Поздравляю тебя, Мишель; ты одержал великую победу над своим лютейшим и опаснейшим врагом -- над самим собою, над своим самолюбием. Искренно и любовно желаю, чтобы это обращение было искренно и действительно, а не минутный порыв, и чтобы ты вошел с отцом в прямые и чистые от всякие скверны отношения, то есть для него самого, а не для Берлина только. Николай чуть не плакал от твоего письма: он говорит, что это еще первое человеческое письмо, написанное твоею рукою, которое он прочел. Он говорит, что отец будет рад и охотно даст тебе не только 1500, но 2000 р.; но что, вместе с тем, он поступит тут не по-детски, а по-старчески, и, чтобы испытать, для него ли самого, или только для Берлина ты обращаешься к нему, потребует, чтобы ты ехал в Прямухино и занялся хозяйством и продержит тебя с год времени. Николай говорит еще, что ты поступил бы очень дурно и неразумно, если бы со всем самоотвержением и со всею искренностию не подвергся этому испытанию. Я совершенно с ним согласен. У всякого есть свои священные права, и без взаимных уступок нельзя ладить людям друг с другом.
   Также чрезвычайно меня обрадовало твое признание, что ты без поездки в Берлин обратишься в ничтожество. Я вспомнил твои упреки мне, что я ограничиваю свою жизнь конечными условиями, зависящими от слепого случая. Итак, моя несчастная действительность одержала над тобою великую победу. Да, Мишель, владычество разумной действительности не подвержено никакому сомнению, но и случай, в свою очередь, царит над людьми самовластно. Без владычества случая жизнь была бы не свободною, а машинальною, не было бы в ней борьбы, а при борьбе падение так же необходимо, как и победа. Теперь ты, верно, лучше поймешь, как иной может в сочувствии женщины видеть условие своего искупления и примирения,-- и не станешь давать благоразумных советов о необходимости Entsagung {отречения (нем.). -- Ред.}. Всякому свое, и дело дружбы -- участие в своем каждого, а не советы, которые только оскорбляют и охлаждают дружеские отношения. Прекрасно сказал ты, что "жизнь всякого обусловливается совершенно особенными, чисто индивидуальными обстоятельствами, которые не могут и не должны улетучиваться во всеобщем и которые доступны только для непосредственно и таинственно созерцающей любви".
   Если ты проживешь год в Прямухине, это время не может попусту пропасть и для приготовлении к Берлину; можно устроить так, что оно не будет для тебя потеряно и со стороны хоть какого-нибудь обеспечения чрез "Отечественные записки", особенно, если ты возьмешь что-нибудь поделать и по части истории, и что-нибудь переводить с немецкого. Я готов хлопотать тут со всем усердием и думаю, что мое участие не будет для тебя бесполезно. Теперь о твоих статьях. Начну с того, что твоя статья уже напечатана и что она привела Краевского в восторг своею ясностию, последовательностию и простотою; особенно его восхищает твоя катка эмпиризму. Из статьи твоей вышло 17г листа с небольшим, то есть 150 р. с небольшим4. Ты спрашиваешь, будут ли твои статьи считаться за одну или за две -- смешной и детский вопрос! Тебе до этого нет дела: дело в числе листов, а не в числе статей. Раздроби целую книгу на сто статей или считай ее за одну статью -- число листов в ней будет одно, а следовательно, и одна плата; Краевский не ограничивает твоей деятельности двумя статьями -- их может быть и пять и больше, да только с разными условиями и ограничениями. Если ты напи<далее -- текст утерян>.
  

69. В. П. БОТКИНУ

16--21 апреля 1840. Петербург

   СПб. 1840, апреля 16 дня. Давно уже сбираюсь писать к тебе, мой дражайший и лысейший Василий, но все не мог собраться. Не поверишь, что за апатия, что за лень овладели мною -- истинное замерзание души и тела. Да, и тела, ибо и оно ничего не просит, и если исправно ест, то больше для порядка, чем для удовольствия. А душа совсем расклеилась и похожа на разбитую скрипку -- одни щепки, собери и склей -- скрипка опять заиграет, и, может быть, еще лучше, но пока -- одни щенки. Большею частию лежу на кровати и думаю об испанских делах1. Если день дурен, то свинцовое небо давит меня,-- и я лежу, уже ни о чем не думая, как живой труп. Но, как нарочно, погода стоит божественная -- на небе ни облачка, все облито золотом лучей солнца, и только местами лед на улицах, да ледяная кора на Неве и Фонтанке давят душу. В такие дни у меня (в) душе пусто, но как-то весело: взгляну на окно, пойду шляться по Невскому -- и хорошо, а в душе, все-таки, фай -- посвистывает2. Только фантазия и жива, но это к моему горю, ибо фантазия первый мой враг и губит меня. Ложусь спать с твердым решением поутру приняться за дело; проснусь -- и до 12 часов пролежу, а там гулять до 4, а там обедать, пить чай и снова ложиться с мыслью о том, что завтра надо начать работать.
   Николай не едет на праздник. Он переходит в армию и месяца через полтора совсем переедет в Тверь. Следовательно, ты тогда и увидишься с ним. Потерпи немного для своей же пользы. Он немного хлопотал, но уже много сделал: он писал к ней3 -- письмо его полно любви и убеждения, задушевно и просто: чуть ли то, которое ты получил от нее и которое так тебя обрадовало, чуть ли оно не было результатом письма Николая к ней. Прекрасное письмо -- хоть в нем Николай и явился в форме природным русским дворянином, то есть хоть в нем нет ни складу, ни ладу, ни знаков прешшання, ни орфографии, но оно полно энергии и любви и не могло не подействовать. Из него она узнала, что у ней есть брат совсем другого рода, чем те. Он тоже получил от нее два письма на двух оборотах одного и того же листика -- хорошо, но только я ровно ничего не понял. То говорит она, что ее участь неразрывно связана с твоею, то, что не может сносить мысли, что ты потеряешь какую-то свою свободу (в самом деле, ужасная потеря!). Признаюсь тебе, мой Василий: люблю тебя, понимаю твое чувство, сколько потому, что понимаю тебя, столько и потому, что изучил твое чувство, принимаю в нем величайший интерес; но -- знаешь ли что? -- извини за откровенность -- от избытка чувств уста глаголят: люблю и ценю ее, но не понимаю ни ее, ни ее чувства. Может быть, причина этого -- моя ограниченность; но ведь я понимаю же другое, а притом я твердо уверен и глубоко убежден, что все глубокое и великое -- просто, хоть и не все простое глубоко и велико. Она представляется мне в форме спящей красавицы, которую злой волшебник (назовем его хоть Альбано4) околдовал непробудным сном. Чудо должно прервать сон, по чудо совершилось, а сон еще продолжается... Или это уж не сон, а медленное пробуждение от магнетического сна, пробуждение с тяжкою зевотою и непонятным лепетом бреда!.. Может Сыть, дай бог!.. А я все-таки скажу тебе, что мне жаль тебя, очень жаль, и что я лучше хочу влачить мое апатическое существование и не знать никакого счастия, нежели узнать твое счастие. Напрасно ты просишь Николая действовать -- верь, что твои просьбы тут совершенно излишни. Ручаюсь тебе за этого малого смелее, чем за себя (ибо за себя я только в одном могу поручиться, что я дрянь). Твое дело -- его дело. Он сделает все. Я уверен, что старик любит и уважает его больше, чем Мишеля, и, следовательно, он может иметь на него влияние. Ах, Боткин, как нетерпеливо желаю я, чтобы ты с ним увиделся, узнал и полюбил его. Он так сущей, что за него можно простить природе и судьбе за произведение четырех московских Бакуниных5.

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   Очень мне неприятно и досадно, что ты не получил моего маленького письмеца6 в ответ на твое маленькое письмецо,, полученное мною от Кирюши. Ты должен был получить мой ответ в пятницу, то есть на другой день после получения моего письма от управителя Заикниа. Но, видно, оно пропало -- жаль, очень жаль! Оно было коротко, но полно любви к тебе -- я писал его к тебе со слезами. В эту минуту мне показалось, что я не трус, не дрянь, не г... и только бы увидел Мишеля, как попросил бы его или убить меня, или позволить мне убить его. Бывают минуты, когда и зайцы делаются львами. Бедный Николай был убит этою твоею запискою и страшно свирепствовал, хоть и ничего не говорил. Этот человек вообще мало говорит -- москводушия в нем -- ни тени. 1000 поклонов тебе за то, что ты развязал меня с Андросовым и Степановым7. О, если бы ты знал, что ты этим для меня сделал! -- ты был бы счастлив целый день, а это не шутка -- иметь в жизни целый день чистого счастия! Бог даст, я возвращу тебе эти деньги, а не даст -- все же лучше -- от Степанова ты никогда бы не получил их. Спасибо -- я теперь легче сплю, и меня уж не так жжет, когда я ложусь спать.

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   Спасибо тебе за объяснение по случаю "отвяжись": оно много сняло с меня и много дало мне8. Говорю не шутя: я рад моей ошибке. Знаешь ли, Боткин, что это такое для меня? Я наконец вижу, что, как человек, я -- дрянь, о моих знаниях и содержании того, что и о чем я пишу, не стоит и говорить; мне остается одно: объективный интерес моей литературной деятельности. Только тут я сам уважаю себя и сознаю не дрянью, потому что вижу в себе бесконечную любовь и готовность на все жертвы; только тут я и страдаю, и радуюсь не о себе и не за себя, только тут моя деятельность торжествует над ленью и апатиею. И потому я больше горжусь, больше счастлив какою-нибудь удачною выходкою против Булгарина, Греча и подобных сквернавцев, нежели дельною критическою статьею. Каково же мне было думать, что близкие ко мне не ценят меня именно в том, в чем я еще имею какую-нибудь цену, а ценят в том, в чем я ни гроша не стою? Это условие sine qua non {непременное условие (лат.). -- Ред.} моих искренних и прямых отношений с кем бы то ни было,-- и потому я рад возникшему между нами недоразумению -- теперь с меня свалилась гора, и только теперь я знаю, что ты понимаешь меня. Мне заперты все пути к человеческому счастию -- это вопрос решенный для меня -- я уж об этом не могу рассуждать, спорить и много говорить -- иногда только вырвется из растерзанной груди горькое слово, да тут же и проглочу его -- и больше ни слова. Итак, только одно и остается мне -- сфера моей литературной деятельности, какова бы она ни была. Видно и в самом деле я нужен судьбе, как орудие (хоть такое, как помело, лопата или заступ), а потому должен отказаться от всякого счастия, потому что судьба жестока к своим орудиям -- велит им быть довольными и счастливыми тем, что они орудия, а больше ничем, и употребляет, пока не изломаются, а там бросает. Так и я: в жизни ни <...>, помучусь, поколочусь, как собака, а там издохну, то есть погружусь в мировую субстанцию и в ней заживу на славу. Лестная перспектива впереди! И потому еще раз спасибо тебе, Боткин. Теперь мои отношения с тобою еще прямее, а я больше тебя люблю и больше в тебя верю.

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   Теперь приложи весь слух и все твое внимание к сим строкам и выполни мою просьбу с усердием и точностию, хотя бы из этого и ничего не вышло. Слушай. Дела "Отечественных записок" худы донельзя. Еще за прошлый год они должны много, теперь же издаются опять почти в долг. Начались они, как обыкновенно начинаются теперь такие предприятия на Руси -- обществом на акциях. Но акционеры дали едва ли по половине и по четверти того, что хотели дать; некоторые ничего не дали9. Лютейшие из них -- Враский и Владиславлев. Первый печатает их в своей типографии, берет с Краевского 140 р. за лист, то есть ровно вдвое против того, что взял бы всякий другой типографщик. И это во имя любви к русской литературе. Враский -- чиновник и родственник Одоевского, доселе и Краевский считал его честным и благородным человеком. Вдруг он требует денег, Краевский говорит, что их нет, и посылает ему счета. Враский отвечает, что не выпустит No (IV), и в самом деле удержал последние листы, которые должны были пойти к переплетчику. Краевский дал ему доверенность на получение из почтамта 2000, Враский потребовал всех (а всех-то 7000), и Краевский принужден был дать ему доверенность на все 7000 -- последнюю надежду свою, потому что без них он сам должен жить с семейством, чем хочет -- хоть воздухом, а обо мне нечего и говорить. Сверх того, Враский, как вкладчик и акционер, вмешивался всегда в дела редакции, изъявлял Краевскому свое неудовольствие за полноту книжек, за помещение некоторых моих статей и пр. Все это, разумеется, терзало Краевского, хотя он все-таки делал по-своему. Владиславлев (ужасная скотина!) тоже как вкладчик (а вложил он 2000) мучает его своими дикими претензиями. Вот каковы дела! Какое нужно тут терпение, какая сила характера, сколько самоотвержения -- суди сам! Недавно Краевский выдержал порядочную лихорадку и недели полторы не выходил из дому; проседь его черных волос с каждым днем все пышнее расцветает. Дары объективного мира! Но он тверд и не хочет бросать святого дела. Я знаю его хорошо: в нем нет ни на волос корыстолюбия, и он действует и страдает для того, чтобы в литературе нашей не водворилась мерзость запустения, чтобы не восторжествовали сквернавцы и плюгавцы (Греч, Булгарин и Полевой), которых дерзость еще ограничивается "Отечественными записками" и "Литературной газетой". Боже мой! Что это за мир! Берут взятки открыто. Приехала гнусная певица Гесс, и Греч заранее провозгласил ее новою Каталани, за 20 билетов, и доставил ей блестящий сбор10. Греч владычествует в русской публике -- он могучее Сенковского: "Библиотека для чтения" расхвалит книгу, а "Пчела" разругает -- книга не идет; "Библиотека" разругает, "Пчела" расхвалит -- книга идет. Без "Пчелы" "Отечественные записки" имели бы верных 3000 подписчиков. Вот что значит Греч! Портрет Панаева и все выходки в "Литературной газете" против Греча11 производят сильный эффект -- он рвет волосы и неистовствует. Но если бы ты знал, чего, какой борьбы, каких усилий стоят нам эти выходки! Кн. Волконский (сын министра) -- помощник Дундука12, приятель Одоевского,-- и только благодаря этому обстоятельству цензура еще наполовину пропускает наши выходки, но при этом всегда бывает целая история. Обращаюсь к Краевскому. Брось он журнал -- и у него будет прекрасное место, деньги, чины. Но его, как и меня, бог наказал страстью к журналистике. Страшное наказание! Но Краевский твердо решился или поставить "Отечественные записки" на ноги, или пасть на их развалинах. Это железный характер! Кроме того, мы еще не без надежд. Несмотря на промахи Каткова (статья о снах) 13, на мои (глупая статейка о брошюрках Жуковского и Глинки, над которою смеялся весь Питер и публично тешился Греч), на Краевского (рецензия о повестях Павлова, на которую роптал весь Питер) и пр. и пр.; несмотря на новое и непереваримое для нашей публики направление "Отечественных записок", нынешний год, вместо того, чтоб убавиться стам трем подписчиков, их прибавилось сотни три, следовательно, на тот год смело можно ожидать прибавки еще по крайней мере 500 против нынешнего года. Это тем вероятнее, что конкретности и рефлексии исключаются решительно, кроме ученых статей, какова Бакунина14, и вообще нынешний год популярнее и живее, а между тем публика уже и привыкает к новости, и то, что ей казалось диким, становится уже обыкновенным. "Библиотека для чтения" падает, Смирдин ее продает с публичного торгу, и едва ли не купит ее Песоцкий15. "Сын отечества" во всеобщем презрении и позоре; есть надежда, что к концу года опять запоздает книжками,-- и теперь у него подписчиков вдвое меньше, чем у нас, и на тот год, вероятно, и еще на половину уменьшится. Все это для нас хорошо и обещает много. Следовательно, теперь вопрос в том, чтобы дотянуть до октября месяца и отделаться от участия подлецов, особенно Враского, и перенести журнал в другую типографию. Если бы Краевский мог достать 25 000 денег,-- то все пошло бы как нельзя лучше. Но для отделания от Враского достаточно и 15, даже 10 с грехом пополам. Итак, слушай. Прочтя это письмо, скачи к Огареву. Прежде всего возьми с него честное слово не говорить никому о том, что услышит от тебя, во всяком случае, чем бы ни кончились его с тобою переговоры -- успехом или отказом. Дай ему приблизительное понятие об обстоятельствах "Отечественных записок" и проси, не может ли он дать Краевскому взаймы 15 или хоть 10000. Если подписка на тот год будет слишком обильна (что может и не быть, однако может и быть), он получит сполна свои деньги, в противном же случае -- по частям и по срокам. Если захочет -- Краевский даст вексель. Если откажет, то хоть 5000 проси: по крайней мере, мы с Краевским будем обеспечены этою суммою, без чего "Отечественным запискам" нельзя существовать, а если Огарев и в 5000 откажет, то я до новой подписки не получу ни копейки, и хоть заживо в гроб ложись. Если почтешь за нужное, открой все это Кетчеру и вместе с ним действуй, только возьми с него честное слово хранить это в тайне. Кто-то писал ко мне (уж не ты ли?) или от кого-то слышал я, что "Наблюдатель" воскресает и хочет блистать ученостию московских профессоров, а Огарев будто бы дает деньги Степанову на печатание. Вздорное предприятие! Толку не будет никакого! Для журнала, хотя бы и ученого, нужен редактор, а редактора нигде нельзя найти -- в Москве особенно. Да и все эти господа только горячатся покуда и скоро охладевают16. Единства не будет и не может быть. Подписчиков больше пятнадцати и ожидать смешно. Ей-богу, досадно, если Огарев напрасно бросит деньги. Лучше бы употребить их на "Отечественные записки": тут будет толк. Итак, душа моя, похлопочи. Что будет, то и будет,-- а ты сделай свое дело и употреби все, что от тебя зависит, для успеха в нем. Я и сам нисколько не надеюсь, но отчего же не попробовать? Авось -- великое дело! Кстати: скажи Кудрявцеву, чтобы прежде генваря будущего года он и не ждал денег. Оно не совсем приятно, но имеет и свою хорошую сторону -- пусть понакопится, а тогда веселее будет получить побольше. Рецензии его прекрасны, я их не начитаюсь, а Краевский не ухвалится ими17. Проси его писать, писать и писать. Что ж делать -- потягнем, братия. Что же будет с нашею литературою, если мы бросим ее на жертву разбойникам? Да скажи Грановскому, что он -- сукин сын. Обещал статью, да и надул. От Редкина нечего и ждать: это чужой человек, да ему, вероятно, и не нравятся "Отечественные записки". А Грановскому, если и не нравятся,-- нужды нет, он все должен писать. Одну статью даровую, за кою получит он экземпляр "Отечественных записок", а прочие за деньги, с условием платы в начале будущего года. Скажи Кетчеру, чтобы немедленно слал к нам "Цахеса" да переводил бы "Мейстера Фло"18 и все, что еще не переведено из Гофмана. Вот еще человек: обещал трудиться для "Отечественных записок" и "Литературной газеты" и надул. А мы нуждаемся и в смеси и в мелких повестях, рассказах. Его труды не пропали бы -- каждая строка будет заплачена. Бога ради, подвигни его нелепость. Да и сам ты,-- о лысый и вдобавок не берущий денег -- и потому дважды любезный! -- что-нибудь сделай. Давай "Рим" -- это будет превосходною беллетрическою статьею19. Кланяюсь тебе в ноги и умоляю тебя с плачем и рыданием многим. Да! Кстати: пришла нам с Панаевым мысль -- перевести "Вильгельма Мейстера", да и хлопнуть в "Отечественных записках". Он уместится в 2-х NoNo, и хорошо б было в летние -- в июньский и июльский. Наша публика в рефлектированной поэзии больше нуждается, чем в художественной: последнюю она будет понимать, перешедши только через первую. Об идеях без рефлектированной поэзии тоже хоть не говори. Надо сделать так, чтобы и в отделе изящной словесности публика находила бы нечто гармонирующее с направлением и духом критики журнала. Понимаешь? Право, славная мысль, и я уверен, что "Вильгельм Мейстер" произвел бы эффект. А там бы и "Wahlvcnvandschaften" {"Избирательное средство" (нем.). -- Ред.}. Но мы вздумали переводить с Панаевым не сами: нам принадлежит только мысль гениальная, а гениальное исполнение не вздумает ли принять на себя Катков?20 Поговори-ко с ним. Всю ли ты тогда перевел "Креслериану"?21 Если не всю, то присядь-ко: это было бы предлогом перепечатать из "Наблюдателя" твой перевод. Нет ли и еще чего у Гофмана музыкально-повествовательного? В Питере много музыкантов, и твоя статья об италиянской и германской музыке произвела на них некоторый эффект22. Не вздумает ли Бакунин перевести записки Гете, переписку Гете с Шиллером?23 Это были бы и ученые и вместе журнальные статьи. Обшарь всего Гофмана -- нет ли чего непереведенного -- коли что найдешь, отдай Кетчеру перевести. Спроси Каткова, что такое "Петер Шлемиль" Шамиссо -- нельзя ли его перемахнуть?24 Вообще немецких повестей как можно больше. Краевский в отчаянии от необходимости помещать скверные французские повести, а немецких нет, да если б и было, некому дать перевести. Потягнем, братцы! Обо всем этом как можно скорее дай ответ, как можно скорее. Особенно об экспедиции при Огареве.

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   Все читал "Серапионовых братьев" Гофмана. Чудный и великий гений этот Гофман! В первый еще раз понял я мысленно его фантастическое. Оно -- поэтическое олицетворение таинственных враждебных сил, скрывающихся в недрах нашего духа. С этой точки зрения болезненность Гофмана у меня исчезла -- осталась одна поэзия. Много объяснил я себе и самого себя чрез это чтение. Вспомни повесть о трех друзьях -- это злая сатира на меня, и именно в лице того, которому отец мнимо возлюбленной его явился в колпаке, с букетом, читая его письмо. Вообще Серапионовский круг напомнил мне наш московский -- и много сладких и грустных ощущений прошло по моей душе. Что за чудесная вещь -- синьор Формика! Да все хорошо, даже и любовь свеклы к дочери астронома -- прелесть. Это не художественная поэзия, как Шекспира, Вальтер Скотта, Купера, Пушкина, Гоголя, но и не совсем рефлектированная, а что-то среднее между ними, и Гофман прекрасно вздумал сделать из нее новейшую "Тысячу и одну ночь", заставив друзей читать друг другу свои повести и рассуждать о них. Хочется перечесть его "Что пена в вине, то сны в голове"25. -- Альбано не фантасмагория, а действительность: теперь я это знаю. Но об этом после, а ты сперва скажи, как тебе кажется мое мнение. Вообще я страстно полюбил Гофмана, не расстался бы с ним, а о драмах Шиллера так и вспомнить тошно.

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   Смешно вспомнить, какие мы были (и отчасти есть и теперь) дети и какими словами мы злоупотребляли. Более всего досталось от нас художественному. Константин Аксаков наврал нам о божественных переводах К. К. Павловой -- и вот мы развопились: я прокричал в "Наблюдателе", Катков проревел в "Отечественных записках", а Константин Аксаков пропел амольным тоном то же в "Отечественных записках"26. Славный стих, славные переводы -- только перечесть их нет силы. Молодец Кудрявцев! Как ни распевал я ему на разные голоса эти дивные переводы, он ничего в них не видел. Теперь я вполне сознал, что слово художественный -- великое слово и что с ним надо обращаться осторожно и вежливо даже в приложении и к Пушкину с Гоголем и в их творениях отличать поэтическое от художественного и даже беллетрического. Например, "Капитанская дочка" Пушкина, по-моему, есть не больше, как беллетрическое произведение, в котором много поэзии и только местами пробивается художественный элемент. Прочие повести его -- решительная беллетристика. Кстати: вышли повести Лермонтова27. Дьявольский талант! Молодо-зелено, но художественный элемент так и пробивается сквозь пену молодой поэзии, сквозь ограниченность субъективно-салонного взгляда на жизнь. Недавно был я у него в заточении и в первый раз поразговорился с ним от души28. Глубокий и могучий дух! Как он верно смотрит на искусство, какой глубокий и чисто непосредственный вкус изящного! О, это будет русский поэт с Ивана Великого! Чудная натура! Я был без памяти рад, когда он сказал мне, что Купер выше Вальтер Скотта, что в его романах больше глубины и больше художественной целости. Я давно так и думал и еще первого человека встретил, думающего так же. Перед Пушкиным он благоговеет и больше всего любит "Онегина". Женщин ругает: одних за то, что <...>; других за то, что не <...>. Пока для него женщина и <...> -- одно и то же. Мужчин он также презирает, но любит одних женщин и в жизни только их и видит. Взгляд чисто онегинский. Печорин -- это он сам, как есть. Я с ним спорил, и мне отрадно было видеть в его рассудочном, охлажденном и озлобленном взгляде на жизнь и людей семена глубокой веры в достоинство того и другого. Я это сказал ему -- он улыбнулся и сказал: "Дай бог!" Боже мой, как он ниже меня по своим понятиям, и как я бесконечно ниже его в моем перед ним превосходстве. Каждое его слово -- он сам, вся его натура, во всей глубине и целости своей. Я с ним робок,-- меня давят такие целостные, полные натуры, я перед ними благоговею и смиряюсь в сознании своего ничтожества. Понимаешь ли ты меня, о лысая и московская душа!..

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   Что это делается с Катковым? Он в восторге от "Одесского альманаха", стихов Огарева и Сатина -- недостает ему приходить в восторг от повестей Н. Ф. Павлова29. Нет, этот малый еще долго не перебесится и не перекипит. Он полон дивных и диких сил, и ему предстоит еще много, много наделать глупостей. Я его люблю, хотя и не знаю, как и до какой степени. Я вижу в нем великую надежду науки и русской литературы. Он далеко пойдет, далеко, куда наш брат и носу не показывал и не покажет. Славная его статья о книжке Максимовича -- прекрасная статья: мысль так и светится в каждом слове30. Вообще преобладание мысли в определенном и ярком слове есть отличительный характер его статей и высокое их достоинство; а отсутствие сосредоточенной непосредственной теплоты сердечной -- недостаток, но это недостаток не его натуры, а его лет. Общее поглощает его дух и, так сказать, обезличивает его индивидуальность. Это чудное начало -- оно всегда останется с ним, укрепляясь наукою, а когда он перестанет пылить и из скверного поросенка сделается почтенным боровом, как ты да я,-- то и недостаток, о котором я говорил и которого определенно не умею назвать, исчезнет. Я читаю его статьи с особенным уважением -- наслаждаюсь ими и учусь мыслить. Да, брат, этот скверный поросенок, чтоб черт его побрал, так и смотрит в наставники иным боровьям, от них же первый есмь аз.

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   Статья Бакунина прекрасна, так прекрасна31, как гадка наблюдательская: выше этой похвалы я ничего не знаю. Этот человек может и должен писать -- он много сделает для успехов мысли в своем отечестве. О, зачем в нем так мало человеческого -- мне кажется, я бы его очень любил... К повести Соллогуба ты чересчур строг: прекрасная беллетрическая повесть -- вот и все32. Много верного и истинного в положении, прекрасный рассказ, нет никакой глубокости, мало чувства, много чувствительности, еще больше блеску. Только Сафьев -- ложное лицо. А впрочем, славная вещь, бог с нею! Лермонтов думает так же33. Хоть и салонный человек, а его не надуешь -- себе на уме. Да, он в образовании-то подальше Пушкина, и его не надует не только какой-нибудь идиот, осел и глупец Катенин (в котором Пушкин видел великого критика и по совету которого выбросил 8 главу "Онегина" 34, но и наш брат. Вот это-то и хорошо. Он славно знает по-немецки и Гете почти всего наизусть дует. Байрона режет тоже в подлиннике. Кстати: дуэль его -- просто вздор, Барант (салонный Хлестаков) слегка царапнул его по руке, и царапина давно уже зажила. Суд над ним кончен и пошел на конфирмацию к царю. Вероятно, переведут молодца в армию. В таком случае хочет проситься на Кавказ, где приготовляется какая-то важная экспедиция против черкес. Эта русская разудалая голова так и рвется на нож. Большой свет ему надоел, давит его, тем более, что он любит его не для него самого, а для женщин, для интриг <...> себе вдруг но три, по четыре аристократки и не наивно и пресерьезно говорит Краевскому, что он уж и в <...> не ходит, потому-де что уж незачем. Ну, от света еще можно бы оторваться, а от женщин -- другое дело. Так он и рад, что этот случай отрывает его от Питера. Что ты, Боткин, не скажешь мне ничего о его "Колыбельной казачьей песне"?35 Ведь чудо!

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   Ну, о себе что-нибудь -- нельзя же не занять тебя таким милым предметом. Плохо, брат, плохо, так плохо, что незачем бы и жить. В душе холод, апатия, лень непобедимая -- все валяюсь по постеле или гуляю, но ничего не делаю. Это письмо писано с неделю, да собирался приняться за него около месяца. И не люблю и не страдаю. Однако ж внутри что-то деется само собою. Все смотрю на себя, и чем больше смотрю, тем больше совлекаюсь с своего мишурного величия и шутовских ходуль, вижу, что я просто -- дрянь, дрянь и дрянь, чуть ли не кандидат в Шевы-ревы. И чем хуже вижу себя, тем лучше понимаю действительность, вижу вещи простее, а следовательно, и истиннее. Не подумай, чтобы опять бросился в крайность самоунижения. Нет, я вижу <себя> не столько гадким, сколько обыкновенным, каков я есть в самом деле, но каким я себе еще не представлялся. Лучшее, что есть во мне -- от природы наклонное к добру сердце, которое не может не биться для всего человеческого, но которое бьется для всего действительного не ровно, не постоянно, а вспышками. Я привязался к литературе, отдал ей всего себя, то есть сделал ее главным интересом своей жизни, мучусь, страдаю, лишаюсь для нее, но учиться, набираться сил, запасаться содержанием, словом, делать из себя сильное и действительное орудие для ее служения -- этого она от меня не дождется, и я об этом перестал уже даже и мечтать. Одним словом, я вижу, что я -- добрый малый, с добрым, горячим (то есть способным к вспышкам) сердцем, с неглупою головою, с хорошими способностями, даже не без дарования, но тут и все. В герои решительно не гожусь, и необыкновенного во мне нет ничего, а необыкновенным я мог казаться себе и даже другим потому только, что современная русская действительность уж чересчур отличается обыкновенностию. Дюжинная действительность! А на безлюдьи и Фома -- дворянин! Вследствие всего сказанного я не почитаю себя ни к чему обязанным, ни к чему призванным. Сначала бывает больно, самолюбие страждет от такого убеждения; но скоро становится легко, свободно, душа делается доступнее благим впечатлениям, на труде лежит меньше блеску, но больше задушевности и хоть небольшого, но истинного достоинства. Да, не герой, а просто -- добрый малый, как вы да я! -- как прекрасно сказал Пушкин36. Еще много предстоит возни с собою -- москводушие, как застарелая французская болезнь, еще ломом и тоскою дает знать о своем присутствии в костях, но -- спасибо Петербургу! -- это не долго продолжится. Надежды на счастие -- нет, уж и не мечтается о нем! не для меня счастие. От него отказалась уж и услужливая моя фантазия. Еще только едкое, горькое и болезненно подступающее к сердцу чувство, как острый пламень, мгновенно пронзающее грудь, да вспышки какого-то ожесточения и отчаяния дают еще знать, что не ото всего еще отрешился я; но и то сказать, что бы я был за человек, если бы во мне умерли человеческие потребности. Я не могу и не умею хвастаться своими подвигами (впрочем, по робости моего характера, не очень блестящими) по части чувственных наслаждений, молчу о них, но уже и не постыжусь заговорить о них, когда другие заговорят, не считаю их ни своим падением, ни развратом, предаюсь им часто и с спокойною совестью, с твердым убеждением в их необходимости, законности и в моем на них неотъемлемом праве. Что ж? Ведь мне одно только и осталось! И потому, надоест -- брошу, а пока не надоело -- давай сюда: откажу себе в книге, в платье, но в этом никогда, и не почитаю денег погибшими, как будто бы они шли на пищу. Одно меня ужасно терзает: робость моя и конфузливость не ослабевают, а возрастают в чудовищной прогрессии. Нельзя в люди показаться: рожа так и вспыхивает, голос дрожит, руки и ноги трясутся, я боюсь упасть. Истинное божие наказание! Это доводит меня до смертельного отчаяния. Что это за дикая странность? Вспомнил я рассказ матери моей. Она была охотница рыскать по кумушкам, чтобы чесать язычок; я, грудной ребенок, оставался с нянькою, нанятою девкою: чтоб я не беспокоил ее своим криком, она меня душила и била. Может быть -- вот причина. Впрочем, я не был грудным: родился я больным при смерти, груди не брал и не знал ее (зато теперь люблю ее вдвое), сосал я рожок, и то, если молоко было прокислое и гнилое -- свежего не мог брать. Потом: отец меня терпеть не мог, ругал, унижал, придирался, бил нещадно и площадно -- вечная ему память! Я в семействе был чужой. Может быть -- в этом разгадка дикого явления. Я просто боюсь людей; общество ужасает меня. Но если я вижу хорошее женское лицо: я умираю -- на глаза падает туман, нервы опадают, как при виде удава или гремучей змеи, дыхание прерывается, я в огне. Я испытываю тут все, что испытывает человек, долго волочившийся за женщиною, возбудившею в нем страсть, и делающий последнюю атаку на нее. Если бы я очутился (предположим это хоть для шутки) в подобном положении, мне кажется -- у меня хлынула бы кровь изо рту, из носу и из ушей, и, как труп, упал бы я на ее грудь. Если при мне называют по имени не только знакомую мне женщину, но и такую, имя которой я слышу в первый раз в жизни и которая живет за тридевять земель в тридесятом царстве, мне уж кажется, что я ее люблю и что все, смотрящие на меня, как сквозь щели, видят мою тайну, и я краснею, дрожу, изнемогаю... Адское состояние!.. Мне кажется, я влюблен страстно во все, что носит юбку. Когда я слышу рассказ о счастии любви или вижу перед собою любовь --
  
   Сердцу грустно, сердцу больно,
   Камнем на сердце тоска,
   И к глазам тогда невольно
   Поднимается рука37.
  
   Нет, не к глазам, а к груди, как бы для того, чтобы поддержать ее, чтоб она не разорвалась или не изошла кровью. Знаешь ли что, Боткин? Если любишь меня, если дорожишь моею к тебе любовию, бога ради, чтобы в твоих письмах ни слова не было об Entsagung {отречении (нем.). -- Ред.}38 и о подобных вздорах... Я болен, друг, страшною болезнию -- пожалей меня. В последний раз я говорю об этом, невольно увлекшись, больше не буду, право, не буду...

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   Да, я болен, недоверчив и подозрителен. Надо щадить меня и обращаться со мною осторожно. Не получая долго ответа от тебя на то письмецо, которое, как оказывается, затерялось, я уж и бог знает чего не передумал39. В это же время получил я письмо от Клюшникова40, наполненное его субъективным вздором, неделикатными выражениями о моих статьях, как-то: это темна вода во облацех, а это ты сказал глупость. Следовало бы засмеяться и отвечать ему общими местами, чтоб ничем отделаться от него. Но моя болезненная раздражительность вспыхнула -- на меня повеяло лютейшим врагом моим -- москводушием, и во мне вспыхнуло москводушие, и я вдался в нечто вроде полемической переписки. Ты знаешь этого человека, знаешь, как он не умеет ничего понять просто и понос или <...> другого человека объясняет созданиями Гете, Шиллера и религиозными моментами. Получив ответ на мой ответ, я не знал, куда деваться от самого себя, мною овладело почти отчаяние. Я ему говорю о том, что имеет право сказать свое мнение о моей статье, что она ему нравится или не нравится, но что он не имеет права говорить, что я пишу глупости и т. п.,-- а он несет мне дичь о Гете и Шиллере, которых преглупо понимает, пустился в старые сплетни. Он жаловался мне на то, что старые приятели его как-то оставили; я очень деликатно намекнул ему, что у него их и не было и что у всех у вас есть задушевные тайны, и что при таком положении всякому весело только с тем, с кем он может их делить, а что с Иваном Петровичем, благодаря его удивительной способности видеть все факты вверх ногами и разбалтывать поверенные ему тайны, никто делиться ими не захочет. Это, верно, его зацепило за живое,-- и он пишет, что презирает тайны, о которых сами владельцы их болтают, и сослался на Каткова, который ругает публично Щепкину, за которую некогда хотел отвалять мне бока4l. Можешь представить, как это на меня подействовало? Что это делает Катков? Подобное москводушие отвратительно и возмутительно. Во-1-х, Щепкина совсем не так пошла, как он воображает, точно так же, как некогда (и еще очень недавно) она была совсем не так велика и свята, как он воображал; во-2-х, низко на других вымещать досаду оскорбленного собственными дурачествами самолюбия; в-3-х, подло мстить женщине, а тем более девушке, какова бы она ни была; в-4-х, стыдно забывать хлеб-соль и ласку, чернить дом, где был принят, как родной, и притом, чем виноват Михаил Семенович, который любил и уважал Каткова и, право, сам стоит того же; в-5-х, как Катков не подумает о том, что если это дойдет до брата, то шутки будут плохи. Боюсь, чтобы и мое имя тут не вмешалось и то, что говорил я о ней друзьям, тебе и Каткову, как взрослому человеку, а не как школьнику, не провозгласилось во всеуслышание, как факт для доказательства. Люблю и уважаю Каткова, и ничто на свете не переменит моего понятия о нем, но, право, нисколько не удивлюсь, если услышу, что Катков меня ругает наповал: ведь еще поросенок! Я ему ни о чем этом не пишу, и ты ему от моего имени ничего не говори, но от себя сделай все, чтобы образумить его, сколько можно. Можешь представить, как подействовала на меня фраза отвалять бока, напомнивши грустное и тяжелое для меня время. Не знаю, говорил ли это Катков, но в религиозном экстазе чего невозможно! Когда все это шло таким образом, Краевский прочел мне письмо Каткова к себе, в котором сей неистовый юноша горько жалуется на чью-то руку, исказившую его экстатическую статейку о <...> "Одесском альманахе"42, хотя он и знает, что эта чья-то рука не чья иная, как Краевского; далее изъявляет свое неудовольствие (против) некоторых стихотворений Красова, будто бы не стоящих помещения43 (ох, уж эти мне поэты с своими большими претензиями по случаю маленьких вещей -- самый мелкий, несносный и раздражительный народ!), и удивляется, как они к нему попали, хотя и знает, что я их ему доставил. Прежде в письмах Краевскому он все изъявлял детское неудовольствие на меня, что я не отвечаю ему (а это именно и отбивало у меня последнюю силу отвечать ему), а тут уже и имени моего не упоминает. Вот и еще капля яду в мою и без того отравленную кровь! Вдруг получаю записку от Кетчера44, очень милую, но которой начало очень дурно на меня подействовало: с голоса Бакунина издевается он над моею действительностию и острит над какою-то моею Мильхен, из чего я и заключил, что ты читал ему мои письма45, и это окончательно дорезало меня; положило в лоск, как говорится. Боткин, я знаю, что ты прочел мое письмо Кетчеру из чистого желания разделить с другим волнение, произведенное моим письмом на тебя, короче, я знаю, что причиною неосторожного поступка была любовь ко мне; но заклинаю тебя всем, что тебе дорого и свято в жизни, не показывай моих писем никому, кроме Кудрявцева и Грановского да местами и отрывками -- Каткова. Довольно наделали мы глупостей и подурачили себя, допуская чужих в свои тайны. Пора п